Alpha Movie: कहानी की बात करें तो कर्नल फतेह सिंह उर्फ जर्रार खान (बौबी देओल) देश के लिए ‘सुपर सोल्जर्स’ यानी बेहद ताकतवर सैनिक बनाने का एक सीक्रेट प्लान तैयार करता है, जिसे ‘प्रोजैक्ट अल्फा’ नाम दिया गया है. इस मिशन के तहत एक खास किस्म का सिरम तैयार किया जाता है, जो शरीर पर इंजैक्ट कर इंसानी ताकत को बढ़ा देता है.
मगर इस सीरम के साइड इफैक्ट दिखने शुरू हो जाते हैं और 6 महीने के अंदर इंजैक्ट किए फौजियों की मौत हो जाती है. आर्मी इस प्रोग्राम को हमेशा के लिए बंद कर देती है और फतेह को डिमोट कर दूरदराज भेज देती है. हालांकि रौ चीफ विक्रांत कौल (अनिल कपूर) की एक गलती के चलते एक्सपैरिमैंट के दौरान उसी की पत्नी के गर्भ में पल रही ‘सीता’ (आलिया भट्ट) इकलौती ऐसी लड़की बचती है जिस के शरीर पर यह कैमिकल काम कर जाता है. फतेह सिंह बचपन में सीता को अपने साथ ले जाता है.
फतेह सिंह उसे पालपोस कर एक ऐसी खतरनाक किलिंग मशीन बना देता है जो बिना सोचेसम?ो सिर्फ कत्ल करना जानती है. लेकिन जब सीता को अपने इस ‘बाबा’ यानी फतेह सिंह के असली और खौफनाक चेहरे का पता चलता है तो वह बागी हो जाती है. इस के बाद शुरू होता है अपनों को खोजने, देश को बचाने और अपने ही गुरु से बदला लेने का रिवेंज प्लौट.
फिल्म की सब से बड़ी समस्या इस का खोखला और बेअसर स्क्रीनप्ले है. इस का लेखक उदय चोपड़ा है, उस ने यहां आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ का रिवर्स कर दिया है, कि क्या हो अगर एक पाकिस्तानी स्पाई भारत में खुफिया बन कर आए. जैसे, इस में फतेह सिंह, जो पाकिस्तानी खुफिया है, भारत में कर्नल रैंक तक पहुंच जाता है.
श्रीधर राघवन और इशिता मोइत्रा ने भारतीय पौराणिक कथाओं के नामों को मार्वल फिल्मों के स्टाइल के साथ जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन नतीजा बेहद थकाऊ और उबाऊ निकला है. फिल्म में लौजिक की कमी साफ ?ालकती है.
2 बहनें (आलिया भट्ट और शरवरी वाघ) दुश्मनों से बच कर 66 घंटों से भाग रही हैं, उन के पास खानेपीने का ठिकाना नहीं है, लेकिन हर नए सीन में वे ब्रैंडेड और स्टाइलिश कपड़ों में नजर आती हैं. वहीं, जब कबीर (ऋतिक रोशन) का कैमियो होता है तो वह दुश्मनों की गोलियों को लिटरली डोच करता दिखाई देता है.
स्पाई फिल्मों में जिस तरह के थ्रिल होने की जरूरत होती है यहां वह मिसिंग दिखाई देता है. कहानी में बहुत कमियां हैं. इंटरवल तक आतेआते पूरी फिल्म एक अजीब सा मजाक लगने लगती है. बस, यह मान लेना पड़ता है कि फिल्म बिना दिमाग लगाए खत्म कर ली जाए.
हालांकि आलिया ने ऐक्ंिटग अच्छी की है पर सीता के भारीभरकम और ठेठ ऐक्शन रोल में वह बिलकुल मिसफिट नजर आती है. वहीं शरवरी को फिल्म में सिर्फ एक ग्लैमरस और चुलबुली सपोर्टिंग रोल के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जिस की एंट्री ही एक फालतू गाने से होती है, जिस में वह कैल्विन क्लाइन की एड करती दिखाई देती है.
विलेन के रोल में बौबी देओल ने अपनी भारी आवाज और खूंखार लुक से असर छोड़ने की पूरी कोशिश की है, लेकिन कमजोर राइटिंग की वजह से उन का किरदार भी कुछ खास कमाल नहीं कर पाता. अनिल कपूर रौ चीफ के रूप में ठीकठाक लगे हैं, बस, उन के हिस्से दमदार स्क्रीन टाइम आया नहीं. सिनेमैटोग्राफी बढि़या है. तकनीकी तौर पर फिल्म चमकीली और भव्य तो है लेकिन इस में कोई गहराई नहीं है.
एडिटिंग के मामले में आरिफ शेख ने सीन्स को इतनी बेरहमी से काटा है कि यह सम?ा पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसे पीट रहा है. विजुअल इफैक्ट्स और ग्रीन स्क्रीन का काम फिल्म के बजट को जस्टिफाई नहीं कर पाता. फिल्म का बीजीएम तो ठीक है मगर कोई गाना ऐसा नहीं है जो जरा सा भी याद रह जाए. फिल्म में सब से पहली जरूरत इस की राइटिंग पर काम करने की थी जो बहुत कच्ची रह गई है. बहरहाल, फिल्म बिना दिमाग लगाए एक बार देखी जा सकती है. Alpha Movie





