Caste Discrimination: बहुत सख्त कानूनों और कोशिशों के बाद भी दलित प्रताड़ना के मामले कम नहीं हो रहे. जाहिर है इस की वजह तो धर्म ही है जिस ने दलित प्रताड़ना को धर्म का हिस्सा घोषित कर रखा है हालांकि एससीएसटी एक्ट के वजूद में आने के समय से ही दबंगों की मनमानी पर लगाम लगी है लेकिन गिरफ्तारी और जमानत को ले कर कुछ सवाल अभी भी जवाब के मुहताज हैं.

23 वर्षीय गोलू अहिरवार भले ही विकलांग है लेकिन देखने में बेहद स्मार्ट और सलीके से रहने वाला है. बुन्देलखंड इलाके के दमोह जिले के बिजोरी पाठक गांव के इस दलित युवा की शादी की रस्में 21 अप्रैल को हंसीखुशी, नाचगाने के साथ हो रही थीं. एक रस्म होती है रछ्वाई या बिन्नाई की जिस में दूल्हा घोड़े पर सवार हो कर पूरे गांव का चक्कर लगाता है. उस दौरान घोड़े की लगाम उस की बूआ या बहन पकड़ कर चलती है. यह ‘मिनी बरात’ कुछ दूर लोधी महल्ले पहुंची ही थी कि कुछ मोटरसाइकिल सवारों ने उस का रास्ता रोक लिया.

गोलू के घर वालों ने उन लोगों से रास्ता छोड़ने के लिए कहा तो वे लोग बिफर पड़े और मारपीट करने लगे. गोलू को घोड़े से घसीट कर नीचे उतार दिया. उस ने इस का विरोध किया तो दबंगों में से एक ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते नफरत से कहा कि तुम्हारी जाति के लोगों को घोड़े पर बैठने का हक नहीं. इतना कहने के साथ ही उन दबंगों ने जमीन पर पटक कर गोलू की कुटाई शुरू कर दी. जो भी उसे बचाने आया उसे भी कूटा. इन में गोलू की बहन मनीषा भी शामिल थी. उसे तो और भी ज्यादा बेरहमी से पीटा गया और उस के गहने भी छीन लिए गए.

देखते ही देखते हल्ला मच गया. दलित समुदाय के लोग इकट्ठा हो कर नजदीकी हटा थाने पहुंच गए और उन दबंगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. इस के पहले कुछ लोगों ने घटना का वीडियो बना कर उसे कुछ व्हाट्सऐप ग्रुपों में पोस्ट कर दिया था. दूसरे दिन पुलिस ने 4 आरोपियों विश्वनाथ सिंह, घुप्पू, बिच्छू और चिन्नू के खिलाफ एससीएसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करते उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. ये चारों ही लोधी समुदाय के थे. एसपी श्रुतकीर्ति ने आरोपियों पर एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी कार्रवाई करने के लिए कलैक्टर से सिफारिश की.

घटना में अगर नया कुछ है तो वह इतना है कि दलित समुदाय के लोगों ने दबंगों के सामने घुटने नहीं टेके और इकट्ठा हो कर थाने को लगभग घेर लिया. आसपास के इलाकों के दलितों ने भी गोलू के परिवार का साथ दिया और अजाक जैसे संगठनों ने भी विरोध और एतराज दर्ज कराया. फरार आरोपियों को दूसरे दिन ही धर लिया गया और अदालत में भी पेश कर दिया गया. अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया. एसपी महोदया ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और जातिगत आधार पर अभद्रता या भेदभाव बरदाश्त नहीं किए जाएंगे.

जैसेतैसे पुलिस की मौजूदगी में घायल गोलू की शादी हुई. 4 दिनों तक बिजोरी पाठक गांव छावनी सरीखा बना रहा. गोलू के घर के बाहर भी जवान तैनात किए गए ताकि कोई अनहोनी न हो, यानी, दबंग लोधी दोबारा हिंसा न कर सकें.

ऐसा कोई पहली या आखिरी बार नहीं हुआ था बल्कि दलित दूल्हों को घोड़े पर न बैठने देने की वारदातें अकसर, खासतौर से मध्यप्रदेश सहित राजस्थान और उत्तरप्रदेश से, सामने आती रहती हैं. यह ऊंची जाति वालों का खास शगल है कि दलित दूल्हे को घोड़े पर चढ़ा देख वे विफर उठते हैं. उन से दलितों की यह आन, बान और शान बरदाश्त नहीं होती. लिहाजा, वे बरात और दूल्हे पर हमला करने से खुद को रोक नहीं पाते.

लेकिन अब सबकुछ पहले सा आसान नहीं रह गया क्योंकि दलित समुदाय पहले जैसा दबाकुचला नहीं है. वह अपने क़ानूनी हक न केवल समझने लगा है बल्कि उन का इस्तेमाल करने के गुर भी सीख गया है. उन में से अहम हैं एकजुट हो कर थाने पहुंचना, सोशल मीडिया पर अपने खिलाफ हुई ज्यादतियों का हल्ला मचाते न्याय मांगना और जरूरत पड़ने पर धरनेप्रदर्शन भी करना. ऐसा वे इसलिए करते हैं ताकि मामले को दबाया न जा सके. इस से उन का आत्मविश्वास बढ़ता है, डर कम होता है और दबंग डरते हैं.

