Women Legal Rights: क्या महिला का परिवार से रिश्ता केवल विवाह पर निर्भर होना चाहिए? अगर बेटा शादी के बाद भी अपने मातापिता का बेटा बना रहता है, तो बेटी क्यों नहीं? औरतों को इंसान के रूप में देखा जाए, किसी की संपत्ति या आश्रित के रूप में नहीं. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला उन लाखों महिलाओं के लिए आशा का संदेश है जो तलाक के बाद सामाजिक भेदभाव और आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं.

भारतीय समाज में आज भी बेटी के अधिकारों को उस की वैवाहिक स्थिति से जोड़ कर देखा जाता है. शादी हो जाए तो कहा जाता है कि अब वह पराया धन है और यदि तलाक हो जाए तो उसे परिवार पर बोझ समझ लिया जाता है. इसी मानसिकता को तोड़ते हुए हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महतत्वपूर्ण फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल तलाकशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को परिवार के सदस्य की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता और उसे उस के कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. ऐसा करना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2005 में हिंदू विवाह कानून में संशोधन कर के बेटियों को बेटों के बराबर का स्थान दे दिया था और वे पैदा होते ही पैतृक संपत्ति में कोपर्सन या सहयोगी के तौर पर हकदार बन जाती हैं.

यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि उस धर्म आधारित सोच को चुनौती है जो महिला की पहचान को हमेशा किसी पुरुष पिता, पति या पुत्र से जोड़ कर देखती है. शादी के बाद बेटी को परिवार से अलग मान लेना और तलाक के बाद उसे अधूरी या अबला समझ लेना समाज की दोहरी मानसिकता का परिणाम है. अदालत ने कहा कि तलाकशुदा बेटी को परिवार के लाभों या पैंशन जैसी सुविधाओं से बाहर रखना भेदभावपूर्ण है. बेटी, बेटी ही रहती है, उस की वैवाहिक स्थिति बदलने से उस के संवैधानिक और पारिवारिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते.

दरअसल, भारतीय समाज में बेटियों से दोहरी अपेक्षाएं रखी जाती हैं. विवाह से पहले परिवार के लिए त्याग की उम्मीद की जाती है और विवाह के बाद कहा जाता है कि उन का मायके पर कोई अधिकार नहीं है. जो समाज लड़की की मरजी के बिना उस की शादी में नाचता है, अगर शादी टूट जाए तो वही समाज लड़की को दोषी ठहराने लगता है. महिलाओं की गरिमा और समान नागरिकता के लिए यह जरूरी है कि तलाकशुदा बेटी को भी परिवार का हिस्सा माना जाए. Women Legal Rights

 

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