Family Story Hindi: दी आप बहुत समय बाद दिखाई दीं, आजकल घूमने नहीं जातीं?’
‘2 बेटियां हैं मेरी. दोनों बाहर हैं. एक की शादी…’’ कहते हुए उन की आंखों में नमी थी. मुझे लगा मुझे से ज्यादा उन की तकलीफ को कौन समझ सकता है जिस की खुद की बेटी हो.
‘अकेले मन नहीं लगता या कहूं कि अकेलापन कचोटने लगा है. बच्चों की इतनी आदत है कि खुद को संभाल नहीं पा रही हूं. यकीन मानो कहीं कुछ भावुक पढ़ूं या देखूं तो मन भर आता है. अभी हाल ही में बेटी के पास से ही आई हूं. ऐसा नहीं कि मैं ने संभलने की कोशिश नहीं की. बहुत तरह से मन लगाने का प्रयास किया लेकिन सबकुछ करने के बाद भी वह रिक्तता जो छूटी है न उसे कोई नहीं भर सकता.’
उन की बात सुन कर दिल भर आया. ऐसा नहीं कि मैं उन्हें उस दिन पहली बार देख रही थी, अकसर अपनी बालकनी से उन्हें आतेजाते देखा है. मस्तमौला, हंसमुख और बिंदास व्यक्तित्व. बेशक कभी मुलाकात का मौका नहीं मिला लेकिन उन को देख कर एक खुशमिजाज महिला की छवि मन में बनती है. कैसे परिचय दूं क्योंकि मैं भी अभी तक बस इतना ही जानती थी, कालोनी की हम से सीनियर पीढ़ी. उस ग्रुप की एक सदस्य मु?ो बहुत प्रिय थी और एक हमारे करीबी लेकिन जानपहचान के बाद भी उन की तरफ से कभी मित्रता के प्रयास नहीं हुए और कभी हम ने भी कोशिश नहीं की.
आज लंबे अंतराल के बाद किसी विवाह समारोह में उन से मिलना हुआ. नजरें मिलीं तो लगा कुछ कहना चाहती हैं लेकिन दोनों की झिक आगे बढ़ने से रोक रही थी. काफी देर हिचकिचाहट के बाद जब आमनासामना हुआ तो दोनों ने कदम बढ़ा दिए.
‘‘हैलो, कैसी हो मीता?’’ उन्होंने बड़ी आत्मीयता से पूछा.
‘‘मैं ठीक. आप?’’
‘‘बहुत समय से तुम से मिलना चाहती थी. तुम्हारा लिखा हुआ पढ़ा. बहुत अच्छा लिखती हो, सीधे दिल पर जा कर लगता है.’’ दिल पर अपनी उंगलियों से संकेत कर जब उन्होंने तारीफ की तो लगा, सच, मेहनत सफल हुई.
‘‘धन्यवाद किरण दीदी. अच्छा लगा सुन कर. यह जान कर और भी अच्छा लगा कि आप मेरा लिखा हुआ पढ़ते हो और पसंद भी आया,’’ मैं ने आतुरता से कहा, ‘‘आप को अपनी किताब दूंगी, पढि़एगा.’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं पहले ही खरीद कर पढ़ चुकी हूं. पढ़ना ही तो जीवन का बड़ा ध्येय होना चाहिए,’’ फिर वे आगे बोलीं, ‘‘तुम मुझे पहचान तो गई हो न?’’
‘‘जी दीदी,’’ कह बात खत्म की. कैसे कहती कुछ लोग बिना मिले भी अपनी ओर खींच लेते हैं, आप उन्हीं में से एक हैं.
बातों का सिलसिला जारी रहा. बच्चों की, लेखन की और उन के पसंदीदा राइटर की न जाने कितनी बातें हुईं.
इन बातों के साथ उन का चेहरा लाल पड़ गया या कहूं न चाहते हुए भी भरी महफिल में उन का दर्द छलक पड़ा. मैं ने पीठ सहला उन को अपनेपन का एहसास करवाने की पूरी कोशिश की.
