Real Test of Democracy: 2019 से 2024 के बीच संस्थाओं को बर्बाद कर उनका जमकर दुरूपयोग किया गया और राम मंदिर, तीन तलाक, धारा 370 जैसे मुद्दों के नाम पर जनता के जरुरी मुद्दों को खत्म किया गया. पांच साल यही ड्रामा चलता रहा. 2024 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में से एक था. दस वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने के बाद भाजपा तीसरी बार जनता के सामने थी. बीजेपी ने पूरे चुनाव में राममंदिर को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया. राममंदिर निर्माण के लिए नरेंद्र मोदी को अवतार की तरह पेश किया गया. सारा मुद्दा महामानव की छवि पर जाकर ठहर गया. विकास नहीं बल्कि विकास पुरुष के नेरेटिव के साथ ही यह चुनाव लड़ा गया. दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की बर्बादी, संविधान पर पैदा हुए खतरे, बदतर होती देश की इकोनॉमी, बेरोज़गारी और लगातार बिगड़ते सामाजिक माहौल पर बात की लेकिन जनता को यह बातें राममंदिर के आगे गैरजरुरी लगी.
2024 के चुनाव में बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा का गिरता स्तर और पेपर लीक जैसे मुद्दे भी पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने लेकिन चुनाव परिणाम आने पर भाजपा फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनी हालांकि इस बार उसे अपने दम पर पूरा बहुमत नहीं मिला था फिर भी वह अलायंस के सपोर्ट से एक मजबूत सरकार बनाने में कामयाब रही.
2024 के बाद चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर बहस तेज हुई. मतदाता सूची में गड़बड़ी पर सवाल उठे लेकिन संसद में चुनाव आयुक्त को बदलने का प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया. राज्यपाल की भूमिका को लेकर भी कई राज्यों में विवाद हुए क्योंकि गैरबीजेपी राज्यों के गवरनर चुनी हुई सरकारों के कामकाज में दखल देने लगे. कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा. इन घटनाओं ने संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए. संविधान ने सेंटर और स्टेट सरकारों के बीच पॉवर का बैलेंस बनाने की कोशिश की है. जब यह बैलेंस बिगड़ता है तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाएँ ही होती हैं. चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद, सीएजी, सूचना आयोग, यूनिवर्सिटीज, मीडिया और स्वतंत्र जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष रहें और बिना किसी दबाव और भेदभाव के काम करें तो लोकतंत्र जिंदा रहता है. डेमोक्रेसी के लिए सबसे जरुरी बात यह होती है कि लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहे.
इसी कारण जब भी किसी डेमोक्रेटिक बॉडी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो इसके लिए सत्ता ही दोषी साबित होती है. ऐसे में इसे निष्पक्ष बनाये रखने की जिम्मेदारी विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज की होती है. लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव से नहीं होती. उसकी परीक्षा तब होती है जब सत्ता आलोचना को स्वीकार करे, संस्थाएँ निष्पक्ष बनी रहें, विपक्ष अपनी भूमिका बेहतर ढंग से निभाए और नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सकें. Real Test of Democracy





