आशाजनक अंक
Indian society: अप्रैल (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘आशा भोसले : सुरों से बंधी एक बागी आवाज’ के माध्यम से भारतीय सिनेमा की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोसले को करीब से जानने का मौका मिला. लेख के माध्यम से आशा के जीवन से जुड़ी कई ऐसी बातें ज्ञात हुईं जो सिनेप्रेमियों को पहले ज्ञात नहीं थीं.
आशा भोसले कर्णप्रिय आवाज की मल्लिका होने के साथसाथ अपने ग्लैमरस व आइकौनिक अंदाज के लिए भी फिल्म इंडस्ट्रीज में जानी जाती थीं. लता और आशा एक ही परिवार से ताल्लुक रखने के बाद भी गायनशैली की अलगअलग विधा में अपनाअपना महत्त्व रखती थीं. नब्बे के दशक में पश्चिमी सभ्यता की तर्ज पर गाने गा कर आशा गायकों की श्रेणी में एक अलग स्थान पर काबिज हो गई थीं. आशा भोसले जैसी गायिका का अधिकतर जीवन एकाकीपन में गुजरा. यह जान कर थोड़ा स्तब्ध हूं.
इस के अलावा इसी अंक में प्रकाशित दूसरा लेख ‘युवाओं को भा रहीं बड़ी उम्र की महिलाएं’ महिलाओं के मनमुताबिक जिंदगी जीने के अधिकार की पैरवी करता हुआ महसूस हुआ. हमेशा से पुरुषप्रधान समाज ने खुद को किसी भी उम्र में जिंदगी का मजा लेने के लिए स्वतंत्र रखा जबकि औरतों को बेसिरपैर के रीतिरिवाजों के बंधन में जकड़े रखा ताकि औरत ताउम्र उन के पैरों की जूती बनी रहे. समाज ने कभी नहीं चाहा कि औरत पुरुष की बराबरी करे.
औरत को केवल शारीरिक भोग विलास की वस्तु एवं बच्चा पैदा करने की मशीन तक सीमित रखा गया. रहीसही कसर अनंत पौराणिक कपोलकल्पित कहानियों ने पूरी कर दी, जिन में बड़े सुनियोजित तरीके से स्त्री की औकात पुरुष के पैरों की जूती के समान बताई गई है. औरत या पुरुष सभी को मनमुताबिक जीवन जीने का अधिकार है. हमेशा की तरह अन्य स्थायी स्तंभ भी बेहद पसंद आए. लेखिका – रुचि कश्यप
बच्चों के मुख से
मेरा 7 वर्षीय बेटा प्रांशुल दोपहर में अपनी मिस से पढ़ रहा था. मेरे पति उस दिन घर पर ही थे. उन के सिग्नेचर लेने के लिए उन के औफिस से उन का एक स्टाफ मेंबर आया था. जब वह जाने लगा तो मेरे पति बोले, ‘बौस, चा खेये जा.’ तो वह बैठ गया. उधर प्रांशुल आश्चर्यचकित हो कर अपनी मिस से बोलने लगा, ‘‘मिस, मेरे पापा ही तो बौस (मालिक-1) हैं, फिर उस अंकल को बौस क्यों कह रहे हैं?’’
यह सुन कर उस की मिस, जोकि बंगाली थी, हंसने लगी. हुआ यों कि उस के पापा अपने स्टाफ मेंबर को बोल रहे थे कि, ‘‘बैठो, चाय पी कर जाना.’’ (बौस ‘चा’ खेये जा).
मेरे हाजिरजवाब और तेजतर्रार बेटे ने सोचा कि उस के पापा अपने स्टाफ मेंबर को अपना बौस बोल रहे हैं जबकि यहां ‘बौस’ का मतलब ‘बैठाना’ हुआ. जब उस की टीचर ने हमें बुला कर बताया तो हम भी उस की बालसुलभ जिज्ञासा के कारण हंसे बिना न रह सके. लेखिका – अंजु सिंगडोदिया
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