Kanwar Yatra Controversy: परदादा ने बेगारी ढोई. दादा ने बोझा ढोया. बाप ईंट ढोता है और बेटा कांवड़ ढोने में लगा है. शूद्रों के लिए यह नई तरह की गुलामी का आगाज है. सावन के महीने में सड़कों पर तांडव करने की खुली छूट है. इस दौरान मूर्खता और अंधविश्वास का खुला प्रदर्शन करने की पूरी आजादी है. चिलम खींचो, छेड़ छाड़ करो, तोड़ फोड़ करो या नंगा नाचो. सब कुछ जायज है. सेवा में प्रशाशन मुस्तैद है. सुरक्षा में पुलिस लगी हुई है. सत्कार में जगह जगह पांडाल सजाये गए हैँ. शूद्रों के झुण्ड पर आसमान से पुष्प वर्षा की जा रही है. पूरी मिडिया काम पर लगी है की कहीं तो किसी काँवड़िये से किसी मलेछ की बाइक टकराये और टीआरपी उछाल मारे लेकिन फिलहाल मलेछ भी दुबके बैठे हैँ. प्राइम टाइम की सुर्खियां फीकी जा रही हैँ. क्या यह शूद्रों की गुलामी की नई शुरुआत है? आइये जानते हैँ.

पंडिताइन परेशान थी. पंडिताइन के घर के बाहर पांच घंटो से डीजे चल रहा था. डीजे के तेज शोर में पंडिताइन का बड़ा लड़का डिस्टर्ब हो रहा था. पंडिताइन से रहा नहीं गया तो वो बाहर निकली और सीधे राम लखन जाटव के दरवाजे पर पहुंच गई. पंडिताइन को अपने दरवाजे पर देखकर राम लखन जाटव को लगा की वो उनके बेटे की कांवड़ यात्रा के लिए उन्हें अप्रिशिएट करने आई है लेकिन पंडिताइन ने चिल्लाते हुए कहा- तुम्हारा बेटा कांवड़ लेने जा रहा है तो इसमें मेरे बेटे की पढ़ाई का नुकसान क्यों कर रहे हो?

यही इस कांवड़ यात्रा का सबसे कड़वा सच है. कुछ अपवादों को छोड़कर इस यात्रा में सिर्फ और सिर्फ शूद्रों के बच्चे ही शामिल होते हैँ. मजदूर बाप के वो बेटे जिन्हे बोझा ढोने की आदत है. जिनका बाप ईंट ढोता है उनका बेटा कुछ न कुछ तो ढोएगा ही. कांवड़ ही सही.

अभी हाल ही में बरेली के शिक्षक डॉ. रजनीश गंगवार की लिखी एक कविता सुर्खियों में आई. कविता की पंक्तियाँ थीं. “कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना” और “मानवता की सेवा करके, तुम सच्चे मानव बन जाना” इस तार्किक कविता ने पाखंडवादी सिस्टम की चूलें हिला कर रख दी. धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और डॉ. रजनीश गंगवार पर F.I.R दर्ज हो गई.

अंजना ओम कश्यप ने अपने शो में इस कविता पर रोना शुरू किया. उन्होंने कहा की रजनीश गंगवार की कविता हिन्दू धर्म के साथ मज़ाक है और यह शिवभक्तों को शिव की पूजा से रोकने का प्रयास है. जिन मुद्दों पर अंजना का अपना कोई ओपिनियन नहीं होता वहाँ वे आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ देती हैँ. इस मामले में भी वही हुआ. अंजना ने कहा की हिन्दुओं के त्योहारों पर ही लोगों को मानवता क्यों याद आती है? कविता के जरिये काँवाडियों का मज़ाक उडाने वाले लोगों ने मुहर्रम पर कविता क्यों नहीं लिखी?

अंजना ओम कश्यप को यह मालूम ही नहीं की डॉ रजनीश की कविता तो फिर भी मर्यादित और संयमित शब्दों में लिखी गई है अगर वे कांवड़ और इस तरह की तमाम धार्मिक यात्राओं पर लिखी आर्यसमाजियों की किताबें पढ़ लें तो शायद वो होश खो बैठे. आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ने वाली अंजना ओम कश्यप ने अगर संविधान ही ठीक से पढ़ा होता तो वह यह बात कहने से पहले सौ बार सोचती. संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है की वह समाज में वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने का काम करे. संविधान का यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों को निर्धारित करते हुए कहता है-

“भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे”

डॉ रजनीश गंगवार ने अपनी कविता के माध्यम से अपने उन संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन किया है जो की मेन स्ट्रीम मिडिया को लीड कर रही अंजना ओम कश्यप को करना चाहिए था.

