Women’s Rights: औरतों के खिलाफ हिंसा केवल अपराध नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक सामाजिक मानसिकता का परिणाम है, जिसमें हर संकट, हर विफलता और हर विवाद का दोष अंततः स्त्री के सिर ही मढ़ दिया जाता है. बृजभूषण शरण सिंह मामले में आए अदालत के फैसले से लेकर धार्मिक मिथकों और सामाजिक परंपराओं तक इतिहास बार-बार यही प्रश्न खड़ा करता है कि क्या हमारे समाज ने कभी स्त्री को निष्पक्ष दृष्टि से देखा भी है?
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. 3 अगस्त 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने ये फैसला सुनाया. अदालत ने यह फैसला एक लंबी चली कानूनी प्रक्रिया के बाद दिया है.
दबंग और आपराधिक छवि वाले भाजपा नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह वैसे भी 20 जुलाई 2023 से नियमित जमानत पर थे. 10 मई 2024 को अदालत ने दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के आधार पर आरोप तय किए थे, जिसके बाद ट्रायल शुरू हुआ था. मगर अदालत के पटल पर सबूत और गवाह जिस पुलिस को रखने थे, वह पुलिस प्रदेश सरकार की और बृजभूषण शरण सिंह भी सरकार के, ऐसे में अदालत में सबूतों और गवाहों का अभाव तो होना ही था.
इस फैसले ने एक बार फिर उस पूरे घटनाक्रम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसने 2023 में देश को झकझोर दिया था. जब देश के लिए ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप और राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाली कई महिला पहलवानों ने सार्वजनिक रूप से सामने आकर खेल संघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया था. रेसलर विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, संगीता फोगाट, अंशु मलिक, बजरंग पुनिया, सत्यव्रत कादियान और सोमवीर राठी जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खिलाड़ियों ने महीनों तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया था. यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि खेल संस्थानों में जवाबदेही और खिलाड़ियों की सुरक्षा की मांग भी थी.
कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगा बुलंद किया और भारत को गौरव दिलाया, वही खिलाड़ी अपने यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हुए जब न्याय की आस में सड़कों पर उतरे और जंतर-मंतर पर आंदोलन किया तो पुलिस ने उनके बाल पकड़ कर घसीटे, उन्हें थप्पड़ मारे, उनके कपड़े अस्त-व्यस्त किये और उन्हें भद्दी भद्दी गालियां दीं. पुलिस बर्बरता के उन वीडियो को देख कर पूरा देश स्तब्ध था. उन तस्वीरों ने केवल खेल जगत ही नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, महिला सुरक्षा और सत्ता की संवेदनशीलता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए थे.
आंदोलनरत तमाम महिला खिलाड़ियों को अदालत से न्याय की उम्मीद थी, मगर अब वो उम्मीद भी टूट गई है क्योंकि अदालत किसी व्यक्ति को जनभावना, राजनीतिक बहस या मीडिया ट्रायल के आधार पर नहीं, बल्कि अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और कानून के आधार पर दोषी या निर्दोष ठहराती है. यदि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर पाता, तो अदालत आरोपी को दोषमुक्त कर सकती है. इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप झूठा था, बल्कि यह कि उपलब्ध साक्ष्य कानूनी कसौटी पर पर्याप्त नहीं पाए गए.
इस मामले ने भारतीय न्याय व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती को उजागर किया है. यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्य जुटाना अक्सर कठिन होता है. ऐसी घटनाएं बंद कमरों में होती हैं, शिकायत दर्ज होने में समय लगता है और गवाह सीमित होते हैं. दूसरी ओर, किसी भी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानून के अनुसार बचाव का अधिकार भी प्राप्त है. और जब आरोपी सत्ता का नजदीकी हो या सत्ता में बैठा हो तो पुलिस को वैसे भी उसके खिलाफ न सबूत मिलते हैं और न गवाह. इसलिए ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से जटिल हो जाती है.
