Missing Woman: दिल्ली के जैतपुर इलाके के ब्लॉक-ए, गली नंबर 01 में स्थित मकान नंबर 04 में रहने वाली 40 वर्षीय बबली सुबह करीब 7:00 बजे अपने घर से किसी काम के लिए निकली थीं लेकिन बबली वापस नहीं लौटीं. जब काफी समय बीत जाने के बाद भी बबली का कुछ पता नहीं चला, तो उनके पति अमरेश और पूरे परिवार ने अपने स्तर पर हर संभावित जगह, रिश्तेदारों और आस-पड़ोस में खोजबीन की. जब हर कोशिश नाकाम रही, तो परिवार जैतपुर थाने पहुंचा.

उसी दिन यानी 10 जून 2026 को जैतपुर थाने में गुमशुदगी/अपहरण का मामला दर्ज किया गया, जिसकी DD संख्या 61A है. पुलिस और प्रशासन को दी गई जानकारी के अनुसार बबली का हुलिया इस प्रकार है- उम्र: 40 साल कद: 4 फीट 11 इंच, रंग: गोरा, चेहरा: गोल, शरीर: पतला, पहनावा: पीले रंग का सलवारसूट और पैरों में पारंपरिक जूती.

पुलिस प्रशासन की ओर से कोशिशें की जा चुकी हैं, लेकिन इस लापता महिला के बारे में अब तक कोई सुराग हाथ नहीं लगा है. इसी वजह से समाचार पत्र में यह सार्वजनिक सूचना जारी की गई है ताकि आम जनता की मदद से बबली को ढूंढा जा सके. किसी भी परिवार के लिए वह समय सबसे बड़ा दुखद बन जाता है जब उनके घर की कोई महिला या लड़की अचानक लापता हो जाती है या अपनी मर्जी से घर छोड़कर चली जाती है.

ऐसे समय में जहां परिवार को संबल की जरूरत होती है, वहीं हमारी सामाज और पुलिस प्रशासन का रवैया परेशान करता है. एक तरफ बेटी के बिछड़ने का गम और दूसरी तरफ व्यवस्था की बेरुखी—परिवार हर दिन एक नई मौत मरता है.

कहने को तो पुलिस का काम नागरिकों की सुरक्षा और सहायता करना है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. एफ.आई.आर. दर्ज कराने से लेकर जांच की प्रक्रिया तक, पीड़ित परिवार को कदम-कदम पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, पुलिस सबसे पहले यही मानकर चलती है, तुमने ही मार दिया होगा, प्रताड़ित किया होगा, या भाग गई होगी.

थाने पहुंचते ही पीड़ित को सांत्वना देने के बजाय पुलिस अधिकारी अक्सर महिला के चरित्र पर उंगली उठाने लगते हैं. ” उसका किसी से चक्कर था क्या?”, “वह किससे फोन पर बात करती थी.

पुलिस अक्सर यह मानकर चलती है कि गलती परिवार की ही होगी. वे परिवार पर ही शक करने लगते हैं कि उन्होंने महिला को प्रताड़ित किया होगा या घर का माहौल खराब होगा. जांच को आगे बढ़ाने, मोबाइल लोकेशन ट्रेस करने या किसी संदिग्ध ठिकाने पर छापेमारी करने के नाम पर पुलिस अक्सर मोटी रिश्वत की मांग करती है. गरीब परिवार अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगाने को मजबूर हो जाते हैं.

रसूखदारों के मामलों में जहां तुरंत कार्रवाई होती है, वहीं आम आदमी को हफ्तों सिर्फ थाने के चक्कर कटवाए जाते हैं. पुलिस अधिकारियों का टालमटोल वाला रवैया परिवार की बची-कुची हिम्मत भी तोड़ देता है. हमारा समाज आज भी महिलाओं की आजादी या उनकी ओर से उठाए गए किसी भी कदम को परिवार की इज्जत से जोड़कर देखता है. जब कोई महिला लापता होती है, तो समाज का रवैया हमदर्दी का न होकर और अधिक आक्रामक हो जाता है:

आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में तरह-तरह की कहानियां गढ़ ली जाती हैं। बिना सच जाने लोग पीठ पीछे और कई बार सीधे मुंह पर भी ताने कसने से बाज नहीं आते. ऐसे परिवारों को समाज में अछूत जैसा मान लिया जाता है। उन्हें शादी-ब्याह, त्योहारों या अन्य मांगलिक कार्यों में आमंत्रित करना बंद कर दिया जाता है, लोग उनसे दूरी बना लेते हैं, मानो उन्होंने खुद कोई जघन्य अपराध किया हो। समाज उस पूरे खानदान को संशय की नजर से देखने लगता है,

कुछ लोग मदद के बहाने आते हैं, लेकिन उनका मकसद सिर्फ गॉसिप के लिए नई जानकारियां जुटाना होता है. वे बार-बार एक ही सवाल पूछकर परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कते हैं. 24 घंटे दिमाग में एक ही चिंता बनी रहती है कि उनकी पत्नी किस हाल में होगी, सुरक्षित होगी या नहीं. बदनामी के डर से लोग घर से बाहर निकलना बंद कर देते हैं. समाज के लगातार हमलों के कारण परिवार खुद को ही दोषी मानने लगते हैं.

जब कोई महिला घर से जाती है, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होती जो लापता होती है, बल्कि उसके पीछे उसका पूरा परिवार जिंदा लाश बन जाता है. और हमारा समाज उसकी मजबूरी या संकट को अपनी पंचायत का विषय बना लेता है. Missing Woman

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