Hindi Story: ‘लाडो, झलिए न रोया कर. जांदे वारी रोदेंयां मथ्थे नई लग्गी दा. मैं केहड़ा लाम ते जा रहया हां.’ मुझ, सिख रैजिमैंट के नायक हरनाम सिंह, को छुट्टी काट कर अपनी यूनिट में जाने से पहले पत्नी को समझाने में बड़ी मेहनत करनी पड़ रही थी. रैजिमैंट बौर्डर पर जा रही थी और लाडो यहां गांव में रहना नहीं चाहती थी. मैं भी समझता था कि उस का यहां रहना ठीक नहीं है. घर वाले उसे तंग करेंगे. नईनई शादी हुई थी. मन से मैं भी चाहता था कि वह मेरे साथ रहे लेकिन जहां रैजिमैंट जा रही थी वहां फैमिली क्वार्टर नहीं थे.
‘तुसां ने तो कहा सी, जब बौर्डर पर जाया करेंगे, मुझे सरकारी क्वार्टर ले कर देंगे?’
‘हां लाडो, मैं ने कहा था. उस के लिए मैं ने एप्लीकेशन दी है. क्वार्टर मिलतेमिलते ही मिलेगा. वहां तुम्हें अकेले रहना पड़ेगा, रह लोगी?’
‘हां जी, अमृतसर में ही तो ले रहे हैं. मैं अपने छोटे भाई को अपने पास रख लूंगी. दोनों मिल कर घर का राशन, सब्जी लाते रहेंगे. आप ने कहा था कि क्वार्टर बिलकुल सुरक्षित होते हैं.’
‘हां, कहा था. चंगा, फिर क्वार्टर मिलने दे तब तक तुम अपने पेके चली जाओ. पर रो न.’
‘चंगा जी, ऐह ठीक है. क्वार्टर दी इंफरमेशन तुहानू यूनिट च आएगी?’
‘हां लाडो, जैस ही इंफरमेशन आएगी, मैं छुट्टी लै के तैनू शिफ्ट कर दवांगा.’
मैं जानता था, घर में विरोध होगा. बेबे विरोध करेगी. बेबे धीरेधारे चल कर मेरे पास आई थी, ‘यह तेरे साथ जाएगी तो फिर इस घर में नहीं आएगी. इस घर से कुछ नहीं मिनेगा’, बेबे गुस्से में थी.
‘क्यों नहीं आएगी, क्यों कुछ नहीं मिलेगा? यह घर मेरा भी तो है. अब लाडो का भी है,’ मैं ने धीरे लेकिन प्यार से कहा था.
‘यह यहां रहेगी, सेवा करेगी तो इसे सबकुछ मिलेगा. नहीं तो कुछ नहीं मिलेगा.’
‘क्यों नहीं मिलेगा? जमीनजायदाद में मेरा हक है. उसे कोई नहीं छीन सकता. यह बात अलग है कि मैं अपने हिस्से की फसल न लूं. जैसे पहले नहीं लेता था.
‘मेरी नईनई शादी हुई है. लाडो की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. उसे कहां रहना है और कहां नहीं रहना है, इस का फैसला मैं करूंगा. जब तक मेरा ब्याह नहीं हुआ था, मैं आप को पैसा देता रहा हूं. अब आप के दूसरे बेटे आप की देखभाल करेंगे. मेरे अपने खर्चे भी होंगे.’
मैं ने लाडो से कहा, ‘लाडो, चल, मैं तैनू तेरे पेके छोड़ कर आवां.’
‘ऐदा कोई सामान ऐथे नहीं रहेगा,’ बेबे ने कहा था.
‘क्यों नहीं रहेगा? जेहड़ा कमरा मैं ने बनाया है, उस में रहेगा.’
‘अगर चोरी हो गया तां साडी जिम्मेदारी नहीं है.’
‘वाह, बेबे तुसीं तां रिश्ता तोड़ने वाली बात कर रही है. मैं मिलिटरी का आदमी हूं. अगर चोरी हुई तो मैं यहां के कमिश्नर को लिखूंगा. वहां से पुलिस जाएगी. मुश्किल आप लोगों के लिए होगी. इसलिए कमरे में रखे सामान को हाथ भी न लगाना,’ मैं ने बेबे से साफ शब्दों में कह दिया था.
बड़े भाई ने कहा, ‘हरनामे, तू आराम नाल जा. लाडो दे सामान नू कोई नहीं छेड़ेगा. तू दरवाजे नू ताला लगा जाना. लाडो नू जित्थे मरजी रख. ऐह तरी जिम्मेदारी है.’
‘कल की आई कुड़ी दा बेबे से ज्यादा हक हो गया है?’
