Editorial : बंगलादेश में हुए आम चुनावों में बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी की जीत से भारत में संतोष इतना ही होना चाहिए कि न तो जमाते इसलामी सत्ता में आई, न जेनजी की पार्टी जिस ने 2024 में शेख हसीना को उखाड़ फेंका था. बीएनपी के मुखिया तारिक रहमान ने कहना शुरू कर दिया है कि वे न दिल्ली के इशारों पर चलेंगे न पिंडी के. उन के लिए बंगलादेश मुख्य है.
जिस देश का जन्म भारत के कारण हुआ वह अब भारत के लिए अगर दूसरा सिरदर्द बन रहा है तो इस के लिए भारत जिम्मेदार है, बंगलादेश नहीं. भारत 1971 के बाद शेख मुजीबुर्रहमान को सुरक्षित नहीं रख पाया, बंगलादेशी सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने ही उन की हत्या करवा कर उन की पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया.
इस का एक कारण यह था कि 1905 में जब अंगरेजों ने हिंदूमुसलिम आधार पर बंगाल प्रोविंस को 2 हिस्सों में बांटना चाहा था तभी भारत के हिंदू नेता उखड़ गए थे कि मुसलिम बहुल प्रोविंस कैसे बन जाए क्योंकि इस से हिंदू बंगालियों का पूर्वी बंगाल के दोहन पर बुरा असर पड़ता.
1757 तक तो पूरे बंगाल पर मुसलिम राज था. पलासी की लड़ाई के बाद जब से अंगरेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज आया, तेजी से इंग्लिश पढ़ कर और अंगरेजों से व्यापार के गुण सीख कर हिंदू व्यापारियों व धर्मगुरुओं ने पूरे बंगाल की अर्थव्यवस्था व समाज पर कब्जा कर लिया था.
1905 में वायसराय लौर्ड जौर्ज नथानिएल कर्जन ने जब मुसलिम मांग के अनुसार बंगाल प्रोविंस को अलग करना चाहा था तो हिंदू धर्मगुरुओं और व्यापारियों को भारी नुकसान दिखा जो मुसलिम नवाबों के शासन के बाद अंगरेजों के शासन में जम कर कमाई कर रहे थे. 1947 में भारत के विभाजन के समय 1905 से 1911 तक के प्रोविंस विभाजन की यादें जड़ में थीं और बंगलादेश बन जाने के बाद भी यह इतिहास भुलाया नहीं गया है.
1971 के बाद भारत सरकार की चाहे जो गलती रही हो पर संघ परिवार ने अपना 1905 से 1911 वाला गुस्सा बरकरार रखा और उस ने भारत में बसे बंगलादेशियों के खिलाफ मुहिम वर्ष 2014, 2019 और 2024 के आम चुनावों में इस्तेमाल कर अपनी पार्टी भाजपा को जीत दिलवाई. यही नहीं, असम के राज्य विधानसभा चुनाव में भी उस ने इसे हथियार बनाया.
तारिक रहमान की बीएनपी इस पुराने गड़े मुद्दे को भूल जाए, यह संभव नहीं है क्योंकि भारत में मुसलिम राज को कहां भुलाया जा रहा है. फिल्म ‘छावा’ और ‘धुरंधर’ की सफलताएं बताती हैं कि यहां की जनता को यह भेदभाव उजागर करने में आज भी पाश्विक आनंद आता है. बंगलादेश भारत का मित्र तब बन सकता जब कम से कम सरकार इस मकड़जाल से निकले. पर जब वोट पाने का अकेला तरीका ही प्रशासनिक नीतियां नहीं बल्कि धार्मिक नारे, वह भी विघटनकारी, हों तो फिर तारिक रहमान की नीति को समझना मुश्किल नहीं. Editorial





