Heart Touching Story: ‘‘बे टा, तुम भी चिता में लकड़ी लगाने में मदद करो,’’ दूर खड़ी राधा ने अपने इंजीनियर बेटे अनुज से कहा.
देखतेदेखते चिता भरभरा कर जलने लगी. राधा की आंख से आंसू की बूंदें टपक पड़ीं.
‘‘मां, इतनी दूर खड़ी हो फिर भी आंखों में धुआं लग गया,’’ अनुज ने सहम कर राधा से पूछा.
‘‘बेटा, यह धुएं के आंसू नहीं हैं.’’ यह सुनते ही अनुज के दिमाग में यह सवाल कौंध गया कि आखिर मां ने दिल्ली फोन कर के उसे तुरंत हवाई जहाज से आने को क्यों कहा?
‘‘मां, अब चलो… चिता में आग लग गई. कुछ ही देर में जल जाएगी.’’
राधा यह सुनते ही फफकफफक कर रो पड़ी. अनुज भी गंभीर हो गया. मां को गले से लगाते हुए उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या बात है? कुछ कहो न. तुम ने इतनी दूर से बुला लिया और इस तरह रो रही हो. आखिर क्या बात है? यह कौन हैं? हमारे परिवार से इन का क्या संबंध है? इस से पहले न तो मैं ने कभी इन्हें देखा, न यह हमारे कोई सगेसंबंधी हैं.’’
इतने सारे सवालों को एकसाथ सुन कर राधा असमंजस में पड़ गई. सोचने लगी, ‘कहां से शुरू करूं?’ फिर बहाना बना कर बोली, ‘‘बेटा, थोड़ी देर बैठ जाओ, मैं थक गई हूं… वैसे भी तरीका यही है कि सब के साथ वापस जाना चाहिए.’’
अनुज मां की बात टाल नहीं पाया. जाने कितने विचार उस के मन में आते रहे कि तब तक सूरज डूब गया और चिता शांत हो गई. तब उस का ध्यान मां की ओर गया. देखा, मां कितनी निश्तेज सी हो गई हैं और चिता की ओर एकटक देखे जा रही हैं. कार से घर जाते हुए अनुज एक शब्द भी नहीं बोला. घर पर आ कर वह नहानेधोने चला गया और मां अपने कमरे में चली गईं. आधाएक घंटा आराम करने के बाद वह मां के कमरे में गया. मां आंखें बंद किए लेटी थीं.
‘‘मां, चाय बना कर लाऊं,’’ अनुज ने पूछा.
राधा को एक झटका सा लगा. उसे ऐसा लगा जैसे अनुपम ने पूछा हो, ‘राधा, चाय पिओगी? बना लाऊं. मेरे हाथ की चाय पिओगी तो लगेगा कि किसी फाइव स्टार होटल की चाय पी रही हो.’
‘सर, रहने भी दीजिए. अब आप हमारे लिए क्या चाय बनाएंगे. क्यों अपने पद की तौहीन कर रहे हैं?’
‘यह तो तुम्हें पहले सोचना चाहिए था. तब तुम्हारा दिमाग घास चरने चला गया था?’ अनुपम ने अफसर की तरह धौंस जमाई थी.
राधा बोली थी, ‘अफसरी मत दिखाइए, इतने में तो चाय बन जाएगी.’ और फिर चाय पीतेपीते हंसीमजाक चलता रहा था.
अनुज चाय लिए खड़ा था. राधा उसे देखती रही. वही आवाज, वही कदकाठी, वही संस्कार, राधा बिस्तर पर लेटेलेटे अपने निर्णय पर गर्व करती रही.
‘‘बेटा, मेरी अलमारी से दवा निकाल ला. बहुत थकान लग रही है, सिरदर्द भी हो रहा है.’’
राधा को अचानक लगा जैसे बहुत सारी समस्याएं और उन के हल एकसाथ खड़े हैं. सब की समस्याएं तो अनुपम भी हल किया करते थे. उन का पैट डायलाग था, ‘क्या समस्या है? लगता है, किसी अफसर ने ठीक से इलाज नहीं किया. मेरे चक्कर में पड़ जाओगे तो बड़ीबड़ी बीमारियां और समस्याएं ठीक हो जाएंगी.’
