Hindi Story: ‘कहा था न कि मैं अगर कभी खो गया तो तुम्हें यही मिलूंगा?’ उस के कानों में वह चिरपरिचित आवाज फिर प्रतिध्वनित हो उठी.

‘हां, और मैं ने तुम्हें ढूंढ़ लिया, ढूंढ़तेढूंढ़ते यहां तक आ ही गई,’ उस ने पूरे जोश में कहा. उस की हर्षसिक्त आवाज समंदर से टकरा रही थी.

‘सुना था, नदी समुद्र से मिलती है और मैं नदियों में से गुजरते हुए तुम्हारा पता तलाश करते आखिर तुम से आ ही मिली.’

उंगलियों से विक्ट्री का निशान बना कर वह हवाओं में अपनी विजय की मुहर छाप रही थी. अपने हाथों में सर्फिंग बोर्ड को थामे उस ने बीच पर कदम बढ़ा दिए, हवाओं में मौजूद एक साया सा आ कर उस के आरपार गुजर गया. ऊपर नीला आकाश और नीचे नीलहरित जल पर नाचती दूधिया उर्मियां अजीब सा मायाजाल फैलाए थीं चमकीली रेत पर. उन से बनतेउठतेगिरते क्षणभंगुर मोती यों लग रहे थे जैसे उस की इस उपलब्धि पर सलिल अपने दोनों हाथों से मोती लुटा रहा हो और वह उन के नेह में डूबती जा रही थी.

समुद्र की दैत्याकार लहरों को चुनौती देती सर्फिंग बोर्ड पर अठखेलियां करती पद्मा के चेहरे पर प्रतिशोध के साथ विजय के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. आज हर भय, हर अपराधबोध उस से कोसों दूर थे. उसे गहरा समुद्र भी जमीन प्रतीत हो रहा था. जरा सी चूक उस का यह पल मौत में बदल सकती थी लेकिन आज हर डर उस की जीत ही होगा, उसे अपने अंदर और बाहर के समंदर में, बस, उसी का स्पर्श मिल रहा था.

अथाह नीली जलराशि यदि नीली समाधि में बदल जाए तो भी उसे कोई कष्ट न होता, सुख ही होता. उसे एक्सट्रीम सैटिस्फैक्शन मिल चुका था. सशरीर उसे आसमान की अनुभूति हो रही थी. वरना उस का हर व्यवहार नपातुला हो चुका था, किसी बो?ा के तले रोज जीना आसान नहीं होता. आज उस ने उत्तरजीवी होने का उत्तरदायित्व पूरा ही लिया था.

ब्रेवो, वाओ, अमेजिंग॔ की चारों तरफ गूंजती आवाजों के साथ वह सुदूर फैली उस अनंत हरहराती जलराशि को विस्मित नेत्रों से देखती जा रही थी. हर बूंद की उछाल में उसे लगता था कि उस में सलिल की आंखें उभर आई हैं, लहरें उसे सलिल की बलिष्ठ भुजाएं लगतीं, सागर स्वयं सलिल.

उस के पैरों के नीचे जमीन न हो कर भी जमीन का आभास हो रहा था. आज उस के पथरीले चेहरे पर बरसों बाद विजय के भाव उभरे थे, हर सर्फर का लगभग यही हाल था. सर्फिंग क्लब से सफलतापूर्वक प्रशिक्षु का सर्टिफिकेट प्राप्त करने के बाद आखिर उस ने समंदर के सीने में अपने कदम उतार ही दिए थे.

आसपास का शोर और खुशी की आवाजें उस वातावरण में आम थीं. डक डाइव, हैंग टेन और ट्यूब राइड अब उस की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे. उस के विस्फारित आंसू समंदर का ही एक अंग लग रहे थे. उसे सलिल अपने अंदर भी उतना ही महसूस हो रहा था जितना बाहर.

सिद्धार्थ उस के जीवन के उस बेशकीमती अविस्मरणीय पल को कैमरे में कैद करता जा रहा था. वह इन खूबसूरत पलों में मरने की कामना कर रही थी ताकि यह उस की अंतिम स्मृति बन जाए. लेकिन, जीवन हमारे चाहने से कहीं आगे है. उसे सलिल अपने रोमरोम में महसूस हो रहा था. ‘आइए वापस लौट चलिए’ प्रशिक्षक का निर्देश मिलते ही उसे यों लगा मानो उस ने अंतिम मिलन के पलों में सबकुछ पा कर भी एक बार फिर खो दिया.

