Women Rights: भारतीय समाज में सदियों से औरतों को पराया धन ही माना गया है. औरत इतनी पराई होती है कि अपने शरीर, इच्छा और सम्मान पर भी उस का कब्जा नहीं होता. शादी को कन्यादान का पवित्र यज्ञ बता कर बेटी को ससुराल भेज दिया जाता है. वहां अगर उत्पीड़न हो तो सह लो, परिवार की इज्जत का सवाल है कह कर उसे चुप करा दिया जाता है.

तलाक जैसी बातें तो 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने से पहले तक भारतीय समाज को हजम नहीं होती थीं. औरत के लिए पति को छोड़ना मुमकिन नहीं था और पति द्वारा छोड़ दी गई औरत समाज की नजर में बोझ समझ जाती थी क्योंकि पितृसत्ता पुरुषों को सिखाती है कि वे रक्षक हैं लेकिन शर्त यह है कि औरतें उन की इज्जत का बोझ ढोएं.

उत्तर प्रदेश के मेरठ में 4-5 अप्रैल 2026 को एक अनोखी घटना घटी. रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज डा. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने अपनी इकलौती बेटी प्रणिता शर्मा का तलाक के बाद ढोलनगाड़ों, गाजेबाजे, फूलमालाओं और मिठाइयों के साथ स्वागत किया.

प्रणिता की शादी 2018 में आर्मी मेजर गौरव अग्निहोत्री से हुई थी. 7-8 साल की शादी में प्रणिता ने ससुराल में मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक उत्पीड़न झेला. बेटे के जन्म के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी. आखिरकार प्रणिता ने आत्मसम्मान को प्राथमिकता देते हुए मेरठ फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर की और जस्टिस शक्तिपुत्र तोमर ने तलाक मंजूर कर दिया.

तलाक की डिग्री मिलते ही प्रणिता के पिता डा. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ढोलनगाड़ों की थाप पर नाचतेगाते, फूलमालाएं पहनाते और मिठाइयां बांटते हुए बेटी को घर ले कर आए. पूरा परिवार आई लव माय डौटर वाली टीशर्ट्स पहने हुआ था. इस मौके पर डा. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने कहा, ‘‘प्रणिता का सम्मान सब से पहले है. बेटी वहां खुश नहीं थी तो उसे खुश रखना मेरा फर्ज है. कोई एलीमनी नहीं ली, सिर्फ बेटी को वापस ले कर आए क्योंकि बेटी बोझ नहीं होती. तलाक कोई कलंक नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने की नई शुरुआत है.’’

यह घटना वायरल हो गई है क्योंकि भारतीय समाज में बेटियों के मामले में आमतौर पर तलाक को छिपाया जाता है लेकिन मेरठ के रिटायर्ड जज डा. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने ऐसा कर पैट्रिआर्कल ढांचे को ध्वस्त कर दिया.

आमतौर पर आज भी तलाकशुदा को परिवारों में विधवा जैसा समझा जाता है और उसे मांगलिक कहे जाने वाले कार्यक्रमों और त्योहारों में बुलाया नहीं जाता. हमारे यहां बर्थडे के अलावा जो कुछ होता है वह धार्मिक ही होता है और इन में तलाकशुदा को घुसने की इजाजत नहीं होती.

मुसलिम समाज में तलाक पहले से ही होते रहे हैं और फिर दोबारा शादियां भी आसानी से हो जाती हैं. लेकिन तलाक की मानसिक वेदना बेहद तकलीफदेह ही होती है. हिंदू औरत हो मुसलिम दोनों के लिए तलाक कोई सम्मानजनक बात नहीं होती. तलाक का यह जश्न सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं बल्कि यह फैमिनिज्म की मजबूत होती विचारधारा का उदाहरण है. Women Rights

 

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