Intercaste Marriage: प्रेम विवाह वह विवाह है जिस का फैसला पूरी तरह से लड़कालड़की द्वारा किया जाता है. सामाजिक सोच में आ रहे बदलाव के कारण कई मातापिता अपनी सहमति दे देते हैं. कई अभी भी दकियानूसी सोच के कारण अपनी सहमति नहीं देते.
भारत में 1970 के दशक में शहरी क्षेत्रों में प्रेम विवाह लोकप्रिय होने लगे. शुरुआत में प्रेम विवाह स्वीकार्य समुदायों के बीच ही होते थे. अब प्रेम विवाह आमतौर पर जातीय, समुदाय और धार्मिक बाधाओं को पार कर जाते हैं. इस के बाद अभी भी प्रेम विवाह या मनचाही शादी की आजादी नहीं है. इस को रोकने के तमाम प्रयास होते हैं.
कई घटनाएं आज भी इस तरह की घट रही हैं जहां मनचाही शादी को रोकने के लिए आपराधिक घटनाएं भी अंजाम दी जाती हैं. गांवों की जातियों की खाप पंचायतों का खौफ अभी भी लडकेलडकियों पर होता है. जबकि संसद ने स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत इस तरह की शादियों को कानूनी मान्यता देने का काम किया है. लड़कालड़की जब कोर्ट के सामने विवाह करने आते हैं तो उन को कानूनी सुरक्षा दी जाती है.
क्या है स्पैशल मैरिज एक्ट
जवाहरलाल नेहरू युग में बना एक और सामाजिक सुधार का कानून विशेष विवाह अधिनियम 1954 को ही स्पैशल मैरिज एक्ट के नाम से जाना जाता है. यह कानून विभिन्न धर्मों या जातियों के जोड़ों को बिना अपना धर्म बदले शादी करने की सुविधा प्रदान करता है. आसान बोली में इस को कोर्ट मैरिज भी कहते है. इन विवाहों को आम भाषा में सिविल मैरिज भी कहा जाता है.
यह अधिनियम पूरे भारत में और विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिकों पर लागू होता है. इस का उद्देश्य प्रेम विवाहों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है.
इस कानून के तहत शादी करने के लिए लडके की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए. लड़कालड़की में से किसी का कोई जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए. लड़कालड़की दोनों मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए. कोर्ट मैरिज करने के लिए जिला विवाह अधिकारी को 30 दिनों पहले लिखित सूचना देनी होती है. नोटिस प्रकाशित होने के 30 दिनों के भीतर कोई भी व्यक्ति विवाह पर आपत्ति उठा सकता है. इस अधिनियम के तहत विवाहित जोड़ों को उत्तराधिकार और विरासत के समान अधिकार प्राप्त होते हैं.
एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में औनर किलिंग की 626 घटनाएं सामने आई थीं. उन में से अधिकांश घटनाएं अंतरजातीय या अंतर्धार्मिक विवाहों के कारण हुई घटी थीं. इंटररिलीजन शादी को ले कर समाज में अलग तरह का माहौल बन गया है. इस को लव जिहाद से जोड कर देखा जाने लगा है. इस प्रकार का भ्रम फैलाया जा रहा है कि लव जिहाद करने के बदले लड़कों को पैसा दिया जाता है. वे सालों एक लड़की के साथ प्रेम संबंध बनाते हैं, फिर उन से शादी कर के उन्हें मुसलिम बना लेते हैं. इस के प्रमाण बहुत कम हैं. लड़कियां आमतौर पर उस घर के रीतिरिवाज अपनाती हैं जहां उन्हें शादी के बाद रहना होता है. सो, मुसलिम लड़की भी हिंदू लड़के से विवाह कर एक तरह से हिंदू बन जाती है.
लव जिहाद का नारा साजिश है
समाज के कटट्रवादी सोच रखने वाले वर्ग के वर्गों ने प्रेम विवाह के बाद धर्मांतरण को लव जिहाद का नाम दे दिया है. दावा किया गया कि मुसलिम लड़का प्रेम और विवाह के बहाने हिंदू महिलाओं को इसलाम धर्म कुबूल करने के लिए लुभा रहे हैं. और, यह पहले से तय साजिश के तहत किया जा रहा है. लव जिहाद शब्द 2009 में पहली बार चर्चा में आया जब विश्व हिंदू परिषद और श्री राम सेना जैसे संगठनों ने दावा किया कि केरल में हिंदू लड़कियों को मुसलिम लडकों से शादी करने के लिए इसलाम में परिवर्तित किया जा रहा है. केरल से शुरू हुए ये आरोप अब पूरे देश में फैल गए हैं और वोट जमा करने के तरीके बन गए हैं.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश में कहा गया था कि ‘केवल विवाह के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन अस्वीकार्य है.’ इस आदेश का इस्तेमाल धार्मिक धर्मांतरण के कथित खतरे को वैधता प्रदान करने के लिए किया गया है. हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक नए फैसले में इस पूर्व आदेश को ‘कानून के अनुरूप नहीं’ बताते हुए खारिज कर दिया. उस ने स्पष्ट रूप से किसी भी दूसरे धर्म वालों से अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में बरकरार रखा.