थके कदमों से वह लौट चली बीच की ओर. लेकिन आज उस में मिलन की खुशी के साथ विजय का उद्घोष भी था. वह वापस आ कर बीच पर बैठ गई. सागर का नमकीन पानी अब भी उस के शरीर का हिस्सा था.

‘‘हे द्विज, यह लो तुम्हारी गुरुदक्षिणा,’’ उस ने कैमरे से रिकौर्डिंग उसे दिखाते हुए कहा, ‘‘थैंक यू, द्विज.’’ उस ने भावुकताभरे स्वर में यह कहा. आज वह सच में फूटफूट कर रोना चाहती थी, इस गुरुदक्षिणा के लिए.

‘तुम रो सकती हो मन भर जाने तक’ उस ने यह सुना और बरसों का सूखा सागर आंखों से बह ही निकला. रेत में गिरते नमकीन मोती मानो सलिल ही अपने रूमाल में सहेज रहा था.

किस ने सोचा था कि पानी से डरने वाली एक साधारण सी लड़की लक्ष्य के लिए इतनी असाधारण बन कर निखरेगी.

‘द्विज’ उन दोनों का स्नेहिल संबोधन था एकदूसरे के लिए क्योंकि उन दोनों ने ही एकदूसरे को दोबारा जन्म दिया था.

हां, उन का मिलना समय की एक निष्ठुर योजना थी. समय सचमुच कितना मायावी होता है. हम जब जो चाहते हैं तब वह नहीं मिलता और जब मिलता है तो उस की प्यास खत्म हो चुकी होती है. उस के मष्तिष्क में वह दिन फिर जीवंत हो उठा.

उस दिन सांक्ष्य सूरज के घर लौटने की प्रतीक्षा में सिंदूरी हो चुकी थी. सुबह के यायावर घोंसले की ओर संगीतबद्ध हो कर लौट रहे थे. सुदूर तक आंचल फैलाए गंगा का घाट भी किनारे सजी हुई तरणियों से क्लांत शांत निशा के आगमन का शंखनाद कर रहा था. लहरें मद्धम हिलोरें ले रही थीं. कोई जलचर यदि निकल पड़ता तो यों तरंग उठतीं मानो कोई मासूम बच्चा नींद से चिहुंक उठा हो. रंगबिरंगी नावें पंक्तिबद्ध यों सजी हुई थीं जैसे किनारों पर मानो उन्होंने सिंदूर से नवविवाहिता की मांग भरी हुई हो. धीरेधीरे सब अपनेअपने कांत में लौटने की तैयारी में थे और वह भी.

‘छपाक’ की तेज आवाज हुई और शाम को नदी के जल से करीब 2 फुट ऊंचे नवजात उपजे, उजले मोती बिखर कर तट पर फैलने लगे. जल से न जाने कितने नएनए पानी के मनोहर आकार आंखों के आगे साकार हो उठे. जितना वजन गिरा उतना ही बड़ा वलय बना और उस क्षणिक शून्य से निकला जल ऊपर उछल कर नएनए आकार रचने लगा.

कूदने वाले ने उसी क्षण खुद को लहरों के हवाले कर दिया और कोई संघर्ष भी नहीं किया लहरों से मानो उसे जीवन से कोई मोह न हो. जीवनयुद्ध से थका वह पथिक यों ही मिटने को राजी था. जैसे जल के मोती धीरेधीरे अपने मूल आकार में लौटते, आंखों के आगे से मिट जाते थे. धीरेधीरे सब पहले जैसा होने जा रहा था. उसे दम घुटने की प्रतीक्षा थी, वह सोच रहा था कि आज सारे जंजालों से मुक्त हो जाऊंगा.

तभी वैसी ही एक और आवाज गूंजी और उस ने धुंधली आंखों से देखा, सामने से कोई तरुणी आ रही है उस की ओर. मानो, पानी पर कोई चील उड़ रही हो, पूरी रफ्तार से कुशलतापूर्वक. थोड़ी देर में उसे लगा कि वह मृत्यु की चाहत रखते हुए पानी में खो गया, सभी दुखों से मुक्त होने के लिए. पर यह उस का भ्रम मात्र था. आंखें खुलने पर वह नदी के किनारे रेत पर पेट के बल लेटा था और उस के सामने वही तरुणी खड़ी थी.

