Parents Loneliness : पढ़ाई के लिए, नौकरी के लिए, बेहतर भविष्य के लिए, किसी न किसी दिन बच्चे घर से बाहर निकलते ही हैं, यह जाना स्वाभाविक है, जरूरी है और सही भी है लेकिन जब बच्चे जीवन की यह नई उड़ान भरते हैं तो जिस घर से जुड़े होते हैं, वहां एक चुप्पी रह जाती है, मातापिता अकेले रह जाते हैं. वर्तमान समय में इसी को ‘एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम’ का नाम दिया गया है.

अकसर, बच्चे यह मान लेते हैं कि ‘मम्मीपापा तो समझदार हैं’, ‘वे अपनी नौकरी, घर तथा दोस्तों में व्यस्त रहते होंगे’, ‘धीरेधीरे उन्हें आदत हो जाएगी’ या फिर ‘वे तो अभी बहुत अधिक उम्र के भी नहीं हैं, अब वे अपने शौक पूरे कर सकते हैं, ‘उन्हें अकेलापन क्यों होगा?’ यहीं अनजाने में चूक हो जाती है. मातापिता चाहे युवा हों या वृद्ध, उन का जीवन वर्षों तक बच्चों के इर्दगिर्द घूमता है. उन बच्चों की दिनचर्या, आवाजें, उन की जरूरतें, सबकुछ मातापिता के जीवन का केंद्र होती हैं. जब वे घर छोड़ते हैं तो उन के जीवन का वह केंद्र अचानक खाली हो जाता है और उन्हें अकेलापन घेर लेता है.

Parents Loneliness (2)
घर भले ही शांत हो जाए लेकिन संबंधों की गर्माहट बनी रह सकती है. यदि संवाद, समझ और
स्नेह कायम रहे. यही संतुलन जीवन को संपूर्ण और सुखद बनाता है.

यह कोई शिकायत नहीं है. जानबूझ कर नहीं किया जाता बल्कि यह जीवन का एक चरण है जो सब के जीवन में कभी न कभी आता है, जो आवश्यक है यह भी सब को पता होता है. यह कोई कमजोरी नहीं है. यह सिर्फ प्यार का खालीपन है. आज की डिजिटल दुनिया में हमारा संवाद पूरी तरह डिजिटल हो गया है. सभी बातें व्हाट्सऐप मैसेज, इमोजी, स्टेटस, रील्स के रूप में होती हैं. ये सब सैकंडों में पहुंचते हैं और सैकंडों में भुला दिए जाते हैं. मातापिता को ‘गुडमौर्निंग’ का फौरवर्डेड मैसेज मिल जाता है. लेकिन उन्हें वह अपनापन नहीं मिल पाता जो कभी हाथ से लिखे एक पत्र में होता था. संवादों की कमी हो गई है, वे संवाद जो भावनाओं से भरे होते थे, एहसास की गर्माहट लिए हुए. यही वजह है कि आज एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है.

बच्चों की भूमिका

मातापिता को इस भावनात्मक स्थिति से बाहर निकालने में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इस के लिए किसी बड़े प्रयास की नहीं, बल्कि नियमित और संवेदनशील जुड़ाव की आवश्यकता होती है.

नियमित फोन व वीडियो कौल

बच्चे मातापिता को नियमित फोन और वीडियोकौल करें. केवल औपचारिक हालचाल तक सीमित न रहें. फोन करना सिर्फ, ‘सब ठीक है’ तक सीमित न रखें. अपनी रोजमर्रा की छोटीछोटी बातें साझ करें. औफिस की कोई घटना, कालेज का कोई किस्सा, मौसम, रास्ते, लोग, जो कुछ भी. मातापिता को यह महसूस होना चाहिए कि वे अब भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं, सिर्फ सूचना पाने वाले नहीं.

पत्र लिखें

मातापिता को नियमित पत्र लिखें. हाथ से लिखे पत्र आज के डिजिटल युग में भले ही पुराने लगें पर मातापिता के लिए हाथ से लिखा पत्र आज भी अनमोल है. कागज लंबे समय तक उन के सामने रहता है. वे पत्रों को बारबार पढ़ते हैं, सहेज कर रखते हैं. डिजिटल संदेश क्षणिक होते हैं, लेकिन पत्र स्थायी सहारा बन जाते हैं और भावनात्मक संतुलन बनाने में मदद करते हैं.

फोटो के प्रिंट भेजिए

अपने कमरे की तसवीर, अपने शहर की, दोस्तों की, रोजमर्रा के पलों की तसवीरें मातापिता के घर को फिर से जीवंत बना देती हैं. मातापिता उन्हें दीवार पर लगा सकते हैं, अलमारी में रख सकते हैं ये तसवीरें घर को फिर से ‘जीवित’ बना देती हैं.

खास चीजें कूरियर से भेजते रहें

कभी कोई स्थानीय मिठाई, कभी हस्तशिल्प, कभी बस एक साधारण पोस्टकार्ड, कूरियर से आया छोटा सा पैकेट मातापिता को यह एहसास दिलाता है कि ‘हम दूर हैं, पर भूले नहीं हैं.’

दोस्तों को मातापिता से मिलवाएं

हम जिन दोस्तों को अपने शहर में छोड़ आए हैं, उन से कहें कि कभीकभी वे मातापिता से मिलने चले जाएं. घर में हलचल लौटती है, बातचीत होती है, मातापिता को सामाजिक जुड़ाव महसूस होता है.

भावनाओं को हलके में न लें

सब से जरूरी बात, मातापिता की भावनाओं को हलके में न लें. अगर मातापिता उदास हों, बारबार चिंता करें या पुराने दिन याद करें तो इसे ड्रामा न कहें, इसे नाटकीयता न समझें. यह जानबूझ कर नहीं होता. यह उस खालीपन का संकेत है जिसे समझे जाने की जरूरत है.

संवेदनशीलता जरूरी

यह बहुत जरूरी बात है कि बच्चों को आगे बढ़ने के लिए खुद को दोषी महसूस नहीं करना चाहिए. आप का आगे बढ़ना गलत नहीं है. आप का दूर जाना स्वार्थ नहीं है लेकिन दूर रह कर भी जुड़े रहना बच्चों की जिम्मेदारी है. सो, किसी न किसी रूप में बच्चे अपने मातापिता से जुड़े रहें.

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम मातापिता की कमजोरी नहीं है. यह उन के प्रेम की गहराई का प्रमाण है. आज की डिजिटल दुनिया में जहां सबकुछ क्षणिक हो गया है, वहां स्थायी भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना बेटेबेटियों की भी जिम्मेदारी बनती है. नियमित कौल, हाथ से लिखे पत्र, प्रिंट की हुई तसवीरें, छोटेछोटे कूरियर और संवेदनशीलता, यही वे साधन हैं जो खाली घोंसले में फिर से अपनापन भर सकते हैं.

समस्या को जाने बिना समाधान देने की अपेक्षा समस्या को सुन कर समझने की कोशिश करना बेहतर है. Parents Loneliness

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