Fatty Liver Disease : लिवर शरीर का सब से अहम अंग है जो विषैले तत्त्वों को बाहर निकालता है, पाचन में मदद करता है और ऊर्जा का भंडारण करता है. लिवर की कोशिकाओं में जब 10 प्रतिशत से अधिक हिस्से में फैट जमा हो जाए, तो इसे फैटी लिवर कहते हैं और यह स्थिति काफी चिंताजनक है, जो आगे चल कर जानलेवा सिरोसिस में तबदील हो सकती है.
नवीन कश्यप सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं. कभी उठ कर चूरन की गोलियां खाते हैं तो कभी फ्रिज से ठंडा दूध निकाल कर पीते हैं. मगर पेट और सीने की जलन घंटों शांत नहीं होती. ऊपर से गैस बनती है, जिस के कारण बारबार खाना हलक में आता है. पिछले एक साल से 75 वर्षीय नवीन बाबू इस समस्या से जूझ रहे हैं. रात के खाने के बाद उन को यह परेशानी अकसर होती है. कभीकभी तो वे इसी डर से रात का भोजन स्किप कर देते हैं.
मोनिका वैद्य को भी खाना न पचने की शिकायत अकसर रहती है. खाना खाने के बाद उन को उबकाइयां भी आती हैं. खट्टी डकारें और मुंह में बारबार खट्टा पानी भर आता है. पेट काफी फूलाफूला सा लगता है.
संध्या भसीन पेट की दाहिनी साइड में पसली के नीचे दर्द शिकायत करती हैं. अभी उन की उम्र 40 साल है मगर थकान दिनभर पूरे बदन को जकड़े रहती है. शरीर में ऊर्जा की कमी, हर वक्त नींद का एहसास और थोड़ा सा काम कर लें तो हांफने लगती हैं.
दरअसल, ये सभी लोग फैटी लिवर के शिकार हैं. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम जिन बीमारियों को सब से ज्यादा नजरअंदाज करते हैं, फैटी लिवर उन में सब से ऊपर है. यह बीमारी न तो शुरुआत में जोरदार दर्द देती है, न ही कोई साफ चेतावनी, इसीलिए इसे अकसर ‘खामोश बीमारी’ कहा जाता है. लेकिन खामोशी में पनपती यह समस्या आगे चल कर गंभीर यकृत रोगों का रास्ता खोल देती है.
अभी तक फैटी लिवर को बड़ों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह समस्या तेजी से बच्चों में भी बढ़ती जा रही है. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि आज हर 7 में से 1 बच्चा फैटी लिवर की चपेट में आ रहा है. यह आंकड़ा सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि मातापिता को सतर्क करने के लिए काफी है. बदलती लाइफस्टाइल, मोबाइलटीवी से चिपके रहना, जंकफूड, कोल्डड्रिंक्स और फिजिकल ऐक्टिविटी की कमी ने बच्चों की सेहत पर गहरा असर डाला है.
फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिस में लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है. अगर समय रहते इसे नहीं पहचाना गया तो आगे चल कर यह डायबिटीज, हार्मोनल प्रौब्लम और यहां तक कि लिवर डैमेज का कारण भी बन सकता है.

फैटी लिवर है क्या?
मानव शरीर में लिवर (यकृत) सब से अहम अंगों में से एक है. यह विषैले तत्वों को बाहर निकालता है, पाचन में मदद करता है और ऊर्जा का भंडारण करता है. जब लिवर की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक वसा यानी फैट जमा होने लगती है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. चिकित्सकीय रूप से यदि लिवर के 5–10 प्रतिशत से अधिक हिस्से में वसा जमा हो जाए, तो स्थिति चिंताजनक मानी जाती है.
लिवर में थोड़ी मात्रा में फैट मौजूद होता है, लेकिन अगर यह फैट लिवर के कुल वजन का 10 फीसदी से अधिक हो जाए तो इसे फैटी लिवर माना जाता है और इस से गंभीर शारीरिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं.
