Family Story in Hindi : अच्छी बेटी की जिम्मेदारी निभाते हुए सिमरन जैसे थक सी गई थी. मां की मृत्यु पर दोनों भाइयों का आना जैसे उसे तसल्ली दे रहा था. लेकिन क्या यह सुख क्षणभर का था?

जाड़े का मौसम. ठंडी बयार. शाम के 4 बज रहे थे. सिमरन तेज कदमों से चलते हुए घर पहुंची. ‘‘रिचा, रिचा कहां हो?’’ आवाज लगाते हुए वह घर के अंदर दाखिल हुई. उस ने देखा, रिचा मां के सिरहाने बैठी है.
‘‘क्या बात है, मां? तबीयत ठीक नहीं लग रही क्या?’’ उस ने मां की ओर मुखातिब होते हुए पूछा.
‘‘नहींनहीं, ठीक है. बस, थोड़ी सी कमजोरी लग रही है.’’
‘‘क्या बात है, दीदी, आज औफिस से जल्दी कैसे? कोई काम?’’ रिचा ने प्रश्न किया.
‘‘हांहां, काम ही तो है. अरे, मुझे अभी भोपाल के लिए निकलना है. कल 10 बजे वहां मेरी औफिस की मीटिंग है.’’
‘‘ओह, अच्छा,’’ करते हुए रिचा चाय बनाने चली गई.
सिमरन बैग जमाने लगी. तभी मां ने पलंग से उठने की कोशिश की. सिमरन ने उन्हें सहारा दे कर फिर लिटा दिया, यह कह कर कि ‘‘दवाई टाइम पर लेना. रिचा आप के पास है, मैं कल रात तक लौट आऊंगी.’’
रिचा चायनाश्ता टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘दीदी, आप निश्चिंचत हो कर जाइए. मैं कल कोचिंग से छुट्टी ले लूंगी.’’ रिचा के आश्वस्तभरे शब्दों ने सिमरन की चिंता को कुछ कम कर दिया.
रिचा सिमरन की ममेरी बहन थी. गांव से बैंक की कोचिंग के लिए यहां इंदौर आई थी. पिछले एक साल से बूआ के घर ही रह रही थी. बहुत ही नेकदिल और समझदार है.
मां को प्रणाम कर सिमरन ने जैसे ही जाने के लिए बैग उठाया, याद आया शर्मा अंकल को बताना ही रह गया. बाबूजी के गुजरने के बाद से पड़ोस के शर्मा अंकल सिमरन के परिवार के दुखसुख के पक्के साझेदार हो गए थे. गेट खोल कर अंदर जाने को हुई, अंकलआंटी बरामदे में ही बैठे मिल गए. वह बोली, ‘‘अंकल, मैं एक दिन के लिए भोपाल जा रही हूं. मां और रिचा घर पर अकेले हैं. मां की तबीयत थोड़ी ढीली है. प्लीज, आप ध्यान रखिएगा. आप को परेशान कर रही हूं.’’
‘‘अरे बेटा, इस में परेशानी वाली क्या बात है. यह तो हमारी भी जिम्मेदारी है. तुम नाहक परेशान हो रही हो. जाओ, अपना काम कर के लौट आओ.’’
अंकल के भरोसे ने सिमरन के चेहरे से चिंता की परत हटा दी.

सिमरन बसस्टौप पर आ गई. रात 10 बजे भोपाल पहुंच गई. होटल में उस के ठहरने की व्यवस्था थी. रिचा को उस ने पहुंचते ही कौल कर दिया और सो गई.
भोपाल की सर्द सुबह. शरीर में कंपकंपी छूट रही थी. तैयार हो कर उस ने स्वैटर के साथ कंधे पर शौल भी डाली.
करीब 2 बजे रिचा की कौल आई, ‘‘दीदी, बूआ की तबीयत बिगड़ गई है. शर्मा अंकल और आंटी की मदद से उन्हें अस्पताल ले कर आए हैं. बूआ अभी आईसीयू में हैं.
‘‘घबराना नहीं, बेटा. इत्मीनान से आओ. हम हैं यहां पर,’’ पीछे से शर्मा अंकल की आवाज आई.
सिमरन स्तब्ध थी.
औफिस के सहकर्मियों ने इंदौर के लिए टैक्सी की व्यवस्था करवाई.
टैक्सी में बैठने के बाद उसे लगा एक सप्ताह से ठंड कुछ ज्यादा ही पड़ रही है, हो सकता है मां इसी वजह से बीमार पड़ गई हो. 2 दिन पहले ही तो उस ने मां से कहा था, ‘इस छुट्टी में मार्केट जा कर आप के लिए बढि़या सा वूलन स्वेटर ले आऊंगी. आप के पुराने स्वेटर सब बेकार हो गए हैं.’
‘नहीं सिम्मी, नए स्वेटर की क्या जरूरत. मुझे कौन किसी के घर जाना है. दिनभर बिस्तर में ओढ़े ही रहती हूं,’ कहते हुए मां का स्वर कातर हो
आया था.
उस ने मां की बेचैनी को ताड़ लिया और मां के गले में बांहें डालते हुए बोली, ‘किस सोच में पड़ गईं मां? आप की बेटी के होते आप को कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है.’ और दोनों के होंठों पर मुसकान आ गई.
कल ही तो उस ने अपने औफिस की दोस्त से एक डाक्टर का एड्रैस लिया था. सोचा था, भोपाल से आ कर मां को दिखा देगी.

