Short Hindi Stories: ‘‘घूंघट हटाओ बहू का, मेरी बहू घूंघट नहीं डालेगी.’’ राजीव के पापाजी की इस बात पर मम्मीजी ने उन की ओर भृकुटि चढ़ा कर देखा तो वे आगे बोले, ‘‘वैदेही, बेटी बन कर रहेगी हमारी. बेटियां परदा नहीं करतीं.’’

शादी के बाद विदा हो कर मैं राजीव के घर आ चुकी थी. भारी मैरून रंग की बनारसी साड़ी पहने, मैं तमाम तरह के जेवरों से लदी थी. विदा के आंसू अब भी रहरह कर बह रहे थे. ‘मेरी चिंता मत करना, वैदेही. ससुराल में पूरा मन रमा कर रहना. दीप्तिजी को कोई शिकायत का मौका मत देना. राजीव के मातापिता अब तुम्हारे भी मातापिता हैं.’’ विदाई के वक्त मां ने साड़ी के छोर में कुछ पैसे और चावल रख कर गांठ बांधते हुए मेरे साथ यह बात भी बांध दी थी.

मुझे पता था कि अब यही मेरी नई दुनिया है पर मां भी तो मेरी ही दुनिया थीं. पिता और मां दोनों का दायित्व निभाया था उन्होंने. पिता कैसे होते हैं, क्या होते हैं, इस बात से मैं बचपन से ही अनभिज्ञ थी. मां बताती है कि जब मैं सिर्फ 2 साल की थी तब ही पापा हमें छोड़ कर चले गए थे. उन की उस अंतिम विदाई की, उन के उस निधन की मेरे मस्तिष्क में कोई स्मृति शेष नहीं थी. मैं ने तो बचपन से अपनी मां में ही मां को और पिता को दोनों को देखा था. मेरे सिवा मां का दूरदूर तक कोई न था. आसपड़ोस की महिलाओं से घिरी, मैं चेहरे पर घूंघट डाले, मां की चिंता करती हुई कुछ सोच ही रही थी कि वह ऊंचा स्वर सुनाई दिया था घूंघट उठाने का.

मैं अंदर ही अंदर एक ससुर का यह रूप देख कर संतोष से भर गई. उस दिन से आज तक मैं ने पापाजी से कभी परदा नहीं किया. वे हर विषय पर मुझ से खुल कर बातें करते. मेरी पसंदनापसंद की सब्जियां लाते. वे हर संभव प्रयास करते कि वे मुझे वह सबकुछ दे सकें जो एक पिता एक बेटी को देता है.

मांजी भी बहुत अच्छी थीं पर उन के चेहरे से मैं यह भांप लेती थी कि उन्हें एक बहू का बहू की तरह रहना ही पसंद है. एक दिन की बात है जब पापाजी ने मुझे एमएड करने की सलाह दी, ‘वैदेही, तुम बीएड तो हो ही, शिक्षण में तुम्हारी विशेष रुचि भी है तो क्यों न तुम एमएड भी कर लो और उस के बाद अपनी डिग्रियों का उपयोग कर के किसी अच्छे स्कूल में टीचर की नौकरी कर लो.’

दरअसल मेरा मन भी टीचर की जौब करने का था पर संकोचवश मैं चुप रहती थी और फिर राजीव भी यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर थे. उन के जौब के सामने प्राइवेट स्कूल की टीचर की नौकरी करने की मेरी हिम्मत नहीं थी. पर पापाजी ने न जाने कैसे और कब मेरे मन को भांप लिया था. ‘बेटी, कोई भी जौब छोटीबड़ी नहीं होती, जिस काम में मन रम जाए और जिस काम को करने में आनंद मिले वह काम निसंकोच कर लेना चाहिए.’

पापाजी के ये शब्द मेरे मन का साहस बढ़ा देते. मायके में 2 साल तक पढ़ाई के साथसाथ मैं ने टीचिंग की हुई थी. सच में मुझे बच्चों को पढ़ाना बहुत पसंद था. दूसरे दिन ही पापाजी मुझे अपने दोस्त के स्कूल ले गए. उन के दोस्त दुबे अंकल सुलझे व्यक्तित्व के धनी थे. उन्होंने मेरा आवेदन स्वीकारते हुए मुझे फौरन अपने स्कूल में टीचर रख लिया. पति राजीव को यह जान कर खुशी हुई.