बृजभूषण शरण सिंह को मामले से बरी किए जाने के अदालत के फैसले से शिकायतकर्ता महिला पहलवानों में गहरी निराशा है. वर्षों तक सार्वजनिक रूप से संघर्ष करने, विरोध प्रदर्शन करने और न्याय की मांग उठाने के बाद भी उन्हें वह परिणाम नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी.
भारतीय समाज में लंबे समय से यह प्रवृत्ति रही है कि यौन उत्पीड़न या बलात्कार जैसे मामलों में पीड़िता के व्यवहार, कपड़ों, समय, मित्रों या जीवनशैली पर सवाल उठाए जाते हैं. अक्सर यह कहा जाता है कि उसने “छोटे कपड़े पहने थे”, “गलत संकेत दिए थे”, “रात में बाहर क्यों निकली”, या “विरोध क्यों नहीं किया”. इस तरह का दृष्टिकोण अपराध के आरोपों से ध्यान हटाकर शिकायतकर्ता के चरित्र और आचरण की जांच करने लगता है. इसे ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ (पीड़िता को दोषी ठहराना) कहा जाता है. कोई आश्चर्य नहीं कि कल पीड़ित रेसलर्स के ऊपर ही यह आरोप लग जाए कि वे एक नेता का राजनीतिक करियर ख़त्म करने के लिए विपक्ष के इशारे पर आंदोलन कर रही थीं.
महिलाओं को अदालतों से न्याय नहीं मिलने या न्याय मिलने में बहुत देर होने के कारण ही महिलाओं को अपने खिलाफ हुई बर्बरता की शिकायत दर्ज कराने और न्याय मांगने से हतोत्साहित करती है. हमारा समाज महिलाओं की शिकायतों को बिना पूर्वाग्रह के सुनने और जांचने के लिए तैयार ही नहीं है. उनसे पहले उनके चरित्र का हिसाब मांगा जाता है. और ऐसा आज नहीं हो रहा बल्कि यह मानसिकता तो सदियों पहले पुरुषों के दिमाग को जकड़ चुकी है कि किसी भी घटना के पीछे कारण औरत ही होती है.
“जर, जोरू, जमीन” भारतीय समाज में प्रचलित एक पुरानी कहावत है. इसका अर्थ है कि धन (जर), स्त्री/पत्नी (जोरू) और भूमि (जमीन) मनुष्यों के बीच संघर्ष के प्रमुख कारण हैं. “जोरू” शब्द स्त्री को एक व्यक्ति के बजाय पुरुष की संपत्ति या अधिकार की वस्तु की तरह प्रस्तुत करता है.
जब तक किसी महिला के न्याय की मांग करने पर सबसे पहले उसके कपड़ों, उसके व्यवहार और उसके चरित्र पर सवाल उठाया जाएगा, तब तक यह महसूस करने वाली अनेक महिलाएं रहेंगी कि न्याय का रास्ता उनके लिए पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन है.
हर युग में औरत ही दोषी : धर्मग्रंथों ने स्त्री पर थोपा अपराधबोध
गौरतलब है कि धर्मग्रंथों की व्याख्याएं पुरुषों ने गढ़ी और आगे बढ़ाई हैं. धर्मग्रंथों ने हर बड़े संकट का बोझ स्त्री के सिर पर ही डाला है. रामायण हो या महाभारत, बाइबिल हो या यहूदी मिथक अथवा बाद की सामाजिक धार्मिक व्यवस्थाएं, बार बार एक ही पैटर्न दिखाई देता है. जब भी किसी समाज पर कोई बड़ा संकट आया, किसी न किसी स्त्री को इसका प्रतीकात्मक कारण बना दिया गया. इस तरह पुरुषों के गलत निर्णय, सत्ता का लालच और सामाजिक अन्याय को ढांपा गया.
कैकेयी : क्या सचमुच राम के वनवास की अकेली दोषी थी?
