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प्रतिभा होना जरूरी

दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘नैपोटिज्म सफलता की गारंटी नहीं’ पढ़ा. लेख बेहद सटीक व सारगर्भित महसूस हुआ. लेख में प्रकाशित विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूं. नैपोटिज्म माध्यम मात्र हो सकता है लेकिन आप इस के सहारे शतप्रतिशत सफलता के शिखर पर पहुंच जाएं, ऐसा बिलकुल नहीं है. बौलीवुड हो या फिर कोई दूसरी फील्ड, सफल होने के लिए अपने अंदर का हुनर ही काम आता है.

भारतीय सिनेमा की बात करें तो पुराने दिग्गज कलाकार कादर खान, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर औसत शक्लसूरत होने के बावजूद इंडस्ट्री में अपना परचम लहराने में कामयाब रहे. वहीं दूसरी तरफ सुपरस्टार जितेंद्र के बेटे तुषार कपूर, सुरेश ओबेराय के बेटे विवेक ओबेराय व सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन अपनी कामचलाऊ ऐक्टिंग के कारण टिके हुए हैं. चमकधमक तो हर किसी को विरासत में मिल जाती है लेकिन चमक को बरकरार अपनी प्रतिभा से ही रखा जा सकता है.

हमेशा की तरह सभी कहानियां लाजवाब व शानदार लगीं. यदि संभव हो तो पत्रिका में किसी इनामी प्रतियोगिता का समावेश कर दिया जाए जिस से पाठक प्रोत्साहन को बल मिलता रहे. – विमल वर्मा

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लापरवाही बरदाश्त नहीं

आप पैसे दे कर कोई वस्तु या सेवा हासिल करते हैं. उस का यूज करना आप का हक है. बात आरक्षित कोच में यात्रा कर रहे ट्रेन यात्रियों की है. कोच में सवार यात्रियों ने गंदगी, कौकरोच निकलने की शिकायत की. कोच अटैंडैंट ने इसे अनसुना कर दिया. मजबूर यात्रियों ने ट्रेन रोक कर हंगामा किया. कोच की साफसफाई की गई. कीटनाशक का छिड़काव किया गया. इस काम में यात्रियों को देरी हुई सो अलग.

वैसे, यह कोई नई बात नहीं है. डब्बे में गंदगी होना, टौयलेट में सीट गंदी होना, पानी न आना ये सब लापरवाही है. इस के जिम्मेदार दरअसल बेमन से कार्य को अंजाम देते हैं.

रोडवेज बसों में भी ऐसी ही स्थिति है. कभी ये रास्ते में खड़ी हो जाती हैं, कभी यात्रियों से धक्का लगवाया जाता है. अकसर मैकेनिकल मिस्टेक कह कर जिम्मेदार लोग अपना पल्ला झाड़ लेते हैं. कहने का मतलब यह है कि आप कोई सुविधा फ्री तो नहीं दे रहे हैं, पैसे ले रहे हैं. सो, इस तरह की लापरवाही बरदाश्त के बाहर है. – सीमा गुप्ता

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बच्चों के मुख से

मेरी 3 वर्षीया बेटी सौम्या ने कहीं से, किसी से ‘दादागीरी’ शब्द सुन लिया था, उस ने मुझ से पूछा, ‘‘दादागीरी का क्या मतलब होता है? मैं ने समझाया, ‘‘जब एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति से अपनी इच्छा जबरदस्ती पूरी करवाता है. यह उस व्यक्ति की ‘दादागीरी’ मानी जाती है.’’

रात के 9 बज रहे थे, सौम्या कार्टून देख रही थी, उस की दादी ने उस से कहा, ‘‘सौम्या, रिमोट दो, मैं सीरियल देखूंगी, चलो दे दो, अच्छे बच्चे की तरह बात मानो.’’ सौम्या ने कुछ पल उन्हें एकटक देखा तथा बोल पड़ी, ‘‘दादीजी, ये आप की ‘दादीगीरी’ है, आप मेरे साथ जबरदस्ती कर रही हैं?’’ उस का इतना कहना था कि उस की ‘दादी मां’ सहित हम सभी हंस पड़े. संध्या

मेरी नातिन जोकि अभी 3 साल की है वह मेरे पास ही रहती है. मैं ने उसे सुबह सो कर उठने पर टौयलेट जाने की आदत डाली है. एक दिन उसे आलस आने पर भी मैं उस के पीछे लगी रही कि वह टौयलेट जा कर आए लेकिन वह मन से जाने को तैयार नहीं हो रही थी. अचानक मेरे काफी जोर देने पर वह मुझ से बाली, ‘‘नानी तुम मेरे शरीर पर बैटरी लगा दो न. जिस से मैं जल्दी से टौयलेट कर सकूं.’’

उस की यह बात सुन कर मैं तो दंग रह गई और मुझे बहुत ही हंसी आई. – शशी माहेश्वरी

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मेरे नाती आयुष को चश्मा पहनना बहुत अच्छा लगता है. जब भी वह मुझे चश्मे में देखता है तो चश्मे को लेने की जिद करता है.

एक बार वह मेरे साथ एक बरात में गया. वहां घोड़ी को मोतियों की लडि़यों से सजाया गया था. घोड़ी की आंख के चारों ओर मोतियों की लड़ी थी. आयुष बड़े ध्यान से घोड़ी को देख रहा था. जब लड़का घोड़ी पर बैठने लगा तो आयुष बोला, ‘‘अरे मम्मी, घोड़ा तो नानी की तरह चश्मा लगाए है.’’ उस की बात सुन कर आसपास खड़े सभी लोग हंसने लगे. – उपमा मिश्रा

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