Hindi Story: उस रात मम्मी ऐसी सोईं कि फिर जागी ही नहीं. उन के इस अचानक निधन पर हम सब एकदम सन्न रह गए थे. न किसी बीमारी के लक्षण न आशंका. घर में 2-2 डाक्टरों के होते हुए भी न कोई चिकित्सा न उपचार. सब ने कहा कि यह तो बड़ी अच्छी मृत्यु है. ऐसी मृत्यु के लिए तो बडे़बडे़ ऋषिमुनि भी तरसते हैं. पर हम ही जानते थे कि कुछ न कर पाने की पीड़ा के कारण हम पर क्या बीत रही थी.

पापा पत्थर बने एक कोने में बैठे थे. न आंखों में आंसू न होंठों पर कंपन. उस राहगीर की तरह जिस का राह चलतेचलते एक झटके में सबकुछ लुट जाए. मैं ने बहुत कम ऐसे पतिपत्नी देखे हैं जिन में पापामम्मी जैसी गहरी आत्मीयता और आपसी समझ हो. रिटायर होने के बाद पापा ने हम सब से साफ कह दिया था कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय मम्मी के साथ बिता कर अपने सेवा काल की व्यस्तता के कर्ज का हिसाब चुकता करेंगे और उन्हें वे सब सुखसुविधाएं देने की कोशिश करेंगे जो वह दीदी का और मेरा कैरियर बनाने के लिए अब तक बलिदान करती आई हैं.

अब वह दोनों सुबह साथसाथ घूमने जाते, योगाभ्यास करते, राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर घंटों चर्चा करते, पार्टियों में जाते और टीवी देखते. कभीकभार की आपस की नोकझोंक इस संगसाथ में चार चांद लगा देती थी. मैं समझ सकता था कि उन्हें यह बिछुड़न कितनी भारी वेदना पहुंचा रही होगी. अपने दुख को किसी तरह काबू कर मैं उन के पास जा कर बैठा तो उन के धैर्य का बांध टूट गया और फफकफफक कर रो पडे़. मैं ने उन का हाथ अपने हाथ में ले लिया और आंसू भरी आंखों से उन की ओर देखता रहा.

चिता पर रखने से पहले पापा मम्मी के पार्थिव शरीर को एकटक निहारते रहे. फिर एक फूलमाला चढ़ाई और बेजान से एक ओर बैठ गए. पापा की आंखें अब हर समय डबडबाई रहतीं, मानो आंसू अभीअभी गालों पर ढुलकने लगेंगे. जबकि इस से पहले मैं ने कभी उन की आंखों में आंसू नहीं देखे थे. मैं अब उन के साथ साये की तरह रहने की कोशिश करता हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि अब मैं ही उन की सब से बड़ी शक्ति हूं.

अगले दिन मैं पापा के साथ कुष्ठ रोगियों की बस्ती गया. वहां हम दोनों ने उन सब को भोजन कराया. 2 दिन बाद हम दोनों अंध कन्या विद्यालय गए जहां पापा ने अंध बालिकाओं को बिस्कुट, नमकीन व फलों का नाश्ता कराया और विद्यालय को दान दिया. मम्मी की तेरहवीं के दिन उन्होंने विकलांग केंद्र के सब  बच्चों को भोजन कराया. मम्मी यहां अकसर आया करती थीं और विकलांग बच्चों की देखभाल में केंद्र की अध्यक्षा की मदद किया करती थीं.

धीरेधीरे दुनियादारी का पहिया अपनी जगह पर लौटने लगा. मैं ने निश्चय किया कि अपना अधिक से अधिक समय पापा के साथ बिताया करूंगा. उन का दुख बांटूंगा, सेवा करूंगा और उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने दूंगा. मैं उन के साथ सोता, साथ उठता. सुबह की चाय उन के साथ पीता फिर सैर और व्यायाम में उन के साथ होता और उन के साथ नाश्ता करने के बाद ही क्लीनिक जाता. दोपहर के भोजन के बाद से शाम को क्लीनिक जाने तक का समय उन के साथ बिताता. उन के लिए पत्रिकाएं, पुस्तकें तथा गीतों के कैसेट ले आता ताकि उन का मन बहल सके. मैं ने सुधा से भी खासतौर पर कह दिया था कि उन का पूरापूरा ध्यान रखे, भले ही इस के लिए उसे अपने क्लीनिक के समय में कटौती करनी पड़े.

