Party Switching Politics : नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए चर्चा में बने रहना जरूरी होता है. जिन नेताओं और दलों के पास विचार और नीतियां नहीं हैं वे चर्चा में बने रहने के लिए दलबदल का खेल खेलते हैं.
15 फरवरी, 2026 की सुबह समाजवादी पार्टी मीडिया विभाग द्वारा मीडिया को सूचना दी गई कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव दोपहर 12 बजे पार्टी के प्रदेश कार्यालय में प्रैस कौन्फ्रैंस करेंगे. समाजवादी पार्टी का कार्यालय उत्तर प्रदेश के राजभवन जिस को अब जनभवन के नाम से जाना जाता है उस से करीब एक किलोमीटर दूर लखनऊ के 19, विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित है. यहां से 500 मीटर दूर कालीदास मार्ग पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का सरकारी आवास 5, केडी मार्ग है. इस 5 कालीदास मार्ग पर बैठने की चाहत हर नेता में होती है. इस की जुगत में ही उस की राजनीति चलती रहती है.
वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव यह तय करेगा कि अगला कौन सा नेता 5, कालीदास मार्ग पर बैठेगा. इस की तैयारी सालभर पहले से ही शुरू हो गई है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रैस कौन्फ्रैंस का असल मकसद भी इसी से जुड़ा था. दोपहर 12 बजे से पहले ही समाजवादी पार्टी का कौन्फ्रैंस रूम पूरी तरह से भर चुका था. यह कौन्फ्रैंस रूम उस समय बना था जब अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. इस में 5 सौ से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है. मौल्स में जिस तरह से फिल्म थिएटर बनते हैं उसी तरह से यह बना हुआ है. सामने बड़ी मेज के उस पार पार्टी के नेता होते हैं. सामने पत्रकार बैठते हैं. सब से आगे चैनल वाले अपने माइक लगा कर बैठते हैं.
ठीक समय पर अखिलेश यादव ने कौन्फ्रैंस हौल में प्रवेश किया. उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में सफेद कुरतेपाजामे पर काले रंग की सदरी पहनी थी. सिर पर लाल रंग की टोपी पहन रखी थी. उन के साथ कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी थे जिन्होंने सफेद रंग की पैंट व शर्ट पहनी हुई थी.
ज्यादातर मीडिया के लोगों को यह पहले पता चल चुका था कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी और दूसरे नेता समाजवादी पार्टी जौइन करने वाले हैं. अखिलेश यादव ने प्रैस कौन्फ्रैंस की शुरूआत नसीमुद्दीन सिद्दीकी से की और उन का स्वागत किया.
अखिलेश यादव ने कहा कि केवल मकान बदला है मोहल्ला नहीं. अखिलेश यादव का कहना था कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़ कर समाजवादी पार्टी जौइन की है. यानी उन्होंने घर बदला है लेकिन अभी भी वह इंडिया ब्लौक का हिस्सा है. यानी मोहल्ला नहीं बदला है.

कौन हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी?
66 साल के नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुसलिम बिरादरी के कद्दावर नेता हैं. लंबे समय तक वे बसपा और कांग्रेस में सक्रिय थे. बहुजन समाज पार्टी में उन की गिनती पार्टी प्रमुख मायावती के बेहद करीबी नेताओं में होती थी. वे मायावती सरकार में मंत्री भी रहे. फरवरी 2018 में वे कांग्रेस में शामिल होने के बाद पश्चिमी यूपी में पार्टी इकाई के अध्यक्ष बने. इस के बाद मीडिया विभाग के चेयरमैन बनाए गए थे.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूलरूप से बांदा जिले के स्योंडा गांव के रहने वाले हैं. उन का राजनीतिक सफर 1988 में बांदा नगरपालिका अध्यक्ष पद के चुनाव से शुरू हुआ. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. उस के बाद उन्होंने बसपा जौइन की. 1991 में बसपा के टिकट से बांदा सदर सीट से विधायक का चुनाव जीत कर उन्होंने इतिहास रचा. वे न केवल बांदा के पहले मुसलिम विधायक बने बल्कि धीरेधीरे मायावती के खास और भरोसेमंद नेता भी बन गए. 2007 में जब बसपा की सरकार बनी तब उन की राजनीतिक मजबूती और प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ भी कहा गया.
नसीमुद्दीन राष्ट्रीय स्तर के वौलीबौल खिलाड़ी रह चुके हैं. इस के अलावा उन्होंने रेलवे में कौंट्रैक्टर के रूप में भी काम किया. उन के खेल और व्यवसाय का अनुभव बाद में राजनीतिक नेतृत्व और निर्णय क्षमता में भी मददगार साबित हुआ. इस सब ने उन्हें पूरे राज्य में एक कद्दावर नेता के रूप में पहचान दिलाई. उन्होंने बसपा सरकार में कई महत्त्वपूर्ण पद संभाले.
