Indian Diaspora: भारतीय मूल की पम्मी जब भारत छोड़ कर लंदन में आ बसी, तब उसे प्रवासी भारतीय कहलाने पर बड़ा गर्व महसूस होने लगा था. उसे यहां के रंगढंग देख कर बहुत ही अचंभा होने लगा जब उस ने देखा कि यहां के लोग कितने खुलेपन के साथ बिना किसी झिझक के सार्वजनिक स्थलों पर भी अपने साथी से किसी भी तरह का शारीरिक प्रेमप्रदर्शन कर लेते हैं. तब उसे ऐसा लगता था कि काश, यह धरती फट जाए और वह इस में समां जाए.
ऐसा करने वाले वयस्क नागरिक ही नहीं बल्कि युवा भी थे. कई बार तो यों भी हुआ कि उस के किशोरवय बच्चे भी उस के साथ यात्रा कर रहे होते तब तो वह घबराहट में उन की आंखें बंद कर देती या किसी तरह से उन के सामने आ कर खड़ी हो जाती कि उस के बच्चे वह सब न देख सकें.
लेकिन कहीं जब आग लगी होगी तो धुआं तो उठेगा ही. और जब धुआं उठेगा तो सब को पता चल ही जाता है कि आग कहां लगी है. शर्म के मारे वह अपने बच्चों को ठीक से समझा न पाती कि आखिर ऐसा क्या है उस दृश्य में जो वह अपने बच्चों को देखने नहीं देना चाहती. बच्चे पूछते भी तो वह अकसर उन्हें यह कह कर टाल दिया करती कि अभी तुम्हारी समझ में नहीं आएगा. बड़ों की बातें हैं, वक्त आने पर तुम लोग खुद ही समझ जाओगे.
अब बच्चे तो बच्चे हैं, उन का जिज्ञासुमन उन्हें वही करने के लिए प्रेरित करता है जो उन्हें करने से रोका जाए, खासकर युवा होते बच्चे. एक दिन उन्होंने देखा कि उन की एक टीचर बाथरूम में किसी अन्य टीचर के साथ वैसा ही कुछ कर रही थी जैसा कि उन्होंने अकसर ट्रेनों में लोगों को करते देखा है और जो उन की मम्मी उन्हें देखने से मना करती है. सो, बच्चों की पहली प्रतिक्रिया वही थी. उन्होंने झट से अपनी आंखों पर हाथ रख लिया और वहां से भाग गए. लेकिन उन का मन नहीं माना और उन्हें वह दृश्य फिर से देखने का मन किया. जब वे वापस लौटे तब तक तमाशा खत्म हो चुका था और उन के दोनों टीचर वहां से जा चुके थे. यह देख वे दोनों निराश हो गए. तब भी उन्होंने अपनी मां और पापा को इस घटना के विषय में कुछ भी नहीं बताया.
कुछ दिन ऐसे ही सामान्य रूप से बीत गए और सब ठीक ही चल रहा था कि फिर एक दिन उन बच्चों ने अपने सीनियर बच्चों को भी ऐसा कुछ करते देखा कि उन के अंदर भी वही सब कर के देखने का कुतूहल जाग उठा. तभी उन में से एक ने अपनी कक्षा में पढ़ रहे सहपाठी, जो उस का दोस्त भी था, से बात की और कहा, ‘चल, अपन भी कर के देखें, कैसा लगता है.’
उस ने यह कह कर मना कर दिया कि ‘नहींनहीं, मुझे तो बहुत डर लगता है, मैं नहीं करूंगा. मां को पता चल गया तो मां बहुत गुस्सा करेगी.’
‘हां, खैर, यह बात तो सही है. मां तो मेरी भी मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी.’