पापा और मम्मी में प्रकृति की सुंदरता को देखने और उस का आनंद लेने की अद्भुत क्षमता थी. जब कभी वे ऐसी जगहों पर घूम कर वापस आते तो दोनों के भीतर एक नई ताजगी हिलोरें ले रही होती. इसलिए आज मैं ने पापा के सामने उन्हें हिमाचल की वादियों में घुमाने का प्रस्ताव रख दिया. मैं ने सोचा इस से उन के दुखी मन को कुछ सुकून मिलेगा.

‘‘अभी मेरा मन नहीं है, बेटे,’’ उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘‘अच्छा तो फिर 3-4 दिन के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश चलते हैं. वहां की गंगा की लहरें और पहाड़ के नजारे आप को बहुत अच्छे लगते हैं न.’’

‘‘इस समय मेरा मन कहीं भी जाने को नहीं है, मयंक. जब होगा तो मैं तुम्हें बता दूंगा.’’

मुझे बहुत दुख हुआ. मेरे दोनों प्रस्ताव उन्होंने बड़ी सहजता से वापस लौटा दिए थे.

शाम का समय था. पापा लान में बैठे जूही को गणित का कोई प्रश्न समझा रहे थे. मैं ने सोचा उन्हें मनाने का तरीका यही है कि मैं अपना मनोरंजन भी बीच में ले आऊं. मैं उन की शक्ति हूं तो उन की कमजोरी भी तो हूं. फिर वह ‘न’ नहीं कह पाएंगे.

मैं ने उन के पास जा कर बच्चे जैसी जिद की, ‘‘पापा, आज फिल्म देखने का बहुत मन कर रहा है. कोई फिल्म दिखा दीजिए न. पापा, प्लीज…’’

पापा के मुख पर एक क्षण के लिए बालकों जैसी अबोध मुसकराहट फैल गई. मुझे लगा कि यह योजना सफल हुई और वह अभी मेरे साथ चल पडे़ंगे पर दूसरे ही क्षण पापा ने सुधा को आवाज दी और फिर मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी ओर से सुधा को तुम्हारे साथ भेज रहा हूं. खूब एंज्वाय करना, बेटे.’’

इतना कह कर कुछ नोट मेरे हाथ पर रख दिए.

‘‘आप भी हम लोगों के साथ चलेंगे, पापा.’’

‘‘मेरी कोई बात नहीं, बेटा,’’ उन्होंने भावुक होते हुए कहा, ‘‘मेरी फिल्म तो तुम्हारी मम्मी के साथ चली गई.’’

मैं गुमसुम सा खड़ा रह गया. आज पहली बार उन्होंने मेरे सामने मम्मी को इस तरह याद किया था. कितनी गहरी पीड़ा थी उन के इन शब्दों में. अनजाने में यह क्या कर दिया मैं ने? चाहा था उन्हें थोड़ा खुश करना और कर दिया दुखी.

मेरा मन अपराधबोध से भर गया और फिर मैं सारी रात सो न सका. पापा का घर से बाहर निकलना अब आमतौर पर समाज के कामों या घर की छोटीमोटी जिम्मेदारियों तक ही सीमित रह गया है. बाहर से लौट कर उन की आंखें घर में कुछ ढूंढ़ती हुई लगती हैं. कभीकभी वह मम्मी की फोटो के सामने बैठ कर काफी देर तक बीते दिनों में खोए रहते हैं. उन्हें देख कर मैं भी उन्हीं यादों से घिर जाता हूं. मम्मी के रहते कुछ कार्यक्रमों में वह अकेले भी जाया करते थे. वहां से लौट कर उन के बारे में मम्मी के साथ घंटों चर्चा चलती रहती. साथ ही चायकौफी के दौर भी चलते.

मैं और सुधा अपने कमरे में बैठेबैठे उन की बातें सुनते और खुश होते. हम बीचबीच में जूही और शानू के हाथ मिठाई व नमकीन भिजवा दिया करते तो यह क्रम देर तक चलता रहता. पापा एक कवि हैं, लेखक हैं और कुछ संस्थाओं के लिए काम करते रहते हैं. मम्मी भी कुछ संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं. जब पापा किसी संस्था द्वारा अपनी सेवाओं के लिए सम्मानित हो कर आते तो मम्मी की खुशी देखते ही बनती थी.