एससी एसटी एक्ट से बिजोरी पाठक गांव के चारों आरोपी अब लंबे समय तक जेल में रहेंगे, बेल उन्हें मिलेगी लेकिन कब, यह ट्रायल के दौरान पता चलेगा क्योंकि इन चारों के खिलाफ एससीएसटी एक्ट यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3 (5) के तहत भी मामला दर्ज हुआ है जिस में जमानत आसानी से तो क्या, मुश्किल से भी नहीं मिलती. आईपीसी की धाराएं 126 (2), 351 (2), 115 (2) और धारा 296 (बी) इन पर लगी हैं जिन में आमतौर पर जमानत मिल जाती है पर एससीएसटी की धाराएं भी इन के साथ लग जाएं तो अदालत को इसे गंभीर अपराध मानते सख्ती बरतनी ही पड़ती है. अग्रिम जमानत का तो प्रावधान इस में है ही नहीं. सो, सवर्ण समुदाय के लोग इस से डरते हैं.

दरअसल, जमानत देने से जो धारा रोकती है वह 18 (ए) है. इस में तो प्रावधान यह भी है कि एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस को शुरुआती जांच की भी जरूरत नहीं. यानी, आरोपी कोई भी हो, उस की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस को किसी की इजाजत लेने की बाध्यता नहीं रहती. यह वही धारा है जिसमे सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर जमकर बबाल देश भर में दलितों ने मचाया था .इस बबाल में जगह जगह हिंसक प्रदर्शनों के दौरान कई मौतें हुई थीं .

सुरेश काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आदर्श कुमार और जस्टिस उदय उमेश ललित की बैंच ने 20 मार्च, 2018 को कहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले प्रारंभिक जांच हो और अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी हो तो पुलिस पहले सरकार की इजाजत ले. अगर आरोपी आम व्यक्ति है तो एसएसपी की इजाजत काफी है. इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस में कुछ विशेष परिस्थितियों में अग्रिम जमानत देने की बात भी कही थी.

गौरतलब है कि धारा 18 में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है. दलितों के देशव्यापी विरोध और हिंसा के चलते सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलते पुराने सख्त प्रावधान बहाल कर दिए थे. तब सवर्णों में नरेंद्र मोदी और उन की सरकार के प्रति भारी गुस्सा दिखा था जिस से साबित यह हुआ था कि प्रधानमंत्री कोई भी हो और सरकार किसी भी दल की हो, उसे दलितों के स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाना ही पड़ेंगे. हालांकि अपने फैसले में जस्टिसों ने यह भी कहा था कि एससीएसटी एक्ट का कुछ मामलों में गलत इस्तेमाल हो रहा है और कई बार बिना किसी ठोस सुबूत के भी एफआईआर दर्ज हो जाती हैं. इसलिए निर्दोष व्यक्ति को बचाने के लिए थोड़ी ढील दिया जाना जरूरी है.

इस फैसले का सवर्ण समुदाय ने दिल खोल कर स्वागत किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सवर्ण समुदाय की दुखती रग पर हाथ रखते संविधान के अनुच्छेद 21 का भी हवाला दिया था जिस के मुताबिक किसी की स्वतंत्रता बिना किसी उचित प्रक्रिया के छीनी नहीं जा सकती. सो, बिना जांच के गिरफ्तारी करना न्यायसंगत नहीं है. तुरंत गिरफ़्तारी के प्रावधान पर भी कोर्ट ने एतराज जताया था.

दलितों के संगठित विरोध के चलते यह फैसला बड़ा और अहम सामाजिक बहस का मुद्दा बन गया था जिस में दलित और सवर्ण दोनों पक्षों की दलीलें अपनी जगह दमदार थीं. तो फिर, विकल्प क्या है? बिजोरी पाठक गांव और देशभर के उन जैसे दबंगों के मद्देनजर देखें तो धारा 18 (ए) बहुत जरूरी है क्योंकि जो कुछ भी हुआ उस की वीडियो रिकौर्डिंग पीड़ित पक्ष ने की. घटना के चश्मदीद गवाह भी हैं, घायलों की मैडिकल रिपोर्टें भी हैं. अगर इन्हें जमानत या अग्रिम जमानत मिल जाती तो तय है कि ये और इस तरह के लोग दलितों को और दबाने से बाज न आते. वे मूंछों पर ताव देते कहते यही कि क्या उखाड़ लिया पुलिस, कानून और अदालत ने हमारा. जवाब में दलित या तो पलायन कर जाते या फिर जवाबी हिंसा करने को मजबूर होते और नतीजा जातीय युद्द की शक्ल में सामने आता जो सभ्य समाज के उसूलों से मेल नहीं खाता.

लेकिन सभ्य समाज के उसूलों से तो यह बात या हकीकत भी मेल नहीं खाती कि किसी बेगुनाह सवर्ण को किसी दलित की झूठी शिकायत पर गिरफ्तार कर सीधे जेल भेज दिया जाए क्योंकि इस में भी कोई शक नहीं कि इस एक्ट का बेजा इस्तेमाल भी होता है. दिलचस्प बात तो इस में यह भी है कि कई बार सवर्णों का एक गुट अपने विरोधी गुट या व्यक्ति को फंसाने के लिए भी इस का सहारा लेता है. यानी, दलितों को कुछ लेदे कर उकसाता है कि वह फलां के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज करा दे.