अपने टेलीविजन शो में अंजना ओम कश्यप कांवड़ यात्रा को समस्त हिन्दुओं की आस्था बता रही हैँ. अगर सच में ऐसा है तो क्या वो ऐसी एक तस्वीर साझा कर सकती हैँ जिसमें उनके परिवार का कोई युवक कांवड़ ढोता हुआ नजर आ रहा हो? क्या वे अपने शो में इन सवालों पर चिल्ला सकती हैँ की हिन्दुओं के ठेकेदार बनने वाले संबित पात्रा या सुधांशु द्विवेदी के घर से कोई कांवड़ ढोता क्यों नहीं दिखा? अमित शाह के पुत्र जय शाह कांवडियों की भीड़ में शामिल क्यों नहीं हुए? कितने प्रतिशत EWS के बच्चे इस पावन यात्रा में शामिल हुए? कांवडियों की इस भीड़ में ब्राह्मण युवाओं की भागीदारी कितनी है? राजपूतों के बच्चे इस भीड़ में कहाँ हैँ? बीच सड़क पर डीजे के आगे नाचते नंगे धड़ँगे लड़कों में वैश्य समाज के लडके कितने हैँ? अगर अपर कास्ट के युवा हिन्दू धर्म की इस पावन यात्रा का हिस्सा नहीं हैँ तो यह समस्त हिन्दुओं की आस्था का पर्व कैसे हुआ?

इन तमाम प्रश्नों का सीधा सा जवाब यह है की यह यात्रा समस्त हिन्दुओं की यात्रा नहीं बल्कि सिर्फ शूद्रों को पाखंडवाद में झोंक कर उन्हें गुलाम बनाये रखने का प्रायोजित कार्यक्रम भर है और इस प्रायोजित कार्यक्रम को स्थाई बनाये रखने के लिए पूरा सिस्टम काम पर लगा है.

कांवडियों के स्वागत में सड़कों किनारे बड़े बड़े होर्डिंग्स लगे हैँ. इन होर्डिंग्स में छोटे बड़े नेता हाथ जोड़े कांवडियों का स्वागत करते दिखाई देते हैँ. इन छुटभइये नेताओं के बच्चे भी कांवड़ यात्रा में शामिल नहीं होते. यहाँ कास्ट और क्लास फैक्टर मायने रखता हैँ. ऊँचे कास्ट और पैसे वालों के बच्चे कांवड़ नहीं ढोते. शहरों के फ्लैट कल्चर और सोसाइटीज में पले युवा भी कांवड़ से दूरी बना कर रखते हैँ.

जो लोग रोज सुबह पार्को में पांच किलोमीटर की दौड़ लगाते हैँ या ट्रेड मिल पर प्रतिदिन दस किलोमीटर तक दौड़ लेते हैँ वो कांवड़ की भीड़ में आधा किलोमीटर भी पैदल नहीं चल सकते क्युकी यह उनके रूटीन से बाहर की बात है. सेहत के लिए दौड़ना अलग बात है और पाखंड के लिए भागना दूसरी बात. यही लोग कांवड़ शिविरों के लिए मोटा चंदा देते हैँ या कई जगहों पर कांवडियों की सेवा में खुद लगे दिखाई देते हैँ. इस मामले में यह लोग भी आस्थावान होते हैँ मगर यह लोग कांवड़ ढोने जितनी आस्था नहीं रखते. शिवभक्ति अपनी जगह है लेकिन शिव को खुश करने के लिए इतनी भी बेगारी खटने की जरूरत नहीं. सावन की गर्मी, ऊपर से मीलों लम्बा सफर. बोझा अलग से. यह काम ऊँची नाक वालों और ऊँची जात वालों का नहीं है. EWS वालों का भी नहीं. EWS वाले गरीब हैँ मगर इतने भी खाली नहीं हैँ की इस हुड़दंग का हिस्सा बन जाएँ. इन लोगों के लिए हर दिन कीमती होता है. कोई अपना एक दिन भी क्यों बर्बाद करे. EWS वालों को अगर किसी धार्मिक यात्रा में जाना ही हो तो वो वैष्णव देवी, अमरनाथ या केदारनाथ की यात्राओं पर निकलेंगे जहाँ भगवान के दर्शन से ज्यादा मजा नेचर के अवलोकन में आता है. खर्च की कोई परवाह नहीं.

कांवड़ यात्रा तो उन लोगों का काम है जिनके बाप दादा के लिए बोझा ढोना ही नियति रही है. कांवड़ ढोने वालों ने बचपन से गर्मी सर्दी और बरसात को झेला है. यह सब आदत में शामिल है. घर में वैसे भी खाली बैठे हैँ. पढ़ाई लिखाई से कोई वास्ता नहीं. अपने जैसे कुछ दोस्त मिल गये तो सफर मजे से कट जाएगा. चिलम, दारू सब मुफ्त में मिलेगा. पानी ही तो ढोना है. सेहत पर क्या फर्क पड़ता है. साल का एक महीना बर्बाद भी हो जाये तो भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे भी जिंदगी भर मजदूरी ही करनी है. एक महीना भगवान के नाम पर बेगारी खट लेने में हर्ज ही क्या है? Kanwar Yatra Controversy

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