मुझे आज भी याद है, वह हम लोगों से कहा करती थीं, ‘यह तुम्हारे पापा का नहीं वरन उन की सेवा का सम्मान हुआ है. इस से कुछ और लोगों को सेवा करने की प्रेरणा अवश्य मिली होगी.’

फिर वह पापा की ओर मुंह कर के कहतीं, ‘आप का आज का दिन तो सार्थक हो गया,’ फिर धीरे से एक स्कूल की प्राध्यापिका के अंदाज में कहतीं, ‘कीप इट अप.’

पापा झट झुक कर आदाब बजाते और घर खुशी के फौआरों से भर जाता. अभी कुछ ही दिन की तो बात है जब पापा किसी सामाजिक संस्था द्वारा सम्मानित हो कर आए थे. वहां से उन्हें एक अच्छा शाल और कुछ पुस्तकें भेंट में मिली थीं. घर में आते ही उन्होंने भावावेश में मम्मी का नाम ले कर पुकारा और तेज कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ चले. मैं अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा था. बहुत दिनों बाद उन के मुख पर ऐसी चमक देखी थी. मैं पलक झपकते ही समझ गया कि पापा इस समय अपने अतीत में लौट गए हैं और अपने सम्मानित होने की खुशी मम्मी से बांटने के भ्रम में आगे बढ़ते जा रहे हैं.

उन के कल्पना से यथार्थ में लौटने की बात सोचते ही मैं ने मन ही मन चाहा कि काश, समय कुछ देर के लिए रुक जाए और वह अपनी इस काल्पनिक खुशी में कुछ देर और डूबे रहें. पर ऐसा कहां होता है? अगले क्षण ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया और वह अपना सिर थाम कर जमीन पर बैठ गए. आंखों से आंसुओं की धार बह चली. कोई विलाप नहीं, सुबकी नहीं. बस, पत्थर को भी पिघला देने वाली मौन रुलाई.

मैं मूक दर्शक बना उन की यह पीड़ा देखता रहा. मेरा मन हुआ कि खिड़की तोड़ कर उन के पास चला जाऊं, उन के आंसू पोंछ कर उन का सिर अपनी गोद में रख कर देर तक सहलाता रहूं, उन के हाथपैर आहिस्ताआहिस्ता दबाऊं और उन का सारा दुख अपने ऊपर ले लूं पर मेरे कदमों ने मेरा साथ नहीं दिया.

मैं बहुत बेचैन था. कुछ सूझ नहीं रहा था कि ऐसी हालत में क्या करूं. अपने कमरे से अमेरिका में दीदी को फोन मिलाया और उन्हें सारी बात बताई. दीदी और जीजाजी कंप्यूटर की जानीमानी कंपनियों में अच्छे पदों पर हैं. दीदी पापा से बहुत जुड़ी हुई हैं. ऐसे समय में पापा के साथ न रह पाने का दुख उन्हें बहुत साल रहा है. हर तीसरे दिन पापा से फोन पर लंबी बात करती हैं. उन्होंने ऐसा इंतजाम किया है कि हर रविवार को सवेरेसवेरे एक माली फूलों का बहुत सुंदर गुलदस्ता ले कर पापा को भेंट करने हमारे घर आता है. पापा अभिभूत हो उठते हैं. मेरी बात सुन कर दीदी ने तुरंत पापा को फोन लगाया और बहुत देर तक उन से बात करती रहीं.

मम्मी के होते पापा के दोस्तों और मिलने वालों का घर में खूब आनाजाना रहता था. मम्मी के अतिथिसत्कार से सब बहुत प्रभावित थे. आजकल इन लोगों का आना नहीं के बराबर हो गया है. पापा का खानापीना भी पहले से बहुत कम होता जा रहा है. इन दिनों जो कुछ भी सामने आता है उसे चुपचाप खा लेते हैं. अपनी पसंद की चीजें बनवा कर खाना जैसे वह भूल गए हैं. किसी समय खानेपीने के बहुत शौकीन रहे हैं वह. हम लोगों के लिए बाजार से नित नई खाने की चीजें लाना और घर में भी बनवाना उन के स्वभाव का अंग रहा है. उन का खिलानेपिलाने का लाड़ कभी भूला नहीं जा सकता. अकसर कहते, ‘अच्छी से अच्छी पौष्टिक चीजें खाओ. अंत तक यही काम आएंगी. स्वास्थ्य अच्छा रखने की कुंजी यही है.’