इस असमंजस या खामी का कोई इलाज किसी के पास है नहीं क्योंकि अगर सवर्णों को दलितों पर अत्याचार करने को फ्रीहैंड मिल गया तो देश फिर से पौराणिक युग में चला जाएगा जहां दलितों को मारनाकुचलना, बेगार करवाना, जातिगत शब्दों और संबोधनों से उन्हें बेइज्जत करना, उन की जमीनजायदाद छीन लेना, उन की औरतों की इज्जत से खेलना और उन्हें लतियाने व जुतियाने जैसे आदेशनिर्देश मनु स्मृति जैसे धर्मग्रंथ देते हैं. बहुत सख्त कानून के बाद भी अगर बिजोरी पाठक गांव जैसी घटनाएं रोजमर्रा की बात हैं तो सही यही लगता है कि जिस हिंसा और प्रताड़ना के गवाह और सुबूत मौजूद हों उन में छूट देने की जरूरत नहीं.

लेकिन जहां दलित की मंशा ख़राब होने या सवर्ण को जानबूझ कर परेशान करने की जरा सी भी गुंजाइश लगे तो जमानत देना हर्ज की बात भी नहीं, बशर्ते कथित आरोपी के भागने का और पीड़ित पर दबाब डालने का डर या अंदेशा न हो. बिलाशक यह मुश्किल काम है लेकिन है विकल्पहीन. ऐसे मामलों में थाने से ही जमानत का प्रावधान एक बेहतर रास्ता है.

इसलिए बना था एससीएसटी एक्ट

एससीएसटी एक्ट के वजूद में आने से पहले दलितों की सुनवाई नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी साबित होती थी. उन की शिकायतें आईपीसी की धाराओं के तहत दर्ज की जाती थीं, इसलिए उन पर कार्रवाई भी सामान्य तरीके से होती थी. मसलन, अगर किसी दबंग ने दलित के साथ मारपीट की तो धारा 323 और 325 लगती थीं. गालीगलौज और मामूली हिंसा, जैसे धक्कामुक्की और धमकी, पर 504 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज कि जाती थी. इसी तरह दलित औरत के बलात्कार पर धारा 376 ही लगती थी.

इस में दिक्कत यह थी कि अपराध या अत्याचार जाति की बिना पर नहीं माना जाता था. ये सामान्य अपराध ही माने जाते थे, खास किस्म के नहीं. इस दिक्कत से भी बड़ी दिक्कत यह थी कि दलितों के जातिगत अपमान या उत्पीडन की अपनी अलग कोई क़ानूनी पहचान नहीं थी. इंडियन पीनल कोड सिर्फ अपराध देखता था, उसे जाति से सरोकार न था. इस से होता यह था कि अपराध साबित ही नहीं हो पाता था क्योंकि दलितों का साथ कोई नहीं देता था. पुलिस भी जांच में ढिलाई बरतती थी और गवाह या तो मिलते नहीं थे और कुछेक मामलों में अगर मिल भी जाते थे तो मुकर जाते थे जिस की वजह होता था दबंग सवर्णों का कहर जिसे किसी का खौफ या लिहाज नहीं था.

इस स्थिति को बिजोरी पाठक की घटना से जोड़ कर देखें तो होता यह कि दोषी लोधियों का कोई कुछ बिगाड़ न पाता. अगर डर कर कुछ दिनों के लिए गांव छोड़ कर न भागते तो दलितों की रिपोर्ट जैसेतैसे पुलिस दर्ज कर भी लेती तो वह धूल फांकने को छोड़ दी जाती. जांच के लिए पुलिस जाती तो तय है कि इन लोधियों का `जलपान` ग्रहण कर और दूसरे तरीकों से भी `अनुग्रहित` हो कर थाने वापस आ जाती. उलटे, गोलू को ही थाने बुला कर तरहतरह से समझाया जाता कि जिस से वह रिपोर्ट वापस ले लेता.

यदि मामला कोर्ट तक पहुंच भी जाता तो मारे डर के एक दलित भी गवाही देने तैयार न होता और अगर कोई हो भी जाता तो वकील सफाई के सवालों के जवाब में कहता यही कि मोटरसाइकिल पर कौनकौन सवार था, मैं ढंग से देख नहीं पाया, किस ने किस को मारा और गोलू को घोड़े से नीचे किस ने उतारा, यह भी मैं नहीं देख पाया. उस वक्त अफरातफरी मची थी जिस के चलते कुछ दिख नहीं रहा था.

ऐसे में फैसला क्या आता, बताने की जरूरत नहीं. ऐसा लगभग देशभर में हर मामले में हो रहा था और दलित प्रताड़ना व अत्यचार की शिकायतें बढ़ती जा रही थीं. सो, उन की हिफाजत और गैरत के लिए एक कानून बना जिस का नाम है- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989. साल 1989 में कांग्रेस संसद में बहुमत में थी. उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे. सो, बिल आसानी से पारित हो गया. तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने इसे पेश किया था जो खुद भी दलित समुदाय (मजहबी सिख) से थे. लिहाजा, उन्होंने इसे पास कराने में खासी फुरती और दिलचस्पी ली थी.

वामपंथी दलों ने इस का स्वाभाविक स्वागत ही किया था. विरोध अगर कोई कर सकता था तो वह भाजपा थी लेकिन तब उस के 2 सांसद जगन्नाथ राव जोशी और ए के पटेल ही लोकसभा में थे जो टुकुरटुकुर इस ऐतिहासिक कानून को वजूद में आते देखते रहे. इस के सिवा उन के पास कोई दूसरा रास्ता न था.