‘‘सही कह रहे हो आप, दी. बेटियां ऐसी ही होती हैं. उन की मौजूदगी घर और मातापिता के जीवन को खुशियों से भर देती है. हमें पता है उन्हें एक दिन जाना है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ, उन के जाने का एहसास भी दिल को हिला देता है.
‘‘जिन से हमारी जिंदगी है और इस जिंदगी में रौनक है उन से दूर हो कर जिंदगी जीना कितना मुश्किल है. यह सामने वाले को बिना महसूस किए सम?ा पाना बहुत कठिन है. मेरा तो खुद का यह हाल है कि मैं कोई सीरियल, विदाई, भावुक गाने तक सुनने से बचने लगी हूं. घर की हर चीज, हर खुशी उसी से है.’’ यह कह मैं ने भी मन को नियंत्रित करने का एक सफल प्रयास किया.
वे भी भावुक थीं, टपाक से एक आंसू छलका दिया, ‘‘मैं तो अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई हूं. बहुत तरीके से मन लगाने की कोशिश करती हूं लेकिन…’’ कह फिर भावुक हो उठीं वे.
मैं ने प्यार से और महज प्यार से ही नहीं, उन के दर्द को आत्मसात करते हुए कहा, ‘‘दी, मैं तो खुद को भावुकता की तोप समझती थी, आप तो मुझ से भी ज्यादा…’’ यह कह मैं ने चुप्पी साध ली.
अंत में पति से मुलाकात के बाद औपचारिक बातें हुईं. उन्होंने चाय पर आने का प्रस्ताव रखा और जल्दी ही मिलेंगे कह कर विदा ली.
बहुत देर तक उन की मासूमियत, ममता और तकलीफ मुझे उन का चेहरा और भावना से भरे आंसू उन के कोमल मन की याद दिलाते रहे.
रहरह कर वह घड़ी याद आ रही थी जब मित्र की बेटी 5 साल का कोर्स करने बाहर गई थी और उस के दुखी मन को मैं ने यह कह कर सम?ाया था, ‘लड़कियां ऐसी ही होती हैं, भाभाजीजी. पता है, एक दिन चली जाएंगी, फिर भी हर बार उन का जाना और चेहरे पर ?ाठी खुशी के साथ उन्हें विदा करना वाकई कठिन होता है.’
आंसू पोंछते हुए बोलीं, ‘बस 5 साल बाहर, फिर शादी. अब तो गई ही समझ. आजकल क्या बेटा, क्या बेटी. सब की इसी उम्र में विदाई हो जाती है. बेटे के आने की आस में फिर भी वक्त गुजरता है लेकिन बेटियां जो गईं तो अपनी ही जाई पर से सब अधिकार खत्म.’ यह कह वे सिसकने लगीं.
सच, कितनी तकलीफ है इन बातों में. यह मुझे आज करीब से महसूस हो रहा था. शायद इसलिए क्योंकि चंद साल बाद मुझे भी इस कसौटी से गुजरना है. बिटिया के बड़प्पन के साथ एक अजीब तरह का बदलाव मैं ने भी महसूस किया. भावुक गानों को नजरअंदाज करना, विदाई के सीन से दूरी बनाना वगैरह.
बेशक बच्चों को बढ़ते देखना सुखद है लेकिन मन में हर बार यही लगता है काश, वक्त यहीं थम जाए लेकिन यह वक्त है कि बंद मुट्ठी में से रेत की तरह फिसलता चला जा रहा है. जानती हूं यह जीवन है, इस में आए बदलाव स्वीकारने ही होंगे. वक्त का हाथ थाम, बढ़ना ही होगा.
उस के बाद किरण दी से मुलाकात का मौका नहीं मिला. बस, व्हाट्सऐप पर हायहैलो का मैसेज एकदूसरे को भेज देते थे. उन से मिल कर लगा था जैसे मैं अपना ही अक्स देख रही हूं. एक बार मैसेज में इतना ही लिख पाई, आप मुझे मुझ जैसी लगीं.