रामायण में कैकेयी को खलनायिका बना दिया गया. पीढ़ियों से बच्चों को यही बताया जा रहा है कि कैकयी ने राम को वनवास पर भेजा. लेकिन यदि घटनाओं को देखें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है. कैकेयी ने एक युद्ध के दौरान राजा दशरथ के प्राण बचाये थे. उसके बदले दशरथ ने दो वरदान देने का वचन दिया था. बाद में कैकेयी ने अपने पुत्र भरत को ध्यान में रख कर दशरथ से वरदान मांग लिए. उसका ऐसी मांग करना ठीक था या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन यह कहना कि सारा दोष केवल उसी का है, सरासर अन्याय है.
दशरथ राजा थे. वे वचन निभाने या न निभाने के विकल्प पर विचार कर सकते थे. राज्यसभा से सलाह ले सकते थे. उत्तराधिकार का दूसरा रास्ता निकाल सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. अगर उनको अपने पुत्र राम से प्रेम होता तो वे कैकेयी की अनुचित मांग कतई स्वीकार नहीं करते. मगर उनको तो इस बात की चिंता ज्यादा थी कि उनकी प्यारी रानी कोप भवन में जा लेटी है. उसको तो मनाना ही है. उसकी मांग तो पूरी करनी ही है. उसको दिया गया अपना पूरा करना ही है. ने दशरथ विवेक से नहीं बल्कि पत्नी-प्रेम में अंधे होकर फैसला लिया.
अगर एक बार दशरथ कैकेयी की मांग पर विचार कर लेते और उसकी मांग ठुकरा देते तो क्या वह जीवन भर कोप भवन में पड़ी रहती? बिलकुल नहीं. आज नहीं कल बाहर आ जाती. मगर दशरथ ने संकीर्णता का परिचय दिया और राम को वनवास भेज दिया. राम के साथ सीता और लक्ष्मण को भी. वन में सीता की जो दुर्दशा हुई, वह जंगल जंगल पति के साथ भटकती फिरी, पति उनको सुरक्षित भी नहीं रख पाया, रावण ने सीता का अपहरण कर लिया, सीता को वापस लाने के लिए राम ने रावण से युद्ध किया. इस युद्ध में हजारों जानें गयीं, पूरी लंका नष्ट हो गई और बाद में जब रावण को मार कर राम सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे तो अपनी स्त्री के ऊपर से उनका विश्वास भी जाता रहा और एक धोबी की बातों में आकर उन्होंने उस गर्भवती सीता का त्याग कर दिया, जिसने बुरे समय में उनका साथ पूरी निष्ठा से निभाया. यह सारी गदर न मचती अगर राजा दशरथ कैकेयी को दिए वचन पर पुनर्विचार कर लेते. रामायण में अगर कोई दोषी है तो वह राजा दशरथ हैं, न कि कैकेयी. मगर दोष पूरा का पूरा कैकेयी पर थोप दिया गया. राम खुद सीता के दोषी हैं, मगर धरती में सीता को समाना पड़ा.
द्रौपदी : महाभारत की वजह या अन्याय के खिलाफ एक औरत की गर्जना
महाभारत की लड़ाई का सारा दोष द्रौपदी के सिर मढ़ा जाता है. कहा जाता है कि द्रौपदी की हंसी, कटु वचन, व्यंग्य बाण ने महाभारत की आग भड़काई, जिसमें लाखों लोग मारे गए.
लेकिन क्या महाभारत सचमुच एक स्त्री के व्यंग्य से हुआ?
क्या धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह महाभारत का जिम्मेदार नहीं था?
क्या दुर्योधन की सत्ता की लालसा महाभारत की जिम्मेदार नहीं थी?
क्या शकुनि की राजनीति महाभारत की जिम्मेदार नहीं थी?
क्या भीष्म की चुप्पी महाभारत की जिम्मेदार नहीं थी?
क्या युधिष्ठिर का अपनी पत्नी को जुएं की बिसात पर दांव पर रखना अपराध नहीं था?