भाजपा के दोनों दिग्गज अटल बिहारी वाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी 1984 का चुनाव क्रमश ग्वालियर और नई दिल्ली सीट से हार चुके थे. वाजपेयी को दिग्गज कांग्रेसी माधवराव सिंधिया और आडवाणी को दूसरे धाकड़ कांग्रेसी के सी पंत ने हराया था.

ये दोनों सवर्णवादी संसद में होते तो तय यह भी है कि अधिनियम उतनी आसानी से और जस का तस पारित नहीं हो पाता जितनी आसानी से हो गया. कांग्रेस को मिले प्रचंड बहुमत का फायदा राजीव गांधी ने दलितहित के लिए उठाया. संसद में हुई बहस दिलचस्प इस लिहाज से थी कि बोलने बाले अधिकतर सांसदों ने अपने अपने संसदीय क्षेत्र में हो रहे दलित अत्याचारों की दास्तां सुनाई और देशभर के आंकड़ों का जिक्र किया. एकाध सांसद ही ने इसे बहुत कड़ा बताते हुए इस में संतुलन की बात कही. लेकिन जहां 95 फीसदी सदस्य सहमत हों वहां ऐसे सुझावों पर कोई कान नहीं देता. आखिरकर, लोकसभा और राज्यसभा से ध्वनिमत से पारित होने के बाद 11 सितंबर, 1989 को राष्ट्रपति आर वेंकटरमण के दस्तखत होते ही 30 जनवरी, 1990 को लागू यानी प्रभावी हो गया.

ये थे सख्त प्रावधान

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग सहित कई संसदीय समितियों ने भी सिफारिश की थी कि दलितों की हिफाजत, गैरत और न्याय के लिए कड़े प्रावधान इस अधिनियम में होने चाहिए वरना इस का हाल भी प्रोटैक्शन औफ सिविल राइट एक्ट 1955 जैसा हो जाएगा जो मूलतया छुआछूत रोकने के लिए बना था. उस में सजा के प्रावधान बहुत हलके थे और उसे लागू करने में कई तकनीकी खामियां भी थीं. सो, सभी ने एक सुर में कहा था कि नया कानून सख्त होना चाहिए, जो हुआ भी.

इस अधिनियम ने पहली बार एससीएसटी के खिलाफ होने वाले अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया. साथ ही, दोषियों को कड़ी सजा के प्रावधान किए गए. पीड़ितों को हिफाजत, पुनर्वास व आर्थिक सहायता के भी प्रावधान जोड़े गए. अब जातिसूचक गालियां देना, सार्वजनिक तौर पर दलितों का अपमान करना, उन की जमीन छीनना या उस पर कब्जा करना, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करना और दलित महिला से छेड़छाड़ करना या उस का बलात्कार करना सहित दलितों के घर जलना वगैरह गंभीर अपराधों की श्रेणी में आ गए. ये अपराध गैरजमानती थे और अग्रिम जमानत का प्रावधान भी एक्ट में नहीं था. अलावा इस के, दलित अत्याचारों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन से दलितों पर कहर ढाना पहले सा आसान नहीं रह गया था. ऐसा भी नहीं है कि इस अधिनियम के लागू होने से दलित प्रताड़ना और अत्याचार बंद हो गए हों बल्कि हुआ इतना कि तेजी से मामले रिपोर्ट होने लगे और सवर्ण संभल कर दलितों से डील करने लगे. यानी, इस तरह के विशेष कानून न्याय के साथसाथ लोगों को सभ्य समाज में रहने का सलीका भी सिखाते हैं.

उफ, ये बदसुलूकियां और तथाकथित सभ्य समाज

सभ्य समाज होने का हमारा दावा सिर्फ टैक्नोलौजी और सुखसुविधाओं के दम पर ही है वरना तो सामाजिक मानसिकता बेहद वहशी, क्रूर और पाशविक है. एससीएसटी एक्ट की विभिन्न धाराएं तो बताती ही हैं लेकिन उन से जुड़े अपराध इन धाराओं को जस्टिफाई करते हुए हैं कि दलितों पर कैसेकैसे अत्याचार और कहर ढाए जाते हैं. ये लगभग कालेजों में होने वाली रैगिंग की तरह हैं जो धीरेधीरे कम हो रही है लेकिन जातिगत रैगिंग बढ़ती जा रही है.

1. धारा 3 (1) (आर) – सार्वजनिक जगह पर जातिसूचक गाली देना या अपमान करना.

2. धारा 3 (1) (एस) – किसी एससीएसटी व्यक्ति को उस की जाति से संबोधित कर अपमानित करना.

3. धारा 3 (1) (क) – जबरन गंदा या अखाद्ध यानी न खाए जाने वाला खाना खिलाना.

4. धारा 3 (1) (ख) – दलितों के घर या इलाके में मल, मूत्र, सीवेज, लाश आदि फेंक कर उन्हें अपमानित करना.

5. धारा 3 (1) (ग) एससीएसटी के किसी व्यक्ति को चोट, अपमान या परेशान करने के इरादे से उस के पड़ोस में मलमूत्र, कचरा, शव या कोई और घृणा पैदा करने वाला पदार्थ फेंकना.

6. धारा 3 (1) (घ) – एससीएसटी के किसी व्यक्ति को जूते की माला पहनाना या उसे नग्न या अर्धनग्न कर घुमाना.

