Jabalpur Incident: मध्य प्रदेश में जबलपुर के निकट नर्मदा नदी पर बने बरगी डैम में नौका विहार के दौरान एक नाव के एक बन रहे पुल से टकरा कर डूब जाने से जो मौतें हुईं वे हमारी निकम्मी आदतों की वजह से हुई हैं. हमारे यहां ज्यादातर काम जुगाड़ से होता है और तकनीक के मौजूद होने के बावजूद, आमतौर पर जान का खतरा मोल ले कर, बेहूदा ढंग से काम किया जाता है.
भारतीयों की मानसिकता आज भी बैलगाड़ी वाले युग की सी है जिस में गाड़ीवान और गाड़ी बनाने वाले बढ़ई समाज के सब से निचली स्तर पर होते हैं, आमतौर पर वे अछूत या दलित समझे जाते हैं जिन्हें न पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है न पढ़ने दिया जाता है. वे उन नावों को चलाने लगते हैं जिन में डीजल इंजन लगे होते हैं जबकि नाव के स्ट्रक्चर व इंजन की मरम्मत का कोई खयाल नहीं रखा जाता.
आज नावों के लिए भी जो इक्विपमैंट और सेफ्टी गैजेट उपलब्ध हैं उन्हें दिखाने मात्र के लिए रखा जाता है क्योंकि सब के दिमाग में यह कूड़ा भरा है कि ‘जाको राखे साईंयां मार सके न कोय’ ही जीवनरक्षक है.
25 लोगों के लिए बनी बोट पर
43 लोगों को चढ़ा दिया गया था जिस के डूबने पर केवल 28 को बचाया जा सका वह भी उन मजदूरों द्वारा जो बन रहे ब्रिज पर काम कर रहे थे. दुर्घटनाएं दुनियाभर में होती हैं, बहुत सी मैकेनिकल फेलियर की वजह से होती हैं लेकिन हमारे यहां जो मशीनें हैं उन की दुर्घटनाएं दुनिया में सब से ज्यादा होती हैं क्योंकि यहां सेफ्टी का ध्यान रखने के लिए केवल रिश्वतखोर सरकारी बाबू होते हैं. मशीनों पर, चाहे वे स्टीमर हों, बोट हों, एयरोप्लेन हों, रेलें हो, कारें हों, इंटरनल सेफ्टी सुविधा बिलकुल नहीं होती. मैकेनिकों को अपने हुनर पर इतना गरूर रहता है कि वे सेफ्टी का ध्यान रखे बिना जोखिम लेते रहते हैं.
इस की सब से बड़ी बुरी आदत तो सीवर सफाई करने वालों में दिखती है जब गंदे पानीभरे मेनहोल में नाली खोलने के लिए किसी को 5 मिनट तक बिना औक्सीजन पाइप, बिना मास्क व बिना लाइट के उतरने को तैयार कर लिया जाता है और 4-5 सफेदपोश सरकारी बाबू मेनहोल के चारों ओर खड़े रहते हैं यह देखने के लिए नहीं कि उतरने वाले की जान तो जोखिम में नहीं बल्कि यह देखने के लिए कि मेनहोल खुला या नहीं.
बोट ट्रैजेडी इसी शृंखला का हिस्सा है. हम अंदर तक तकनीकविरोधी हैं. हम आज भी मानसिक तौर पर 15वीं सदी में जी रहे हैं. मोबाइल हाथ में रख कर उस में जन्मकुंडली देख रहे हैं. पूजा कर के सोचते हैं कि सब शुभ होगा. बोट पानी में उतारने से पहले जरूर पूजा की गई होगी.
युद्ध के असल शिकार
पश्चिम एशिया में युद्ध के सब से बड़े शिकार सैनिक नहीं, साधारण लोग हैं जिन पर अचानक किसी ड्रोन या मिसाइल का हमला होता है. ईरान के बाहर मरने वालों में पहला पीडि़त सैनिक नहीं, तेल अवीव, इजराइल की राजधानी में काम कर रही 32 वर्षीया मेरी एन वेरा थी जो फिलीपींस से आ इजराइल में कमा कर फिलीपींस में रह रहे अपने परिवार को पालने की कोशिश कर रही थी. उस की मौत मिसाइल के एक टुकड़े से हुई.
करीब 3 करोड़ लोग अपनेअपने देशों की बेरोजगारी, गरीबी, दुर्व्यवस्था, क्रूरता, भेदभाव से निकलने के लिए आमतौर से अकेले ही रहने और काम करने के लिए अभी गल्फ देशों में हैं. वे अपनेअपने देशों में अरबों डौलर भेज रहे हैं. लगभग गुलाम लेबर भेजने वालों में भारत विश्व में सब से बड़ा निर्यातक है. भारत को इस से 120 से 180 अरब डौलर की विदेशी मुद्रा मिलती है.