क्या द्रौपदी के चीरहरण के समय पूरी सभा का मौन रहना अपराध नहीं था?
फिर भी सदियों से यही अलापा जा रहा है कि द्रौपदी ने महाभारत करा दिया. यानी जिस महिला ने अपमान का विरोध किया, उसी को विवाद की जड़ बना दिया गया.
बाइबिल की हव्वा : पहली पापी करार दी गई
यहूदी और ईसाई धर्म में मनुष्य की उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि परमेश्वर ने पहले आदम और उसकी संगिनी के रूप में हव्वा की रचना की. उन्हें अदन की वाटिका में रहने का अधिकार दिया. वे वहां सारे पेड़ों के फल खा सकते थे, सिवाय एक पेड़ के. एक शैतान ने पहले हव्वा की बहकाया और उसे एक निषिद्ध फल खुद खाने और आदम को खिलाने के लिए तैयार किया. इसी फल को खाने के कारण आदम और हव्वा स्वर्ग से निकाले गए और पृथ्वी पर आकर उन्होंने मनुष्य जाति को बढ़ाया.
तमाम धार्मिक व्याख्याओं में इसी प्रसंग के आधार पर स्त्री को ‘पहले पाप’ से जोड़ा गया और यह विचार विकसित हुआ कि स्त्री के कारण मानव जाति स्वर्ग से निकली. समय के साथ इस कथा की अनेक धार्मिक व्याख्याएं की गयीं. मध्यकालीन यूरोप और कई धार्मिक परम्पराओं में हव्वा को उस व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसने पहले ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया. परिणामस्वरूप स्त्री को प्रलोभन, दुर्बलता और पाप का माध्यम मानने की प्रवृत्ति विकसित हुई. यह धारणा व्यापक हुई कि मानव जाति का स्वर्ग से निष्कासन स्त्री के कारण हुआ.
धर्मोपदेशों और सामाजिक मान्यताओं ने स्त्री को पुरुष के पतन का कारण बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
पैंडोरा : दुनिया की सारी बुराइयों की जिम्मेदार
प्राचीन यूनानी मिथकों में पैंडोरा को संसार की पहली स्त्री माना जाता है. कथा के अनुसार देवताओं के राजा ज़्यूस ने मनुष्यों को दंड देने के उद्देश्य से पैंडोरा की रचना करवाई. कारण यह था कि टाइटन प्रोमेथियस देवताओं की इच्छा के विरुद्ध स्वर्ग से अग्नि चुराकर मनुष्यों को दे आया था. ज़्यूस इसे देवताओं के अधिकार और सत्ता के विरुद्ध विद्रोह मानता था. इसलिए उसने केवल प्रोमेथियस को ही नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति को दंडित करने का निश्चय किया.
देवताओं ने मिलकर पैंडोरा को अनेक आकर्षक गुण प्रदान किए. किसी ने उसे अनुपम सौंदर्य दिया, किसी ने मधुर वाणी, किसी ने संगीत, कला और कौशल, तो किसी ने जिज्ञासा का स्वभाव. इसी कारण उसका नाम “पैंडोरा” पड़ा, जिसका अर्थ है – “सभी उपहारों से संपन्न”
जब पैंडोरा को पृथ्वी पर भेजा गया, तो उसके साथ एक पात्र, जिसे “पैंडोरा का बॉक्स” कहा गया, भी दिया गया. उसे स्पष्ट चेतावनी दी गई कि वह इस पात्र को कभी न खोले. किंतु उसकी जिज्ञासा इतनी प्रबल थी कि वह स्वयं को रोक नहीं सकी. जैसे ही उसने उस पात्र का ढक्कन खोला, उसमें बंद संसार की सारी विपत्तियां – दुःख, बीमारी, मृत्यु, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा, युद्ध, महामारी, शोक और असंख्य कष्ट बाहर निकलकर पूरी दुनिया में फैल गए. घबराकर पैंडोरा ने पात्र को तुरंत बंद कर दिया, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी. कथा के अनुसार उस पात्र में केवल “आशा” ही भीतर रह गई.
