Army Story: कैप्टन कर्नल नेहरा साहब मुझे डिपो के अफसर मेस में मिले. मैं पीटी ड्रैस में उस समय नाश्ता कर रहा था. वे भी नाश्ता करने आए थे. मैं उन के अधीन हवलदार रहते हुए एक यूनिट में काम कर चुका था. शायद उन्होंने मु?ो अब भी हवलदार समझ था, इसीलिए उन की टोन में रूखापन था. नाश्ता करते हुए मैं ने उन्हें कुछ भी जवाब देना श्रेष्ठ नहीं समझ . अफसर मेस का यही नियम था. नाश्ता, लंच या डिनर करते चुप रहा जाए. कोई बड़ा अफसर विजिट के लिए आए तो भी उठना नहीं है. अगर कुछ पूछा जाता है तो बैठेबैठे ही उत्तर देना है. यह नियम हरेक पर लागू है. अगर कोई उठने भी लगता है तो उसे मना कर दिया जाता है.
‘‘तुम यहां कैसे? तुम्हें अफसर मेस में नाश्ता करने की परमिशन किस ने दी?’’ उन की आवाज में गुस्सा था, माथे पर बल पड़े हुए थे.
मैं ने मेस के नियम के रहते फिर भी उन्हें जवाब नहीं दिया. केवल मुंह पर उंगली रख कर चुप रहने का इशारा किया. मेरे ऐसा करने पर वे और गुस्सा हो गए. उन्होंने मेस हवलदार को जोर से आवाज लगाई. वह ‘सर’ कह कर भागा हुआ आया. कर्नल साहब ने गुस्से की टोन में ही मेरी ओर इशारा करते हुए पूछा, ‘‘ये श्रीमान यहां कैसे नाश्ता कर रहे हैं? यहां अलाऊ नहीं है.’’
‘‘क्यों सर, ये कैप्टन साहनी साहब हैं, नई पोस्ंिटग पर आए हैं.’’
वे बहुत समय तक मुझे हैरानी से देखते रहे. मैं नाश्ता कर चुका था. नाश्ता करते रहने पर भी उन्होंने मेरी ओर प्रश्न उछाला था, ‘‘आप अफसर कब और
कैसे बने?’’
वे ‘तुम’ से ‘आप’ पर आ गए थे. वे एक अफसर से रूखे तरीके से नहीं बोल सकते थे. मैं उन के सामने बैठ गया. मेस बौय मेरे लिए चाय रख गया था. मैं ने चाय की चुस्कियां लेते हुए बड़े सहज भाव से कहा, ‘‘सर, मैं अफसर तब बना जब हमारे विभाग ने इंवेट्री कंट्रोल अफसर की वेकैंसी निकाली.’’
‘‘फिर भी आप को अफसर नहीं बनना चाहिए था.’’
‘‘क्यों सर, मैं अफसर फैमिली से संबंध रखता था. आप जानते थे कि मेरे बड़े भाई हमारे विभाग के कर्नल थे. अब वे ब्रिगेडियर बन कर कमांड हैडक्वार्टर में बैठे हैं. आप उन के अंडर में काम भी कर चुके हैं. उन्होंने आप को बताया भी था लेकिन फिर भी आप ने मुझे हर तरह से तंग किया. आप यह बरदाश्त नहीं कर सकते थे कि एक हवलदार आप की तरह स्कूटर पर आए. आप ने मुझ से पूछा भी था, ‘इतनी कम सैलरी में तुम अपना स्टैंडर्ड कैसे मेनटेन करते हो?’
उस समय वे औफिस में बैठे सिगरेट पी रहे थे. मैं ने कहा था, ‘सर, मुझे किसी तरह की आदत नहीं है. मैं सिगरेट, शराब नहीं पीता हूं. मीटअंडा भी नहीं खाता. मेरी फ्री रम भी मेरी स्टोरकीपर प्लाटून के जवान पी जाते हैं. बड़ी आसानी से मैं अपना स्टैंडर्ड मेनटेन कर पाता हूं. मेरा क्वार्टर इतने क्वार्टरों में फर्स्ट क्यों आया था? मेरी पत्नी भी बहुत अच्छे घर से आई थी. अपने साथ ढेरों दहेज लाई थी. उसे पता था कि घर को कैसे व्यवस्थित करना है. इंस्पैक्शन करने आए कमांडैंट साहब की पत्नी और अन्य अफसर उस के रखरखाव से आश्चर्यचकित थे. उन्होंने मेरे रैंक को नहीं देखा था. उन्होंने हमारे साथ बैठ कर चाय भी पी. कमांडैंट साहब ने अपने सैनिक सम्मेलन में भी यह बात कही थी कि अगर किसी को क्वार्टर का रखरखाव और सुंदरता देखनी है तो हवलदार साहनी का क्वार्टर देखें.’