इसी विदेशी मुद्रा के सहारे जहां भारत के 1 करोड़ और दूसरे देशों के 2 करोड़ लोगों के परिवार चलते हैं, वहीं भारत समेत पाकिस्तान, बंगलादेश, इथियोपिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस की सरकारें मुफ्त की विदेशी मुद्रा से ऐयाशी का सामान खरीद रही हैं, बड़ेबड़े हवाई जहाज खरीदे जा रहे हैं, शासकों के बच्चे विदेशों में पढ़ने जा रहे हैं. इन देशों के अमीरों के लिए महंगी गाडि़यां खरीदी जा रही हैं, शासकों के चहेते अमीर उद्योगपति विदेशों में घर और बिजनैस खरीद रहे हैं, छुट्टियां मना रहे हैं.
इन सब देशों की सरकारों को अब चिंता यह है कि अगर अमेरिकाईरान युद्ध के कारण तेल महंगा हो गया और दूसरे देशों से तेल निकालना सस्ता पड़ने लगेगा तो गल्फ देशों में सुस्ती छा जाएगी और 3 करोड़ से ज्यादा लोग अपनेअपने देशों में जाने को मजबूर हो जाएंगे जहां उन्हें न नौकरियां मिलेंगी न सुकून. वे सरकारों के लिए सिरदर्द भी बनेंगे और सरकारों की जेबें भी नहीं भरेंगे.
एक तरह से वे इन सरकारों को पाल रहे हैं जबकि लगभग हर देश की सरकार इन मजदूरों के साथ बहुत दुर्व्यवहार करती है. उन्हें जाने पर मोटी रिश्वतें और दलाली देनी पड़ती है और आने पर कस्टम ड्यूटी. जो भारत में होता है वही दूसरे देशों में होता है. सभी देशों की सरकारें इन ‘दूध देने वाली गायों’ के साथ डंडों से बात करती हैं.
इस युद्ध के पीडि़त तो ये मजदूर हैं. पढ़ेलिखे तो महंगी फ्लाइट्स ले कर 4 दूसरे देशों से होते हुए लौट आएंगे पर गरीब मजदूर मरने के लिए छोड़े जा सकते हैं. उन के भगवान भी उन्हें बचाने नहीं आएंगे. हां, मर गए तो जरूर भगवान का एजेंट अपनी फीस लेने पहुंच जाएगा.
निशाने पर कौर्पोरेट
भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार डा. वी अनंत नागेश्वरन से कोई ऐसी बात तो सुनी नहीं जा सकती जो सरकार की नीतियों की पोल खोलती हो, इसलिए जब उन्होंने कंपनियों को लताड़ा कि वे अपने प्रौफिट देश में ही इन्वैस्ट करने के स्थान पर दूसरे देशों में ले जा रही हैं, तो इसे केवल एक बहाना मानना चाहिए.
डा. वी अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि कई तकलीफों के बावजूद पिछले 5 सालों में भारतीय कंपनियों को 30 फीसदी अधिक मुनाफा हुआ है लेकिन उन्होंने यह मुनाफा भारत में नए उद्योगों में नहीं लगाया बल्कि इस से विदेशों में रिहायशी संपत्तियां खरीदीं या विदेशी कंपनियों में लगाया.
अनंत नागेश्वरन को यह शिकायत इसलिए है क्योंकि भारत में या तो कर्जे पर कंपनियां फलफूल रही हैं या विदेशी कंपनियों का पैसा लग रहा है या फिर वे स्टौक मार्केट से पैसा जुटा रही हैं. भारत में नए उद्योग नहीं लग रहे तो भविष्य में भारत का औद्योगिकीकरण धीमा हो जाएगा, जिस के संकेत दिखने लगे हैं. यह बात उन्होंने जोर से कही कि जो मुनाफा भारतीय कंपनियों को कोविड के बाद हुआ वह दूसरे देशों की कंपनियों से कहीं अधिक है. इस का मतलब यह है कि कंपनियों ने भारत की भगवा सरकार का पूरा लाभ उठाया लेकिन उस लाभ को देश में न लगा कर बाहर लगाया.
अब यह बात वे नहीं कह सकते कि कंपनियों को यह पाठ सरकार खुद सिखा रही है. भारत सरकार की अपनी पूंजी दोचार सैक्टरों को छोड़ कर या तो पाकिस्तान का हौवा दिखा कर सेना पर खर्च की जा रही है या मंदिरों के निर्माण या मंदिरों तक भक्तों को लाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर की जा रही है. इस में भी भारतीय कंपनियां कमाई ही कर रही हैं क्योंकि सेना के ठेकों और विदेशी सौदों में बहुत मोटा मुनाफा होता है.