7. धारा 3 (1) (ड) – एससीएसटी के किसी व्यक्ति के कपड़े जबरदस्ती उतारना, सिर मुड़ाना, मूंछ कटाना, चेहरा या शरीर रंगना या ऐसा दूसरा कोई काम करना जो मानवीय गरिमा के खिलाफ हो.

8. धारा 3 (1) (झ) एससीएसटी के किसी व्यक्ति को कब्र खोदने, मानव या मवेशियों के शव ले जाने को मजबूर करना.

9. धारा 3 (1) (न) – एससीएसटी के लोगों द्वारा पूज्य किसी वस्तु, मसलन मूर्ति, फोटो आदि को नुकसान पहुंचाना या अपवित्र करना.

10. धारा 3 (1) (एफ) – दलितों की जमीन या जायदाद पर नाजायज कब्जा करना.

11. धारा 3 (1) (जी) – उन्हें जमीन इस्तेमाल करने से रोकना.

12. धारा 3 (1) (जेड) – घर या गांव छोड़ने को मजबूर करना.

13.धारा 3 (1) (4) – बंधुआ मजदूरी या जबरन काम यानी बेगार करवाना.

14. धारा 3 (1) (डब्ल्यू) (1) (2) – एससीएसटी की महिला की मर्यादा भंग करना या यौन उत्पीड़न करना.

15. धारा 3 (1) (पी) – झूठा केस करना या गलत जानकारी दे कर फंसाना.

इन धाराओं से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि आरक्षित वर्ग के लोगों के साथ देशभर में कैसाकैसा दुर्व्यवहार किया जाता है. इन उपधाराओं में बताए गए अपराधों की पुष्टि ये कुछ समाचार करते हैं:

1 – महाराष्ट्र के सांगली में म्यूजिक कंपोजर पलाश मुच्छल के खिलाफ जातिसूचक गाली देने का मामला धारा 3 (1) के तहत दर्ज हुआ था. नवंबर 2024 में दर्ज इस मामले में पीड़ितों विजय प्रकाश माने और विद्यान माने ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी. गौरतलब है कि ये दोनों नामी महिला क्रिकेटर स्मृति मंधाना की दोस्त हैं.

2 – गुजरात के राजकोट विसावदर तालुका के भूटडी गांव में रामजी मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान 29 अप्रैल, 2026 को भोज के दौरान दलितों को अलग बैठाया गया. उन्हें अलग बरतन लाने पर ही खाना खिलाया गया. धारा 3 (1) (जेड) के साथ बीएनएस यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (2) और 54 भी लगाई गईं.

3 – इसी साल 3 फरवरी को मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के कसबे अम्बाह में धर्मेंद्र तोमर नाम के युवक ने अपने ही दलित किराएदार युवक को खुद के साथ ही अश्लील हरकतें करने व घुटनों के बल बैठने, मुरगा बनाने और खुद को ही पीटने को मजबूर करने का वीडियो वायरल हुआ तो उस की बिना पर पुलिस ने धर्मेंद्र को धारा 3 (1) (डब्ल्यू) व अन्य धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया.

4 – अब से कोई ढाई साल पहले उस वक्त सनसनी मच गई थी जब मध्यप्रदेश के सीधी जिले में प्रवेश शुक्ला नाम के शख्स ने एक आदिवासी युवक के चेहरे पर पेशाब कर दिया था. इस अमानवीय और शर्मसार कर देने वाली घटना की चर्चा देशभर में हुई थी. इस पर भी तभी कार्रवाई हुई जब इस का वीडियो वायरल हुआ. धारा 3 की लगभग सभी धाराएं प्रवेश शुक्ला के खिलाफ दर्ज कर कार्रवाई की गई. चूंकि हल्ला ज्यादा मच गया था, इसलिए प्रशासन ने आरोपी का घर भी बुलडोजर से ढहा दिया और उस के खिलाफ नैशनल सिक्योरटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया.

5 – इस से भी शर्मनाक और पाशविक मामला राजस्थान के जालौर से सामने आया था जहां के सरस्वती स्कूल के एक शिक्षक चैन सिंह ने एक दलित छात्र इंद्र मेघवाल की इतनी बेरहमी से पिटाई की थी कि वह मर गया था. दलित इंद्र का गुनाह इतना भर था कि उस ने प्यास लगने पर मटके से पानी ले लिया था. यानी, दलित बच्चे के छूने भर से मटका अपवित्र हो जाता है जिस की सजा मौत टीचर ने मुकर्रर की.

6 – बीती 4 मई को मुरैना के ही एक अधेड़ दलित मोहनलाल जाटव को दबंगों ने जनकपुर गांव में नंगा किया और उस के गले में जूतों की माला पहनाई. मुरैना के सिविल लाइन्स थाने में गुर्जर समुदाय के आरोपियों दिलीप, भूरा और सुरेंद्र के खिलाफ धारा 3 (1) (घ) के तहत मामला दर्ज कराया गया. यहां भी भीम आर्मी और बसपा जैसे सियासी दलों ने खासा हंगामा मचाया था.

ऐसे घृणित मामलों की भरमार है जिस से यह साबित होता है कि ये धाराएं व उपधाराएं गहरी रिसर्च के बाद बनाई गई हैं. हैरत तो इस बात की है कि मीडिया ऐसे गंभीर और संवेदनशील मामलों का जिक्र तक नहीं करता क्योंकि उस में भी सवर्णों की भरमार और दबदबा है. पुलिस को भी ये मामले सिरदर्दी लगते हैं. उस की पहली कोशिश यह रहती है कि पीड़ित को बहलाफुसला कर या डराधमका कर चलता कर दिया जाए जिस से सफेदपोश सवर्णों की काली करतूतें ढकी रहें.