‘‘आप को लगा था, मैं आप पर व्यंग्य कस रहा हूं. आप ने मुझे 7 दिन का पिट्ठू लगा कर काम करने की सजा दी थी. आप हमेशा पढे़लिखे जवानों को हेय समझ ते रहे हैं. सर, ऐसी मानसिकता आज भी मैं ने आप के चेहरे पर मुझे नाश्ता करते हुए दिखी थी.
‘‘सर, मैं आप से कहीं ज्यादा पढ़ालिखा था. किसी कारण मैं जवान में भरती हुआ था. यह तो वक्त खराब था मेरा कि मु?ो आप के अंडर में काम करना पड़ा. मैं ने आप के साथ काम करते हुए भी शौर्ट सर्विस कमीशन के लिए अप्लाई किया था लेकिन आप ने मुझे आगे नहीं जाने दिया था. बाधक थी आप की सोच, जवानों की योग्यता को नकारने की वृत्ति. यह भी कि आप औल इंडिया कंपीटिशन बीट कर के अफसर बने हैं.
‘‘ऐसी मानसिकता मैं ने आईएमए की ट्रेनिंग के दौरान भी देखी थी. खुद को जवान से बने अफसर से सुपीरियर समझना. ऐसी सोच सीधे आए अफसरों के मन में हमेशा रही है लेकिन ट्रेनिंग में सभी कैडेट ऐसे नहीं थे. वे इस बात को समझते थे कि किसी का भी यहां तक पहुंचना आसान नहीं है.’’
अभीअभी नाश्ते के लिए आ कर बैठे मेजर सतनाम सिंह साहब ने मेरी बात सुन ली थी. वे मेरे रूममेट भी थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ कैप्टन साहनी?’’
‘‘कुछ नहीं, सर. कर्नल साहब मुझे यहां नाश्ता करते देख कर गुस्सा हो गए थे. मैं इन के अंडर में हवलदार रहते हुए कार्य कर चुका हूं. ये मुझे आज भी हवलदार समझ रहे थे.’’
मेजर सतनाम सिंह साहब ने कर्नल साहब को गहरी नजरों से देखा और कहा, ‘‘सर, आप को अपनी सोच बदलने की जरूरत है. क्या आप समझते हैं, कैप्टन साहनी को यहां तक पहुंचने में कम मुश्किलें आई होंगी? पहले कमांडिंग अफसर, फिर ब्रिगेड कमांडर, उस के बाद सब-एरिया कमांडर और अंत में कमांड हैडक्वार्रट में जनरल साहब ने इन का सख्त इंटरव्यू लिया होगा. तब इन्हें इन की योग्यता के कारण इंवेंट्री कंट्रोल अफसर के लिए रिक्मेंड किया होगा और अंत में एसएसबी बोर्ड जो सेलैक्शन के समय किसी की भी नहीं सुनता है चाहे वह सेना के किसी बड़े अफसर का भाई या बेटा ही क्यों न हो?
‘‘थोड़ीबहुत सिफारिश भी तभी चलती है जब इंटरव्यू देने वाले में दम हो. वे उस समय एक साधारण अफसर को नहीं, बल्कि एक सेनाप्रमुख का सेलैक्शन कर रहे होते हैं. कल को इन्हीं में से किसी को सेनाप्रमुख बनना होता है. आप भी शायद पहली बार एसएसबी क्लियर नहीं कर पाए होंगे.’’
कर्नल नेहरा कुछ नहीं बोले थे. वे उसी तरह गुस्से में नाश्ता कर के चले गए थे.