अपनी पसंदीदा खाने की चीजों की लिस्ट सुबह ही मम्मी के हाथ में थमाने और चटकारे लेले कर खाने वाले पापा अब सुधा और महाराजिन को अपनी पसंद का कुछ भी बनाने के लिए नहीं कहते. मेरे और सुधा के आग्रह करने पर वह यह कह कर कन्नी काट जाते हैं, ‘‘सबकुछ इतना अच्छा बनता है कि तबीयत खुश हो जाती है. इस से बढ़ कर और क्या खाया जाए?’’

पता नहीं वही पापा इतने गुमसुम से क्यों रहने लगे हैं. अब अपने कपड़ों की ओर भी उन का ध्यान नहीं रहता. पहले उन्हें प्रेस किए हुए सलीकेदार कपडे़ बदलबदल कर पहनने का बड़ा शौक था. नई तरह के कपडे़ पहन कर शीशे के सामने खडे़ हो कर काफी समय तक अपनेआप को संवारते रहना उन की फितरत थी. पर आजकल तो कपडे़ प्रेस हुए हैं या नहीं, कुरते में पूरे बटन हैं या नहीं, जुराबें फटी हुई हैं या साबुत, इन बातों की ओर कोई ध्यान नहीं होता. जब मैं उन से कहता हूं कि बाहर जाते समय अपने कपड़ों को ध्यान से देख लिया करें तो दिल को छूने वाला उन का जवाब होता है, ‘‘उम्र का आखिरी पड़ाव है, बेटे. अब क्या…’’

मैं उन की ओर देखता रह जाता हूं. सुनता आया हूं कि समय बडे़ से बडे़ दुख से उबारने वाला, बडे़ से बडे़ जख्म भरने वाला होता है, लेकिन यहां तो उलटा ही हो रहा है. ज्योंज्यों मम्मी से हमेशा की जुदाई का वक्त आगे बढ़ता जा रहा है त्योंत्यों उन का दर्द जैसे और बढ़ रहा है.

पिछले कुछ दिनों से पापा की नई आदतों को ले कर मन बहुत बेचैन है. उन्होंने सुबह दूध के डिपो से दूध लाना शुरू कर दिया है. यह काम उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. वह जूही और शानू को उन के स्कूल की बसों में बैठाने का जिम्मा निभाने लगे हैं.

जैसे ही मुझे पता चला, मैं ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘अब ये काम आप करेंगे, पापा? मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. नहीं, आप को इन झमेलों में बिलकुल नहीं पड़ना है, प्लीज.’’

‘‘झमेला काहे का, बेटे,’’ वह सहज भाव से बोले, ‘‘इस बहाने बच्चों से उन की पढ़ाई की बातें करने का मौका मिल जाता है. समय अच्छा गुजर जाता है. कुछ दिनों में हम लोग अच्छे दोस्त बन जाएंगे.’’

मैं चुप तो हो गया पर उन की बात मन को कचोटती रही. इसी बीच उन्होंने बच्चों को ‘होम वर्क’ कराने का काम भी संभाल लिया. मुझे और भी हैरानी हुई. आखिर, पापा ये सब काम अपने ऊपर क्यों लेते जा रहे हैं?

उस दिन तो हद ही हो गई. क्या देखता हूं कि पापा सब्जी मंडी से सब्जी से भरे 2 थैले लिए चले आ रहे हैं. चेहरे पर पसीने की बूंदें झलक रही हैं और बोझ की वजह से पैर भी कुछ ठीक तरह नहीं पड़ रहे हैं. मैं शरम से पानीपानी हो गया. अपनेआप को धिक्कारने लगा. गाड़ी रोक कर उन्हें अपने साथ बिठाया और थैलों को पीछे की सीट पर रखा. मैं रोंआसे स्वर में उन से बोला, ‘‘पापा, इस समय मुझे खुद पर बहुत शरम आ रही है. ये आप के सब्जियों के थैले लादने के दिन हैं क्या?’’