‘बेबे, तुहाडा हक तां रहेगा लेकिन यह सरकारी कानून है. जब तक मैं कुंआरा था, सारे हक तेरे थे. शादी हो जाए, तां सारे हक वाइफ दे हो जांदे ने. तुसीं सिर्फ आश्रित रह जांदे हो. वह भी तब अगर मैं तुहाडा इकलौता मुंडा हुंदा. नहीं तो तुहाडे दूसरे मुंडे तुहानू संभालेंगे.’
‘मैं सरपंच साहब कोलों पुछदी हां कि यह कैसा कानून है? वे भी फौजी थे.’
‘बेबे, तूने की जाना है, सरपंच साहब इदर ही आ रहे हैं. पूछ ले जो पूछना है.’
पूछा तो सरपंच साहब ने कहा, ‘बेबे, तेरा मुंडा ठीक कहंदा ऐ. हुन तेरा कोई हक नहीं है. सारे हक तेरी बहू दे हो गए ने. तू अपने मुंडे दी आश्रित वी तां हो सकदी सी जे तेरा ऐहो इक मुंडा हुंदा.’
बेबे रोंआसी हो गई थी. बात अधिकार की थी. बात लगातार आने के पैसे की थी, ‘जिस ने पैदा किया है, पाला है, पोसा है, पढ़ाया है, इतना बड़ा किया है कि वह देश की सेवा लेई फौज में जा सके. उस का कोई हक नहीं रह जादां.’
मैं ने बेबे से प्यार से कहा, ‘बेबे, कानून ऐसा है नहीं तो मां का हक पूरा होता है. तू कदी वी मेरे पास आ कर रह सकदी है. पर मेरे खर्चे बढ़ गए ने. जैसे और भाइयों दे बढ़ गए ने. वे तुहानू सिर्फ दालरोटी दे पादें ने. तुसीं मेरे पास आओगी, तां मैं भी तुहानू दालरोटी ही दे पाऊंगा. एह तुसां ने समझना होगा. मेरे अपने खर्चे होंगे.’
‘चंगा, पुत्र जिवें तेरी मरजी.’ बेबे निराश हो गई थी. मैं इस के लिए कुछ नहीं कर सकता था. मैं बेबे को उसी हालत में छोड़ कर लाडो को उस के पेके छोड़ आया था. एक महीने बाद क्वार्टर मिला तो मैं लाडो को वहां क्वार्टर पर छोड़ आया. गांव में पड़ा उस का सारा सामान क्वार्टर पर शिफ्ट कर दिया था.
लाडो को समझा दिया कि यहां सब्जी की गाड़ियां आएंगी, राशन की गाड़ियां आएंगी. स्कूलबसें आएंगी. अगर तुम बीमार हो जाओ तो यहां एमआईरूम हैं जहां 24 घंटे डाक्टर रहता है. दीवाइयां मिलेंगी. अगर यहां का राशन और सब्जियां तुम्हें पसंद न आएं तो तुम बाजार से भी अपने भाई के साथ जा कर ला सकती हो. क्वार्टर पर मेरा स्कूटर रहेगा ही.
वैसे तो यहां सब सुरक्षित है, क्वार्टरों के बीच क्वार्टर है, फिर भी ध्यान से रहना. राशन स्टौक कर के रखना. रोजरोज तुम्हें बाजार न भागना पड़े. तेरा भाई सारा दिन कालेज में रहेगा.
‘जी, मैं समझ गई. राशन की मुझे फिक्र नहीं है. आटा, चावल, सब्जियां घर से आ जाया करेंगी. बापू जी ने मुझे आती बार सब कह दिया था. संडे को भाई गांव जा कर ले आया करेगा.’
‘फिर भी घर के खर्चे के लिए तुम्हें पैसे चाहिए होंगे. महीने में कितने रुपयों की जरूरत रहेगी, उतने की मैं फैमिली अलौटमैंट लगवा दूंगा. हर महीने तुम्हें पैसे मिल जाया करेंगे.’
लाडो ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, ‘हर महीने 5 हजार रुपए काफी होंगे.’
‘ठीक है, मैं तुम्हें 5 हजार के बजाय 10 हजार रुपए भेजा करूंगा. बच जाएं तो अपने बैंक अकाउंट में जमा करती रहना. तेरे लिए कांटे या चैनी सैट बनवा लिए जाएंगे. कुछ न कुछ बनता रहेगा.’
‘ठीक है, जी. खुला खर्च करने पर भी पैसे बच जाया करेंगे.’
मैं सारे प्रबंध कर के रैजिमैंट में वापस आ गया था. पीछे की इतनी चिंता नहीं थी. जब भी टाइम मिलता, लाडो से बात हो जाती थी. रैजिमैंट जम्मूकश्मीर के उड़ी सैक्टर में आ गई थी. टास्क आतंकवादियों का सफाया करना था. हमारी सहायता में सीआरपीएफ और जम्मूकश्मीर पुलिस रहती थी.
