Hindi Story: सुबह से प्रभा किचन में व्यस्त थी. आज उस के पति डा. प्रेम को सरकारी सेवा में पूरे 10 वर्ष हो गए थे. इसी खुशी में प्रभा ने विशेष लंच का इंतजाम किया था. बाहर का कोई मेहमान इस आयोजन में शामिल नहीं था. घर के सारे सदस्यों के लिए सब की पसंद के व्यंजन बनाए थे प्रभा ने. अम्मां की पसंद का राजमा, बाबूजी के लिए भरवां बैगन, प्रेम के लिए दमआलू. बडे़ देवर को लौकी के कोफ्ते पसंद थे तो छोटे को छोले. बच्चों के लिए स्वीट डिश बनी हुई थी और अपने लिए पुलाव. सब से छोटी ननद को आलू के परांठे बहुत प्रिय थे. इतना सारा इंतजाम करने में उसे काफी समय लग गया. डेढ़ बजे घर के सारे सदस्य इकट्ठे हो गए.
मेज सजी देख कर शुभम बोला, ‘‘वाह भाभी, मजा आ गया आज तो. कोई खास बात है क्या?’’
‘‘खास बात ही तो है. इस माह से एक और इनक्रीमेंट जो मिलने वाला है,’’ डा. प्रेम मजाक के लहजे में बोले.
‘‘अच्छा, तो आज भाई साहब की नौकरी का जन्मदिन है,’’ विवेक की बात सुन कर सब खिलखिला उठे.
‘‘चलो भई, खाना शुरू करो. यों ही ढंके हुए डोंगों की खुशबू से पेट भरने का इरादा है क्या?’’ बाबूजी बोले.
‘‘मम्मी आती ही होंगी. तभी खाने की शुरुआत होगी. ये लो, वह आ भी गईं शर्मा आंटी के घर से,’’ लता बोली.
अम्मां के बैठते ही सब ने खाना निकालना शुरू किया. पहले भरवां बैगन के डोंगे का ढक्कन उठा कर वह बोलीं, ‘‘यह क्या, प्रभा, महीने भर का तेल आज के ही खाने में डाल दिया है तुम ने. कितनी बार कहा है, किफायत से चला करो पर तुम्हारी फुजूलखर्ची की आदत गई नहीं.’’
अम्मां की बात से प्रभा का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. उसे उदास देख कर शुभम बोला, ‘‘क्या मम्मी, कभी तोभाभी के खाने की तारीफ कर दिया करो. कितनी मेहनत की है उन्होंने आज के लंच के लिए.’’
‘‘तू चुप कर. बड़ा आया भाभी का हिमायती. पूरे महीने का खर्च तो मुझे ही चलाना पड़ता है. इतने सारे व्यंजन बनाने की क्या जरूरत थी.’’
‘‘हमें कौन सी रुपयों की कमी है, मम्मी. बड़े भैया डाक्टर हैं, शुभम इंजीनियर और मैं एम.बी.ए. कर के कहीं अच्छी नौकरी कर ही लूंगा. बाबूजी को भी अच्छी पेंशन मिलती है,’’ विवेक बोला.
‘‘जिन्हें रुपयों की कमी होती है वे ही किफायत करते हैं क्या? और लोग नहीं करते? आड़े वक्त पर रुपए ही काम आते हैं, समझे,’’ चंदा देवी बोलीं.
चंदा देवी की बातों से खाने का मजा किरकिरा हो गया था. प्रभा की भावनाओं की कद्र करते हुए सब उस की तारीफ कर रहे थे. यह सब सुन कर चंदा देवी की भौंहें और तन गई थीं. वह चुपचाप खाना खा कर उठ गईं. बड़ा बेटा मां को मनाते हुए बोला, ‘‘मां, नाराज हो गईं. मुझे बधाई तो दे दो. आज तुम्हारे बेटे की ज्वाइनिंग की तारीख है. तभी तो प्रभा ने थोड़ा बजट बढ़ा दिया.’’
‘‘बहू का पक्ष लेने आया होगा तू यहां. कहे देती हूं, उसे समझा दे कि मां को फुजूलखर्ची कतई पसंद नहीं है.’’
‘‘कह दूंगा. अब तो नाराजगी छोड़ दो,’’ प्रेम बोला.
बेटे के मनुहार से चंदा देवी थोड़ी देर में सामान्य हो गईं. अभी प्रेम के लिए प्रभा को मनाना बाकी था. किचन का काम निबटा कर वह भी बेडरूम में उसी का इंतजार कर रही थी.
कमरे में आ कर प्रभा को समझाते हुए वह बोले, ‘‘मां की बात का बुरा नहीं मानते. वह हमारी भलाई के लिए ही तो कहती हैं.’’