तभी उन दोनों के बीच उन्हीं का एक दोस्त, जो एक गोरा बच्चा था अर्थात अंगरेज़ लड़का था, आ कर बोला, ‘क्या हुआ, तुम दोनों क्या सोच रहे हो, क्या बात कर रहे थे जो मेरे आने से चुप हो गए? कहीं तुम दोनों का प्लान मुझे मारने का तो नहीं है न?’ कहते हुए वह हंसने लगा.
ये दोनों बच्चे पहले तो थोड़ी देर उस की शक्ल देखते रहे, फिर उस की नकल करते हुए बोले, ‘कहीं तुम दोनों का प्लान मुझे मारने का तो नहीं है न. चुप रह, पागल कहीं का.’
फिर एक ने सोचा, चलो, इस से भी पूछ कर देखते हैं और जब इन दोनों ने उसे सारी घटना बताते हुए पूछा, तो उस ने कहा, ‘अच्छा, तो तुम लोग चुंबन के विषय में बात कर रहे थे. तो उस में क्या हुआ, यह तो बहुत ही साधारण सी बात है. हम जिस से प्यार करते हैं उसे अपना प्यार दिखाने के लिए किस करते हैं. मेरे पापा तो मेरी मम्मी को हर रोज़ एक किस करते हैं.’
‘हैं, सब के सामने? तेरे सामने भी?’
‘हां, तो उस में क्या हुआ?’
बाकी के दोनों बच्चों ने एकदूसरे की शक्ल एकसाथ देखी, मानो आंखों ही आंखों में तय कर लिया कि इस का मतलब इस में कुछ गलत बात नहीं है. यह सब के सामने भी किया जा सकता है.
एक दिन स्कूल खत्म होने के बाद घर जाने से पहले दोनों ही बच्चे अपनेअपने सब से प्रिय दोस्त को चूमने ही वाले थे कि तभी एक की मम्मी ने देख लिया और ज़ोर से डांटते हुए कहा, ‘यह क्या करने जा रहे तुम दोनों? यह सब करना कहां से सीखा? चलो घर, बताती हूं तुम को.’
घर आते ही मां के गुस्से का जो घड़ा फूटा उस से डर कर बच्चों ने स्कूल और अपने दोस्त के बीच हुई सारी कहानी बता दी. लेकिन साथ में यह भी कह दिया, ‘मां, अब हम बड़े हो गए हैं, हमें भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है. आप हमेशा हमें हर बात के लिए रोकतीटोकती रहती हैं. यह गलत बात है. आखिर हमारी भी तो अपनी ज़िंदगी है, अपने विचार हैं. हम जो चाहे वो करें, आखिर हमारा शरीर हमारा है. सो, उस से जुड़े नियम भी हमारे ही होने चाहिए, आप के थोपे हुए नहीं.’
इतना कहने की देर थी, एक जोरदार थप्पड़ पड़ा वह भी आवाज नहीं आनी चाहिए के इशारे के साथ क्योंकि विदेशों में बच्चों को मारनापीटना सख्त मना है. यदि आप ने ऐसा कुछ किया तो आप को जेल भी हो सकती है. खैर, बच्चे अपने गाल को सहलाते हुए आंखों में आंसू लिए चुपचाप अपने कमरे में चलते बने. अगले ही दिन मां बच्चों के साथ स्कूल पहुंची और उन की क्लासटीचर से इस विषय में बात करने लगी.
“यह सब क्या सिखा रहे हैं आप बच्चों को, हम यहां बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं. यह सब ज्ञान के लिए नहीं जो आप दे रहे हैं. आप को पता भी है, बच्चा घर आ कर हम से कैसेकैसे सवाल पूछता है? ऐसे में हम कहा जाएं और क्या जवाब दें उन को, आप ने कभी सोचा भी है?”
टीचर ने कहा, “रिलैक्स, पहले आप शांत हो जाइए. देखिए, आप ने जो भी देखा वह इस उम्र में होने वाली एक बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है. अब आप को यह समझना होगा कि आप के बच्चे अब बड़े हो रहे हैं. इसलिए अब आप उन्हें उन की मनमरजी करने से रोक नहीं सकतीं. सही तो कहा इन्होंने बौडी इन की है तो रूल्स भी इन के ही होने चाहिए न.”