सपाट चेहरे के साथ उस की आंखों में जीवन के लक्षण देख कर उस के चेहरे पर एक क्षीण स्मितरेखा उभर कर लुप्त हो गई. निर्निमेष वह उस की ज्वलंत आंखों में देखता रहा, फिर बच्चों की तरह रो पड़ा, ‘क्यों बचाया मुझे?’

शायद, जिन्हें मौत चाहिए उन्हें वह नहीं मिलती. तरुणी ने उसे जीभर कर रो लेने दिया और वह नदी की तरफ पीठ कर के बैठ गई. फिर कुछ क्षणों के बाद उत्तर दिया, ‘कुछ सहानुभूति और कुछ समानुभूति के कारण. कभी मैं ने भी यह गलती की थी. आज लगता है कि अगर तब सफल हो गई होती तो आज वहां न होती जहां हूं.’

युवक, जिस का नाम सिद्धार्थ था, ने दोबारा नदी की ओर देखा तो खुद भी भय से आंखें मूंद लीं. गंगा की रेत अभी भी उस के वस्त्रों से किसी हठी प्रेमिका सी चिपकी हुई थी, मानो कोई प्यार की प्यासी अपने प्रिय को छोड़ना ही न चाहती हो. उस ने धीरे से कहा, ‘तुम रो सकते हो. जब तक तुम्हारे भीतर की पीड़ा किसी जाग्रत ज्वालामुखी की तरह अपना लावा बहा कर खुद को शांत न कर ले, रोते रहो.’

उस ने आश्चर्यजनक तरीके से सामने बैठी उस युवती को देखा, जो उसे बिना कोई उलाहना दिए रोने की सलाह दे रही थी. और वह एक बार फिर रेत के ढहते किले के मानिंद भरभरा कर रो पड़ा. शायद, बेहद टूटा हुआ होगा, तरुणी ने सोचा, फिर कहा, ‘तुम जब तक चाहो, रो सकते हो. उस के बाद तुम चाहो तो अपना मन खोल सकते हो.’

‘आप पहली शख्सियत हैं जिस ने मुझ से यह बात कही है,’ वह भरे गले से बोला.

‘शायद हम अजनबी के सामने वैसे ही निष्कपट और निर्वसन होते हैं जैसे

मां के समक्ष नवजात शिशु. कोई बंधीबंधाई छवि टूटने का भय ही नहीं होता. हम एक पहले से ही बनेबनाए तयशुदा खांचे में जीते हैं और उसी के लिए मजबूर किए जाते हैं.’

‘आप सही कह रही हैं,’ उस ने संभल कर बैठते हुए कहा.

अब युवक कुछ संयत हो चुका था. तरुणी ने कहा, ‘तुम अपने घर लौट सकते हो.’

युवक ने खाली आंखों से कुछ कहना चाहा लेकिन प्रकट में यह बोला, ‘मेरा नाम सिद्धार्थ है, आप का नाम जान सकता हूं? आप बहुत अच्छा तैरती हैं.’

युवती ने उत्तर दिया, ‘मुझे पता है.’

युवक बोला, ‘आप को किस ने सिखाया?’

युवती ने कहा, ‘भय ने.’ और वह उसे विस्मित छोड़ कर आगे बढ़ने लगी. भय, भय से ही तो भाग कर मैं गंगा की गोद में शांति खोजने आया था. उस ने चिल्ला कर कहा, ‘मु?ो आप से बात करनी है, दोबारा कब मिलेंगी?’

‘रोज आती हूं इधर, इसी समय,’ उस के पथरीले चेहरे से स्वर निकले, ‘अब यह तुम्हें तय करना है कि कैसे मिलोगे, नदी में कूद कर या किनारे पर.’ कहती हुई वह शाम के अंधेरों में तेजी से चलते हुए लुप्त हो गई.

‘उफ्फ यह इंसान ही था या कुछ और. जीवन का कोई चिह्न ही नहीं.’ उस ने खुद से कहा और सिर झटक कर खुद भी वापस गलियों में गुम हो गया.