रोज एन्काउंटर होते. रोज आतंकवादी मारे जाने लगे लेकिन वे कीड़ेमकौड़ों की तरह भरे पड़े थे. घरघर में अपने ठिकाने बनाए हुए थे. ऐसे में कई निर्दोष लोगों के मारे जाने की आशंका रहती थी. इस के लिए बहुत से तरीके अपनाए जाने लगे. कोरडन कर के उन्हें आत्मसमर्पण के लिए कहा जाता. जो निर्दोष होते उन्हें हाथ ऊपर कर के बाहर आने के लिए कहा जाता. ऐसा करने पर वे आतंकवादियों की गोलियों का शिकार होने लगे. ऐसे समय हमारे कमांडरों का हुक्म बड़ा साफ होता, ‘उड़ा दो सब को.’
हमारे कमांडर मीडिया वालों से कहते, ‘‘आप हम से प्रश्न पूछने के बजाय जम्मूकश्मीर के लोगों से कहें कि वे हमारे समक्ष आत्मसमर्पण करें. हम पूछताछ के बाद उन के घर वालों को सौंप देंगे. नहीं तो सब मारे जाएंगे. गेहूं के साथ घुन भी पिसता है. हमें अपनी ड्यूटी करने से कोई नहीं रोक सकता. सेना को जो टास्क मिला है, वह वो करती रहेगी. इस का लाभ यह हुआ कि चोरीछिपे कैसे न कैसे लोग हमारे कमांडरों के पास आने लगे. यह सूचना मिलती कि कहां पर कितने आतंकवादी छिपे हैं और उन के पास कितने और कैसे हथियार हैं.
मुठभेड़ में मारे जाने वालों के प्रति मीडिया को बुला कर बाताया जाता कि देखें, ये सब पाकिस्तानी हैं. इस का लाभ यह हुआ कि सारी दुनिया में यह मैसेज जाने लगा कि यह जंग पाकिस्तान ने छेड़ रखी है और हिंदुस्तान को इन का सफाया करने का पूरा हक है. भारत पाकिस्तान को आतंकवादी देश घेषित करवाने में असमर्थ रहा. कारण, बहुत से देश पाकिस्तान के फेवर में रहते थे. वे यूएनओ में विट्टो कर देते. इस में चीन और अमेरिका प्रमुख थे.
मुझे लाडो की चिंता रहती थी. लड़ाई में व्यस्त होने के बाबजूद अपने कमांडर से इजाजत ले कर मैं रोज उस से बात करता. वह कहती, ‘मैं ठीक हूं. मांबापूजी हर हफ्ते आ कर देख जाते हैं. राशन, सब्जियां भी ले आते हैं. कोई मुश्किल नहीं हो रही है. तुंसी छुट्टी कद आ रहे हो?’
‘अभी लड़ाई चल रही है. छुट्टी आने के कोई चांस नहीं हैं.’
‘लड़ाई च तुहानु वी जाना पैदा ए.’
‘हां लाडो, सब जांदे ने.’
‘तुसीं अपना क्ष्याल रखना जी. मैनू बहुत डर लग रहया है.’
‘सब अपनी प्रोटैक्शन ले कर चलते हैं. फिर भी जब गोलियां चलदियां ने ते किस को लग जाएं, कोई पता नहीं हुंदा. लाडो, तू फिक्र न कर. हां, लाडो, और्डर आ गया है. इक जगह आतंकवादियां दा सफाया करन जाना है.’
‘सफल हो कर आओ जी.’
नायक हरनाम और उस की प्लाटून तेजी से एक घर में छिपे ठिकाने की ओर बढ़े. आत्मसमर्पण के सारे प्रयास फेल हो गए तो गोलाबारी शुरू हुई. गोलाबारी से काम नहीं चला तो राइफल से ग्रेनेड फेंके गए, तब गोलाबारी बंद हुई. 3 आतंकवादी मारे गए और 16 साल का एक बच्चा भी था. सभी पाकिस्तानी थे. मीडिया को बुला कर बताया गया, ‘‘देखें, ये सभी पाकिस्तानी हैं. 16 साल का बच्चा भी सियालकोट के अल्लड़ गांव का है. पाकिस्तान इन्हें अपने आदमी मानता नहीं है. ये लास्ट वाले 2 पाकिस्तान की रैगुलर आर्मी के हैं. हम इन्हें सम्मान से दफना देंगे.’’
