West Bengal Election: पश्चिम बंगाल में चुनाव के नाम पर जो हुआ वह यह बताता है कि भारत का लोकतंत्र अब अपने आखिरी पायदान पर है. यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि लोकतंत्र में तो वोटर सरकार को चुनता है, पर जब कोई सरकार राज्यों के वोटर को चुनने लग जाए, वह खुद यह तय करने लग जाए कि कौन मत डालेगा और कौन नहीं, तो फिर कौन सा लोकतंत्र बचता है?

एक लड़का परीक्षा में नकल कर के प्रदेश में टौप कर गया. उस ने और उस के जानने वालों ने अखबारनवीसों से कहा, बहुत मेहनत की, सफलता पाने के लिए दिनरात एक कर दिए. पश्चिम बंगाल चुनाव में जो हुआ, वह कुछ ऐसा ही है. दिल्ली, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इसी तर्ज पर भाजपा ने चुनाव जीते. आगे भी इसी तरीके से चुनाव जीते जाएंगे. अनेकानेक तरीकों से वोट चोरी कर के धीरेधीरे क्षेत्रीय पार्टियों को नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा, विपक्ष को बलहीन कर संसद से बाहर खदेड़ दिया जाएगा और फिर बनेगा दक्षिणपंथी विचारधारा का एक चक्रवर्ती सम्राट और पूरे भारत में उस का एकछत्र राज.

ऋग्वेद, यजुर्वेद और बाद में रामायण व महाभारत में अश्वमेघ यज्ञ का वर्णन है. यह यज्ञ राजाओं द्वारा अपनी सार्वभौमिक सत्ता स्थापित कर चक्रवर्ती सम्राट बनने की मंशा से आयोजित किया जाता था. अश्वमेघ यज्ञ के लिए राजा एक सजा हुआ घोड़ा छोड़ता था, घोड़ा छलांगें लगाता एक राज्य से दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से दौड़ता था. घोड़े के पीछे राजा की सेना होती थी. जिनजिन राज्यों में घोड़े के कदम पड़ते थे वे राज्य राजा की अधीनता स्वीकार कर लेते थे. जो अधीनता स्वीकार नहीं करते थे उन से जंग होती थी और उन्हें जबरन राजा के अधीन किया जाता था. इस तरीके से राजसत्ता बढ़ा कर राजा यह दर्शाता था कि वह सब से शक्तिशाली है.

सालभर बाद घोड़ा वापस राजधानी लाया जाता था, तब वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ शुरू होता था. यज्ञ के बाद राजा को चक्रवर्ती सम्राट घोषित कर दिया जाता था. यह धार्मिक अनुष्ठान के लबादे के अंदर राजनीतिक शक्ति हासिल करने का तरीका था. इस यज्ञ में ब्राह्मणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जो राजनीति + धर्म का घालमेल कर विरोध के स्वर को कुचल कर एक ऐसे व्यक्ति को चक्रवर्ती घोषित करते थे जो जनता को धर्म के चाबुक से हांकता रहे.

अश्वमेघ यज्ञ का प्रचलन पौराणिक साहित्य में मिलता है, इतिहासकार उस की पुष्टि नहीं कर सकते. इस के अनुसार, राजा को जमीन और प्रजा का मालिक माना जाता था. वही सर्वशक्तिमान था. उस की तानाशाही लोगों पर चलती थी. अधिकांश देशों में आज जनता का राज यानी लोकतंत्र स्थापित है. इन देशों में जमीन का राजा कौन होगा, यह फैसला जनता करती है.

फिर आज यहां अचानक अश्वमेघ यज्ञ का जिक्र क्यों? दरअसल आजादी के बाद के सात दशकों में भारत एक बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका था, तभी 2014 में दक्षिणपंथी विचारधारा की मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई. कुछ समय तक तो लगा कि जनता की चुनी हुई सरकार जनता के लिए क़ाफीकुछ करने की इच्छा रखती है, मगर धीरेधीरे शासकों को चक्रवर्ती बनने की धुन सवार हुई.