मैं ने मेजर सतनाम सिंह साहब से कहा, ‘‘सर, मैं अपने काम में बिलकुल परफैक्ट था. यह कर्नल साहब बहुत अच्छी तरह जानते थे. उस समय ये कैप्टन थे. इन्होंने मुझे हर तरह से चैक करवाया था. यहां तक कि सौलवेज डिपो को जाने वाले पुराने स्टोर को भी चैक करवाया. कुछ नहीं मिला था. यही नहीं, सर, मैं पोस्टिंग जा रहा था. ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन भी आ गया था. मैं यूनिट की नफरी से आउट था. फिर भी इन्होंने एक सूबेदार साहब को मेरा सामान चैक करने के लिए स्टेशन भेजा था कि कहीं मैं कुछ चोरी कर के तो नहीं ले जा रहा हूं.
‘‘मैं ने चैक करवाने से इनकार किया था. चैक करने आए सूबेदार साहब ने इन्हें बताया तो इन्होंने स्टेशन पर तैनात मिलिट्री पुलिस को अप्रोच करने के लिए कहा. मिलिट्री पुलिस के अधिकारी ने सूबेदार साहब से कहा कि आप यूनिट से चैक करने का लैटर ले कर आएं. तब हम चैक करेंगे.
‘‘सर, मजे की बात सुनें, सूबेदार साहब यूनिट में वापस गए और लैटर ले कर आए. मिलिट्री पुलिस के अधिकारी ने खुद मेरे सामान को चैक किया. पर्सनल के अतिरिक्त उन्हें वह सामान मिला जो मिलिट्री की ओर से मु?ो अथौराइज था. उन्होंने चैक कर के एक कौपी मुझे दी और एक कौपी सूबेदार साहब को दी. मैं ने अपने भाई ब्रिगेडियर साहब को बताया. उन्होंने कहा, ‘तुम अपनी नई यूनिट पहुंचो, फिर मैं बताता हूं कि क्या करना है.’
‘‘सर, मैं ने इन के विरुद्ध शिकायत करने की ठान ली थी. फिर ब्रिगेडियर साहब ने सम?ाया कि इस समय जबकि इंवेंट्री कंट्रोल अफसर की सारी कार्रवाई हो चुकी है, केवल एसएसबी रह गया है, किसी तरह की कार्रवाई मत करो. मैं भी जान गया था कि एक हवलदार या जूनियर अफसर की कोई नहीं सुनता है. अफसर, अफसर का फेवर करते हैं.’’
थोड़ी देर बाद मैं ने कहा, ‘‘सर, ये ड्राफ्ंिटग में बहुत कमजोर थे. जो क्लर्क सरकारी पत्रों की ड्राफ्ंिटग के लिए तैनात था, वह भी अच्छी ड्राफ्ंिटग नहीं कर पाता था. विशेषकर उन पत्रों की जो फौर्मेशन हैडक्वार्टर में जाने होते थे. मैं ड्राफ्ंिटग कर के देता था. ये पूछते थे, ‘यह ड्राफ्ंिटग किस ने की है, तुम्हारी तो हो नहीं सकती. वह मेरे बारे में बताता था कि मैं ने की है. ये कर्नल साहब मेरी एक गलती निकाल नहीं पाते थे. व्यावहारिक बात तो यह थी कि ये खुद ड्राफ्ंिटग करते. यह मेरे कमांडिंग अफसर भी जानते थे कि ये मुझ से ईर्ष्या रखते हैं.
‘‘सर, इतना सब होने पर भी इन्होंने मेरी गुप्त रिपोर्ट खराब कर दी. मेरे कमांडिंग अफसर साहब ने इन्हें बहुत झड़ा था कि एक ऐसा जवान जो तुम्हारी कुरसी पर बैठने के योग्य है, आप ने उस की रिपोर्ट खराब कर दी है. तब उन के प्रभाव में भी इन्होंने मेरी रिपोर्ट ठीक नहीं की. कमांडिंग साहब ने कहा था कि अगर तुम ठीक नहीं करोगे तो मैं इसे ठीक करूंगा. फाइनल रिपोर्ट मेरी मानी जाएगी. तब भी इन्होंने ठीक नहीं की. मेरे कमांडिंग अफसर साहब ने उसे ठीक कर के भेजा.’’
‘‘लेकिन सारे अफसर ऐसे नहीं हैं, कोई बिरला ही ऐसा होता है जो ऐसी श्रेणी में आता है जिन की कोई गिनती नहीं होती. एक से बढ़ कर एक अच्छे अफसर हैं. वे जवानों के वैलफेयर को सर्वोपरि समझते हैं और मानते हैं,’’ मेजर सतनाम सिंह ने कहा.