सारे विभाग के अधिकारी यह सुन कर दहशत में आ जाते थे और शिकायत करने वाले लोग अनुपम को धन्यवाद देते नहीं थकते थे.
राधा भी अपने विभाग की ओर से बैठकों में जाती. कोई संबंध न होने पर भी उसे अनुपम की इन बातों पर और उसे दी जाने वाली बधाइयों पर गर्व होता. जब कभी आफिस के चैंबर में अनुपम बैठक करते और शिकायत- कर्ता उस के पास आते तो संबंधित विभाग के कर्मचारी को बुला कर कस कर डांटते और कर्मचारी के जाने के बाद जोरजोर से हंसते.
एक बार राधा ने पूछ ही लिया, ‘सर, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ अनुपम हंस कर बोले, ‘दिल से नहीं डांटता. दिल से डांटना भी नहीं चाहिए, नहीं तो दिल पर जोर पड़ता है.’
इसी प्रकार विभिन्न अवसरों पर राधा उन के कमरे में जाती रही. पहले तो कुछ संकोच और डर था, बाद में अनुपम के स्वभाव से परिचित होने पर वह बेधड़क उन के कमरे में जाने लगी. एक दिन उस ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया, ‘सर, दुनिया भर की समस्याएं आप निबटाते रहते हैं. हम लोग भी तो हैं. कभी पूछ ही लिया करिए कि तुम लोगों की कोई समस्या तो नहीं है.’
इतना कह कर राधा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो. अनुपम की पारखी नजरों ने जैसे चेहरा पढ़ लिया हो.
तुरंत घंटी बज गई. चपरासी कमरे में आया तो बोले, ‘‘2 कप चाय ले आना.’’ फिर राधा को बैठने का इशारा किया और खुद सरकारी काम में जुट गए. राधा एकटक उन के चेहरे और काम करने की तन्मयता को देखती रही. चाय पीते समय वह कुछ नहीं बोली.
अनुपम बोले, ‘हां, तो कहिए आप की क्या समस्या है?’
फिर राधा के चेहरे पर घबराहट देख कर वह बोले, ‘अच्छा यह लो हमारा टेलीफोन नंबर. जब कोई परेशानी हो तो निसंकोच बता देना,’ यह कह कर अनुपम फिर काम में जुट गए.
राधा ने कांपते हाथों से परची ली पर जैसे ही कमरे से बाहर निकली खुशी के मारे उछल पड़ी. जैसे उस ने कोई परीक्षा पास कर ली हो.
और एक दिन राधा ने साहस कर अनुपम के घर सुबहसुबह फोन कर ही दिया. डर भी लगा कि उधर से डांट सुनाई पड़ेगी मगर आश्चर्यजनक रूप से अनुपम ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘हैलो, कौन बोल रहा है?’
राधा ने अपना परिचय देते हुए हिम्मत कर के घर पर मिलने का समय मांग लिया.
अनुपम समय के बहुत पक्के थे. सुबह 8 बजे के बाद किसी से न मिल कर आफिस जाने की तैयारी शुरू कर देते थे और 9 बजे तक आफिस चले जाते थे. उन्होंने 7 बजे का समय दिया.
दस्तक देते ही अनुपम की आवाज सुनाई दी, ‘अंदर आ जाइए, दरवाजा खुला है,’
राधा घबराते हुए ड्राइंगरूम में बैठ गई. चारों तरफ नजरें दौड़ाईं. दीवार पर बच्चों की फोटो थीं. एक और फोटो में अनुपम एक महिला के साथ बैठे
थे. राधा ने समझ लिया कि यह मैडम ही होंगी.
अनुपम अंदर आए और बड़े कैजुअल ढंग से पूछा, ‘अब बताइए, क्या समस्या है आप की,’ और साथ ही सर्वेंट को 2 कप चाय बनाने के लिए कह दिया.
‘सर, मैडम और बच्चे नहीं दिख रहे हैं. साथ नहीं रखते क्या?’
‘अरे, इस नौकरी में हम लोगों का कोई पक्का ठिकाना तो है नहीं, परिवार कहां रखें.’