इसके बाद भी अंतरधार्मिक विवाहों के प्रति लोगों के पूर्वाग्रह कम नहीं हुए. उत्तर प्रदेश सरकार ने जबरन या बेईमानी से किए जाने वाले धर्म परिवर्तन, जिन में विवाह के लिए किए जाने वाले धर्म परिवर्तन भी शामिल हैं, पर रोक लगाने के लिए एक अध्यादेश पारित किया है. इस कानून का उल्लंघन करने वाले विवाह न केवल अमान्य घोषित किए जाएंगे, बल्कि उल्लंघनकर्ताओं को 10 वर्ष तक की कारावास की सजा भी हो सकती है. सरकार की पुलिस पहली बार तो अलग धर्मों वाले हर विवाह को जबरन का नाम दे सकती है. जब तक अदालतों से गुहार कर के लड़केलड़की अपनी सहमति दें, तब तक उन की जान पर खतरा बना रहता है.
मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक सहित भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी घोषणा की है कि वे ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं.  विवाह में जबरदस्ती तो, दरअसल, स्वधर्मी करते हैं जब पिता अपनी मरजी के पति या पत्नी अपनी बेटी या बेटे पर थोपते हैं. यह लव जिहाद से ज्यादा खौफनाक और दर्दीला होता है और इसी में हजारों हिंदू लड़कियों ने आग लगा कर आत्महत्या कर जान दे दी या मुसलिम लड़कियों ने तलाक की मार खाई.
आज का लव जिहाद सिद्धांत 1920 के दशक में मुसलिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं के ‘अपहरण’ को लक्षित करने वाले हिंदू संगठनों के अभियान जैसा ही है. हिंदू धर्म में पितृसत्तात्मक सोच हावी है. लव जिहाद की आड़ में महिलाओं के प्रेम करने के अधिकार को नकारा जाता है. केवल लव जिहाद की बात नहीं है. अपनी पसंद के अपने धर्म के लड़के से शादी की आजादी दूसरी जाति वाले से प्रेम विवाह में भी नहीं दी जाती है.
हिंदू लड़कियों के भाग जाने और धर्म परिवर्तन के डर और हिंदू महिलाओं की पवित्रता से जुड़ी चिंताओं का इस्तेमाल कर के हिंदू पुरुषों की पौरुषता और शक्ति को सार्वजनिक राजनीतिक क्षेत्र में और भी अधिक मजबूत तरीके से फिर से स्थापित किया जाता है. हिंदू लड़की पर हिंदू लड़कों का अनन्य अधिकार माना जाता है. उस की पवित्रता की रक्षा को उस का विशेषाधिकार समझा जाता है. हिंदू सांप्रदायिक संगठनों द्वारा कहा जाता है कि ‘हमारी’ महिलाओं की रक्षा के लिए कोई भी कदम जायज है.’
इस दबाव को समझना मुश्किल नहीं है. कुछ समय पहले तनिष्क ने अपनी ज्वैलरी के विज्ञापन में हिंदू महिला के मुसलिम परिवार में विवाह को दर्शाया तो  वीडियो की काफी आलोचना हुई थी. इस के बाद इस विज्ञापन को वापस ले लिया गया. सोशल मीडिया में इस को ‘लव जिहाद’ से जोड़ कर देखा गया. कट्टरवादियों द्वारा बहिष्कार करने की धमकी देने के बाद यह कदम उठाया गया.
अंतरधार्मिक विवाहों की सच्चाई यह है कि यह माना जाता है कि युवा लडकियां अपने लिए भविष्य के बारे में सोच नहीं सकतीं. उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए ‘बहकाया’ गया है, प्रेम नहीं हुआ है. ‘लव जिहाद’ का प्रचार हिंदू लड़कियों को नीचा दिखाने के लिए किया गया है कि वे आसानी से बहक जाती हैं. जो लड़कियां अपने धर्म या जाति से बाहर, अपने गोत्र के भीतर या अपने परिवार की स्पष्ट स्वीकृति के बिना विवाह करती हैं, उन्हें सामाजिक बहिष्कार और यहां तक कि हिंसा का तो सामना करना ही पड़ता है.