‘‘इस में हर्ज ही क्या है, बेटे,’’ उन्होंने फीकी सी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘डाक्टर हो, इतना तो मानोगे ही कि चलूंगाफिरूंगा तो शरीर ठीकठाक रहेगा, नहीं तो जोड़ों का और न जाने कौनकौन सा दर्द शुरू हो जाएगा, और फिर ताजा सब्जियां किफायती दाम पर मिल जाती हैं.’’

‘‘पापा, प्लीज,’’ मैं ने आहत हो कर कहा, ‘‘आप सुबहशाम सैर का समय बढ़ा दीजिए. योगाभ्यास और अधिक देर तक कीजिए और सामाजिक कामों के लिए अधिक समय दीजिए लेकिन आप सब्जी और दूध ढोने या बच्चों को उन की बस में बैठाने का काम मत कीजिए. पता नहीं सुधा ने आप को क्यों नहीं रोका.’’

‘‘इस में सुधा बीच में कहां से आ गई,’’ वह बोले.

तभी घर आ गया.

मैं बारबार यही सोच रहा था कि पहले इन कामों से कोसों दूर भागने वाले पापा अब क्यों इन्हें एकएक कर के पकड़ते जा रहे हैं?

मैं ने सुधा से इस बारे में पूछताछ की कि कहीं जानेअनजाने में उस ने तो ऐसा कुछ नहीं कह दिया जिस ने उन की भावनाओं को ठेस पहुंची हो और ये काम कर के हमें यह बताना चाह रहे हों कि वह हमारे ऊपर भार हरगिज नहीं हैं. बड़ा स्वाभिमानी जीवन जिया है उन्होंने.

यह पूछताछ मैं ने इसलिए भी की क्योंकि मेरी लाख कोशिशों के बावजूद वह उन का उतना ध्यान नहीं रखती, उन्हें उतना सम्मान नहीं देती जितना उसे देना चाहिए और जितना मैं चाहता हूं. इस का कारण वह कभी भी नहीं बता पाई और कोई कारण नजर भी नहीं आता. मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि वह उन के प्रति अपने व्यवहार में सुधार नहीं ला पाई. मैं ने भी घर की सुखशांति के लिए इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है. मानसम्मान किसी से जबरदस्ती करवाने की वस्तु है भी नहीं. हां, उस ने मम्मीपापा के लिए किए जाने वाले मेरे किसी काम में आज तक कोई अडींगा नहीं लगाया.

मेरी बात सुन कर वह कुछ असहज सी लगी. मैं ने समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, सुधी, प्लीज, मुझे गलत न समझना. पापा की इस अजीब सी स्थिति के कारण मैं इस समय गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहा हूं. मैं समझता हूं तुम से कुछ छिपा नहीं है. इस समय हमें उन का ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है.’’

‘‘मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया, मयंक, जिस से उन्हें किसी तरह की ठेस पहुंचे,’’ उस ने मुझे आश्वस्त कर दिया.

पापा के बारे में मेरी चिंता दिनोदिन बढ़ती जा रही है. उन्होंने और मम्मी ने कंधे से कंधा मिला कर जीवन के उतारचढ़ावों से बहुत संघर्ष किया है. उन्होंने अभावों से जूझजूझ कर दीदी का और मेरा कैरियर बनाया है और हमें जीवन में सुव्यवस्थित किया है. अब जबकि हम संपन्न हैं और उन के लिए जीजान से सुखसुविधाएं जुटाना चाहते हैं, वह हमें इस अवसर से वंचित कर रहे हैं. हमारे लिए अपने ऊपर तरहतरह के कार्यों का बोझ डालते जा रहे हैं.

पापा के मुख पर स्वाभाविक मुसकान की हलकी सी झलक देखे एक अरसा हो गया. कभीकभार हमारा मन रखने के लिए जबरदस्ती की हंसी हंस भी देते हैं तो वह चुप्पी से अधिक भयानक होती है. उन की आवाज में पहले वाली खनक सुनने को, कान और आंखों में चमक देखने को आंखें तरसती रहती हैं. लेकिन देखने को मिलती है सिर्फ बेबसी. उन का अधिकार के साथ कभी कुछ कहना और करवाना बंद हो गया है. ऐसा लगता है जैसे वह परायों के बीच रह रहे हैं. यह कैसी विडंबना है? कोई मुझे बताए, पापा को यह क्या होता जा रहा है? वह खामोश क्यों रहते हैं? Hindi Story

लेखक – प्रभुदयाल महेश्वरी 

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