‘‘जानता हूं, सर. नहीं तो 13 लाख की विश्व प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ सेना को कमांड करना आसान नहीं होता. मैं तो आप से अपने व्यक्तिगत अनुभव शेयर कर रहा हूं. सभी अनुशासनप्रिय होते हैं. कोई जवान या जूनियर अफसर अनुशासन तोड़ने की हिम्मत नहीं करता है. वे जानते हैं, अगर ऐसा किया तो उन का रिकौर्ड खराब हो सकता है. उन के अगले प्रमोशन में फर्क पड़ सकता है. समय पर प्रमोशन न मिलने पर वे औरों से जूनियर हो जाएंगे. जवानों की ओर से गलती की गुंजाइश न के बराबर रहती है.’’
मैं थोड़ी देर बाद फिर बोला, ‘‘सर, अदर आर्म्स के अफसर हमारे अफसरों से कहीं ज्यादा अच्छे होते हैं. वे हम पर अधिक विश्वास करते हैं, हमारे काम की प्रशंसा करते हैं विशेषकर जब हम वर्कशौप्स में पोस्ट होते हैं. वे हमें मेहमान सम?ाते हैं. सभी को हमारे सैक्शन से काम पड़ता है. हर स्टोर को देने की हमारी जिम्मेदारी होती है.’’
मेजर सतनाम सिंह साहब नाश्ता कर चुके थे. मुझ से कहा, ‘‘छोड़ें, कैप्टन साहब, परवा मत करें. अब आप इन्हीं की तरह अफसर हैं. इन्हें आप की गुप्त रिपोर्ट नहीं लिखनी है. डिप्टी कमांडैंट साहब और कमांडैंट साहब आप को बहुत मानते हैं. इसीलिए उन्होंने आप को एक अत्यंत जिम्मेदार पोस्ट पर लगाया है. चलिए, अपने काम पर चलते हैं.’’
वे उठे तो मैं भी अपने रूम में आया. वरदी पहनी और अपने औफिस आ गया. औफिस के कार्य में व्यस्त रहा. अफसर मेस में कर्नल के साथ हुई बातचीत डिप्टी कमांडैंट साहब और कमांडैंट साहब के पास पहुंच गई थी. वे दोनों मेरे भाई ब्रिगेडियर साहब के साथ काम कर चुके थे. उन्होंने मुझे अलगअलग समय पर अपने औफिस में बुलाया और पूछा कि कर्नल नेहरा के साथ क्या बात हुई थी. वे मेरे मुख से सारी बात सुनना चाहते थे. मैं ने सब बताया. उन्होंने मुझे अपने काम पर ध्यान देने के लिए कहा. मैं अपने औफिस में चला आया था.
बाद में मुझे कमांडैंट साहब के पीए ने बताया था कि कमांडैंट साहब ने कर्नल नेहरा को बुला कर बहुतकुछ कहा था. शायद उन से यह भी कहा गया था कि वे भी आप की गुप्त रिपोर्ट खराब कर सकते हैं. आप फुल कर्नल नहीं बन पाएंगे. मेरी उन से कोई बात नहीं होती थी. न मेस में और न अन्य कहीं. उन के चेहरे के भावों से हमेशा मुझे यह लगा था कि वे मुझ से नाराज हैं. मेरा उन से कोई संबंध भी नहीं रहता था. डिपो में उन का विभाग अलग था और मेरा अलग.
मैं अपने औफिस में आ कर बैठ गया. जवान रहते जीवन में कैसीकैसी घटनाएं घटीं, सब याद आने लगा था. कई बार आंखोंदेखी बात भी गलत हो जाती है. मैं एक वर्कशौप में पोस्ट था. उस समय मेरे पास साइकिल थी. आदेश यह था कि हम साइकिल पर गेट से बाहर जा कर चढ़ सकते हैं. मैं पैदल ही गेट की तरफ बढ़ रहा था. गेट के पास एक तिरपाल का टुकड़ा पड़ा था. आगे से सूबेदार मेजर साहब आ रहे थे. उन्होंने मुझ से कहा, ‘बाबूजी, देखना यह टुकड़ा कैसे पड़ा हुआ है?’ मैं ने टुकड़ा उठा कर उन्हें दे दिया और लंच के लिए चला गया.
