Social Media Controversy: हरेक के हाथ में स्मार्टफोन है और हर फोन में सोशल मीडिया है. सोशल मीडिया आज के हाईटैक समय का ऐसा अनिवार्य अनिष्ट बन गया है जिस से बच पाना लगभग असंभव हो गया है. स्टैंडअप कौमेडी और रील्स के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है उसे देख कर बारबार यह सवाल उठता है कि क्या समाज की संवेदनाएं इतनी कुंद हो चुकी हैं कि अब किसी भी विषय पर हंसीमजाक करना सामान्य माना जाने लगा है? क्या लाजशर्म, संस्कार, मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसी बातें अब अप्रासंगिक हो गई हैं?

आएदिन सोशल मीडिया पर किसी न किसी पोस्ट, वीडियो या टिप्पणी को ले कर विवाद खड़े होते रहते हैं. कुछ समय तक हंगामा चलता है, लोग विरोध करते हैं, फिर संबंधित व्यक्ति माफी मांग लेता है और मामला मानो खत्म हो जाता है. लेकिन क्या सचमुच माफी मांग लेने से सबकुछ समाप्त हो जाता है?

हाल ही में स्टैंडअप कौमेडियन प्रणित मोरे के लाइव कौमेडी शो ‘क्राउड वर्क’ में हुई 2 घटनाओं ने लोगों को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है. पहली घटना एक युवा वैब डैवलपर द्वारा अपनी प्रेमिका को खिलाई गई 370 रुपए की बिरयानी की कीमत ‘वसूल’ करने की बात से जुड़ी है, जबकि दूसरी घटना एक मैडिकल छात्रा द्वारा देहदान में प्राप्त मृत शरीरों के निजी अंगों को ले कर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से संबंधित है. दोनों ही घटनाएं सामाजिक संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को सामने लाती हैं.

मुंबई के एक प्रतिष्ठित अस्पताल की मैडिकल छात्रा डाक्टर सेजल पवार ने कौमेडियन प्रणित मोरे से बातचीत के दौरान बताया कि मैडिकल कालेज की एनाटौमी क्लास में जब पुरुषों के शव अध्ययन के लिए लाए जाते हैं, तब वे और उन के साथी छात्र मृत शरीरों के निजी अंगों के आकार को ले कर मजाक करते हैं. जिस तरह की बातें उन्होंने सार्वजनिक मंच पर कहीं, उन्हें दोहराना भी असहजता पैदा करता है. आश्चर्यजनक यह था कि मंच पर मौजूद कौमेडियन भी इस पर हंस रहे थे और इसे मनोरंजन का हिस्सा बना रहे थे.

यह केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं थी, बल्कि मैडिकल एथिक्स और मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन भी था. जो लोग देहदान करते हैं, वे किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा, शोध और समाजहित के लिए अपना शरीर समर्पित करते हैं. यह एक अत्यंत सम्माननीय और प्रेरणादायक कार्य है. ऐसे लोगों के प्रति इस तरह की टिप्पणियां न केवल उन का अपमान हैं बल्कि उन हजारों लोगों की भावनाओं को भी आहत करती हैं जो भविष्य में देहदान करने का विचार रखते हैं.

यदि किसी पुरुष डाक्टर ने किसी महिला के मृत शरीर के बारे में ऐसी टिप्पणी की होती तो संभवतया समाज की प्रतिक्रिया कहीं अधिक तीखी होती. यही कारण है कि इस घटना ने व्यापक असंतोष और आलोचना को जन्म दिया. बाद में डाक्टर सेजल पवार ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए अपनी गलती स्वीकार कर ली. लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल माफी मांग लेने से उस मानसिकता का प्रभाव समाप्त हो जाता है जो ऐसी बातों को मनोरंजन का विषय मानती है?

दूसरी घटना भी कम चिंताजनक नहीं है. 23 वर्षीय वैब डैवलपर हिमांशु जांगड़ा ने उसी शो में अपनी प्रेमिका के साथ हुई एक डेट का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उस ने लड़की को 370 रुपए की चिकन बिरयानी खिलाई थी. बाद में जब लड़की ने उसे घर छोड़ने के लिए कहा, तो उस ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उसे उस बिरयानी की कीमत ‘वसूल’ करनी थी. इस के बाद उस ने लड़की को एक बगीचे में ले जा कर उस के साथ जो कुछ किया उस का विवरण उस ने बेहद बेशर्मी और गर्व के साथ सार्वजनिक मंच पर सुनाया. मंच पर मौजूद लोग और स्वयं कौमेडियन इस बात पर हंसते रहे, यहां तक कि उसे इनाम भी दिया गया.

