Wife Career Rights: एक औरत भी सपने देख सकती है. औरत को भी कैरियर, नौकरी और ऊंचे मकाम तक पहुंचने की लालसा हो सकती है लेकिन समाज की नजर में शादीशुदा औरत के सपने की कोई वैल्यू नहीं. वह कैरियर के फैसले भी खुद नहीं ले सकती. जो औरत शादी के बाद ऐसे सपने देखने की हिम्मत करती हैं वह गलत ठहरा दी जाती है. तलाक का एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा जिस में पति का कहना था कि पत्नी सिर्फ अपना कैरियर बनाना चाहती है, घरपरिवार नहीं देखना चाहती. पति ने इसे ‘मानसिक क्रूरता’ बताया. पति का तर्क था की बीवी नौकरी करेगी तो मेरे साथ क्रूरता होगी.
एक मामले में पति ने अपनी पत्नी से गांव जाने के लिए दबाव बनाया लेकिन पत्नी अपने कैरियर को छोड़ कर गांव जाने को तैयार नहीं थी. इस बात पर दोनों के बीच आपसी मतभेद गहरे होते चले गए और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ की बैंच ने पति की दलील खारिज कर दी और कहा, ‘हर महिला को अपना कैरियर चुनने का पूरा हक है. अगर पत्नी नौकरी करना चाहती है, पढ़ाई करना चाहती है और आगे बढ़ना चाहती है तो यह पति के साथ कोई क्रूरता नहीं है.
‘शादी के बाद पत्नी से यह उम्मीद करना गलत है कि वह सिर्फ घर संभालेगी और अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़ देगी. शादी के नाम पर औरत की आजादी छीनना संविधान के अनुच्छेद 25(1) के खिलाफ है. पतिपत्नी दोनों को बराबर का दर्जा है. जैसे पति को नौकरी का हक है, वैसे ही पत्नी को भी है.
‘पत्नी अगर पति के साथ दूरदराज के इलाके में रहने से मना करती है क्योंकि उस का कैरियर खराब होगा तो यह क्रूरता नहीं मानी जाएगी. पत्नी का कैरियर के लिए अलग रहना ‘पति को छोड़ना’ यानी परित्याग की श्रेणी में नहीं आएगा. विवाह महिला की व्यक्तिगत पहचान और कैरियर पर ग्रहण नहीं है. शादी के बाद महिला की अपनी पहचान खत्म नहीं हो जाती. वह सिर्फ किसी की पत्नी बन कर नहीं रह जाए, यह उचित नहीं है. उसे अपनी पहचान बनाने का पूरा हक है.’
औरत का कैरियर उस का संवैधानिक हक है. सुप्रीम कोर्ट ने एक लाइन में बता दिया कि 21वीं सदी में पत्नी का नौकरी करना गुनाह नहीं है. यह सोचना कि शादी के बाद उस का कैरियर खत्म हो जाएगा, गलत है. बराबरी का हक सिर्फ किताबों में नहीं, घर में भी होना चाहिए. Wife Career Rights