राधा को लगा, शायद परिवार के अलग रहने के कारण अनुपम कुछ परेशान हैं. बात बढ़ाते हुए वह बोली, ‘सर, आप बड़े लकी हैं कि मैडम दूर रह कर भी बच्चों को पाल रही हैं और उस से ज्यादा लकी वह खुद हैं जिन्हें आप जैसा जीवन साथी मिला,’ यह कहतेकहते राधा की आवाज भरभरा गई.
‘क्या हुआ आप को?’ अनुपम बोले, ‘लीजिए, चाय पीजिए फिर बताइए.’
‘सर, आप बाहरी आदमी हैं फिर भी पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपनी समस्या आप से कह सकती हूं. मेरे पति हैं, 2 बच्चे हैं. सासससुर भी हैं. बच्चे स्कूल जाने लगे हैं. पूरा दिन तो अच्छा बीतता है या यह कहिए कि दिन भर आफिस का काम करतेकरते घर को भूल जाती हूं. जैसे ही घर पहुंचती हूं सबकुछ बदल जाता है. मेरे पति जो मेरी इच्छा के विरुद्ध मुझ से नौकरी कराते हैं शाम को ताने देते रहते हैं कि मेरे कई लोगों से संबंध हैं और जब मैं नौकरी छोड़ कर घर पर बच्चों को पढ़ाने के लिए कहती हूं तो गाली देते हैं और कहते हैं कि खाना कहां खाऊंगा? भीख मागूंगा क्या? रोज शाम को शराब पी कर आते हैं और इतनी मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा, पहुंचाते हैं कि लगता है कि मैं तो बस एक मशीन हूं.’
यह सब एक सांस में बतातेबताते राधा फूटफूट कर रोने लगी. अनुपम ने ऐसा माजरा पहली बार देखा था. बड़ी असमंजस की स्थिति हो गई. वे धीरे से उठे और गंभीरता से राधा के सिर पर इस तरह हाथ फेरा जैसे कोई बुजुर्ग दिलासा दे रहा हो, ‘राधा, तुम रोओे मत. समय है, सब पास हो जाएगा. अच्छे दिन भी आते हैं.’
फिर राधा अचानक उठी और बोली, ‘सर आप को देर हो रही होगी, क्षमा कीजिए, आप का समय बरबाद किया.’
फिर तो राधा अकसर अनुपम के घर जाने लगी और समय बीतने के साथ सबआर्डिनेशन की दूरियां खत्म होती चली गईं. अनुपम से मिलने के बाद राधा को घर की तकलीफों का एहसास कम होने लगा. वह इस बात का ध्यान रखने लगी कि किन बातों से अनुपम को खुशी होती है और किन बातों से चिढ़ते हैं. उस ने अपना फेवरेट परफ्यूम लगाना भी बंद कर दिया था, क्योंकि एक बार अनुपम ने यह कह दिया था कि परफ्यूम लगा कर किसकिस को परेशान करती हो.
अनुपम भी शायद इस दोस्ती से अपने परिवार की कमी कम महसूस करने लगे थे. हंसीहंसी में राधा अनुपम से कह देती, ‘मैडम बहुत सीधी हैं. यदि मैं आप की पत्नी होती तो एक पल भी आप को अकेले नहीं रहने देती. आप का कोई भरोसा नहीं है.’
इस तरह अंतरंगता बढ़ती गई और एक दिन राधा ने अनुपम से वह कह दिया जो एक शादीशुदा औरत शायद ही कह पाती, ‘सर, मुझे आप से एक बेटा चाहिए.’
अनुपम अवाक् रह गए. कुछ देर तक वह समझ ही नहीं पाए कि क्या किया जाए, फिर बोले, ‘क्या कहा?’