सांझ और रात एकदूसरे के आलिंगन में अपना अस्तित्व खो रही थीं, तारों जड़ी रात की काली चादर अपने रंग में आ रही थी. पहुंच कर युवती पद्मा ने दरवाजा चाबी से खोला, धीमी रोशनी का बल्ब एक युवक की तसवीर पर रोशनी बिखेर रहा था. ईजी चेयर पर वह खुद को ढीला छोड़ कर और अपनेआप को ?ालाते हुए तसवीर की आंखों से आंखें मिला कर बोली, ‘देखना, एक दिन मैं तुम से फिर मिलूंगी.’

पर उस की आंखें इतनी रिक्त थीं कि वहां न नमी थी और न ही अपने लिए कोई क्षमा. आंखों में नींद भरी थी पर कोई पीड़ा ऐसे चुभ रही थी जैसे कंकड़. उस ने सोने की कोशिश की पर सब व्यर्थ. नींद की गोलियां उस के जीवन का अटूट अंग बन गई थीं. किसी तरह नींद आती भी थी तो उस का अपराध छाती पर यों अड़ कर खड़ा हो जाता ज्यों अंगद का पैर. उफ्फ, कितना मुश्किल होता है अपराधबोध के साथ जीना. अगली शाम को उस के कदम रोज की तरह फिर चल दिए गंगा के किनारे. सीढि़यों के पास आज सिद्धार्थ पहले ही मौजूद था.

‘मेरा इंतजार कर रहे थे,’ उस ने सवाल किया?

‘जी.’

‘क्यों, क्या आज छलांग फिर लगाने का इरादा है?’ उत्तर से पहले एक और सवाल आ गिरा उस की झुली में.

‘नहीं, आप का धन्यवाद करना था और कल के लिए माफी मांगना चाहता हूं, वह पल जो आप ने मुझे जीवन में लौटाया.’

‘क्षणिक आवेग हम से बहुतकुछ छीन लेते हैं. जिंदगी वाकई खूबसूरत है. भूमिका बांधने की कोई जरूरत नहीं. तुम से पहले मैं भी तो ऐसा कर चुकी हूं.’

‘क्यों, आप तो बहुत अच्छी तैराक हैं. आप रोज आती हैं इधर?’ उस ने ताज्जुब से कहा.

‘हां, अपने मन की शांति की तलाश में, मेरे कदम खींच ही लाते हैं इधर.’

इतना कह कर उस ने अपना सामान किनारे रखा और खुद को लहरों के हवाले कर दिया, थकने की हद तक जाने के बाद वह किनारे पर लौट आई.

‘आप बहुत अच्छी तैराक हैं,’ उस ने एक बार फिर उस की आंखों में देख कर कहा.

वहां, बस, पीड़ा और आत्मग्लानि की मौजूदगी थी. उस ने आंखों को मूंद लिया और पेड़ का सहारा ले कर बैठ गई, फिर बोली, ‘कुछ बातों के लिए हम बहुत देर कर देते हैं. मुझे अग्रोफोबिया था शुरू से ही.’

‘तो क्या हुआ, हम अपने जीवनकाल में किसी न किसी चीज से भयग्रस्त होते ही हैं,’ सिद्धार्थ ने कंधे उचका कर कहा, ‘‘मुझे एगोराफोबिया यानी जनातंक है, मनोविज्ञान की पढ़ाई की है.’’

‘हूं, तो तुम ने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुनना चाहा.’ सवाल सामने से उछला.

सिद्धार्थ ने जवाब दिया, ‘मैं सर्वाधिक असफल हूं अपने घरवालों की नजर में, सब से नकारा, शुरू से ही और अब यह डर मुझ में फैल रहा है. उन के सवालों से बचता एकांत खोजता फिरता हूं.’

पद्मा बोली, ‘और मैं अकेली रह गई हूं. यह तैराकी मेरा अपराधबोध है. मेरा प्रायश्चित्त समझ.’

‘ओह. लेकिन आप का डर अपराध तो नहीं. यह मन की एक अवस्था है,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘कैसे नहीं है,’ उस ने दुख से कहा, ‘जो डर हमारी पूरी जिंदगी की दिशा और दशा बदल कर रख दे, उस से डरूं नहीं तो क्या करूं?’

‘आप से मिल कर मन को बड़ा सुकून मिलता है, आप की बातें मुझे अपनी सी लगती हैं,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘क्योंकि हम मनुष्यों को प्रकृति ने भावनाओं और संवेगों के साथ भाषा की आजादी दी है,’ इतना कह कर वह जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

पर रोजाना मिलने से उन के मन की गिरह ढीली पड़ने लगी थी.