‘‘हर काम में मीनमेख और टोकाटाकी मुझ से सहन नहीं होती. 6 साल हो गए मुझे इस घर में आए हुए. 2 बच्चों की मां हूं मैं. मुझे क्या इस घर की फ्रिक नहीं है. सब की इच्छा का ध्यान रखो तब भी कुछ न कुछ सुनना पड़ता है,’’ प्रभा बोली.
‘‘तुम्हारी सहनशीलता की तो सब तारीफ करते हैं.’’
‘‘मांजी तो नहीं करतीं न. अच्छा खाना, अच्छा पहनना कुछ अच्छा नहीं लगता उन्हें. हमारे भी तो यही दिन हैं ओढ़नेखाने के. बाकी शौक क्या बुढ़ापे में पूरे करेंगे?’’
‘‘तुम बेकार में मां की बातों को गंभीरता से ले रही हो. हमें यहां तक पहुंचाने में बहुत संघर्ष और त्याग किया है उन्होंने. तभी हम यहां तक पहुंच सके हैं. यह बात तुम्हें भी याद रखनी चाहिए.’’
‘‘यही सब सोच कर तो मैं चुप रह जाती हूं, जवाब नहीं देती. एक मेरा मुंह तो वह बंद करवा देंगी, कल शुभम और विवेक की शादी होगी. उन्हें यही आदत पड़ी रहेगी तो उन की बीवियां तो चुप नहीं बैठेंगी. समय के साथ मांजी को भी तो समझौता कर लेना चाहिए. यह बात आप भी तो उन्हें समझा सकते हैं.’’
‘‘मां का बदलना आसान काम नहीं है. शुभम और विवेक की होने वाली बीवियों की ंिचंता तुम अभी से क्यों कर रही हो. जो होगा देखा जाएगा,’’ प्रेम ने कहा. पति की प्यार और समझदारी की बातें प्रभा की नाराजगी आसानी से दूर कर देतीं. वह खुद भी मांजी की जीतोड़ मेहनत से बने इस परिवार को तोड़ना नहीं चाहती थी. यही सोच कर उस ने कभी पति पर इस शहर को छोड़ कर दूसरे शहर ट्रांसफर के लिए जोर नहीं डाला.
2 साल के अंदर शुभम का रिश्ता तय हो गया. पूरे रस्मोरिवाज के साथ उषा इस घर में मंझली बहू बन कर आ गई. चंदा देवी दूसरी बहू के आ जाने से बहुत खुश थीं. पहली बहू प्रभा से उषा अधिक सुंदर भी थी और अमीर भी. दहेज में भी ढेर सारा सामान लाई थी. बढ़ते लोगों की आवश्यकता के अनुरूप घर छोटा पड़ने लगा था. तभी प्रमोशन के साथ प्रेम का ट्रांसफर दिल्ली हो गया. प्रभा ने राहत की सांस ली. ‘यह तो अच्छा हुआ उषा के आने के बाद इन का तबादला हुआ, नहीं तो अम्मां इस के लिए भी मुझे ही दोषी मानतीं और दिनरात ताने सुनातीं,’ उस ने सोचा.
शीघ्र ही परिवार से विदा ले कर डा. प्रेम पत्नी एवं बच्चों सहित दिल्ली के सरकारी आवास में आ गए. घर से चलते हुए चंदा देवी ने उन्हें ढेर सारी नसीहतें दे डालीं, ‘‘बेटा, नए शहर में ठीक से रहना. बहुत बड़ी जगह है दिल्ली. घूमनेफिरने, सैरसपाटे में मगन मत रहना. बच्चों पर भी पूरा ध्यान देना. उतने ही पैर पसारना जितनी बड़ी चादर हो. जब भी मौका मिले हम बूढ़ों की भी कुशलखबर लेते रहना.’’
आशीर्वाद के साथ भरी आंखों से विदा किया चंदा देवी ने अपने बड़े बेटे के परिवार को. उन के दूर जाने का सभी को दुख हो रहा था. उषा ने जल्दी ही प्रभा की कमी को पूरा कर दिया और बड़ी कुशलता से घर चलाने लगी. प्रभा के चले जाने से अब मां के ध्यान का केंद्र उषा थी. कहीं उस से कोई भूल हो जाती तो वह कहने से न चूकतीं.
उषा दबे स्वर में शुभम से इस की शिकायत करती तो वह कहता, ‘‘तुम इस घर की दूसरी बहू हो. प्रभा भाभी को देखो, पूरे 8 वर्ष रहीं इस घर में पर कभी मम्मी की किसी बात का बुरा मान कर जबान नहीं खोली उन के सामने. तुम्हें भी उसी समझदारी के साथ अपने फर्ज निभाने हैं. इसी में हम सब की भलाई है.’’