जरूरत से ज्यादा लंबा लगता हुआ यह सफर बड़ी मुश्किल से खत्म हुआ और सिमरन हौस्पिटल पहुंची. शर्मा अंकल और आंटी सामने चेयर पर बैठे मिल गए. उस ने डबडबाई आंखों से अंकल को देखा. वे हाथ पकड़ कर उसे आईसीयू तक ले गए. बमुश्किल 5 मिनट रुकने दिया गया उसे. वह निढाल सी अंकल के पास बैठ गई. उन्होंने बताया, मां के फेफड़ों में इन्फैक्शन है. सांस लेने में दिक्कत हो रही है.
उदासी की परत उस के चेहरे पर जम गई. कुछ देर में रिचा भी वहां आ कर बैठ गई. दोनों बहनें निशब्द थीं.
रात 11 बजे मां को हार्टअटैक पड़ा और वह चल बसीं. सुखद भविष्य के जो अरमान सिमरन ने अपने हृदय में संजोए थे, एक झटके में उजड़ गए. वह सिर्फ और सिर्फ शून्य में टकटकी लगाए देख रही थी, मानो पूछ रही हो, ‘घर की जो सांस थम गई है, उसे जीवंत कौन करेगा.’ पहले एकएक कर के दोनों भाई बाहर चले गए, फिर बाबूजी दुनिया से चले गए, और अब मां.
शर्मा अंकल ने सचिन और सौरभ दोनों को मां की मृत्यु की सूचना दे दी. दोनों ने जल्दी पहुंचने की बात कही.

दूसरे दिन मां की अंत्येष्टि भी हो गई. कुछ करीबी रिश्तेदार और परिचितसम्मिलित हुए लेकिन इन सब के होने का एहसास उस के लिए नगण्य था. आज से ज्यादा अकेला उस ने अपने को कभी नहीं पाया. उस के चारों तरफ तो सन्नाटा खिंच आया था. शर्मा आंटी आईं और कस के उसे अपने अंक में भर लिया, ‘‘मैं हूं न बेटा, तेरी मां.’’ और वे स्वयं भी दुख से अभिभूत हो उठीं.
सिमरन की आंखों से अश्रुओं का रेला बह निकला. बहुत देर रोती रही, फिर खुद ही संभाला अपनेआप को. मां के कमरे में जा कर बैठी और देखा, उन का पलंग, उन के कपड़े, उन की दवाएं, कुछ धार्मिक पुस्तकें आदि सब चीजें ऐसे रखी हुईं थीं मानो मां अभी आ जाएंगी. कितनी याद आएंगी मां.
दुखी मन से भाइयों को मोबाइल लगाया. बहुत देर ट्राई किया पर नैटवर्क नहीं मिला. मोबाइल का नैटवर्क न सही, मस्तिष्क का नैटवर्क जरूर जुड़ गया. विगत स्मृतियों के तार सिलसिलेवार जुड़ते चले गए.

दोनों भाई उस से बहुत प्यार करते थे. उस का रूठना, उस का मचलना, उस की खिलखिलाहट पर दोनों भाई निहाल हो जाते थे. सचिन भैया उसे गोद में उठा कर स्कूल छोड़ने जाते. कपड़ेजूते हर फरमाइश सचिन भैया बाबूजी से मनुहार कर के पूरी करवाते. हर रोज पार्क में घुमाने भी ले जाते.
एक बार की घटना है. पार्क में कुछ बच्चों ने उसे झूले पर से गिरा दिया था, नाक में से खून आने लगा था. दोनों भाइयों ने उन बच्चों के साथ बहुत लड़ाई की, बहुत धमकाया. यहां तक कि लड़ाई की खबर घर तक आ पहुंची थी. मां ने दोनों भाइयों को डांट लगाई थी, अब लड़ने से क्या फायदा?
भाई बोले, ‘हमें कुछ हो जाता कोई बात नहीं, बहन के लिए बरदाश्त नहीं करेंगे.’

