Social Discrimination: देश में संविधान को लागू हुए 75 साल हो गए लेकिन समाज में जातिवादी गैरबराबरी आज भी क़ायम है. संविधान हर नागरिक को समान मानता है लेकिन समाज में हर व्यक्ति की औकात उस की जाति से तय होती है. जब दलित अपना हक मांगता है, सिर उठा कर जीने की कोशिश करता है तो उस पर घातक हमले किए जाते हैं. यह सदियों से होता आया है और आज भी देश के हर कोने में हो रहा है. सभी जगह मकसद एक ही है- नीच की औकात याद दिलाना.

जातिवाद का नंगा नाच देश के हर कोने में होता है. तमिलनाडु और केरल जैसे शिक्षित व विकसित राज्य हों या यूपी और बिहार जैसे पिछड़े राज्य, आज भी एससी और एसटी तबके के साथ अत्याचार व उत्पीड़न की घटनाएं घटती हैं. कहीं घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जाता, कहीं सार्वजनिक नल से पानी पीने पर पीटा जाता है तो कहीं मूंछ रखने पर हत्या कर दी जाती है. अभी हाल ही में बिहार में 2 दलितों को मंदिर में घुसने की सजा दी गई. उन्हें सरेआम पीटा गया. ऐसी घटनाएं तकरीबन हर जिले में अकसर देखनेसुनने को मिलती हैं.

पिछले 2 दशकों की बड़ी घटनाओं की बात करें तो खैरलांजी, गोहाना, मिर्चीपुर और शब्बीरपुर की घटनाएं रोंगटे ख़डी करती हैं. यह घटनाएं जाति आधारित हिंसा की भयंकर मिसाल हैं. इन में दलित परिवारों पर संगठित हमले हुए, औरतों के सामूहिक बलात्कार किए गए और दलितों की बस्तियां जला दी गईं.

दलित उत्पीड़न की घटनाओं में सब से दर्दनाक घटना 29 सितंबर, 2006 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव में हुई थी. भोतमांगे परिवार के आसपास के कुणबी लोग उन के खेत से सड़क निकालना चाहते थे. परिवार ने विरोध किया. सिद्धार्थ गजबिया पर हमला हुआ. सुरेखा भोतमांगे ने गवाह बन कर शिकायत दर्ज कराई. 12 आरोपी गिरफ्तार हुए लेकिन 29 सितंबर को जमानत पर छूट गए. उसी शाम करीब 70 लोगों की भीड़ हथियारों, लाठियों, कुल्हाड़ियों और साइकिल चेन से लैस हो कर भोतमांगे की झोंपड़ी पर टूट पड़ी.

45 साल की सुरेखा, उन की 17 साल की बेटी प्रियंका जो 12वीं की स्टूडैंट थी और 21 साल के बेटे रोशन व 19 साल के अंधे बेटे सुधीर को घसीट कर घर से बाहर निकाला गया. औरतों को नग्न कर के गांव में घुमाया गया, सामूहिक बलात्कार किए गए. घर के मर्दों के प्राइवेट पार्ट काट दिए गए और चेहरों को जला दिया गया.

इस के बाद परिवार के सभी चारों की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी गई. शव नाले में फेंक दिए गए. इस परिवार में भैयालाल भोतमांगे, जो खेत में छिप गए थे, बच गए थे. वही इस मामले में गवाह बने. पुलिस ने शुरू में सुबूत दबाने की कोशिश की, दबाव बढ़ने पर बाद में कुछ आरोपी दोषी ठहराए गए और कुछ को उम्रकैद हुई.

21 अप्रैल, 2010 को हरियाणा के हिसार जिले के मिर्चीपुर गांव में जाटों के इलाके के दक्षिण में वाल्मीकि बस्ती थी. 19 अप्रैल को एक कुत्ते के भूंकने पर जाट युवकों ने ईंट फेंकी.

दलित युवक ने आपत्ति जताई तो दोनों के बीच झगड़ा हुआ. इतनी सी मामूली बात को ले कर 21 अप्रैल को हजारों जाटों की भीड़ लाठियों, पत्थरों, पैट्रोल-तेल के साथ दलित बस्ती पर टूट पड़ी. 18 घरों में आग लगा दी गई. 70 साल के ताराचंद और उन की पोलियो से पीड़ित 17 साल की बेटी सुमन को जिंदा जला दिया गया. इस हमले में 51 दलित घायल हुए. 250 से ज्यादा दलित परिवार गांव छोड़ कर भाग गए. मामला दर्ज हुआ. पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठे. आखिरकार, दिल्ली हाईकोर्ट ने कई आरोपियों को दोषी ठहराया.

ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. भारत के ग्रामीण समाज में जाति व्यवस्था की क्रूर सच्चाई आज भी गहरी पैठ बनाए हुए है. ये हमले सिर्फ व्यक्तिगत झगड़े नहीं थे. ये दलितों के आत्मसम्मान, जमीन और शिक्षा के अधिकार के खिलाफ संगठित दमन की सदियों पुरानी मानसिकता के हिंसक उदाहरण हैं. कानून की किताबों में समानता लिखी है, लेकिन गांवों में जाति की दीवार अभी भी मजबूत है. पुलिस और प्रशासन ऐसे मामलों में बड़ी बेशर्मी के साथ पक्षपाती रवैया अपनाते हैं क्योंकि सिस्टम में ऊंची जातियों का वर्चस्व हमेशा से रहा है.

आरक्षण के नतीजे में कुछ दलित सिस्टम में पहुंचे लेकिन उन्हें वहां भी जातिवाद का सामना करना पड़ा. यही वजह है कि दलित उत्पीड़न की हर घटना में सुबूत दबाना, देर से कार्रवाई कि जानी, पीड़ितों को ही दोषी ठहराना जैसे पैटर्न दोहराए जाते हैं. न्याय मिलता भी है तो बहुत देर से वह भी अधूरा. डा. अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता ही उपाय नहीं, सामाजिक स्वतंत्रता भी जरूरी है. Social Discrimination

 

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