“तो आप यह कहना चाहती हैं कि अब हम इन्हें रोकें भी न, टोकें भी न. ऐसे तो ये बिगड़ जाएंगे. ऐसा थोड़ी होता है. अभी ये बच्चे हैं, अभी इन्हें सही और गलत की समझ ही कहां है, जो हम इन्हें इन के हाल पर छोड़ दें. न जी, न. ऐसा नहीं होता.”
“देखिए, आप इन्हें डराधमका कर इन से अपनी मनमरजी के अनुसार फैसले नहीं करवा सकतीं. यदि आप ने ऐसा कुछ किया तो मुझे मजबूरन आप के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करनी पड़ेगी.”
“वाह जी वाह. अच्छी जबरदस्ती है, बच्चा हमारा और रूल्स इन के मानने पड़ेंगे. मांबाप हम हैं कि आप हो?”
“देखिए, हर समस्या का समाधान होता है. एक अकेली आप ही ऐसी पेरैंट्स नहीं हैं जो अपने बच्चों के साथ ऐसी समस्या फेस कर रही हैं. आप जैसे और भी लोगों की यही शिकायत है, इसलिए हम ने यहां यौन शिक्षण के साथ साथ होर्मोन्स के कारण होने वाले शारीरिक एवं मानसिक बदलावों से जुड़ी संपूर्ण व सही जानकारी प्रदान करने की कक्षा आरंभ की है ताकि बच्चों को इस विषय से जुड़ी सही जानकारी प्राप्त हो सके.
“इस शिक्षा के माध्यम से हम वयस्क होते बच्चों को यह समझाना चाहते हैं कि भले ही बौडी आप की, हक भी आप का ही है कि आप इसे किसी दूसरे के हवाले करने से पहले एक नहीं सौ बार सोचें. यह अधिकार भी पूर्ण रूप से आप का ही है. लेकिन यदि अपनी बौडी में आ रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए आप सही जानकारी को साथ ले कर चलेंगे तो इस में भला आप का ही है.”
“देखिए, मुझे वो सबकुछ नहीं पता, मैं तो बस आप से इतना कह रही हूं कि मैं अपने बच्चों को यों उन के हाल पर छोड़ कर चुपचाप उन के बिगड़ने का तमाशा नहीं देख सकती.”
“अरे, आप को ऐसा क्यों लगता है कि यौनशिक्षा की जानकारी हासिल कर लेने से आप का बच्चा बिगड़ जाएगा. ऐसा नहीं होता, बल्कि आप को तो यह सोच कर खुश होना चाहिए कि कम से कम आप का बच्चा इतना समझदार हो जाएगा कि सुरक्षित खेलेगा.”
“खेलेगा, यह आप क्या कह रही हैं, टीचर? मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी. आखिर पवित्रता भी कोई चीज़ होती है या नहीं? कैसी बातें कर रही हैं आप?”
“उफ्फ, मेरे अनुभव में जो समाज सब की निगरानी करते हैं, वे ही सब से ज्यादा अपने घरों में पाखंड पालते हैं.”
“क्या मतलब, आप कहना क्या चाहती हैं?”
“मैं कैसे समझाऊं आप को?” अध्यापिका जी का सुर जरा ऊंचा हो चला था, “दूसरे धर्म या जाति को गाली देना, गंद फैलाना, नियमों का उलंघन करना, यहां तक कि चोरी आदि करने में भी भारतीय ही आगे हैं. लोगों में भेदभाव करना, इस में अकसर वही लोग सब से ज्यादा आगे होते हैं जो नैतिकता का सब से बड़ा ढोंग करते हैं और इसी दोहरेपन की वजह से लड़कियों की जिंदगी और उन की आजादी सब से ज्यादा प्रभावित होती है. जबकि यहां, हमारे यहां, ऐसा नहीं होता.”