जब मायावती 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तब उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इस के बाद 21 मार्च, 1997 से 21 सितंबर, 1997 तक शौर्ट टर्म गवर्नमैंट में मंत्री रहे. 3 मई, 2002 से 29 अगस्त, 2003 तक 1 साल के लिए वे फिर कैबिनेट का हिस्सा रहे. इस के बाद 13 मई, 2007 से 7 मार्च, 2012 तक फुलटाइम मंत्री रहे. उन की नीतियों और प्रभाव के कारण उन्हें पश्चिमी यूपी में एक मजबूत नेता माना जाता था.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने संगठन और सदन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत रखी. पिछले दो दशकों से वे विधान परिषद सदस्य रहे हैं. उन की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी भी 5 साल तक एमएलसी रहीं. उन के बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. बसपा के बाद उन को सही जगह की तलाश थी. मायावती से मतभेद के बाद बसपा छोड़ कर फरवरी 2018 में नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में शामिल हुए. वहां वे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे. इस के बाद अचानक उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा छोड़ते वक्त मायावती को बुराभला कहा था लेकिन जब कांग्रेस छोड़ी तब उन्होंने कांग्रेस के किसी नेता को कुछ नहीं कहा. नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा, ‘‘मैं कांग्रेस में अपने साथियों के साथ इसलिए शामिल हुआ था ताकि जातिवाद और संप्रदायवाद के खिलाफ हो रहे अन्याय की लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके लेकिन कांग्रेस में रहते हुए मैं यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं. मेरा मकसद जनता के लिए काम करना है, जो यहां पूरा नहीं हो पा रहा था. मेरी कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, मेरा यह निर्णय सैद्धांतिक है.’’
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने आगे कहा, ‘‘कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं और करता रहूंगा. कांग्रेस में मेरे लिए कोई काम नहीं था, मैं जमीनी स्तर का व्यक्ति हूं और 8 साल तक मैं जमीनी स्तर पर काम नहीं कर पाया. मैं कभी कोई बड़ा नेता नहीं रहा, न ही अब हूं, इसलिए मैं जमीनी स्तर पर काम करना चाहता हूं, इसीलिए मैं ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी. मेरे मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं है.’’
कांग्रेस से अलग होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बहुजन समाज पार्टी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी में जौइन करने का प्रयास किया. बहुजन समाज पार्टी छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा प्रमुख मायावती के साथ अपनी बातचीत की औडियो रिकौर्डिंग जारी कर दी थी. जिस के चलते मायावती उन से बेहद नाराज हैं.
मायावती को लगता है कि मुसलिम नेता अपने वर्ग का वोट नहीं ले पाते हैं. इस की वजह यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 21 मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. इस के बाद भी एक सीट नहीं निकल सकी थी.
मुसलिम वोट का बंटवारा
नहीं चाहती सपा समाजवादी पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में सब से बड़ी सफलता मिली थी जब उस के 37 सांसद चुने गए थे. सपा की सहयोगी कांग्रेस को भी 7 लोकसभा की सीटें मिलीं. सपा-कांग्रेस का गठबंधन सफल रहा था. 2027 के विधानसभा चुनाव में भी सपा-कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस को कम सीटें दी जाएं, इस चुनावी रणनीति के तहत सपा कांगे्रस को यह समझना चाहती है कि उस के पास ताकत नहीं है. जमीन पर संगठन नहीं है ऐसे में उत्तर प्रदेश में उसे सपा के पीछे ही चलना चाहिए. इसलिए नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उन की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी सहित सपा में एंट्री दी गई है.

कांग्रेस में हाशिए पर पडे़ नसीमुद्दीन सिद्दीकी खबरों की हैडलाइन में आ गए. अखिलेश यादव कांग्रेस के महत्त्व को समझते हैं, इसलिए उन्होंने कहा कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने घर बदला है मोहल्ला नहीं. जिस से कांग्रेस को बुरा भी न लगे. समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ इंडिया ब्लौक में है, ऐसे में कांग्रेस भी खुल कर बोलने से बच रही है.
समाजवादी पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि मुसलिम वर्ग उन के ही साथ है. मुसलिम वर्ग ने जब से बसपा को वोट देना बंद किया है तब से वह सपा-कांग्रेस के साथ है. ऐसे में आपस में टकराव होगा या दोनों आपस में समझदारी से काम लेंगे, यह देखना पड़ेगा.
पार्टी छोड़ने वाला ‘गद्दार दोस्त’
कांग्रेस की नजर में पार्टी छोड़ने वाला ‘गद्दार दोस्त’ होता है. राहुल गांधी ने पंजाब के नेता व सांसद रवनीत सिंह बिट्टू जो कभी कांग्रेस में थे, उन पर तंज कसते हुए ‘माय ट्रेटर फ्रैंड’ यानी ‘मेरा गद्दार दोस्त’ कह कर संबोधित किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘यहां एक गद्दार जा रहा है. इस का चेहरा देखिए. नमस्ते भाई, चिंता मत करो, तुम वापस आ जाओगे (कांग्रेस में).