‘‘मैं ने फर्ज निभाने से कहां मना किया है पर मांजी की रोकटोक मुझे अच्छी नहीं लगती. हर काम में कमी ही निकालती रहती हैं. और तो और किचन का एकएक डब्बा खोल कर सामान की जांच करती हैं.’’
‘‘दरअसल, मम्मी बहुत गरीब घर की बहू बन कर आई थीं. पापा तो सिर्र्फ नौकरी करना जानते थे. गृहस्थी का सारा बोझ मम्मी पर था. छोटीछोटी बचतें कर के उन्होंने अपने घर की सारी जिम्मेदारियां निभाईं और हमें भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाया. उन की वे आदतें आज भी वैसी ही बनी हुई हैं. इस का बुरा मत माना करो. अब तो वे आदतें छूटने से रहीं. तुम्हें ही उन के साथ ऐडजस्ट करना होगा, उषा.’’
‘‘किचन की तो छोड़ो, वह तो जब तब बेडरूम में घुस कर अलमारी भी देखने लगती हैं. मुझे बड़ा अजीब सा लगता है. आखिर, कुछ तो प्राइवेसी होनी चाहिए.’’
‘‘धीरेधीरे तुम्हें सब बातों की आदत पड़ जाएगी. मम्मी दिल से बुरी नहीं हैं पर आदत से मजबूर हैं. हो सके तो उन की बातों को नजरअंदाज कर दिया करो,’’ शुभम बोला.
शुभम सोचने लगा, ‘भाभी इस घर में इतने वर्ष रहीं, पर हम ने कभी उन की समस्याओं को जानने की कोशिश तक न की. प्रेम भैया से ही कह कर वह मन हलका कर लिया करती होंगी. औरतों को कैसीकैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है इस का एहसास मुझे अब हो रहा है.’
उषा ने भी प्रभा के पदचिह्नों पर चल कर चंदा देवी से तालमेल बिठाने की जीतोड़ कोशिश की. काफी हद तक वह इस में सफल भी हो गई पर जबतब उन का व्यवहार उस के हौसलों को पस्त कर देता. ऐसे में शुभम का मूक बन कर सबकुछ चुपचाप सहन कर लेना उसे बड़ा अखरता. उम्र के साथ चंदा देवी का स्वभाव और भी चिड़चिड़ा होता जा रहा था. महीने भर के बजट में जरा सा भी हेरफेर हो जाता तो वह तूफान खड़ा कर देतीं. शुभम छिप कर बढ़े हुए बजट की क्षतिपूर्ति कर देता था.
एक दिन उस के बैग में राशन का सामान देख कर वह फट पड़ीं, ‘‘बहू की खातिर अब मां से भी छिपाने लगा है तू बातों को. तुम्हारे भले के लिए ही तो टोकाटाकी करती हूं. क्या यह सबकुछ मैं छाती पर रख कर ले जाऊंगी. तुम लोगों के ही तो काम आएंगे आज के बचाए हुए चार पैसे.’’
‘‘मम्मी, आप गलत समझ रही हैं. मैं ने तो आप को बेवजह तनाव से बचाने के लिए यह रास्ता अपनाया था,’’ शुभम बोला.
‘‘चुप, जोरू का गुलाम. उस ने कहा और तू ने कर दिया. मां का खयाल नहीं आया तुझे. समझाने की बात पर यह रास्ता निकाला तू ने. ठीक है, आज से मैं तुझे कुछ नहीं कहूंगी.’’
अपने वादे को निभाने के लिए चंदा देवी बेटेबहू से तो सीधे कुछ न कहतीं, पर दिन भर बाबूजी को ताने सुनाती रहतीं. बाबूजी तो संत स्वभाव के थे. वह घर के पचड़ों में कभी नहीं पड़े थे. चंदा देवी के आगे उन की कभी एक न चली थी, सो उन्होंने इस विषय में सोचना ही छोड़ दिया था. रातदिन बाबूजी से मम्मी का यह व्यवहार देख शुभम से न रहा गया. मां के पैर पकड़ते हुए बोला, ‘‘अब गुस्सा थूक भी दो, मम्मी. कसम खा कर कहता हूं, ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा. तुम्हें हमें समझाने का पूरा हक है.’’
बेटे के मनाने पर चंदा देवी ने हठ छोड़ दिया और उसी पल से उन की पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई. अब वह शुभम के वादे को परखने के लिए उन के बेडरूम में भी ताकाझांकी करने लगीं. उषा के लिए ये सब असहनीय था, पर वह मजबूर थी. कभीकभार शौक पूरा करने के लिए वह रात को बंद कमरे में झीनी नाइटी पहन लेती थी. एक दिन उस पर नजर पड़ जाने से मांजी ने जिन शब्दों का प्रयोग किया उसे सुन कर उषा शरम से पानीपानी हो गई.