इस कानून की धारा 3 (1) (ए) के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति, जो स्वयं एससी या एसटी जाति का न हो, किसी एससीएसटी जाति के किसी व्यक्ति को कुछ गंदा खाने या पीने के लिए जोर डालता हो तो उसे 6 महीने से 5 साल तक की सजा मिल सकती है. यह अपनेआप में ऐसा कृत्य है जो रोंगटे खड़े करने वाला है, ऐसा लगता है कि ऐसा किया जाता रहा है जो आश्चर्य से भर देता है. तभी यह अपराधों की लंबी सूची में सब से ऊपर है.

इस तरह के बीसियों कृत्य जो अपराध घोषित किए गए है जो अपनेआप में 20वीं सदी में क्या, पहली सदी में भी सोचे नहीं जा सकते थे लेकिन हमारे समाज में हो रहे थे. किसी एससीएसटी के घर में मानव टट्टी, गंदा पानी फेंकना दूसरा अपराध गिनाया गया है. तीसरा अपराध इस समुदाय को चोट पहुंचाना, उस का अपमान करना उस के रिहायशी इलाकों में गंद फेंकना, गंदा पानी फेंकना, मरा जानवर या ऐसी ही कुछ गंदगी फेंकना है.

इन अपराधों की ऊपर दी गई लंबी सूची ही यह दर्शाने के लिए काफी है कि एससीएसटी समाज के साथ क्याक्या होता है. जूतों की चप्पलों की माला पहना कर जुलूस निकालना, नंगा कर के रखना, गंदा करना, मूंछें काटना, मुंह पर कालिख या कोई रंग पोतना भी इसी सूची में हैं. ये अपराध इन जातियों के साथ देशभर में होते रहते हैं, इन के समाचार अकसर दिखतेछपते रहते हैं.

जिस तरह के मामले पुलिस में इस कानून के बनने के बाद या पहले आए थे, उन से साफ है कि दलितों और जनजातियों के खिलाफ सिर्फ सामान्य मारपीट नहीं होती जो ऊंची जातियों में होती रहती है, इन के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार होता रहा है कि जिसे अलग तरह के अपराध की संज्ञा देना गलत नहीं कहा जा सकता. सामाजिक नोचकाट ही इन जातियों के लोगों को भूखा मार सकने के लिए काफी होता है क्योंकि ये अधिकतर कर्ज में डूबे रहते है और आमदनी बंद हो जाने के बाद ये एकदिन मौत की कगार पर पहुंच सकते हैं.

इन अपराधों में वोट डालने पर दबाव डालने या किसी तरह के प्रलोभन देने के काम भी शामिल हैं जो चुनावों में बड़े हथियारों की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. ऊंची जातियां गांवों, कसबों में दलितों के नए जूते, कपड़े पहनने तक पर आपत्ति करने से बाज नहीं आतीं जो इस कानून में अपराध माना गया है. इन जातियों के लोग जादूटोना कर के दूसरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ऐसा आरोप लगाना और उस के बाद उस के खिलाफ कुछ हरकत करना भी अपराध है.

अपराधों की लंबी सूची पढ़ने पर साफ लगता है कि यह सब तो एससीएसटी जातियों के साथ होता रहता है क्योंकि मीडिया में लाख छिपाने के बावजूद कुछ मामले भी सामने आ ही जाते हैं. इस कानून की धारा ऊंची जातियों के सरकारी अधिकारियों पर जिम्मेदारी डालती है कि इन अपराधों पर कार्रवाई न करना भी दंडनीय होगा. यह प्रावधान इसलिए रखा गया है कि कहीं कानून कागजों पर ही न रह जाए, नीची जातियां इस कानून से अपना बचाव ही न कर पाएं और हर शिकायत की फाइलों के ढेर में दबा न दिया जाए.

इस कठोर कानून में अपराधी की जमीनजायदाद कुर्क करना भी शामिल है जिस का अर्थ यह है कि अपराधी के काम की सजा पूरे परिवार को भुगतनी पड़ सकती है. इन अपराधों में से बहुत से ऐसे हैं जो सामान्यतया इंडियन पीनल कोड या उस के भगवाकरण वाले संस्करण ‘भारतीय न्याय संहिता’ के अंतर्गत नहीं आते और ऊंची जातियां आपस में एकदूसरे के खिलाफ नहीं करते. इन में चोट पहुंचाने की इच्छा कम होती है, बचीखुची इज्जत के भी लूट लेने की ज्यादा होती है.

कोई सभ्य समाज ऐसी व्यवस्था को लंबे समय तक सहन नहीं कर सकता जहां एक वर्ग दूसरे से न केवल सस्ती मजदूरी ले, उसे अपमानित भी करे. सही आचरण आर्थिक प्रगति, सुरक्षा व स्थाई वातावरण के लिए जरूरी है. अनुशासन तभी आ सकता है जब समाज का कमजोर से कमजोर तबका भी अपने को पूरे समाज का हिस्सा समझे, उस का लाभ उठा सके, उस के प्रति अपने काम बराबरी के स्तर पर कर सके.