ब्राह्मणों ने सोचा वैदिक काल को वापस लाने का यह सही समय है, लोगों से उन की अपेक्षाएं और सवाल छीन कर उन्हें धर्म की जंजीरों में जकड़ा जाए. लिहाजा, उन्होंने अपने करतब शुरू कर दिए.

अश्वमेघ यज्ञ की तैयारियां होने लगीं और घोड़ा दौड़ाया गया. कलियुग में या कहें कि मोदीयुग में इस घोड़े का नाम है- चुनाव आयोग. इस को दौड़ादौड़ा कर एकएक कर राज्य हथियाए जाने लगे. फर्क सिर्फ इतना है कि तब घोड़े के पीछे सेना चलती थी और आज चुनावी मशीनरी, प्रचारतंत्र, जांच एजेंसियां और संसाधनों की अपार शक्ति चलती दिखाई देती है. चक्रवर्ती बनने की लोलुपता में राजा ने तमाम सरकारी मशीनरी और चुनाव आयोग को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और धीरेधीरे 17 राज्यों पर अपना आधिपत्य जमा लिया.

मगर चक्रवर्ती बनने की राह में जो बड़ा रोड़ा था, वह था पश्चिम बंगाल, दुर्गा-काली का बंगाल, जहां की कमान 15 साल से एक महिला ममता बनर्जी के हाथ में थी. इस राज्य को फतह करने के लिए चुनाव आयोग ने जो किया उसे राजनीति के इतिहास में सब से काले अध्याय के रूप में देखा जाएगा. बंगाल में चुनाव के नाम पर जो हुआ वह यह बताता है कि भारत का लोकतंत्र अब अपने आखिरी पायदान पर है. यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि लोकतंत्र में तो वोटर सरकार को चुनता है, पर जब कोई सरकार राज्यों के वोटर को चुनने लग जाए, वह खुद यह तय करने लग जाए कि कौन मत डालेगा और कौन नहीं, तो फिर कौन सा लोकतंत्र बचता है?

पश्चिम बंगाल में स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन (एसआईआर) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए मोदी सरकार ने अपने लिए वोटर चुने. जो भाजपा को वोट नहीं डालते उन्हें वोटिंग लिस्ट से बाहर कर दिया गया. चुनाव से पहले एसआईआर के जरिए राज्य की मतदाता सूची से 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए. वोटर लिस्ट से नाम हटाने का काम मुसलिम मतदाताओं को निशाना बना कर किया गया क्योंकि मुसलिम मतदाताओं को ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का बेस वोटर माना जाता है. पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी मुसलिम मतदाता हैं जो 2011 से ममता बनर्जी का समर्थन करते रहे हैं.

इस के बाद अन्य राज्यों में जा बसे पश्चिम बंगाल के उन हजारों लोगों के नाम वोटर लिस्ट में फौर्म 6 के जरिए जोड़े गए जो भाजपा के पक्ष में वोट डालते हैं. अवैध तरीके से एकएक दिन में 30-30 हजार फौर्म जमा हुए. कई जिलों में एक ही दिन में हजारोंहजार आवेदन जमा होने की खबरें सामने आईं. अनेक आवेदनों में पते संदिग्ध थे, दस्तावेज अधूरे थे और बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम जोड़े गए थे जो वास्तव में राज्य में निवास ही नहीं करते थे. यह इसलिए किया गया क्योंकि वे भाजपा के संभावित समर्थक माने जा रहे थे.

यह मामला इतना गंभीर और राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो गया कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं. उन्होंने चुनाव आयोग की स्पैशल इंटैंसिव रिविजन (एसआईआर) प्रक्रिया को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए चुनौती दी. अदालत में उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रक्रिया के जरिए पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि संदिग्ध नाम जोड़े जा रहे हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की तरह व्यवहार करने के बजाय केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि यदि मतदाता सूची ही प्रभावित हो जाए तो चुनाव की निष्पक्षता का पूरा आधार समाप्त हो जाता है.