मम्मीजी को मेरी नौकरी से कोई खास एतराज नहीं था. शुरू में तो सब ठीक से चलता रहा पर जैसे ही मम्मीजी पर घर के कामों का भार पड़ा, वे चिढ़ीचिढ़ी सी रहने लगीं. ‘‘सारा घर नौकरों के हवाले कर दो. अरे, नौकर घर नहीं चलाया करते, वे सिर्फ मदद करते हैं. घर तो घर की औरतें ही चलाती हैं.’’ वे बड़बड़ातीं तो पापाजी उन्हें समझ कर कहते, ‘‘अरे, मुझे भी कोई काम दे दिया करो, लाओ तुम्हारी सब्जी काट दूं, सब मिलजुल कर काम करेंगे तो हो जाएगा, इतना परेशान क्यों होती हो राजीव की मां.’’

‘‘आप को तो कुछ दिखता नहीं. बस, बैठेबैठे ज्ञान के मोती लुटाते रहते हो. अरे, कब तक नौकरी करा लोगे अपनी बहू से, कल को बालबच्चा होगा, तो छोड़नी ही पड़ेगी न नौकरी. फिर यह चार दिन नौकरी कर के क्या पा लेगी बहू.’’

‘‘वाह, दीप्तिजी, यह सही कही, जैसे सारी नौकरीपेशा महिलाएं मां ही नहीं बनतीं, किस जमाने में रह रही हो तुम राजीव की मां?’’

वे पैर पटकती हुई गुस्से में बात को टालती वहां से चली तो जातीं पर मेरे भीतर कई सवाल छोड़ जातीं. कभी लगता कि छोटी सी ही तो नौकरी है, छोड़ दूं तो क्या? फिर पापाजी मनोबल बढ़ा देते और मैं नई ऊर्जा के साथ स्कूल की ओर चल देती. मेरा मन जब भी बुझबुझ सा होता, पापाजी मायके से मां को बुला लेते. मम्मीजी और पापाजी सहित राजीव भी उन का खूब खयाल रखते. मैं अपनी प्यारी सी ससुराल को देख कर बारबार अपने समय को सराहती. देखते ही देखते पापाजी के प्रोत्साहन और मेरी मेहनत के चलते मेरी सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई.

राजीव की मम्मी का तो पता नहीं लेकिन पापाजी और राजीव इस बात से बहुत खुश हुए. मैं सुबह जल्दी उठती, बहुत हद तक घर के काम समेटती और फिर उस के बाद स्कूल चली जाती. घर के सभी लोग बराबर से घर के काम करते. अब तो धीरेधीरे मम्मीजी भी बदलने लगी थीं. उन के ताने अब न के बराबर हो गए थे.

सब आराम से चल ही रहा था कि एक रात पापाजी की तबीयत बिगड़ गई. हम आननफानन उन्हें अस्पताल ले गए. उन्हें तुरंत आईसीयू में एडमिट कर लिया गया. डाक्टर ने बताया कि उन्हें सीरियस हार्टअटैक आया है. अभी कंडीशन काफी खराब है. कुछ कहा नहीं जा सकता. यह सुन कर मैं सुन्न पड़ गई. मम्मीजी और राजीव की भी हालत खराब थी. राजीव यहां से वहां दौड़ते, कभी इंजैक्शन और दवा लाते तो कभी बैंच पर बैठ कर रोंआसे हो जाते. मैं उदास बैठे राजीव की ओर देखती तो उन में मैं 2 साल की उस वैदेही को खोजती जो मेरी स्मृति? में कहीं थी ही नहीं. आज मु?ो महसूस होता कि जिस वक्त मेरी मां ने पापा को खोया होगा उस वक्त क्या बीती होगी उन पर. यहां अस्पताल का माहौल बहुत डरावना था. आतेजाते उदास चेहरों के बीच में मैं मम्मीजी को संभालती.

