Mahatma Gandhi: केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने 30 मई, 2026 को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि, “दशकों तक देश की इमेज गांधीजी पर अटकी हुई थी लेकिन आज ग्लोबल पहचान गांधी से मोदी पर शिफ्ट हुई है.” गजेंद्र सिंह शेखावत का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जिस में इतिहास, राष्ट्र और लोकतंत्र को एक व्यक्ति के इर्दगिर्द समेट देने की कोशिश दिखाई देती है.

जब शेखावत से पूछा गया कि कल्चर टूरिज्म या बौलीवुड में भारत का बड़ा ब्रैंड एंबैसडर कौन है, तो उन्होंने जवाब दिया, “आजकल हमारे पास सब से बड़ा ब्रैंड एंबैसडर हमारे प्रधानमंत्री मोदी हैं. 10-15 साल पहले तक गांधी जी भारत के ब्रैंड एंबैसडर थे और अब मोदी जी भारत के ब्रैंड एंबैसडर हैं.

गजेंद्र सिंह शेखावत ने जो भी कहा उस में कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है क्योंकि बीजेपी सरकार के सारे मंत्री सिर्फ मोदी का गुणगान करने में माहिर हैं. पर्यटन मंत्री की अपनी उपलब्धि क्या रही, उन्हें इस पर बात करनी चाहिए लेकिन हर विभाग का मंत्री अपनी जिम्मेदारी से फारिग है. पर्यटन हो या परिवहन, विदेश मामले हो चुनाव, सभी जगह मोदी का चेहरा ही नजर आता है. यही कारण है कि प्रचारतंत्र ने एक नेता को देश का ब्रैंड एंबैसडर बना दिया है.

सब से पहले यह समझना होगा कि ब्रैंड एंबैसडर और राष्ट्रनिर्माता में फर्क होता है. ब्रैंड एंबैसडर किसी उत्पाद, कंपनी या अभियान का प्रचार करता है. महात्मा गांधी किसी विचार के प्रचारक नहीं थे, वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सब से प्रभावशाली नेताओं में से एक थे जिन की पहचान पूरी दुनिया में भारत के संघर्ष, अहिंसा और जनआंदोलन के प्रतीक के रूप में आज भी कायम है.

अगर आज दुनिया भारत को जानती है तो उस के पीछे केवल वर्तमान सरकारों का योगदान नहीं है. भारत की पहचान हजारों वर्षों की संस्कृति, विज्ञान, साहित्य, दर्शन, सामाजिक आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से बनी है. गांधी उस विरासत के एक महतत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं. गांधी से सहमति या असहमति हो सकती है, उन की आलोचना भी की जा सकती है लेकिन उन के ऐतिहासिक महतत्व को किसी समकालीन नेता से तुलना कर के कम करने की कोशिश इतिहास के साथ न्याय नहीं है.

शेखावत के इस बयान की दूसरी समस्या व्यक्तिपूजा की राजनीति है. लोकतंत्र में संस्थाएं बड़ी होती हैं, व्यक्ति नहीं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा माहौल बनाया गया है जिस में हर उपलब्धि का श्रेय एक व्यक्ति को और हर समस्या की जिम्मेदारी किसी और को दे दी जाती है. सड़क बने तो प्रधानमंत्री महान, जी-20 हो तो प्रधानमंत्री महान, चंद्रयान सफल हो तो प्रधानमंत्री महान. ऐसे में गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे लोग राष्ट्र और सरकार के बीच का अंतर भी भूल जाते हैं तो इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आधुनिक भारत किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है. इस में भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी और लाखों गुमनाम लोगों का योगदान है. ऐसे में किसी एक नेता को राष्ट्र का पर्याय बना देना लोकतांत्रिक परंपरा के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

असल सवाल यह है कि क्या भारत की पहचान 140 करोड़ लोगों, उस के संविधान और उस की विविधता से बनेगी या फिर किसी एक राजनीतिक चेहरे से? अगर सत्ता में बैठा कोई नेता ही देश का सब से बड़ा प्रतीक घोषित कर दिया जाएगा तो इतिहास का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के अनुसार होने लगेगा.

भारत कोई साबुन, मोबाइल या पर्यटन पैकेज नहीं है जिसे किसी ब्रैंड एंबैसडर की जरूरत हो. भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जिस की पहचान उस के नागरिकों, उस के संविधान और उस के संघर्षों के कारण है. नेताओं का सम्मान होना चाहिए लेकिन राष्ट्र को किसी एक व्यक्ति की छवि में कैद कर देना लोकतंत्र की हत्या के समान है. गांधी की आलोचना कीजिए, उन के विचारों पर बहस कीजिए लेकिन भारत के इतिहास को वर्तमान राजनीति के अनुसार छोटा करने की कोशिश करना देश की सामूहिक स्मृति और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने का षड्यंत्र ही माना जाएगा.

सब से बड़ा सवाल यह है कि आज भारत में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां विकराल रूप धारण कर चुकी हैं. अगर कोई नेता देश का सब से बड़ा ब्रैंड एंबैसडर है तो क्या वह इन समस्याओं की जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में स्वीकार करेगा? या फिर वह केवल उपलब्धियों के समय ही ब्रैंड एंबैसडर बनेगा? Mahatma Gandhi

 

 

 

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