अगली मुलाकात में सिद्धार्थ ने पूछा, ‘आप को तैरना किसी ने सिखाया या खुद सीखा?’

‘बचपन की पहली याद जब मैं खेलते हुए बड़ी सी बाल्टी में गिर पड़ी थी, समझ मरने ही वाली थी, बच गई. तब एक पड़ोसी ने बचाया था.’

पद्मा ने नदी को देखते हुए कहा, ‘उस के बाद मेरा बड़ा ध्यान रखा जाता था. उस बात को भूल भी न पाई थी कि दोबारा नदी स्नान में डूबते हुए बची. यहां तक कि मु?ो पानी और डूबने के सपने भी डराया करते थे.

‘बड़ी जलराशि को देख कर चक्कर आ जाते. ऐसा लगता कि यह मुझे तेजी

से अपनी ओर खींच लेगी. मु?ो अनुभूति होती उस से मुझे खींचते दैत्याकार हाथों की.

‘और देखो, आज सब सीख लिया सिवा सलिल के बिना जीने के.’ उस ने बात खत्म कर के सिद्धार्थ की ओर सूनी नजरों से देखा.

‘आप डरपोक नहीं बहादुर हैं. आप ने वाकई भय से आगे की दौड़ लगाई है,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘मायके में मेरी हद शावर से आगे न बढ़ी कभी. जब सलिल, मेरे पति, मेरी जिंदगी में आए तो सबकुछ बड़ा अच्छा था,’ उस ने बताया, ‘शादी के बाद जहां मुझे बाथरूम में बाथटब भी बरदाश्त न था, उस के उलट, तैराकी उन के लिए स्ट्रैस भगाने का जरिया थी.’

वह कुछ रुक कर फिर बोली, ‘हम दोनों में छोटामोटा झगड़ा भी हो जाता लेकिन वे मेरी हालत से समझता करने लगे थे. मैं ने हौल में लगी हुई उन की पसंद की सभी पानी वाली पेंटिंग भी धीरेधीरे बदल दीं. वे मेरे डर के साथ जीना सीख चुके थे. अब जब भी वे बाहर के टूर करते तो मैं औफिस संभाल लेती.

‘‘अब हमारे मध्य भय से जुड़ी कोई बात नहीं होती थी. मुझे लगा सबकुछ सामान्य है लेकिन मुझे पता न था कि मैं उन के जीवन का घुन थी क्योंकि मैं ने जानेअनजाने उन के सुकून के सभी रास्ते बंद कर दिए थे. मेरा डर धीरेधीरे उन्हें मार रहा था, उस दिन फैमिली गैदरिंग में हम शामिल हुए थे. हमारे मध्य हमारा अंश आकार ले रहा था.

‘सलिल स्विमिंग पूल में उतरे तो तैरने के लिए थे मगर वे उस से बाहर आ ही न पाए. मैं मदद के लिए चिल्ला भी न सकी. डर से फ्री हो चुकी थी.’ पनियाती आंखों से उस ने सिद्धार्थ को देखा, फिर बोली, ‘जब तक सहायता मिलती, मैं ने उन्हें अपनी आंखों के सामने पानी में समाते देखा. उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया पर तब तक देर हो चुकी थी.’

‘उन्हें मदद चाहिए थी मेरी. और मैं ने अपनी कायरता से सब खो दिया.’

‘ओह, कहीं उन्हें कार्डिएक अरेस्ट तो नहीं आया था?’ सिद्धार्थ ने अपनी राय दी.

‘मुझे पता ही न चला था कि वे मेरे डर से जुड़े व्यवहार से रोजाना होने वाले तनाव के कारण दिल के मरीज बन चुके थे,’ उस ने रहस्यमयी वाणी में कहा, ‘मुझे उन के जाने के बाद होने वाली रस्मों से उतनी तकलीफ नहीं हुई जितनी इस रहस्य के खुलने की वजह से.’

‘मेरी कायरता उन के लिए जीवनभर का घुन बन गई और एक दिन तनाव के कारण मिसकैरेज भी हो गया. मैं चलते पंखे, आग सब में अपनी ग्लानि के कारण मौत के बहाने तलाशने लगी. फिर तलाश रुकी तो पानी पर जिस से डर लगता था, जो सलिल को लील गया.’