कोई समाज आर्थिक तौर पर बराबर भी नहीं हो सकता. गरीब और अमीर तो चाहे कुछ कर लो, रहेंगे. लेकिन गरीबी के साथ जाति का ठप्पा लगे और इस ठप्पे का सार्वजनिक प्रचार करने का हक एक वर्ग को हो, यह मंजूर नहीं. भारत इसी कारण सदियों गुलाम रहा है और आज भी इस की प्रति व्यक्ति आय 102 देशों में से 150-155 के स्तर पर रहती है चाहे पूरी अर्थव्यवस्था सभी देशों में से 4-5 स्तर पर क्यों न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने खोली पोल

सरकार नोटिस ले या न ले, विपक्षी दल दलितों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं या न निभाएं और अधिकतर दलित संगठन खुद मंदिरों में भजनकीर्तन करने में मशगूल हो जाएं लेकिन अदालत की निगाह से देश के ये हालात छिपे नहीं हैं जिन्हें शायद उस ने जानबूझ कर उजागर किया जिस से सभ्य समाज के लोगों की हकीकत उजागर हो. बीती 4 मई को सुप्रीम कोर्ट ने, खासतौर से ओडिशा की निचली अदालतों पर एक कड़ा और कड़वा कमैंट यह किया था कि वे जमानत के बदले दलित आदिवासियों से थाने की साफसफाई न करवाएं.

सीजेआई सूर्यकांत की बैंच ने तल्ख अंदाज में टिप्पणी की थी कि ऐसे आदेश रूढ़िवादी सोच दिखाते हैं और इस से हाशिए के समुदायों के खिलाफ जातिगत पक्षपात उजागर होता है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी रिपोर्ट्स पहुंच रही थीं कि जमानत के लिए थानों की साफसफाई करने की शर्तें रिजर्व कैटेगरी के लोगों पर थोपी जा रही थीं जबकि ऊंची जाति वालों से ऐसा कोई काम नहीं कराया जाता.

सीजेआई ने लिहाज किया जो रूढ़िवादी सोच शब्द इस्तेमाल किया वरना इस के लिए सटीक शब्द मनुवादी सोच है जो देश में इन दिनों तबीयत से फलफूल रही है. सरकार भगवावादियों की है जिस का मंकसद ही पौराणिक वर्णव्यवस्था की बहाली है. इस के बाद भी जस्टिस सूर्यकांत की यह साफगोई एक सैल्यूट की हकदार है जो न्याय व्यस्था के प्रति आम लोगों को आश्वस्त करती है कि और देखें न देखें, हम देख रहे हैं, इसलिए ओडिशा के साथसाथ चेतावनी देशभर की अदालतों को भी दी गई कि कम से कम आप तो जातिगत भेदभाव के भागीदार मत बनो.

मुआवजा और समझौता – एक्ट का तोड़ मगर हर्ज क्या

एससीएसटी एक्ट एक सलीका है, जिसे खौफ भी कहा जा सकता है, जो सभी में नहीं आ गया. दलित अत्याचार के मामले और आंकड़े सालदरसाल बढ़ते रहे हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 के 51 हजार के मुकाबले साल 2022 में दलित प्रताड़ना के 57 हजार से भी ज्यादा मामले दर्ज हुए थे. यानी, हर दिन औसतन 155 दलित देश में प्रताड़ित किए जाते हैं. इन में से 21 तो बलात्कार के होते हैं. सीधा सा मतलब यह है कि देश में प्रतिदिन 21 दलित महिलाएं बलात्कार जैसे घृणित अपराध की शिकार होती हैं.

इस से यह बात भी स्थापित हुई कि कानून के जरिए समानता देखने का राजीव गांधी का सपना पूरा नहीं हो पाया क्योंकि असमानताएं धर्म की देन हैं. हां, दलितों में आत्मविश्वास बढ़ा क्योंकि उन की हिफाजत के लिए एक कड़ा कानून मौजूद है जो उन की गरीबी के मद्देनजर उन्हें मुआवजा भी सरकार से दिलवाता है.

एससीएसटी एक्ट में हरेक अपराध का मुआवजा तय है जिस पर अब पहले के मुकाबले ज्यादा विवाद खड़े होने लगे हैं. गौरतलब है कि दलित के साथ मारपीट या छेड़खानी पर सरकार उसे 2 से 3 लाख रुपए तक का मुआवजा देती है. इसी तरह दुष्कर्म और हत्या के अपराध में यह राशि 8 लाख रुपए तक है. उत्पीडन पर 60 हजार रुपए तक दिए जाने का प्रावधान है. यह राशि किस्तों में दी जाती है. पहली क़िस्त एफआईआर दर्ज होने के साथ ही 50 फीसदी और बाकी 25-25 फीसदी की 2 किस्तें क्रमश: चालान पेश होने और अपराध साबित होने पर पीड़ित को दी जाती हैं.

एससीएसटी एक्ट के मामलों को नजदीकी से देखने वाले हैरत में हैं कि दोषियों को सजा न के बराबर (औसतन 20 फीसदी) ही हो रही है, बाकी 80 फीसदी बरी हो रहे हैं. इस का यह मतलब नहीं कि उन्होंने दलितों के प्रति अपराध नहीं किया होगा, बल्कि, मतलब यह है कि दलितों ने सरकार से मुआवजे की पहली और दूसरी क़िस्त लेने के बाद उन्हें `माफ` कर दिया और अदालत में अपने बयान से पलट गए जिस से आरोपी बरी हो गया. इस के लिए भी पीड़ित दोषी से पैसे वसूलता है.