चंदा देवी अपनी बेटी लता पर जान छिड़कती थीं. उस का हर शौक पूरा करना अपना फर्ज समझतीं. जिन परिधानों को बंद कमरे में भी पहने की बहुओं को छूट नहीं थी, उन्हें वह खुलेआम पहन कर घूमती. घर पर सभी को बहूबेटियों का यह भेद फूटी आंख न सुहाता पर अम्मां के स्वभाव को देखते हुए सब मुंह बंद ही रखते.
अपने जीवन के किसी अभाव की बेटी पर उन्होंने छाया भी नहीं पड़ने दी थी. पराई अमानत मानते हुए वह उस की हर छोटीबड़ी इच्छा का सम्मान करतीं. ज्यादा लाड़प्यार के कारण वह कुछ ज्यादा ही नाजुक हो गई थी. 3 भाइयों की 1 बहन होना कोई कम गर्व की बात तो नहीं थी. चंदा देवी का कड़ा रुख बेटी के सामने एकदम मुलायम हो जाता. मांबेटी के संबंधों को देख कर उषा कभी सोचती, ‘मांजी हमें भी अपनी बेटी की तरह क्यों नहीं मानती हैं? बेटी तो बेटी होती है. सभी को एक दिन पराया होना पड़ता है. हम से जिन बातों की उम्मीद वह करती हैं उस का एक अंश भी तो उन्होंने अपनी बेटी को नहीं सिखाया. कहीं लता को भी मांजी जैसी सास मिल गई तो.’
मन में आए गलत विचार को उषा ने तुरंत झटक दिया और उस के खुशहाल जीवन की कामना करने लगी. लता कितनी ही मां के मुंह लगी क्यों न थी फिर भी भैयाभाभी का पूरा अदब करती. कभीकभी मांजी की नजर बचा कर किचन में आ जाती और भाभी का हाथ बंटाती.
बी.ए. पास करते ही लता के लिए रिश्ते आने लगे. काफी छानबीन के बाद सुरेश से उस का रिश्ता अम्मां को जंच गया. सुरेश विदेश में साफ्टवेयर इंजीनियर था. उस का परिवार दिल्ली में रहता था. मां के कहने पर प्रेम और प्रभा उस की ससुराल देख कर आ गए थे. सबकुछ ठीक था. बड़ी धूमधाम से लता का विवाह हो गया. शादी के 1 हफ्ते बाद ही वह पति के साथ अमेरिका चली गई.
बेटी की जिम्मेदारी निभा कर चंदा देवी बहुत खुश थीं. जबतब बेटी की जुदाई उन्हें परेशान भी करती. ‘अपने देश बेटी दी होती तो महीने दो महीने में मम्मी से मिलने तो आ ही जाती. सात समुंदर पार से साल में एक बार भी आ पाएगी या नहीं.’ सोच कर चंदा देवी उदास हो जातीं. फोन से बात कर के वह लता की कुशलक्षेम पूछ लेतीं.
4 महीने के बाद अचानक लता बिना किसी को कुछ बताए अमेरिका से वापस मायके आ गई तो चंदा देवी भौचक रह गईं. इन 4 महीनों में ही वह क्या से क्या हो गई थी. चेहरे पर रौनक का नामोनिशान नहीं था. आंखें अंदर धंस गई थीं. मांबाबूजी से लिपट कर वह बहुत रोई. लाख पूछने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया.
लता गर्भवती थी. ऐसी हालत में उस पर किसी बात का जोर डालना उस के लिए खतरनाक हो सकता था, यही सोच कर सब ने चुप्पी साध ली और उस के सामान्य होने का इंतजार करने लगे. सुरेश से फोन पर बात करने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया. बस, यही कहा, लता की जिद शुरू से ही हिंदुस्तान जाने की थी. उस का घर से दूर यहां जरा भी मन नहीं लगा.
उषा ने लता की डिलीवरी तक उस की बहुत सेवा की. लाड़प्यार में पलीबढ़ी ननद की यह हालत देख कर उसे बड़ा दुख होता. उषा हर प्रकार से उस का दिल बहलाने की कोशिश करती, पर लता एक खोखली हंसी हंस कर रह जाती. लता के दुख को सभी महसूस कर रहे थे. यह एहसास चंदा देवी को कहीं अंदर ही अंदर सुकून दे रहा था. उन की सलाह से पहले ही उषा और शुभम लता की हर जरूरत को पूरा कर देते. Hindi Story