देखतेदेखते रात बीत चुकी थी. सुबह आईसीयू से बाहर डाक्टर आ कर बोले, ‘‘तबीयत में अब कुछ सुधार है पर अभी भी उन्हें आईसीयू में ही रखेंगे. आप लोग चाहें तो उन से मिल सकते हैं.’’ हम तीनों एकएक कर के पापाजी के पास गए. मैं जब उन के पास गई तो वे रो पड़े, ‘‘वैदेही, अगर मु?ो कुछ हो जाए तो राजीव और उस की मां का खयाल रखना.’’

‘‘आप को कुछ नहीं होगा, पापाजी. आप की बेटी आप को कुछ नहीं होने देगी, पापाजी.’’

कांपती आवाज में वे बहुत धीमेधीमे बोले, ‘‘तू तो है ही मेरी प्यारी बिटिया, मुझे हमेशा एक बेटी की चाह थी, पर राजीव का जन्म इतनी मुश्किल से हुआ कि आगे डाक्टर ने हमें संतान न करने की सख्त हिदायत दे दी, पर जिस दिन से तुम्हारे कदम हमारे घर में पड़े उस दिन से मुझे यह एहसास हुआ कि प्रकृति को हमें तेरी जैसी प्यारी सी बहू देनी थी, इसलिए उस ने हमें बेटी नहीं दी.’’

‘‘पापाजी, मुझे भी बचपन से पापा कहां मिले. मुझे तो अपने पापा का चेहरा तक याद नहीं. आप ही से मुझे पता चला कि पापा होते क्या हैं, अब मुझे कभी मत छोड़ना पापाजी,’’ यह कहती हुई मैं उन की कांपती हथेली पकड़ कर रो पड़ी तो नर्स ने मुझे आईसीयू से बाहर जाने का इशारा किया.

पापा से बात करने के बाद मैं और भावुक हो गई थी. पापा नहीं होंगे तो? बिना पापा के वह घर कैसा होगा? मैं ऐसी कल्पना कर के भी सिहर जाती. अगले 3 दिनों तक पापा अस्पताल में रहे. तीनों दिन मैं बराबर वहीं रही उन्हें के पास. राजीव मम्मीजी को रात को घर छोड़ आते और दोपहर उन्हें ले आते.

हमारे वे 3 दिन बहुत मुश्किल से कटे पर आखिरकार पापाजी ठीक हो कर घर आ गए. वे पहले से काफी कमजोर हो गए थे. मम्मीजी की तबीयत भी कुछ ठीक न थी. वे मानसिक और शारीरिक रूप से काफी थक गई थीं. उन दिनों मैं ने स्कूल से छुट्टियां ले रखी थीं. पापाजी का मैं जीजान से खयाल रख रही थी. मम्मीजी भी अब ठीक थीं. वे मेरा सेवाभाव देख कर गदगद थीं. पापाजी कुछ ही दिनों में बिलकुल स्वस्थ हो गए थे. सबकुछ जैसा था वैसा ही चल पड़ा था.

मम्मीजी मुझे बहुत ज्यादा प्यार करने लगी थीं. उन्होंने मेरी मां को भी यहीं रहने को बुला लिया था. मुझे 2 मांओं और एक पिता का भरपूर प्यार मिल रहा था. कहते हैं, ससुर कभी पिता नहीं बन सकते और बहू कभी बेटी नहीं बन सकती. पर यहां ससुर पिता से भी बढ़ कर थे और बहू बेटी से भी बढ़ कर थी.

‘‘वैदेही, बेटी, कब से स्कूल की छुट्टी ले कर बैठी हो, कल से स्कूल जाओ.’’ पापाजी मु?ो बिलकुल वैसे ही डांट रहे थे जैसे अमूमन पिता अपनी नन्हीं बच्ची को स्कूल न जाने पर डांटते हैं. मैं ने अपना बचपन बिना पिता के गुजारा था पर आजकल लग रहा था कि जैसे मैं

फिर एक बच्ची हूं जो बिना पिता के नहीं

रह सकती.