यह केवल एक घटिया मजाक नहीं था, बल्कि महिलाओं और उन की भावनाओं का घोर अपमान था. इस तरह की बातें युवाओं के बीच किस प्रकार की सोच को जन्म देती हैं, इस का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है. यदि किसी लड़की पर किए गए खर्च को इस प्रकार ‘वसूल’ करने की मानसिकता को हास्य के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह रिश्तों की गरिमा, सहमति के महत्त्व व स्त्री सम्मान जैसे मूल्यों को कमजोर ही करेगा. इस घटना के बाद जिस कंपनी में हिमांशु जांगड़ा कार्यरत था, वहां से उसे नौकरी से निकाल दिया गया. वहीं प्रणित मोरे की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे, क्योंकि उन्होंने न केवल ऐसी बातों को मंच दिया, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी किया.

आज सोशल मीडिया पर ऐसे कंटैंट की भरमार है जिन में सैक्स, गालियां, अश्लीलता और व्यक्तिगत अपमान को हास्य का पर्याय बना दिया गया है. कई तथाकथित कौमेडियन अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए पत्नी, परिवार, रिश्तों और सामाजिक मूल्यों तक का मजाक उड़ाने से नहीं हिचकते. पिछले वर्ष एक चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा मातापिता के संबंधों को ले कर की गई अनुचित टिप्पणी भी इसी प्रवृत्ति का उदाहरण थी. धीरेधीरे निर्मल हास्य और स्वस्थ व्यंग्य की जगह सस्ते और अश्लील मनोरंजन ने ले ली है. सोशल मीडिया पर गालियां देने वाले, अभद्र हरकतें करने वाले और सनसनी फैला कर फौलोअर्स जुटाने वाले लोगों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है.

चिंता की बात केवल इतनी नहीं है कि ऐसा कंटैंट बनाया जा रहा है, बल्कि यह भी है कि लाखों लोग उसे देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं और साझा कर रहे हैं. जो लोग ऐसे कंटैंट को लगातार प्रोत्साहित करते हैं उन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. यदि समाज बिना सोचेसमझे हर चीज को मनोरंजन मान कर स्वीकार करता रहेगा, तो संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य धीरेधीरे कमजोर पड़ते जाएंगे.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी की गरिमा, भावनाओं या सामाजिक मूल्यों की कीमत पर कुछ भी कहा या किया जाए. जिस दिशा में सोशल मीडिया और तथाकथित कौमेडी का एक बड़ा हिस्सा बढ़ रहा है, वह केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए खतरनाक और जोखिमभरा संकेत भी है.

यह केवल स्टैंडअप कौमेडियनों की समस्या नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया उपभोक्ताओं की मानसिकता का भी प्रश्न है. यदि किसी कौमेडियन की रील लाखों लोग देखते हैं, साझा करते हैं और उस पर हजारों टिप्पणियां करते हैं, तो उस की लोकप्रियता के लिए केवल कलाकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सोशल मीडिया का मूल सिद्धांत ही यही है कि जिस सामग्री को अधिक ध्यान मिलता है, वही अधिक लोगों तक पहुंचती है.

विडंबना यह है कि अनेक दर्शक किसी कौमेडियन की बातों को पहले उत्साह से देखते हैं, उस की रीलों पर हंसते हैं, उसे फौलो करते हैं और फिर किसी विवाद के बाद अचानक नैतिकता के स्वयंभू प्रहरी बन जाते हैं. जो लोग कल तक प्रशंसक थे, वही आज सब से तीखी आलोचना करते दिखाई देते हैं. इस प्रकार की प्रतिक्रिया अकसर सिद्धांतों से अधिक, भीड़ की मानसिकता को दर्शाती है.

यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति द्वारा गलत जानकारी या असत्य बातें कही जाती हैं, तो उस की आलोचना होना स्वाभाविक है. लेकिन यह भी सच है कि दर्शकों की मांग ही ऐसे कंटैंट को जीवित रखती है. जब तक लोग विवादास्पद, सनसनीखेज और उकसाने वाली सामग्री को देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक ऐसे रचनाकारों की लोकप्रियता बनी रहेगी.

इसलिए सवाल केवल कौमेडियन पर नहीं, बल्कि उन दर्शकों पर भी उठना चाहिए जो पहले उन्हें सिर पर बिठाते हैं और बाद में उन्हीं पर पत्थर फेंकते हैं.

 

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