‘सर, मैं चाहती हूं कि जो पल भर की खुशी मुझे मिली है वह परमानेंट मेरी हो जाए. मैं आप को मैडम से अलग नहीं करना चाहती. मैं खुद नौकरी करती हूं. बेटे को पाल लूंगी. कभी उस को यह पता नहीं लगने दूंगी कि उस के पिता कौन हैं. सर, मैं चाहती हूं कि मेरे पास एक ऐसी संपत्ति हो जो मेरे बुढ़ापे में मेरा सहारा बने. लोग कहते हैं कि खून अपना रंग दिखाता है सो अपने बच्चों से मुझे कोई उम्मीद नहीं है. वह भी शायद बड़े हो कर अपनी बीवी को पीटें और मां को गाली दें. शायद मेरे पति की तरह.’
अनुपम राधा की नासमझी में कही गई समझदारी की बातें सुन कर मुसकरा दिए. बोले, ‘कितना पढ़ा है? लगता है, जीन्स इफेक्ट पर बड़ी खोज कर चुकी हो.’
‘सर, बी.एससी. के बाद शादी हो गई और पता नहीं चला कि कब 30 पार कर गई.’
अनुपम बहुत टेंस थे. शायद बौस से कुछ कहा- सुनी हो गई थी. राधा ने उन के घर पर ही खुद चाय बनाई और चाय देने के बाद उन के
सिर पर धीरे- धीरे हाथ फेरने लगी.
अनुपम की आंखों से आंसू की बूंदें टपक पड़ीं, वे बोले, ‘यह अकेलापन बहुत खराब होता है. कोई दर्द बांटने वाला नहीं है. बच्चे होते तो शायद उन की हंसी में यह टेंशन घुल जाता.’
यही सोचतेसोचते न जाने कब वे दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि सारी नजदीकियां ही मिट गईं. फिर दोनों एकदूसरे को एकटक देखते रहे, जैसे एकदूसरे से गलती के लिए क्षमा मांग रहे हों.
राधा अब अनुपम से कटने लगी थी. वह अकसर नजर बचा कर निकल जाती. फिर एक दिन अनुपम को पता चला कि राधा अस्पताल गई है. आफिस में वह बोलते कम थे, पर सबआर्डिनेट्स से गाड़ी में बातचीत करने पर पता चला कि वह मां बनने वाली है. अनुपम रहरह कर यह आशंका पाल लेते कि कहीं यह उस दिन की गड़बड़ तो नहीं. राधा को भी यह एहसास हो गया कि शायद अनुपम में अपराधबोध है.
एक दिन उस ने टेलीफोन पर कहा, ‘सर, बधाई. आप एक और बच्चे के डैड बनने वाले हैं पर एक रिस्पांसिबल लेडी होने के कारण मैं चाहूंगी कि अब आप अपना ट्रांसफर करा लें, जिस से कि आप की खोई हुई चमक वापस आ जाए. हां, टेलीफोन नंबर और पता जरूर दे दीजिएगा.’
तब से अनुपम से यदाकदा बात होती रही. फोटो, पत्र आते और जाते रहे. अनुज पैरों पर खड़ा हो कर स्कूल से कालिज जाने लगा और फिर उस ने इंजीनियरिंग भी कर ली. वह अच्छे जौब में लग गया.
अनुपम बहुत बड़े अधिकारी हो कर रिटायर हो गए. राधा ने भी रिटायरमेंट ले लिया. हां, अनुपम ने आखिरी बार राधा को यह लिखा था, ‘हालांकि हमारा बेटा अब बड़ा हो गया है. तुम्हारी सेवा भी कर रहा है, फिर भी मैं ने सारी बातें तुम्हारी मैडम को बता दी हैं. उम्र के इस पड़ाव पर मैडम ने इसे भूल मान कर माफ कर दिया है और यह वचन दिया है कि जब कभी राधा को कोई तकलीफ होगी तो वह स्वयं या अपने बच्चों के माध्यम से राधा की मदद करेंगी. तुम्हें मैडम ने स्वीकार कर लिया है. अपना खयाल रखना.’
और वही खत अनुज अपने हाथों में लिए अपनी मां के सामने खड़ा था.
‘‘मां, वह मेरे डैड थे?’’
अनुज के इस सवाल पर राधा ने अपनी पलकें इस प्रकार झुका लीं जैसे उसे यह स्वीकार करते हुए गर्व महसूस हो रहा हो. Heart Touching Story
लेखक – अनूप कुमार श्रीवास्तव





