Social Media Impact on Children: फ्रांस की संसद 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह बैन लगाने वाला कानून लागू करने जा रही है. इस के साथ ही फ्रांस यूरोपीय संघ में ऐसा कानून लाने वाला पहला देश बन जाएगा क्योंकि बच्चों को मैंटल डिसऔर्डर, साइबर बुलिंग और नशे जैसी लत से बचाने के लिए यह जरूरी है. सोशल मीडिया की वजह से साइबर बुलिंग, अश्लील कंटैंट, बच्चों में डिप्रैशन और पढ़ाई से ध्यान भटकना बढ़ रहा है. संसद के दोनों सदनों ने सहमति दे दी है. जल्द ही कानून पास हो जाएगा.
आज बच्चों को फोन देना मजबूरी बन गया है. औनलाइन क्लास, होमवर्क, सब के पास है वाली जिद आदि के नाम पर बच्चे पेरैंट्स से मोबाइल ले ही लेते हैं. लेकिन 10 से 14 साल की उम्र दिमाग के विकास की सब से नाजुक उम्र होती है. इस उम्र में सोशल मीडिया का डोपामिन बच्चों को 3 चीजें देता है- तुलना, लत और अकेलापन. रील्स के 30 सैकंड में बच्चा खुशी ढूंढ़ता है और असली जिंदगी उसे बोर लगने लगती है.
कुछ खतरे जो हर मां को जानने चाहिए
तुलना और इंसिक्योरिटी : ‘मेरे दोस्त की रील पर 1 लाख लाइक्स हैं, मेरे क्यों नहीं?’ ‘मैं मोटी/काली हूं क्या?’, ‘मुझे लोग पसंद क्यों नहीं कर रहे’ जैसे सवाल बच्चों के दिमाग में दौड़ने लगते हैं.
नींद और पढ़ाई का नुकसान : रात 12 बजे तक रील्स देखना, सुबह स्कूल में नींद आना, रिजल्ट खराब होते जाना जैसे साइड इफैक्ट्स बहुत कौमन हैं.
अजनबियों से खतरा : अनजान लोगों से बात, चैलेंज के नाम पर खतरनाक वीडियो आदि.
फिलहाल हमारे यहां सोशल मीडिया पर पूरी तरह बैन मुमकिन नहीं लेकिन ‘स्मार्ट पेरैंटिंग’ से बहुतकुछ बदला जा सकता है.
डिजिटल डाइट प्लान आप के लिए : 15 साल की उम्र से पहले व्हाट्सऐप फैमिली ग्रुप और पढ़ाई वाले ऐप ठीक हैं. पर इंस्टाग्राम और फेसबुक 15 साल कि उम्र के बाद अलाऊ करना चाहिए.
घर में फोन फ्री जोन बनाएं : डाइनिंग टेबल और बेडरूम में फोन बंद रखें. खाने की टेबल पर बातें हों, रील्स नहीं.
पेरैंटल कंट्रोल औन करें : यूट्यूब किड्स, गूगल फैमिली लिंक जैसे ऐप से बच्चा क्या देख रहा है, कितनी देर देख रहा है आदि सब चैक करें.
पैशन को बढ़ावा दें : रोज करीब एक घंटा गार्डनिंग, पेंटिंग, कुकिंग, सिंगिंग जैसी हौउबीज में बच्चे को इन्वौल्व करें. तभी वह क्रिएटिव बनेगा.
स्क्रीन टाइम की जगह ग्रीन टाइम : हरेक घंटा स्क्रीन = 30 मिनट गार्डन/खेल/पढ़ाई. चार्ट बना कर फ्रिज पर लगाएं. हफ्ते में 5 दिन टार्गेट पूरा करने वाले बच्चे को संडे को उस की पसंद का खाना बना कर दें.
खुद उदाहरण बनिए : आप रातभर रील्स देखेंगे तो बच्चा कैसे मानेगा? जैसा हम करेंगे वैसा वह सीखेगा. इसलिए पहले खुद पर कंट्रोल रखें.
याद रखिए, मोबाइल एक औजार है. अगर सही उम्र में, सही निगरानी में दिया जाए तो वरदान है वरना वही औजार बच्चों के बचपन को छीन लेता है. बच्चे का भविष्य ‘स्क्रौल’ में नहीं ‘स्कूल’ और अच्छी आदतों में है. Social Media Impact on Children