दूर खड़े नायक-क्लर्क पिल्ले को लगा, ‘ले भई, आज हवलदार साहनी चोरी करते पकड़ा गया. सूबेदार मेजर साहब ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया. उस ने पूरी यूनिट में फैला दिया कि हवलदार साहनी चोरी करते पकड़ा गया.’
मैं लंच से लौटा तो मुझे तुरंत मेरे जूनियर अफसर ने बुलाया, पूछा, ‘क्या हुआ था?’
मुझे कुछ पता ही नहीं था. मैं ने उन से पूछा, ‘क्या हुआ, सर. आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’
‘तुम्हें चोरी करते हुए सूबेदार मेजर साहब ने पकड़ा था?’
‘नहीं सर, यह बात हुई थी.’ मैं ने उन्हें सारी बात बताई.
उन्होंने तुरंत सूबेदार मेजर साहब से पूछा. उन्होंने भी वही बताया जो मैं ने उन्हें बताया था.
मुझे बुरा लगा था. मेरे साथ पूरे स्टाफ को भी बुरा लगा था. सूबेदार मेजर साहब ने शाम को सैंट्रल रोलकौल रखी थी. ऐसी रोलकौल में अफसरों को छोड़ कर सभी जूनियर अफसर और जवान हिस्सा लेते हैं. चाहे कोई फैमिली के साथ रह रहा हो या बैरक में. सूबेदार मेजर साहब ने सारी बात विस्तार से बताई और नायक पिल्ले को सैंटर में खड़ा कर के खूब ?ाड़ा व बेइज्जत किया, कहा, ‘हवलदार साहनी चोर नहीं है, नायक पिल्ले जैसे खुद चोर होते हैं, उन्हें सभी चोर नजर आते हैं. हवलदार साहनी और उन का स्टाफ स्टोर-होल्डर हैं.
‘बाढ़ खेत को नहीं खाती है. अगर आप को सूई भी चाहिए तो आप उन के पास भागते हैं. वे अदर आर्म्स से हैं. हमारे मेहमान हैं. उन्हें इस तरह बदनाम करना छोड़ें. आगे से इस बात का खयाल रखें. नायक पिल्ले जैसी हरकत न करें. यह रोलकौल इसी के लिए बुलाई गई है.’
नायक पिल्ले ने सब के सामने मु?ा से माफी मांगी थी. मैं ने उस से केवल यह कहा था कि आप को बात फैलाने से पहले मु?ा से बात करनी चाहिए थी पर मुंह से निकली बात लौट कर नहीं आती. मैं बहुत दिनों तक आहत रहा था.
मैं नयानया स्कूटर ले कर आया था. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि मैं अब साइकिल वाला नहीं रहा. मेरे बहुत से साथी और शायद कर्नल नेहरा भी जलभुन गए थे. कुछ दिन तो स्कूटर ठीक चला, बाद में ऐसा खड़ा हुआ कि स्टार्ट ही न हो. मुझे समझ ही नहीं आया कि नया स्कूटर जो शोरूम से निकाले कुछ ही दिन हुए हैं, इस तरह खराब कैसे हो सकता है. कैंटोनमैंट एरिया शहर से दूर होता है. मुझे 4 किलोमीटर स्कूटर धकेल कर शोरूम की वर्कशौप तक ले जाना पड़ा था. संडे था.
यूनिट में छुट्टी थी. रास्ते में कर्नल नेहरा साहब तथा दूसरे अफसर भी मिले थे. सब ने पूछा कि क्या हुआ. मैं ने कहा कि बस, सर, स्टार्ट नहीं हो रहा. शोरूम ले जा रहा हूं. उन में से कइयों ने स्टार्ट कर के भी देखा. उन से भी स्टार्ट नहीं हुआ. उन में ये कर्नल नेहरा भी थे, कहा, ‘ठीक है, शोरूम ले जाओ.’
मैं ने अनुभव किया था, उन के चेहरे पर कुटिल मुसकान थी. शायद खुश हो रहे होंगे कि चार किलोमीटर धकेलेगा तो पता चल जाएगा. शोरूम में मेकैनिक ने बताया कि किसी ने आप के साथ शरारत की है. पैट्रोल टंकी में गंदा सूतर डाल दिया है जिस कारण कारबोरेटर ब्लौक हो गया है. मेकैनिक को सभी साफ कर के लगाने में बड़ी मेहनत पड़ी थी. मुझे उसी रोज पैट्रोल टंकी में ताला लगवाना पड़ा था. फिर कोई शरारत नहीं हुई.
