अमेरिका के यूटा राज्य से आई एक दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर धर्म और पहचान के नाम पर फैल रही नफरत इंसानियत को कहां ले जा रही है.
यूटा में भारतीय मूल के व्यक्ति पर कैसे हुआ हमला?
साल्ट लेक सिटी के पास स्थित एक शॉपिंग मॉल में काम करने वाले भारतीय मूल के सैयद सोहैलुद्दीन पर एक व्यक्ति ने सिर्फ इसलिए चाकू से हमला कर दिया क्योंकि वह मुस्लिम हैं. हमलावर ने पहले उनका नाम, उनका देश और फिर उनका धर्म पूछा. जैसे ही उसे पता चला कि वे मुस्लिम हैं, उसने उन पर लगातार चाकू से कई बार वार किये.
करीब 15 बार चाकू लगने से गंभीर रूप से घायल सोहैलुद्दीन को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी सर्जरी हुई और उनका इलाज जारी है. राहत की बात यह रही कि मॉल में मौजूद लोगों ने बहादुरी दिखाते हुए हमलावर को पकड़ लिया, नहीं तो यह घटना और भी भयावह हो सकती थी.
पुलिस ने आरोपी पीटर माइकल लार्सन को हत्या के प्रयास और प्रतिबंधित हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है. अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार आरोपी ने स्वीकार किया कि उसने पीड़ित को उनके धर्म की वजह से निशाना बनाया. उसने खुद को “कैटलिस्ट” बताते हुए मुसलमानों की हत्या करने की मंशा भी जाहिर की. ऐसे बयान इस बात की गंभीर चेतावनी हैं कि आम लोगों में बढ़ रही कट्टर सोच केवल विचार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह कभी भी हिंसा का रूप ले सकती है.
अमेरिका में हेट क्राइम की घटनाएं क्यों चिंता का विषय हैं?
किसी भी समाज में कट्टरता अचानक पैदा नहीं होती. जब देश का नेतृत्व करने वाला राजनेता आम नागरिक को सुगमता से जीवन जीने के संसाधनों को उपलब्ध कराने की बजाये उसे धर्म की आग में झोंक कर उस पर सत्ता की रोटियां सेंकने लगता है, धर्म के नाम पर लोगों के दिमाग में एक दूसरे के प्रति नफरत भरने लगता है, जब वह इसमें सफल हो जाता है और लोगों के जीवन में नफरत भरी भाषा सामान्य होने लगती है, तब उसका असर सड़कों पर भी दिखाई देने लगता है.
अमेरिका में भारत की तरह धर्म सरकार पर मागा के मार्फत हावी होने लगा है. ईसाई चर्च को मानने वाले कट्टर गोरे न मुसलमानों को आसपास देखना चाहते हैं और न अब हिंदुओं को. तुलसी गैबबर्ड को ट्रंप के केबिनेट से निकाल दिया गया है. न्यूयार्क के मुस्लिम मेयर जोहरान ममदानी की सफलता और लोकप्रियता से कट्टर गोरे ईसाई चिढ़े हुए हैं.
यह घटना सिर्फ एक भारतीय या एक मुस्लिम पर हमला नहीं है, बल्कि उन लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है जो अमेरिका में लंबे समय से समानता, सहिष्णुता और मानव गरिमा की बात करते रहे हैं. अमेरिका में भी अगर किसी व्यक्ति की पहचान उसके लिए खतरा बन जाए, तो यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है. ट्रंप, बैंजामिन नेतन्याहू और व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं ने धर्म को शासन का नंबर 1 काम बना कर दुनिया को फिर धर्म की आग में झोंक दिया है.