“आप के यहां, क्या होता है और क्या नहीं होता, यह तो हम देख ही रहे हैं, इसीलिए तो परेशान हैं और आप से बात करने चले आए. रही बात लड़कियों की ज़िंदगी की, तो मैं ने तो ऐसी कोई बात की ही नहीं. मैं लड़के और लड़कियों में भेद नहीं मानती. मेरे लिए बच्चे बच्चे ही होते हैं. वो लड़के हों या लड़कियां, इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. रही बात चोरीचकारी की या नियम तोड़ने या गंद फैलाने की, तो ऐसा सब आप के यहां भी होता है.
“परंतु हां, बाकी लोगों की तुलना में कुछ कम. लेकिन बड़ी आबादी वाले दुनिया के हर देश का यही हाल है. इस सब के लिए आप केवल भारत पर उंगली नहीं उठा सकतीं. नियमों का तोड़ा जाना या कानून को अपने हाथों में ले कर खेलना तो चीन और अमेरिका जैसे देशों में भी बड़ी तादाद में होता है. उन के लिए तो कुछ नहीं कह रही हैं आप?”
अध्यापिका जी ने कहा, “हमारे यहां ऐसा नहीं होता. यहां यदि कोई किशोर या कोई किशोरी कोई ऐसा गलती कर बैठता है/बैठती है तो हम उसे जज नहीं करते. जबकि भारत में एक ऐसी गलती पूरे जीवन की सजा बन जाती है.”
“आप कहना क्या चाहती हैं? कहीं आप के के कहने का तात्पर्य केवल हम ‘भारतीय’ लोगों से तो नहीं है? यदि ऐसा है तो फिर यह तो भेदभाव का मामला हो जाएगा. देखिए बहन जी, आप हमारे बच्चों की कक्षा अध्यापिका हैं, इस वजह से अब तक हम बहुत ही शांति और सम्मानपूर्वक आप से बात कर रहे थे. लेकिन अब पानी सिर से ऊपर होता दिखाई दे रहा है. आप जानती हैं न कि इस तरह का भेदभाव कानूनन अपराध है और यह हम बिलकुल नहीं सहेंगे.
“आप ने हम लोगों को समझ क्या रखा है. अब गुलाम नहीं हैं हम आप के और वैसे भी, आप हमें जो चाहे कह लीजिए लेकिन यदि हमारे भारत के खिलाफ आप ने कुछ भी उलटासीधा बोला, तो हम चुप नहीं रहेंगे, बता देते हैं. रही बात दूसरे धर्मों को गाली देना, नैतिकता का ढोंग करना आदि वाली बातें, तो आप को बता दें कि ऐसा सब केवल भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और एशिया के अन्य कई बड़े देशों के देशवासी भी करते हैं. खासकर वो देश जहां हिंदुओं को छोड़ कर अन्य दूसरी जाति व धर्मों के लोगों की प्रधानता है. हम उन का नाम नहीं लेना चाहते. लेकिन इस का यह अर्थ नहीं कि उन लोगों की वजह से आप सभी को एक ही छड़ी से हांकने लग जाएं. हर बंदा अलग होता है.”
“देखिए, मैं आप से इतना कहना चाहती हूं कि आप के बच्चे बड़े हो रहे हैं और उन में अब हार्मोनल बदलाव आ रहा है जिस की वजह से उन की इस विषय को ले कर उत्सुकता अधिक है. केवल उन की ही नहीं, उन के उम्र के सभी बच्चों का यही हाल है. कइयों की तो गर्लफ्रैंड्स-बौयफ्रैंड्स भी हैं.”
“होंगे, मुझे उस से क्या. मेरे बच्चों का ऐसा कुछ नहीं है.”