मंदिरों में निवेश करना जनता से वसूले गए टैक्स की बरबादी है. लेकिन अर्थव्यवस्था पर इस बो?ा के बारे में बहुत कम लिखा जाता है क्योंकि जो भी आर्थिक विशेषज्ञ हैं वे ऊंची जातियों के पूजापाठी ही हैं. थिंक टैंकों यानी विचारकों के समूहों में तो भगवा गैंग वाले किसी को बोलने तक नहीं देते और आज की सरकार के खिलाफ बोलने को तो देशद्रोह का नाम दे दिया गया है.
विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों, यूजीसी के अधिकारियों, अर्थ विशेषज्ञों, टैक्स एकत्र करने वाली संस्थाओं के कर्ताधर्ता, नीति आयोग के सदस्य सब महान पूजापाठी हैं और बहुत से खुले तिलकधारी हैं. वे आधुनिक निर्माण की नहीं, पूजापाठ में नई तकनीक लाने की सोच सकते हैं, बस. मीडिया की स्वतंत्रता को सरकारी दबाव और उच्च व मध्य वर्ग की जातीय पहचान को बनाने में गंगा में डुबो दिया गया है.
दरअसल, जब तक देश पर मंदिर और पूजापाठ हावी रहेंगे, देश में निर्माण संभव नहीं होंगे. जब तक देश में पैसा-सत्ता पाने के लिए सेना, अर्धसेना, पुलिस, ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल होगा, कोई उद्योगपति संतुष्ट नहीं होगा और बाहर भागने का रास्ता खुला रहेगा.
मस्क बनाम औल्टमैन एलन मस्क का एक्स और ग्रोक
आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जनता को जम कर परोसा जा रहा है जबकि प्रतिद्वंद्वी कंपनी ओपन एआई के सैम औल्टमैन अमेरिका में एक मुकदमे में उलझे हुए हैं. एलन मस्क का कहना है कि उन्होंने कई साल पहले सैम औल्टमैन की सहायता यह सोच कर की थी कि आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की तकनीक को मुनाफे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.
अब ओपन एआई अपने तकनीकी सौफ्टवेयर प्रोडक्ट्स को महंगे दामों में बेच रहा है और मोटा मुनाफा कमा रहा है. एलन मस्क अपनी सहायता के बलबूते पर औल्टमैन को हटाना चाहता है. ओपन एआई का कहना है कि एलन मस्क एक सफल कंपनी को पुरानी सहायता के नाम पर हथियाना चाहता है.
असल में डिजिटल तकनीक जो एक टूल की तरह आई थी अब हर जने की पीठ में छुरे की तरह धंस रही है, वह छुरा जो दिखता नहीं पर खून बराबर का बहाता है. दुनियाभर के लोग आज आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस, डिजिटल एल्गोरिदम, औनलाइन बैंकिंग, औनलाइन संदेशों के लेनदेन की गिरफ्त में ऐसे हैं कि वे लिखनापढ़ना भूल रहे हैं, सिर्फ सुन और बोल रहे हैं. उन्हें जो कंपनियां चाहें वह दिखाया व सुनाया जा रहा है. उन के हर काम पर नजर रखी जा रही है.
धर्म की तरह एल्गोरिदम ने अपने मजबूत पंजों में आज के आदमी को इस तरह गिरफ्त में ले लिया है जैसा वह प्रिंटिंग प्रैस के आने से पहले 15वीं शताब्दी तक था. उस की सोच, उस की तर्कशक्ति, उस की स्वतंत्रता, उस की पसंद, उस के तर्क सब डिजिटल कंपनियों के क्रूर हाथों में हैं जो जिसे चाहें जैसे काम करने क?ो मजबूर कर सकती हैं.
चुनी हुई सरकारों को कमजोर बनातीं डिजिटल कंपनियां, जो धर्म की दुकानों से भी ज्यादा पौवरफुल हैं, आम आदमी को पूरी तरह से गुलाम बना रही हैं. उस के पलपल पर नजर तो रखी ही जा रही है, उस के खाने, पहनने, सुनने, पढ़ने, देखने, घूमने और यहां तक कि उस के सैक्स तक पर भी उन का पहरा जारी है.
डिजिटल कंपनियों के सौफ्टवेयर डिजाइनर पहले के धर्म के इशारों पर चल रही सेनाओं के जनरलों की तरह हैं जिन का काम होता था कि सैनिकों को आदेश दो कि चलो दूसरे पर हमला करो, उन्हें लूटो, उन की औरतों को छीन लाओ.
जब इस छीना?ापटी में 2 सेनाओं का मुकाबला होता है तो स्थिति ईरान बनाम इजराइलअमेरिका जैसी हो जाती है. यही, एलन मस्क और सैम औल्टमैन की कंपनियों के साथ हो रहा है. सेनाओं के युद्धों की कीमत भी जनता अपने उत्पादन को छीने जाते, अपने लोगों को मरने के लिए भेजने को मजबूर होते देखती थी, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस और डिजिटल आक्रमण भी वैसा ही है. धर्म ने सदियों ऐसा किया, अब बाजार में नया धर्म छा गया है. Jabalpur Incident