रवनीत सिंह बिटटू 3 बार कांग्रेस सांसद रह चुके हैं. पहली बार 2009 में आनंदपुर साहिब से लोकसभा के लिए चुने गए थे. इस के बाद 2014 और 2019 में लुधियाना से जीते थे. खालिस्तान समर्थक कट्टरपंथी आवाजों के मुखर आलोचक माने जाने वाले बिट्टू 2024 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गए. इस चुनाव में वे लुधियाना से पंजाब कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग से लगभग 20 हजार वोटों से हार गए. चुनाव हारने के बावजूद केंद्र सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया, रेल तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई.
बिट्टू जब 11 साल के थे तब उन के पिता का निधन हो गया. इस के बाद 20 साल की उम्र में उन्होंने अपने दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को भी खो दिया, जिन की 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी. वर्ष 2007 में राहुल गांधी से मुलाकात के बाद बिट्टू ने राजनीति में कदम रखा था.
कांग्रेस से अलग होने के बाद बिट्टू ने राहुल गांधी पर सिख समुदाय को बांटने की कोशिश करने का आरोप लगाया और कहा कि सिख किसी भी राजनीतिक दल से बंधे नहीं हैं. अमेरिका में सिखों को ले कर दिए गए राहुल गांधी के बयान पर रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा ‘राहुल गांधी ने सिखों को बांटने की कोशिश की है. सिख किसी पार्टी से जुड़े नहीं हैं और यह चिंगारी लगाने की कोशिश है. राहुल गांधी देश के नंबर वन टेररिस्ट हैं.’
कांग्रेस से अलग होने के बाद रवनीत सिंह बिट्टू ने जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी को ले कर बयान दिए उस से राहुल गांधी दुखी थे. राहुल गांधी यह मानते है कि कई कांग्रेसी नेता पार्टी को धोखा दे रहे हैं.
कभी राहुल गांधी के साथी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया और जतिन प्रसाद उन को छोड़ कर चले गए. राहुल गांधी इस धोखे की अकसर चर्चा करते रहते हैं. जब रवनीत सिंह बिट्टू उन को दिख गए तो राहुल गांधी ने तंज कस दिया. दलबदल की इस कहानी में धोखा छिपा हुआ है. यह हमारी पौराणिक कहानियों की देन है, जहां युद्ध जीतने के लिए घर के भेदी की तलाश रही है.
रामायण और महाभारत युद्ध घर के भेदी ने जिताए
एक कहावत है – ‘घर का भेदी लंका ढाए’. यह कहावत रावण के भाई विभीषण पर कही गई है. रामायण के राम – रावण युद्ध में मेघनाथ, कुंभकरण और रावण का वध तभी संभव हो पाया जब विभीषण ने रहस्य खोले. इसी तरह से राम ने बालि का वध किया. बालि और सुग्रीव के बीच जब युद्ध चल रहा था तब राम ने पेड़ की आड़ ले कर बालि को मारा था. इसी तरह से महाभारत में कर्ण को मारने से पहले उस के कुंडल और कवच छीन लिए गए थे. शकुनी की गलत सलाहों ने कौरवों को मरवाने का काम किया.
सतयुग में प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप की हत्या घर के भेदी की वजह से हुई. हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उस की मौत न घर में होगी न बाहर, न दिन में होगी न रात में, न उसे कोई मनुष्य मार सकेगा न पशु.
ऐसे में हिरण्यकश्यप को मारने के लिए नरसिंह अवतार हुआ. उस ने घर न बाहर, रात न दिन को देख कर मार दिया. तमाम ऐसे युद्ध हुए जो घर के भेदी की वजह से हारे गए. आज के दौर में चुनाव किसी युद्ध से कम नहीं है. ऐसे में जैसे ही चुनाव करीब आते हैं घर के भेदी विश्वासघात करने लगते हैं.
पौराणिक कहानियों में इस दलबदल को बुरा नहीं माना गया है. इसे जीत का मंत्र माना गया है, इसलिए जनता के ऊपर फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सा नेता किधर व किस दल में जा रहा है. इन नेताओं के पास राजनीतिक चर्चा के लिए विषय नहीं होते. राहुल गांधी जैसे नेताओं के पास विषय होते हैं लेकिन छोटे दलों के पास हिम्मत और विषय नहीं होते. ऐसे में नेताओं के पार्टी छोड़ने और जौइन करने के जरिए ही वे खबरों की हैडलाइन मैनेजमैंट करते रहते हैं. Party Switching Politics