“अच्छा ठीक है, आप मुझे एक बात बताइए कि यदि मान लीजिए कि आप का बच्चा किसी युद्ध के लिए जा रहा है जिस में जान का जोखिम बहुत है तो आप उसे सुरक्षा कवच के साथ भेजना पसंद करेंगी या बिना उस के ही भेज देंगी?”
“जाहिर सी बात है, सुरक्षा कवच के साथ ही भेजूंगी.”
“बस, वही बात है, जो हम इन बच्चों को समझाना और सिखाना चाहते हैं.”
“अच्छा.”
“हां. और क्या, आप यों ही इस बात को ले कर इतना परेशान हो रही हैं. आप तो यह सोच कर खुश हो जाइए कि कम से कम आप का बच्चा नशे आदि के सेवन से अब तक बचा हुआ है. यहां तो बच्चे सब से पहले खुद को वयस्क दिखाने के चक्कर में सिगरेट आदि का सेवन ही करना शुरू कर देते हैं.”
“पर यह सब जानकारी अभी से देनी ज़रूरी है क्या? कम से कम बच्चों को 18 साल के तो हो जाने देतीं आप लोग. तब यह सब कुछ बतातींसमझातीं, तो शायद ज्यादा ठीक होता.”
“देखिए, अब आप मुझे वह करने पर मजबूर कर रही हैं जो मैं करना नहीं चाहती. लेकिन आप को समझाने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ेगा. पिछले बैच में एक लड़की थी, मैं आप को उस का नाम तो नहीं बता सकती लेकिन उस की ज़िंदगी और इस स्कूल से जुड़ा एक किस्सा बता सकती हूं. वैसे, मुझे ऐसा करना नहीं चाहिए क्योंकि यह स्कूल के नियम के खिलाफ है. लेकिन आप को समझाने के लिए मैं यह राज आप को बता रही हूं. वह बच्ची इसी जानकारी के आभाव में एक दिन अपने ही एक सहपाठी मित्र के साथ वह सब कर बैठी जो उसे नहीं करना चाहिए था और फिर पता है क्या हुआ?”
“क्या हुआ?”
“वह बच्ची कच्ची उम्र में गर्भवती हो गई और जब तक पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. डाक्टर ने भी गर्भपात करने से मना कर दिया और उस बच्ची का सारा जीवन बरबाद हो गया. इतनी कम उम्र में मां बन जाने के कारण उस का जो शारीरिक नुकसान हुआ, सो हुआ, मानसिक रूप से भी वह इतनी टूट गई कि उस ने अपनी पढ़ाई ही छोड़ दी.”
“और बच्चे के पिता का क्या हुआ? लड़की के घरवालों ने जा कर उस से बात नहीं की?”
“नहीं. ऐसा कुछ कर पाते, उस से पहले ही वह लड़का और उस के परिवार वाले बदनामी के डर से चुपचाप कब यह शहर छोड़ कर चले गए, किसी को कुछ पता नहीं. इधर, लड़की को आतेजाते लोगों ने परेशान करना शुरू कर दिया. इस कारण वह गहरे अवसाद में चली गई और उस ने आत्महत्या कर ली.”
‘लो बताओ, बदनामी का डर तो लड़की वालों को होना चाहिए था. उन्हें जाना चाहिए था शहर छोड़ कर, तो बच्ची को लोग परेशान न करते जबकि चला गया लड़का, हद है.”
“खैर, जो कुछ भी हुआ उस से स्कूल की भी बहुत बदनामी हुई और हम ने यह फैसला किया कि युवा होते बच्चों को इस विषय में ज्ञान देना भी उतना ही जरूरी है जितना कि नशे से होने वाले नुकसान से उन को अवगत करना. मुझे उम्मीद है कि आप को मेरी बात समझ में आ गई होगी और आप भी हमारे साथसाथ अपने बच्चों को इस विषय में जागरूक बनाने में सहायक साबित होंगी.” Indian Diaspora