चाय आई, पी कर मैं फिर यादों में खो गया. ट्रेनिंग करते समय मिलिट्री साइंस के पीरियड में हमें विस्तार से सम?ाया गया था कि सेना में अलगअलग व्यवस्थाएं क्यों श्रेष्ठ हैं. सेना में ही नहीं, सिविल में भी ऐसी व्यवस्थाएं हैं. आप अपने अधीन काम करने वालों से ज्यादा घुलमिल नहीं सकते. अफसर बनने के बाद सभी भूल जाते हैं कि जवान और जूनियर अफसर हैं तो वे अफसर हैं. जवान नहीं होते तो वे अफसर भी न होते. वे कमांड किन पर करते.
जानता हूं, अनुशासन के लिए ऐसा करना जरूरी है लेकिन जवानों के वैलफेयर का काम भी तो हम अफसरों को सिखाया जाता है. समय का ध्यान रखो. अगर 10 बजे का टाइम है तो उस से 5 मिनट पहले पहुंचो. आमतौर पर ऐसा ही किया जाता है. मैं ने अपने सैनिक जीवन में एक ऐसा धाकड़ कमांडिंग अफसर देखा जो समय का जबरदस्त पाबंद था. वह परेड लेता था तो उस का जीप से उतरना और परेड का सावधान होना एकसाथ होता था. उस अफसर के समय ब्रिगेड कमांडर साहब का एडम-इंस्पैक्शन था. कमांडर साहब किसी कारण आधा घंटा लेट थे. उन्होंने संतरी से गेट बंद करवा दिया, संतरी से कहा, ‘कमांडर साहब आएं तो गेट नहीं खोलना है. पूछें तो कहना, ‘सर, आप आधा घंटा लेट हैं. इंस्पैक्शन के लिए कोई और दिन निश्चित करें.’
बिग्रेड कमांडर साहब वापस चले गए. उन्होंने एक हफ्ते बाद का समय रखा और समय से 5 मिनट पहले आए. वरना तो कई कमांडिंग अफसर इंस्पैक्शन करने वालों का घंटों इंतजार करते हैं. सेना ऐसे अफसरों के कारण सर्वश्रेष्ठ बनती है. और भी बहुतकुछ याद आने लगा. कई अफसर जवानों से बहुत प्यार करते हैं. उन्होंने देखा, सिविलियन वर्कर शौर्ट लीव ले कर हफ्ते में 2-3 बार घर चले जाते हैं. हमारे जवान पीछे से उन का काम करते रहते हैं. उन्होंने यह कर दिया कि सिविलियन हफ्ते में एक बार शौर्ट लीव जा सकेंगे. यह उन के लिए केवल प्रिविलेज था, अधिकार नहीं था. इसलिए कोई बोल नहीं सका था. यह भी किया कि हमारे जवान भी हफ्ते में एक बार शौर्ट लीव ले सकेंगे चाहे उन्हें सोना ही क्यों न हो.
फिर उन्हीं कमांडैंट साहब ने देखा कि ओपन एयर थिएटर में अफसरों और जूनियर अफसरों के लिए तो कुरसियां लगी होती हैं लेकिन जवानों व उन के बीवीबच्चों को क्वार्टर से दरियां ला कर पिक्चर देखनी पड़ती थी. उन्होंने सब के लिए कुरसियां खरीद कर लगवाईं. ऐसे अफसर भारतीय सेना में भरे पड़े हैं. बहुत कम अफसर कर्नल नेहरा जैसे होते हैं.
ऐसे अनेक शानदार अफसरों के साथ मैं एक लंबी सेवा कर के सेना से सेवानिवृत्त हुआ. खट्टेमीठे अनुभव हमेशा मेरी यादों में बने रहे. मैं ने अपने सैनिक जीवन में केवल यह किया कि मैं ने किसी की छुट्टी नहीं रोकी और कार्य के दौरान कई तरह की बातें होने पर भी मैं ने किसी की गुप्त रिपोर्ट खराब नहीं की. यह मेरे अधिकार क्षेत्र में था.
साहनी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था. Army Story