‘औनर किलिंग’ हिंदूहिंदू लव जिहाद का एक हिस्सा है. गांवों में जम कर उपयोग किया जाता है. कई मामले सामने आते हैं जिन में परिवार के पुरुष जातिगत विवाह के नियमों का उल्लंघन करने वाले या सगोत्र विवाह जैसे संबंधों में बंधने वाले लड़के या लड़की की हत्या कर दी गई.
प्रेम विवाह में न करें ‘धर्म परिर्वतन’
आज भी समाज में प्रेम विवाह सरल नहीं है. अगर यह सवर्णों की 3 ऊपरी जातियों में है तो फिर भी काफी हद तक स्वीकार है. इस के बाद भी पेरैंट्स के मन में कसक रह ही जाती है कि बेटी या बेटे ने मनमानी की. लड़कालड़की में भी भेद है. लडके के घर वालों को प्रेम विवाह से बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन लड़की करती है तो उस के घर वालों को बहुत दिक्कत होती है. वहां मूंछ का सवाल उठता है. समाज क्या कहेगा, दूसरी बहनों की शादी कैसे होगी?
अपर कास्ट के बीच प्रेम विवाह थोड़ीबहुत नानुकुर के बाद स्वीकार हो जाते हैं. लेकिन अपर कास्ट व ओबीसी, एससी और एसटी के विवाह में काफी कठिनाइयां आती हैं. विडंबना यह है कि ओबीसी, एससी और एसटी भी दामाद या बहू अपर कास्ट की नहीं चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें समधी के घर में कभी सम्मान नहीं मिलेगा.
साकिब और अनिका इस का उदाहरण हैं. ये दोनों सोशल मीडिया पर सामाजिक मुद्दों को ले कर वीडियो बनाते हैं. इन्होंने अपने घर पर नेमप्लेट लगाई जिस में साकिब का नाम ऊपर और कनिका का नाम नीचे लिखा था. इन को वैसे ही ट्रोल किया जाता है पर इस मुददे को ले कर इतना ट्रोल किया गया कि उन को अपनी नेमप्लेट बदलनी पडी.
विवाह आपसी रिश्ते और भरोसे पर निर्भर होता है. शादी अंतरजातीय हो या अंतरधार्मिक, दोनों में ही एकदूसरे पर अपने धर्म को या जाति को बदलने का दबाव न हो. साथ रहते हुए भी दोनों अपनेअपने धर्म का उपयोग करें या किसी भी धर्म को न मानें. इस से सामाजिक कटट्ररपन को खत्म करने में मदद मिलेगी.
विधर्मी से शादी करने के बाद यह जरूरी है कि घर में किसी तरह के धार्मिक निशान न हों. दोनों अपनेअपने परिवारों में धार्मिक पारंपरिक त्योहारों में जाएं पर अगर दूसरे धर्म वाले साथी को नहीं बुलाया गया हो तो दोनों न जाएं.
घर में मोबाइल और टीवी की जगह पढ़ने की सामग्री ज्यादा हो क्योंकि ये दोनों जम कर धर्म का प्रचार कर रहे हैं. आमतौर पर लिखित मुद्रित साहित्य इस बीमारी से बचा हुआ है.
विधर्मी से विवाह करने के बाद ऐसे उत्सव बहुत मनाएं जिन का धर्म से लेनादेना नहीं है, जैसे न्यू ईयर डे या मदर्स डे. व्हाट्सऐप जैसे मीडियम पर फैमिली ग्रुपों से दूर रहें क्योंकि दोनों धर्मों के परिवारों के लोग अपनेअपने धर्म के धार्मिक संदेश भेजने से बाज नहीं आएंगे. इस से अच्छा है सब को अलगअलग मैसेज या ग्रीटिंग भेजें. सब से बड़ी बात, ऐसी पत्रिकाएं ही लाएं जो धर्मों का प्रचार करती तसवीरें मुखपृष्ठ पर प्रकाशित नहीं करतीं.
यही नहीं, इस शादी से पैदा हुई संतान किस धर्म को अपनाएगी, यह तय करने का अधिकार मातापिता को नहीं बल्कि संतान को होना चाहिए. जब वह बालिग हो जाए तब उस को अपनी मरजी से धर्म चुनने का अधिकार दिया जाए और उस का फैसला सब को मान्य हो. कटट्रवादी ताकतें अंतरधार्मिक और अंतरजातीय शादियों की आलोचना करते हैं, ऐसे में उन को धर्म के बारे में बोलने का अधिकार खत्म हो जाएगा. और तभी, प्रेमपूर्ण माहौल बन सकेगा.
***
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...