मन था, मैसेज में कुछ अपने मन की भी लिखूं लेकिन कैसे, वे तो उम्र, तजरबे और अनुभव सब में मु?ा से बड़ी हैं. बस, चंद शब्द उन्हें अपने दिल के कहना चाहती थी. आज साहस कर लिख भी दिए, ‘‘दीदी, जैसा हम बच्चों के लिए सोचते हैं न, बच्चे भी वही महसूस करते हैं लेकिन उन के अपने सपने, साथ और नया परिवार होता है. उन्हें सामंजस्य बैठा कर अपनी मां के दिए संस्कारों को मान दिलवाना है. यदि हम दुखी होंगे तो वे कैसे खुश होंगे. हमें आज फिर ममता का फर्ज निभाना है, बेवजह नहीं, वजह ढूंढ़ कर. खुश रहना है ताकि हमारी गैरमौजूदगी में भी बच्चे यह सोच कर आगे बढ़ पाएं कि हमारी खुशियों की वजह मातापिता हैं. हमें उन के लिए खुश रहना है. आप तो नाम को सार्थक भी करती हैं ‘किरण’.
‘‘चाहे वक्त बदले या मिजाज, किरण का तो काम ही सकारात्मकता फैलाना है. वह कैसे विपरीत परिस्थिति को अपने स्वभाव पर हावी होने दे सकती है. यदि वह प्रयासरत रही तो आसपास वही प्रकाश होगा, वही खुशनुमा वातावरण होगा और वही चारों तरफ उम्मीद का उजाला होगा.’’
इस के बाद उन का कभी कोई मैसेज नहीं आया. कभीकभी मैं ही गुडमौर्निंग मैसेज भेज देती और वे उसी में कभी हाथ जोड़ कर तो कभी लव बना कर जवाब दे देतीं. दिल को यह कह कर तसल्ली दी कि शायद मेरा सम?ाना उन्हें अच्छा नहीं लगा.
आज अचानक मौर्निंग वाक पर आमनासामना हुआ. वही खुशनुमा चेहरा, मस्त अंदाज. आज दोनों में कोई झुकि न थी, तेजी से दोनों एकदूसरे की तरफ बढ़ गए.
‘‘दीदी, कैसी हैं आप? बहुत अच्छा लग रहा है आप को देख कर? आज तो वही पुराना अंदाज.’’
उन्होंने भी उतनी ही आत्मीयता से जवाब दिया, ‘‘मिलना चाहती थी तुम से. कल ही लौटी हूं, धन्यवाद जो कहना था.’’
‘‘धन्यवाद, क्यों दीदी?’’
‘‘सही कहा था तुम ने, मैं यहां खुश नहीं रहूंगी तो बच्चे कैसे खुश रह पाएंगे. पता नहीं, क्यों नहीं समझ पाई कि मेरे चेहरे की खुशी से चलने वाला मेरा परिवार मुझे निराश देख कर सुकून में कैसे रह सकता है. बच्चे कितने भी बड़े हो जाएं, कितनी भी दूर चले जाएं, कितनी तरक्की कर लें या नई दुनिया में रचबस जाएं, उन के दिल में मातापिता की जगह कभी कोई नहीं ले सकता. बस, जब यह सम?ा आया तो अब सब ठीक है.
आजकल औनलाइन हैल्थ प्लान जौइन किया है. किट्टी में फिर सक्रिय हो गई हूं. जिम में भी सक्रिय हूं. और तो और, एक एनजीओ से जुड़ कर
2 बच्चियों को मुफ्त शिक्षा दे रही हूं. पता है, अपनी बच्चियों का अक्स उन में देखने लगी हूं. सच कहूं तो अब जिंदगी में बहुत सुकून है. यदि हम खुश रहना चाहें तो तमाम रास्ते हैं. जिंदगी हमारी है लेकिन उस पर अधिकार केवल हमारा तो नहीं, हमारे अपनों का भी है,’’ यह कह हंसने लगीं वे.
‘‘मीता, तुम्हारे लिखे हर शब्द दिल में उतर गए. सच कहूं तो तुम्हारे मैसेज ने एक नई दिशा दी. मैं ‘किरण’ जहां तक पहुंचूंगी वहां उजाला ही उजाला होगा’’ इस बात को कहते हुए उन के चेहरे पर आत्मविश्वास की एक अनोखी चमक थी.
लेखिका – मीता जोशी