यह कहानी केवल एक मिथक नहीं रही, बल्कि सदियों तक स्त्रियों के प्रति समाज की सोच को प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गई. इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह स्थापित करता है कि मानव जाति की समस्त पीड़ा और दुःख का कारण एक स्त्री की जिज्ञासा और उसकी “आज्ञा उल्लंघन” की प्रवृत्ति थी. अर्थात यदि पैंडोरा ने निषिद्ध पात्र न खोला होता, तो संसार दुःखों से मुक्त रहता. सवाल यह कि जब पैंडोरा को वह बॉक्स कभी खोलना ही नहीं था तो वह बॉक्स उसके साथ भेजा क्यों गया? मगर यह सवाल एक पुरुष को कटघरे में खड़ा करेगा इसलिए यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया.
मनु स्मृति और सामाजिक व्यवस्था
भारतीय परम्परा में वेद, उपनिषद, गीता, पुराण, स्मृतियां और अनेक ग्रन्थ हैं. इनमें से मनु स्मृति एक धर्मशास्त्रीय – सामाजिक ग्रन्थ है. मनु स्मृति में स्त्री की स्वतन्त्रता, शिक्षा और सामाजिक भूमिका को लेकर जो विचार रखे गए हैं वे बेहद संकीर्ण मानसिकता को दर्शाते हैं. इन्हीं विचारों पर पूरा सनातन टिका है. इन्ही विचारों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने आत्मसात किया है. अनेक अदालतों के जज इसी विचारधारा के तहत अपने फैसले देते हैं.
दोष हमेशा औरत का ही क्यों?
यदि इन तमाम कथाओं को साथ रखकर देखें तो एक सामान पैटर्न दिखता है –
जब राजा असफल हुआ – दोष रानी का
जब युद्ध हुआ – दोष स्त्री का
जब परिवार टूटा – दोष स्त्री का
जब समाज बिगड़ा – दोष स्त्री का
लेकिन जिन पुरुषों के हाथ में सत्ता थी, जिनको निर्णय लेने थे, जिन्होंने निर्णय लिए, जिन्होंने हिंसा की, जिन्होंने अन्याय पर मौन साध लिया, वे सभी महान, धर्मात्मा, मर्यादा पुरुष या महान व्यक्ति के रूप में स्थापित हो गए.
कहना गलत न होगा कि धर्म हमेशा से स्त्री विरोधी रहा है क्योंकि धर्म को पुरुषों की जमात ने गढ़ा है. उन्होंने पितृसत्ता को मजबूत करने के लिए हर गलत चीज के लिए स्त्री को जिम्मेदार ठहराया. ये मानसिकता आज भी तक जस की तस पुरुषों के दिमाग पर हावी है. जबकि जरूरत इस बात की थी कि कम से कम इक्कीसवीं सदी में तो हजारों वर्ष पुरानी कथाओं को नए नैतिक विवेक से पढ़ा जाता और स्त्री के साथ न्याय किया जाता.
कैकेयी को महत्वाकांक्षी मां कहने वाले, द्रौपदी को महाभारत का युद्ध कराने वाला कारण मानने वाले या हव्वा को मानव इतिहास के पहले अपराधी का प्रतीक बताने वाली पितृसत्ता अगर आने वाले समय में रेसलर विनेश फोगाट और उनकी साथी पहलवानों को दोषी ठहरा दें, तो कोई आश्चर्य नहीं. इसमें बहुत बड़ा हाथ धर्म और धर्मग्रंथों का है, जिन्होंने स्त्री विरोधी मानसिकता से पूरे समाज को जकड़ रखा है. देश की अदालतें तक स्त्री विरोधी मानसिकता से मुक्त नहीं हैं. Women’s Rights





