Bollywood Drama: फिल्म का बेसिक आइडिया बढि़या है. फिल्म बताने की कोशिश करती है कि अकेली औरत को समाज किन नजरों से देखता है, उन के बारे में कैसीकैसी बातें फैलाता है और फिर अपना काम नहीं बनता तो डायन भी घोषित कर देता है. फिल्म मां और उस की 2 बेटियों की है. इस में भी ‘डार्लिंग्स’ और ‘हसीन दिलरुबा’ वाला डार्क ह्यूमर और पल्पक्राइम का तड़का है, जो फैमिनिज्म के सवाल भी उठाती है. फिल्म की पूरी सैटिंग में एक टिपिकल मिडिलक्लास हाउसिंग सोसाइटी ‘आदर्श कालोनी’ दिखाई गई है, जहां पड़ोसी एकदूसरे के घर में ताकाझांकी करने से गुरेज नहीं करते.

कहानी में निरमा डिटर्जैंट के मशहूर जिंगल वाले नामों का इस्तेमाल किया गया है. मां रेखा (माधुरी दीक्षित) और उस की 2 अलग मिजाज की बेटियां, जया (तृप्ति डिमरी) और सुष्मा (धारणा दुर्गा)- विज्ञापन में इन नामों का इस्तेमाल एक आदर्श, साफसुथरी और घरेलू भारतीय महिला की छवि को दिखाने के लिए किया गया था, जो घर के कामकाज और सफाई में माहिर थीं. यहां डायरैक्टर सुरेश त्रिवेणी ने इसी घरेलू और ‘पवित्र’ छवि पर तीखा हमला करने की कोशिश की है.

रेखा स्लीवलैस ब्लाउज पहनने वाली विधवा है. वह उदास नहीं है, न ही अकेलेपन की शिकन लिए है. दिखने में कामुक है, जिसे पूरी सोसाइटी एक चालू और बदनाम औरत मानती है. यहां तक कि उस के घर की दीवारों पर ‘डायन’, ‘रेखा का देखा’, ‘रेखा का दाम’ जैसे वल्गर स्लोगन लिख दिए जाते हैं.

इन सब के बीच एक पड़ोसी चरित्र कुमार गुप्ता (रवि किशन) है. जो उसे (बदनाम रेखा) सोसाइटी से बाहर निकालना चाहता है और उस की संपत्ति हड़पना चाहता है. ट्विस्ट तब आता है जब वासना की तलाश में गया यही चरित्र गुप्ता एक दिन रेखा की रसोई में लाश बन कर मिलता है. इस के बाद रेखा इस ?ामेले से निकलने के लिए अपनी दोनों बेटियों की मदद लेती है. फिर शुरू होता है लाश को छिपाने और पड़ोसियों की नजरों से बचने का एक अजीबोगरीब खेल.

इस बीच फिल्म पास्ट और प्रेजैंट में हर कुछ देरी में गोते खाती है. यहां कुछ डार्क रियलिटी भी सामने आती है जिस में निकल कर आता है कि बदनाम रेखा नहीं बल्कि सोसाइटी है. फिल्म आगे बढ़ती है तो पता चलता है चरित्र गुप्ता जिंदा है, वह रेखा को हमेशा से पाना चाहता था, जब बात नहीं बन पाई तो उस पर डायन, कुलटा जैसी बातें फैला कर बदनाम करता था.

हालांकि फिल्म का अंत प्रिडिक्टेबल है. या कहें कि पूरी फिल्म प्रिडिक्टेबल है, जिस में एक अच्छे मैसेज के साथ सब ठीक कर दिया गया है. नया यह है कि पुराने समय में जहां गांव की अकेली औरतों को जैसे कुलटा या डायन बता कर मारपीट दिया जाता था, उस का शहरी वर्जन इस में दिखाया गया है जो दिलचस्प है.

हालांकि फिल्म की कमजोरियां भी हैं, जैसे इस का कई जगह बेवजह कौमिक हो जाना सीरियस सीन को हलका बना देता है. फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस के कलाकारों के बीच टोनल मिसमैच. इस में कोई शक नहीं कि माधुरी दीक्षित ने अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकल कर एक चैलेंजिंग रोल चुना है, लेकिन पूरी फिल्म के दौरान उन का वो ‘दीक्षित स्टारडम और औरा’ उस छोटे शहर के रफ एंड टफ माहौल में पूरी तरह घुल नहीं पाता. ऐसा लगता है कि वे एक बहुत सलीके से सीखी हुई ऐक्ंिटग का प्रदर्शन कर रही हैं, न कि उस किरदार को जी रही हैं.

दूसरी तरफ, तृप्ति डिमरी और डैब्यू कर रहीं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर धारणा दुर्गा ने अच्छा काम किया है. धारणा दुर्गा ने भी पहली ही फिल्म में अपनी कौमिक टाइमिंग से प्रभावित किया है लेकिन दिक्कत यह है कि जहां माधुरी, तृप्ति और धारणा एक लाउड सिटकौम की तरह चीखचिल्ला कर बात कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ शारदुल भारद्वाज और गीतांजलि कुलकर्णी इतनी रियलिस्टिक और ग्राउंडेड ऐक्ंिटग कर रहे हैं जैसे उन्हें पता ही न हो कि वे किसी कौमेडी फिल्म का हिस्सा हैं. रवि किशन जैसे मं?ो हुए अभिनेता को फिल्म में सिर्फ एक प्रौप बना कर छोड़ दिया गया.

सुरेश त्रिवेणी यहां आ कर लड़खड़ा जाते हैं. वे एक ही समय में तीन चीजें करने की कोशिश कर रहे थे. फिल्म का स्क्रीनप्ले बहुत ढीला है. चरित्र गुप्ता फिल्म के बीच में पूरी तरह गायब कर दिया गया जैसे वह अपीयरैंस देने आया हो. 3 औरतें घर के अंदर इतनी जोरजोर से चिल्ला कर साजिश रच रही हैं और पड़ोस की जासूस आंटियां, जो हर वक्त नजर रखती हैं, को कुछ सुनाई ही नहीं देता, यह बचकानापन अजीब लगता है. इस में परेश रावल का छोटा सा कैमियो भी है. अच्छा है फिल्म में गाने नहीं हैं. इस से अच्छी बात कि यह फिल्म कोई उपदेश नहीं देती. लेकिन कमजोर पेसिंग, स्क्रिप्ट के बिखराव और लाउड चिल्लमचिल्ली के कारण यह एक बढि़या फिल्म बनने से चूक गई. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी डार्क कौमेडी थीम को जस्टिफाई करती है. बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है. Bollywood Crime Drama Bollywood Crime Drama

 

 

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