Artificial Intelligence: जैसे 300 साल से पहले से जब से सभ्यता बननी शुरू हुई है तब से धर्म ने बातें बनाबना कर समाज को पूरी तरह कंट्रोल में ही नहीं रखा, लगातार उस से पैसा वसूला भी. दुनियाभर में बने बड़े पिरामिड, चर्च, विशाल मंदिर, विशाल मसजिदें, बड़ीबड़ी मूर्तियां धर्म की देन नहीं हैं बल्कि धर्म के आम आदमी की मेहनत से वसूली की निशानियां हैं. आज भी नितांत कपोलकल्पित, अविश्वसनीय कहानियों पर दुनिया की 8 अरब जनता में से 95 फीसदी अंधा भरोसा करती है.
इस भरोसे को अब आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस भुनाने में लग गया है. तकनीक 5,000 साल पहले भी विकसित हुई होगी, तभी इजिप्ट में एकदम चौकोर पिरामिड बने. गुफाओं में मृत्यु की बाद राजाओं के शव रखे गए. विशाल चर्च बने जिन में 500 से 1,000 लोग छत के नीचे बैठ सकें. अंगकोर वाट जैसे मंदिर सुदूर कंबोडिया में बने. आर्टिफिशियल इंटैंलीजैंस यानी एआई इसी तरह का निर्माण करा रही है जिस के धर्मगुरु सैफ एहसान, बिल गेट्स, सुंदर पिल्लई, एलौन मस्क, मार्क जुकरबर्ग जैसे हैं. ये भी कहते हैं कि एआई आप की रक्षा उसी तरह करेगा जैसे 5,000 साल से धर्मगुरु कह रहे हैं कि उन का हवा में से गढ़ा गया ईश्वर रक्षा करेगा.
एआई जनता के काम नहीं आएगा, पूंजीपतियों, सरकारों, चोरउचक्कों के काम आएगा. उन्होंने यह कर दिखाना शुरू भी कर दिया है. ठीक है कि एआई से दुनिया की प्रगति हो रही है, विशाल भवन बन रहे हैं. बड़े हवाई जहाज बन रहे हैं, 2,000-3,000 लोगों के ले जाने वाले पानी के जहाज बन रहे हैं लेकिन यह न भूलें कि इन में आम लोग नहीं, केवल खास लोग ही सफर कर सकेंगे. यह एआई का कमाल है कि उस ने अरबों लोगों की नब्ज कुछ लोगों के हाथों में दे दी है जो मनचाहे ढंग से जनता की सोच ही नहीं, उस की संपत्ति को भी तोडमरोड़ सकते हैं.
दिल्ली की समिट में एआई का बड़ा प्रदर्शन हुआ पर यह समिट एआई के मालिकों और उन के सब से बड़े गाहक सरकारों की थी. वे यह तय करने के लिए जमा हुए कि एआई से कैसे अरबों लोगों को गुलामी में धकेला जा सकता है. आम सीधे लोगों का मूल्य कैसे तकनीकी तरीकों से इस कदर शून्य कर दिया जाए कि वे पीढिय़ों तक बदहाली, बीमारी और खुद के साथ होने वाली बदतमीजी को सहते रहें.
एआई समिट में हुई बातों में कहीं यह नहीं था कि दुनिया में लड़ाइयों को कैसे बंद किया जाएगा. कहीं यह नहीं था कि बढ़ती अमीरीगरीबी की खाई कैसे दूर होगी. कहीं यह नहीं था कि महंगी होती स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती कैसे होंगी. कहीं यह नहीं था कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ को एआई कैसे रोकेगी. सब अपनीअपनी हांक रहे थे कि हम ने एआई से यह कर लिया, वह कर लिया. भई, जनता को क्या मिलेगा, कब मिलेगा. अभी तो एआई का इस्तेमाल गरीबों को एल्गोरिदमों से ज्यादा काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. यह टूल वह कोड़ा है जो अफ्रीकी गुलाम या भारतीय अछूत अपनी पीठों पर सदियों तक सहते रहे हैं. Artificial Intelligence