एक हैरतअंगेज हकीकत भोपाल की है जहां के एससीएसटी स्पैशल कोर्ट ने इस साल जनवरी से ले कर 20 अप्रैल तक सौ मामलों में फैसला सुनाया. इन में से 80 आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो पाए. लिहाजा, वे बाइज्जत बरी हो गए. बरी इसलिए हो गए क्योंकि दोषियों ने कोर्ट में अपने बयान बदल दिए थे.

सौदेबाजी का यह खेल देशभर में बड़े पैमाने पर चल रहा है. यह आज नहीं तो कल कोई गुल जरूर खिलाएगा क्योंकि इस खेल में पीड़ितों को पैसा तो मिल रहा है लेकिन न्याय नहीं मिल पा रहा. जाहिर है, खुद उन की इस में दिलचस्पी नहीं. इस खेल को भोपाल के ही 2 उदाहरणों से समझें तो साबित होता है कि गैरत पर पैसा भारी पड़ रहा है.

मामला एक – 13 जुलाई, 2019 को एक पीड़िता ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि वह अपनी बहन के साथ न्यू मार्केट से काटजू अस्पताल जा रही थी कि तभी अजहर अली नाम के नौजवान ने बुरी नीयत से उस का हाथ पकड़ लिया. पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 354 सहित एससीएसटी एक्ट की धारा 3 (1) (डब्ल्यू) (आई) के तहत मामला दर्ज कर लिया. पर सुनवाई में कहानी बदल गई. दोनों बहनों के बयानों में विरोधाभास पाया गया कि वे अस्पताल जा रही थीं या थाने गईं, जिस से अजहर बरी हो गया. जाहिर है, मुआवजे की 2 किस्तें पीड़िता ले चुकी थी और मुमकिन है तीसरी क़िस्त की वसूली अजहर से की हो जो जेल की सजा से बचने के लिए उस ने अदा की होगी.

इस का सीधा सा मतलब यह है कि या तो अपराध वास्तव में हुआ ही नहीं था और अगर हुआ भी था तो उस में समझौता, जिसे सौदा कहना बेहतर होगा, कुछ लेदे कर हो गया. इस में किसी का कुछ नहीं बिगड़ा. बस, अदालत का वक्त जाया हुआ. पीड़िता को 2-3 लाख रुपए मिल गए और दोषी सस्ते में जेल की हवा खाने से बच गया.

मामला दो – इस मामले में एक पीड़ित रामदयाल जाटव ने शिकायत की थी कि जमनालाल प्रदीप और मानसिंह ने उसे उस के खेत में आ कर गलियां दी थीं. मामला 500 रुपए की उधारी का था जो रामदयाल ने उक्त आरोपियों से लिए थे. ये तीनों अपना पैसा वसूलने के लिए पीड़ित के खेत में पहुंचे थे. उन के हाथ में डंडा भी था जिस से उन्होंने मारपीट की.

लेकिन कोर्ट में सुनवाई के दौरान रामदयाल अपने ही बयान से यह कहते पलट गया कि पैसे का कोई विवाद ही नहीं था और डंडा तो घटनास्थल पर था ही नहीं. इसलिए मारपीट का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. लिहाजा, तीनों आरोपी बरी हो गए.

ऐसा 80 में से 65 मामलों में अकेले भोपाल में महज 4 महीने में हुआ. सो, बात चिंता की तो है. चूंकि एससीएसटी एक्ट में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है इसलिए नया रास्ता बयान बदलने का निकाल लिया गया है. हालांकि इस से फायदा दोनों ही पक्षों को है, एक को, पैसा मिल जाता है; दूसरा पक्ष जेल की सजा से बच जाता है, जिस की कीमत वह पीड़ित सहित कार्रवाई कर रहे पुलिस वालों को भी देता है ताकि वे कोई अड़ंगा न डालें.

दलितों ने मुआवजे को धंधा बना लिया है और समझौते को बैठेबिठाए आमदनी का जरिया बना लिया है. ये बातें अकसर सभ्य समाज में होती रहती हैं कि इस से कानून अपनी मंशा में कामयाब नहीं हो पा रहा. लेकिन जैसे गिरफ्तारी की अनिवार्यता पर रोक नहीं लगाई जा सकती वैसे ही इन समझौतों और सौदेबाजी को नहीं रोका जा सकता. समझौता हर्ज की बात नहीं क्योंकि इस से किसी का कुछ बिगड़ता नहीं. पीड़ित का सोचना यह रहता है कि दोषी को सजा अगर हो भी गई तो उस से मुझे क्या हासिल होगा. मुमकिन यह भी है कि उसे दोषी पर दया आ जाती हो जिसे वह कैश कराना बेहतर समझता हो.

लेकिन गिरफ्तारी की अनिवार्यता पर जरूर दोबारा विचार किया जाना चाहिए क्योंकि सभी मामले सच्चे नहीं होते और सच्चे मामलों में भी हलके मामलों में जमानत का प्रावधान होना चाहिए. लेकिन बिदोरी पाठक गांव जैसे मामलों में कतई कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि यह एक्ट उन जैसे दबंग मानसिकता वाले सवर्णों को सीधा करने के लिए ही बना है. रही बात इस एक्ट के बेजा इस्तेमाल की, तो उसे दहेज़ एक्ट और घरेलू हिंसा एक्ट की तरह रोका नहीं जा सकता. ये सभी विशेष कानून हैं जिन की कुछ खामियों का कोई ट्रीटमैंट किसी के पास नहीं. Caste Discrimination

 

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