हमारे कमांडर ने आगे कहा, ‘‘आप पाकिस्तान से पूछें कि यह प्रौक्सी वार क्यों किया जा रहा है. ये हथियार पाकिस्तान के हैं. गोलाबारूद पाकिस्थान का है. अगर लड़ना है तो खुल कर लड़ें न. हम छोड़ेंगे नहीं. हम पाकिस्तान में घुस कर भी मारेंगे.’’
उन मीडिया वालों, जो पाकिस्तान के फेवर में लिखते थे, की बोलती बंद थी. वे भी पाकिस्तान के विरुद्ध लिखने लगे थे. विश्व में संदेश जाने लगा था कि सारा फसाद पाकिस्तान ने खड़ा किया है और भारत जम्मूकश्मीर के लागों की रक्षा के लिए उन का सफाया कर रहा है.
जम्मूकश्मीर की पिछली सरकारों, जम्मूकश्मीर पुलिस और लोगों के सहयोग के बिना आतंकवादी अपने ठिकाने बना नहीं सकते थे. हमारे कई जवान इन सब की गलत सूचनाओं के कारण शहीद हो गए. थे. तब सेना के साथ सीआरपीएफ और जम्मूकश्मीर पुलिस के जवान जोड़े गए. पहले सेना पर कई आरोप लगते थे कि ये रेप करते हैं. गलत एन्काउंटर करते हैं. सेना के कई लोग आज भी इन आरोपों के चलते जेल काट रहे हैं. सेना की हर कमांडो यूनिट में ऐसे कमांडो शामिल किए गए जो कश्मीरी समझते थे. तब शहीदों की संख्या कम हुई.
आदेश आया कि पीओके में घुस कर एक आतंकवादी पैड को तबाह करना है. सिख रैजिमैंट का इतिहास रहा है कि जहां भी भेजा गया, फतह हासिल की. उस के लिए उस एरिया की रैकी की गई. आईस्कैच बने कि कहांकहां उन की पोस्ट हैं. कैसे उन के पास हथियार हैं. कहांकहां माइंस बिछी हुई हैं. सारी सूचनाएं इकठ्ठी करने के बाद पूरी योजना बनाई गई. सब जवानों और अधिकारियों के दिमाग में समझा दिया गया था कि किसे क्या करना है. सिख रैजिमैंट में उन के गुरु सहबान का बडा़ स्पष्ट संदेश है,
‘‘सुरा सो पहचानिए जो लरै दीन के हेत,
पुरजा पुरजा कट मरै कबहू न छोड़े खेत.’’
शूरवीर की असली पहचान है जो दीनदुखियों के लिए लड़ मरे. पुरजापुरजा कटने के बाद भी वह मैदान न छोड़े. और यह भी,
‘‘चिड़ियां नाल मैं बाज लड़ाऊं,
गीदड़ों को में शेर बनाऊं
सवा लाख से एक लड़ाऊं
तां गोबिंद सिंह नाम कहाऊं.’’
गुरु साहिब के ये संदेश रैजिमैंट के सभी जवानों, जूनियर अफसरों और अफसरों कि नसनस में भरा हुआ था.
हमला इतना जबरदस्त किया गया था कि उन्हें भागने का मौका भी नहीं मिला. सभी मारे गए. मिशन सफल रहा लेकिन आती बार नायक हरनाम सिंह का एक पैर माइन पर आ गया था. उसे पेनकिलर दे कर हैलिकौप्टर से तुरंत अस्पताल शिफ्ट किया गया ताकि उस का पैर बचाया जा सके. उस का पैर तो बच गया लेकिन उस के दाएं पैर की पांचों उंगलियां काटनी पड़ी थीं. वह फौज के लिए फिट नहीं रह गया था. उसे मैडिकल बोर्ड ने फौज से आउट कर दिया था. इस में जब तक उस की सर्विस रहती, पूरे वेतन के साथ मैडिकल पैंशन भी मिलती.
हरनाम की डिस्चार्ज बुक पर लिख गया था, ‘‘फिट फौर सिविल सर्विस.’’ इस आधार पर उसे रक्षा मंत्रालय में सरकारी नौकरी मिल गई. उसे फौज की भी सारी सुविधाएं मिलने लगीं और सरकार से वेतन भी. केवल महंगाई भत्ता एक जगह से मिलता. पहले हरनाम लंगड़ा कर चलता था, फिर समय पा कर ठीक चलने लगा था. लाडो खुश थी कि वे शहीद नहीं हुए. वे उस के साथ तो हैं.
हरनाम ने शहर में अपना मकान बना लिया था. हरनाम और लाडो ने एक लंबा जीवन जिया. उन के 2 बच्चे हुए- एक लड़का और एक लड़की. आगे चल कर दोनों खूब पढ़े. दोनों ने इंजनियरिंग की और अपने पिता की तरह फौज में गए अफसर बन कर. Hindi Story