विपक्षी दलों ने इसे ‘लोकतंत्र की आत्मा पर हमला’ बताया. मगर आश्चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया. मोदी सरकार के आगे कोर्ट ने मुख्यमंत्री की एक न सुनी. कोर्ट ने कहा- “इस बार वोट नहीं डाल पाए, कोई बात नहीं, अगली बार वोट डाल देना.” मानो, वोटिंग कोई वैकल्पिक खेल हो.

इस तरह चुनाव आयोग और न्यायालय पर दबाव बनाता हुआ शासकों का यह सम्राट खुद को चक्रवर्ती बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों – प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में खुल कर किया गया. पश्चिम बंगाल में शारदा चिट फंड घोटाला, शिक्षक भरती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी का आरोप लगा कर तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेताओं और सरकारी अधिकारियों को परेशान किया गया. बहुतों को गिरफ्तार भी किया गया. पार्थ चटर्जी (पूर्व मंत्री), उन की करीबी अर्पिता मुखर्जी, अनुब्रत मंडल जैसे टीएमसी के प्रभावशाली नेता सीबीआई की हिट लिस्ट में रहे. जैसेजैसे चुनाव करीब आए, कार्रवाई और तेज हो गई. जो नेता डर कर भाजपा में शामिल हो गए उन के खिलाफ कार्रवाइयां समाप्त हो गईं.

तमाम हथकंडे अपना कर भाजपा ने अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी चुनाव ‘कौन्कर’ कर लिया है. अब कुछ समय तक मणिपुर की तरह बंगाल भी जल सकता है. डर और खौफ कायम करने के बाद धर्म का झंडा ऊंचा किया जाएगा. सब को उस के आगे नतमस्तक होना होगा. कोई सवाल नहीं करेगा. विकास की बात नहीं होगी. शिक्षा-रोजगार की बात नहीं होगी. न्याय और समानता की बात नहीं होगी. बस, धर्म और मंदिरमसजिद की बात होगी.

ऐसे हथकंडों से लड़ा गया चुनाव और उस के बाद तैयार किया जा रहा माहौल केवल सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम है. जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को विरोधी नहीं बल्कि शत्रु की तरह देखा जाए, तब लोकतांत्रिक संस्कृति धीरेधीरे भय और अधीनता की संस्कृति में बदल जाती है. तानाशाही का उदय होता है. जनता के भीतर यह संदेश बैठाना कि सत्ता अजेय है, संस्थाएं निष्प्रभावी हैं और प्रतिरोध व्यर्थ है. लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में चल रही दक्षिणपंथी चाल को यदि अब भी समझ जाएं तो लोकतंत्र को बचाया जा सकता है.

इतिहास गवाह है कि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव परिणामों से नहीं, बल्कि चुनाव के बाद के वातावरण से होती है. क्या नागरिक बिना डर के अपनी बात कह सकते हैं, क्या विपक्ष सुरक्षित है, क्या कानून सब पर समान रूप से लागू है और क्या राज्य जनता के अधिकारों की रक्षा कर रहा है? लोकतंत्र में ये बातें महत्त्वपूर्ण हैं. लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि इस भरोसे से चलता है कि चुनाव निष्पक्ष होंगे, संस्थाएं स्वतंत्र होंगी और सत्ता बदलने का रास्ता खुला रहेगा.

जब मैदान बराबरी का न रहे, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां, मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाएं सत्ता के पक्ष में झुक जाएं और जनता से अपना मुखिया चुनने का अधिकार छीन लिया जाए तो ‘लोकतंत्र‘ कपोल-कथा से ज्यादा कुछ नहीं. इसे चुनाव जीतना नहीं बल्कि चुनाव कौन्कर करना कहते हैं, जो भाजपा ने किया और आगे अब वह उन राज्यों में करेगी जहां अन्य राजनीतिक पार्टियों की सरकारें हैं. West Bengal Election

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