अवशेषों से इंसानी विकास का सफर –  हमारे डीएनए में आज भी जारी है ‘लाइव कोडिंग’

पहले माना जाता था कि पिछले 10,000 साल में मनुष्य जाति का विकास लगभग रुक गया होगा क्योंकि खेती के बाद इंसानों की सर्वाइवल चुनौतियां कम हो गईं लेकिन नया अध्ययन इन बातों को खारिज करने के लिए काफी है क्योंकि एवोलुशन अपना काम लगातार कर रहा है. यह शोध नेचर जर्नल में 15 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुआ है. हार्वर्ड मैडिकल स्कूल के डेविड रीच, अली अकबरी और उन की टीम ने 15,836 प्राचीन यूरोपियन लोगों के डीएनए का विश्लेषण किया. इस में उन की टीम को 10,016 नए जीनोम मिले. इस खोज के साथ यह अब तक का सब से बड़ा डीएनए अध्ययन बन गया है.

लगभग 10,000 साल पहले खेती की शुरुआत के बाद नैचुरल सलैक्शन के कारण मनुष्य के 479 जीन वैरिएंट्स नए पाए गए. इस से पहले वैज्ञानिक सिर्फ मुट्ठीभर उदाहरण ही जानते थे. हजारों और वैरिएंट्स पर भी इस का असर पड़ा है. इस खोज से यह पता चलता है कि मनुष्य का एवोलुशन धीमा नहीं पड़ा बल्कि तेज हुआ. खासकर 5 हजार साल के दौरान यानी ब्रौंज एज के बाद से विकास में खासी गति आई है. खेती, पशुपालन, घनी आबादी और नई बीमारियों की वजह से भी नए जीन वैरिएंट्स बने. यह एवोलुशन का जीताजागता सुबूत है.

इंसान के शरीर की इस कोडिंग को देखा जा सकता है, इसलिए इसे ‘लाइव कोडिंग’ कहा जा रहा है जिस का मतलब यह है कि हमारे डीएनए का सौफ्टवेयर आज भी अपडेट हो रहा है. खेती और तकनीक जैसे कल्चरल प्रोग्रैस ने इंसानी विकास को रोका नहीं, बल्कि नई दिशा दी.

सीलिएक रोग का रिस्क म्यूटेशन सिर्फ 4,000 साल पहले का है यानी यह म्यूटेशन पिरामिडों से भी नया है. प्राचीन काल में यह म्यूटेशन संक्रमण से बचाता था लेकिन आज यह औटोइम्यून की समस्या बन गया है. इंसानों में लैक्सेज पर्सिस्टेंस यानी दूध पचाने की क्षमता पशुपालन शुरू होने के बाद आई. पिछले 5 हजार सालों में ही हलकी त्वचा से जुड़े कई वैरिएंट्स बढ़े. टीबी, प्लेग, एचआईवी जैसी बीमारियों से जुड़े जीन बदले. कुछ वैरिएंट्स रोलरकोस्टर की तरह ऊपरनीचे हुए.

इस नई शोध से पता चलता है कि एवोलुशन कभी रुका ही नहीं, यह आज भी जारी है. बीमारियां, जीवनशैली और पर्यावरण हमारे जीनों को आज भी आकार दे रहे हैं. डेटा की भारी मात्रा, 18,000 साल का स्पैन और नए कंप्यूटेशनल मेथड ने उन बारीक सिग्नल्स को पकड़ लिया जो पहले ड्रिफ्ट या माइग्रेशन से छिप जाते थे.

हालांकि, यह अध्ययन वेस्ट यूरेशिया के जिनोम सैंपल्स पर हुए शोध का नतीजा है. एशिया, अफ्रीका सहित दुनिया के बाकी हिस्सों पर अलग डेटा की जरूरत है. इस शोध के बारे में कुछ वैज्ञानिक जटिल ट्रेट्स यानी व्यवहार और बुद्धि पर सलैक्शन के दावों को ले कर अभी संदेह में हैं, फिर भी इतना तो तय है कि इंसानी विकास थमा नहीं है. हमारे डीएनए में अभी भी एवोलुशन का लाइव अपडेट चल रहा है. Short Hindi Stories

लेखक – पूर्ति खरे

 

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