‘मिसकैरेज से पहले तो मकसद था मेरे पास. उस दिन इसी जगह छलांग लगा दी, जहां इन हाथों से उस का अस्थि विसर्जन किया था.’ कब डूबी, याद नहीं लेकिन आंख खुली तो सामने जो शख्सियत थी, वह बड़ा नाम था तैराकी में आदित्य सिंह.

पद्मा ने आगे कहा, ‘वजह, जाहिर है, मुझे भी बतानी पड़ी. उस ने मुझे पूर्ण शांति से सुना, फिर बोला, ‘मरना आसान है, कल लोग भूल जाएंगे. यदि वास्तव में उस के लिए जीना चाहती हो तो उस की पसंद को जियो, इसी में मिलेगा वह तुम्हें.’

‘पर मुझे तो पानी से भय लगता है,’ मैं ने कहा.

‘आज जान ली पानी ने तुम्हारी,’ उस ने व्यंग्य से कहा.

‘उस में भी जिंदगी पलती है, पानी की दुनिया में जीने के अपने तरीके हैं. तुम खुद से भयभीत हो. पानी तो तुम्हारे मेरे दोनों के अंदर भी है, बस देह की हद में.’

‘मेरे पास अब खोने को कुछ भी शेष न था, पाने की कोई उम्मीद भी न थी.’

‘उसे मृत्यु ने अवसर नहीं दिया पर तुम अगर प्रेम में हो तो उस विसंगति को संगति में बदल दो,’ आदित्य सिंह ने कहा था.

‘उन के स्विमिंग स्कूल में फौर्म भरते समय कितना विरोधाभास था, तैराकी के प्रशिक्षु का सब से बड़ा डर पानी? उस दिन मैं ने पानी में आंखें बंद कर के उतरते समय पहली बार विसर्जित किया अपना पश्चात्ताप, भय और विसंगतियों को.’

सिद्धार्थ ने बड़े धैर्य से सुनते हुए उत्तर दिया, ‘पता है हमारे समाज को सबकुछ सुंदर चाहिए, जैसे कोई वेल प्रोग्राम्ड सौफ्टवेयर, हम अपनी उपलब्धियों को तो सगर्व ढोल बजा कर सुनाते हैं लेकिन

डर किसी विषधर से अंधेरे में ही पला करते हैं.’

‘‘समाज में हम निजी भय के बारे में खुल कर बात करें तो कायर कहे जाते हैं.

पद्मा अब बोली, ‘पता है, अब इस पानी में मुझे सलिल का स्पर्श महसूस होता है, पता नहीं किस कतरे में वह मुझे बिन बताए छू कर निकल जाता होगा.’

सिद्धार्थ ने कहा, ‘हो सकता है वह अब तक अरब सागर निकल चुका हो, गंगा वहीं तो मिलती है उस से.’

‘शाम ढल चुकी है, सिद्धार्थ. अब हमें चलना चाहिए,’ पद्मा ने यंत्रवत उत्तर दिया.

और दोनों फिर अंधेरों में अपनी मंजिल की ओर बढ़ गए.

अगली शाम जब वे फिर मिले तो उस के भावहीन चेहरे पर उदासी की मोटी परत थी.

‘आज नहीं तैरोगी?’ सवाल सामने से आया.

‘यह देखो,’ उस ने एक पुरानी डायरी आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘उस के पुराने विवाद लौकर से मिली, आज ही पजेशन मिला है. यह देखो, उस की बकेट लिस्ट, जो कभी पूरी नहीं होगी, अब. ‘स्कूबा डाइविंग, सर्फिंग, पूल में अपने बच्चों के सैलिब्रेशन अब ये सब अगले जन्म में करूंगा, पद्मा डरती है पानी से और मैं उसे खोने से.’

‘स्विमिंग पूल के लिए छोड़ी गई जगह अब कभी नहीं साकार होगी. बड़ा मुश्किल है अपनी पसंद के कामों को भूल कर जीना या शायद मरना कहूंगा उसे, यह डर अब उस से ज्यादा मुझे मार रहा है.’

कुछ देर के लिए तो सिद्धार्थ मौन रह गया, फिर बोला, ‘पर ये तो उस की भावनाएं हैं और तुम तो अब पानी के भय से आगे बढ़ चुकी हो.’