अपने बेटों की बात सुन मां का गुस्सा हंसी में तबदील हो गया और उन्हें मारने के लिए उठाया हाथ उन के गालों को खींचे बिना रह नहीं पाया.
समय आगे बढ़ता रहा. पढ़ाईलिखाई और फिर नौकरी की व्यस्तता के चलते भाई आगे बढ़ गए और उन की छुटकी सिम्मी पीछे छूट गई.
बड़े भैया की एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब लग गई. बाद में शादी कर के वे अमेरिका चले गए.
सौरभ भैया ने ग्रेजुएशन के बाद हायर कोर्स करना चाहा पर बाबूजी फीस के पैसे जुटा नहीं पा रहे थे. सौरभ भैया की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने कहीं से थोड़ा सा कर्जा ले कर फीस जमा करवाई. बाद में उन की भी नौकरी लग गई, फिर शादी हो गई.
शादी के बाद बड़े भैया को देख वे भी बाहर जाने के सपने बुनने लगे. मां बिलकुल भी राजी न थीं कि सौरभ भैया भी सचिन भैया की तरह बाहर जा कर अपना घर बसाएं, किंतु अच्छी अपौर्चुनिटी मिलते ही उन्होंने मां को झूठी तसल्ली देते हुए मना लिया. यह भी आश्वासन दिया कि एक निश्चित रकम वे हर माह भेजेंगे. यह सिलसिला 3-4 साल तक तो चला, फिर धीरेधीरे पैसे कम होते चले गए और फासला बढ़ता गया. शायद उन के मन में यह विचार आया कि अब तो सिम्मी की भी नौकरी लग गई है.
मां से एक बार फोन पर बोले थे, ‘यहां बस खानेपीने जितने पैसे रह जाते है और अब हमें अपने भविष्य के लिए भी कुछ सोचना है.’
बड़े भैया भी बाबूजी की मौत पर आए थे तो रूठेरूठे ही रहे, कहने लगे, ‘बाबूजी ने घर तो सिमरन के नाम कर ही दिया है. हमारे लिए किया ही क्या है? सरकारी स्कूल में पढ़ाया, 2 कमरे के घर में पढ़ने तक की जगह न थी. आज मैं जहां भी हूं, अपनी मेहनत के बलबूते पर हूं.’
घर की स्थिति को देखते हुए उन की बात बुद्धिमतापूर्ण न थी. बच्चों को पढ़ाना और अपने लिए छत बनाना छोटी नौकरी वाले इंसान के लिए सहज नहीं था.
दोनों भाई नौकरी के चलते घर से दूर हो गए तो मातापिता की जिम्मेदारी को देखते हुए सिमरन ने शादी करने से इनकार कर दिया. मांबाबूजी के समझने पर भी वह न मानी. बाबूजी ने सोचसमझ कर घर सिमरन के नाम कर दिया.
‘‘दीदी, चाय,’’ रिचा का भावभीना स्वर था.

वह स्मृतियों की सघन धुंध से बाहर आई. आंखें डबडबा आईं. रिचा जबरदस्ती चाय का कप हाथ में थमाते हुए बोली, ‘‘पहले चाय पी लो दीदी, फिर लेट जाना. सिर्फ दो घूंट चाय पी कर वह वहीं पलंग पर लेट गई.
मन के आकाश में छाई यादों की बदलियां उसे कहां सोने दे रही थीं.
दूसरे ही दिन दोनों भाई अपने परिवार के साथ पहुंच गए.
‘‘मां इतनी जल्दी चली जाएंगी, यकीन ही नहीं होता, सिम्मी,’’ सचिन भैया भावविभोर हो कर बोले.
‘‘8 दिन पहले तो मां से बात हुई थी, उन्होंने अपनी तबीयत के बारे में कुछ नहीं बताया,’’ कहते हुए सौरभ भैया की रुलाई फूट पड़ी.
सिमरन सवालिया आंखों से दोनों भाइयों को देख रही थी. ‘‘बाबूजी
की मौत के गए, अब मां की मौत पर आए हैं. कितने संपर्क में थे वे अपनी मां के?’’ मानो, उन से पूछ रही हो. दोनों भाइयों ने सिम्मी को गले से
लगा लिया.
वह निस्पंद खड़ी रही, फिर रुंधे गले से बोली, ‘‘मां को कई रात मैं ने करवटें बदलते देखा है, छत को निहारते हुए आप दोनों की पुरानी बातें, किस्से, यादें बुदबुदाती रहती थीं.’’
दोनों भाभियों ने सिम्मी को सांत्वना दी.
मां और बाबूजी अपने दोनों बेटों के आगे हार गए थे. यह सोच कर सिमरन अपने को सहज नहीं कर पा रही थी.
रिचा ने कंधे पर स्पर्श किया, ‘‘दीदी,’’ सिमरन ने खाली आंखों से उसे देखा. रिचा समझ गई, दीदी अभी सदमे से उबर नहीं पाई है, दुख उस की आंखों में तैर रहा है.
हालांकि आने के बाद दोनों भाई आगे के काम में जुट गए. तेरहवीं की व्यवस्था की सारी कमान दोनों भाइयों ने अपने हाथों में ले ली. सिम्मी दोनों भाइयों से नाराज थी और अपनी नाराजगी छिपाने का भी उस का कोई इरादा न था पर फिर भी उन दोनों के आने से क्यों वह पहले से हलका महसूस कर रही थी? यह सवाल बारबार उस को चुभ रहा था. शायद हर वक्त एक अच्छी बेटी होने की जिम्मेदारी का वहन करतेकरते जो थकान हो गई थी, वह भाइयों के आ जाने से जैसे बंट सी गई.