‘एक दिन पहले की तारीख है नीचे उस के इस दुनिया से जाने की,’’ पद्मा ने अपना निचला अधर दांतों से काटते हुए दुख से कहा.

‘तुम्हें द्विज का अर्थ पता है?’ सिद्धार्थ ने पूछा.

‘ब्राह्मण,’ पद्मा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘नहीं. द्विजत्व का अर्थ है एक ही जन्म में 2 बार जन्म लेना, एक बार भौतिक और दूसरी बार आध्यात्मिक. जब हम किसी दायित्व की दीक्षा लेते हैं तो हमारे सारे भय छूट जाते हैं,’ वह लहरों की ओर देख कर बोला.

‘फीनिक्स तो अपनी ही राख से फिर जन्म लेती है और बदलता कुछ नहीं.’

‘पर तुम मुझे फीनिक्स नहीं, द्विज लगती हो जो पानी से डरतेडरते पानी से खेलने लगी. अब तुम उदासीन हो सुख और दुख की सीमारेखा के मध्य खड़ी हो निर्भीकता से. सलिल की वह बकेट लिस्ट भी पूरी करोगी जरूर. तुम ने स्विमिंग में हुनर सीख कर खुद को नया जन्म दिया है, सलिल की यादों को भी.’

‘तुम्हें सचमुच ऐसा लगता है,’ पद्मा ने बेफिक्री से कहा.

‘हां, तुम्हें पता है आपदा अवसर का गर्भकाल होती है, मैं तुम्हारे लिए वह अवसर खोज कर लाऊंगा और तुम सलिल को यह उपहार जरूर दोगी, द्विज. तुम्हारे प्रेमगीत का स्थायी लिखा जा चुका है. बस, अंतरा शेष है.’

‘हां,’ पद्मा के चेहरे पर दृढ़ता नजर आ रही थी. उस के पास खोने को कुछ भी न था और पाने के लिए बड़ा समंदर था सपनों का.

‘‘सिद्धार्थ,’’ पद्मा ने जोर से पुकारा तो वह वर्तमान में लौटा. ‘क्या सोच

रहे हो?’

‘‘सोच रहा हूं डबल सैलिब्रेशन है आज, यह लो हमारे एनजीओ की रजिस्ट्रेशन मेल. हम ऐसी मुहिम चलाएंगे जहां पानी से डर के अलावा सभी डरों के बारे में खुल कर बात होगी, ताकि कोई घुट कर न जिए. कोई औरत प्रेमी को पाने के लिए न डरे. कोई युवती रात को अकेले में जाने के डर से अपना कैरियर समाप्त न करे. कोई मां बच्चे को ऊंचे पेड़ पर चढ़ने से न रोके.’’

‘‘सुनो, मुझे फूलों का बुके ला कर दो न, व्हाइट लिलीज का,’’ पद्मा ने आंखें ?ाका कर कहा.

पद्मा एक बार फिर सर्फिंग बोर्ड ले कर उतरी और बुके को सागर के हवाले कर बोली, ‘‘सलिल, अब मुझे पानी से डर नहीं लगता. तुम्हें हमारे ‘द्विजत्व’ नाम के एनजीओ की नींव मुबारक हो.’’

उस की आवाज लहरों के साथ मानो नृत्य कर रही थी. गंगा में राख के रूप में विलीन हुआ सलिल उसे सागर में मिला था, जहां वह उसे यह सूचना प्रसव पीड़ा के बाद मिली संतान जैसी खुशी की तरह ही सुना रही थी.

वक्त के साथ सलिल स्विमिंग स्कूल के रूप में उस का सांझ स्वप्न साकार हो रहा था.

‘‘बधाई, प्रेम की पीड़ा से उपजी यह नई इबारत मोक्ष के द्वार पर पहुंचा द्विज ही लिख सकता है, फीनिक्स नहीं,’’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘‘सच, फीनिक्स होती तो बस मेरी यात्रा बारबार राख होने और जन्म लेने की होती, लक्ष्य कभी न मिल पाता, तुम्हारा शुक्रिया.’’

उस के सामने अनगिनत संतानें थीं विद्यार्थियों के रूप में, सलिल की बकेट लिस्ट इस बार संपूर्ण हो चुकी थी.

सलिल भी हम में है और सिद्धार्थ भी, पद्मा भी हमारे मन में. बस, जरूरत है जीने का हुनर सीखने की. Hindi Story

 

 

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