दोनों भाभियां भी घर के काम में जुट गईं. मेहमानों के ठहरने, खाने की सारी व्यवस्था कर ली गई. सब को शोकपत्रिका भेज दी गई.
तेरहवीं में 3 दिन शेष बचे थे. वह कपड़े उठाने कमरे में गई तो देखा, दोनों भाई और बड़ी भाभी आपस में कुछ बात कर रहे थे. बड़े भैया देखते ही बोले, ‘‘सिम्मी, कोई नाम छूट रहा हो तो बता देना, उन्हें भी शोकपत्रिका भेज देंगे या फोन कर देंगे.’’
‘‘हां,’’ उस ने संक्षिप्त उत्तर दिया. नाराजगी के बादल अभी उस के मन से हटे नहीं थे. वह बाहर जाने को मुड़ी, ‘‘तनिक रुको, सिम्मी,’’ भाभी ने हाथ पकड़ा, ‘‘चिंता न करो, सिम्मी, सब काम अच्छे से करेंगे.’’
वह चुप रही.

तेरहवीं का कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से निबट गया. सब नातेरिश्तेदार चले गए. सब के रहते भी घर में एक सन्नाटा खिंच गया था.
दिन आगे सरकने लगे. रिचा भी कोचिंग जाने लगी.
मां को गए सवा महीना बीत गया. बड़े भैया ने पंडितजी को बुला कर मंत्रोच्चार का एक छोटा सा कार्यक्रम शर्मा अंकल और दोचार घनिष्ठ लोगों की उपस्थिति में करवाया.
8 दिन बाद सिमरन ने औफिस जौइन कर लिया. औफिस में सिमरन लंच के दौरान अपनी दोस्त के साथ बैठी अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालने की कोशिश करती रही, ‘कुछ दिनों बाद भैयाभाभी भी चले जाएंगे.’ ‘बहुत अकेलापन सा फील कर रही हूं.’ ‘सचिन भैया, सौरभ भैया बस अब जाने की तैयारी में होंगे, इतना लंबा रुक गए, यह काफी शौकिंग है’, ‘घर तो काटने को दौड़ता है पर घर से बाहर निकलने की भी हिम्मत नहीं होती.’ ‘विल आई एवर फील बैटर?’
घर लौटते हुए उस ने भैया के बच्चों के लिए टौफी, फ्रूट्स, ड्रौइंगबुक, कुछ गेम्स खरीदे.
घर से कुछ ही दूर थी कि उस ने देखा, घर के बाहर ईंट और रेत से भरी 2 गाडि़यां खड़ी हैं. उस ने जल्दीजल्दी कदम बढ़ाए, ‘‘भैया, भैया, यह बाहर जो सामान आया है, वह किस ने मंगवाया है?’’
‘‘हम ने’’, दोनों भाई एक स्वर में बोले.
‘‘क्यों?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘ऊपर की मंजिल बनवा रहे हैं. अब हम इंडिया में ही रहेंगे. जौब भी यहीं करेंगे. हम सब एकसाथ रहेंगे. हमें अपनी बहन की धूमधाम से शादी भी तो करनी है.’’
दोनों भाई निर्निमेष सिम्मी को देख रहे थे और सिमी विस्फारित नेत्रों से दोनों भाइयों को.
‘‘चल पगली, इस सरप्राइज पर गरमागरम चाय पिला.’’
सब के होंठों पर मुसकराहट तैर गई. Family Story in Hindi

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