फैटी लिवर से हमेशा नुकसान नहीं होता, लेकिन कुछ मामलों में यह अतिरिक्त फैट लिवर में सूजन पैदा कर सकता है. इस स्थिति को स्टीटोहैपेटाइटिस कहा जाता है, जो वास्तव में लिवर को नुकसान पहुंचाता है. जब लिवर में सूजन लंबे समय तक बनी रहती है तो यह सख्त हो जाता है और इस में जख्म हो जाते हैं.
जब लिवर की लगभग 34 से 66 फीसदी कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है तब थकान, पेट में भारीपन या हलका दर्द जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. अगर जीवनशैली में बदलाव नहीं किया गया तो यह स्थिति गंभीर लिवर रोग में बदल सकती है.
फैटी लिवर के एडवांस और गंभीर चरण में लिवर की 66 फीसदी से अधिक कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है. इस स्थिति में सूजन (स्टिएटोहैपेटाइटिस), घाव या जख्म (फाइब्रोसिस) और सिरोसिस जैसे जटिल लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
लिवर में ज्यादा फैट जमा होने पर इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है. ऐसे में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है. क्योंकि ऐसे लोगों का लिवर इंसुलिन के संकेतों को ठीक से प्रोसैस नहीं कर पाता है. फैटी लिवर डिजीज आज की तारीख में सिरोसिस की सब से बद्फी वजह है. लगभग 35 फीसदी लोगों, जिन्हें फैटी लिवर है, में से 25 फीसदी लोगों में इस के बढ़ने और सिरोसिस तक पहुंचने का खतरा होता है. हालांकि, लिवर की कोशिकाओं में फैट के सामान्य स्तर से सिरोसिस तक पहुंचने में लंबा समय यानी 5-10 साल तक लग सकते हैं.

शराब ही नहीं, आदतें भी दोषी
लंबे समय तक यह धारणा रही कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों को होता है. यह आधा सच है. वास्तव में इस के 2 प्रमुख रूप हैं- पहला, अल्कोहौलिक फैटी लिवर जो अत्यधिक शराब सेवन के कारण होता है. दूसरा, नौनअल्कोहौलिक फैटी लिवर जो बिना शराब के, जीवनशैली की गलतियों से होता है. आज भारत समेत दुनियाभर में दूसरा रूप तेजी से फैल रहा है. मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, जंक फूड, मीठे पेय, शारीरिक निष्क्रियता, ये सभी मिल कर लिवर को वसा का गोदाम बना रहे हैं.
शहरी जीवनशैली और बढ़ता खतरा
एसी दफ्तर, घंटों की स्क्रीन, देररात तक जागना और पैकेट वाला भोजन, यही शहरी जीवन का न्यू नौर्मल है. विडंबना यह है कि पढ़ालिखा, संपन्न और स्वस्थ दिखने वाला वर्ग इस बीमारी की सब से बड़ी चपेट में है. फैटी लिवर यह बता रहा है कि आधुनिक विकास का एक कड़वा साइड इफैक्ट भी है.
लक्षण जो अकसर अनदेखे रह जाते हैं
फैटी लिवर के शुरुआती चरण में लक्षण या तो होते नहीं, या इतने सामान्य कि उन्हें थकान मान कर छोड़ दिया जाता है, जैसे लगातार थकान, पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में भारीपन, भूख कम लगना, हलका मतलीपन आदि. समस्या तब गंभीर होती है जब यह लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस और आखिरकार लिवर फेल्योर तक पहुंच जाती है.
जांच और इलाज : दवा से ज्यादा जीवनशैली
फैटी लिवर का पता अकसर अल्ट्रासाउंड, रक्त जांच या विशेष स्कैन से चलता है. लेकिन इलाज की सब से अहम बात यह है कि इस की कोई जादुई गोली नहीं होती है. डाक्टर कहते हैं कि वजन घटाइए, रोज कम से कम 30 मिनट तेज चाल चलिए, मीठा, तला और प्रोसैस्ड भोजन कम कीजिए और शराब से दूरी बनाइए. यानी, इलाज की चाबी अस्पताल से ज्यादा रसोई और दिनचर्या में है.
सुबह अच्छा नाश्ता करें. दोपहर को मध्यम खाना लें और रात का खाना हलका लें. रात का खाना 7 बजे तक खा लें. दूध वाली चाय या कौफी की जगह ब्लैक कौफी पिएं. कई अध्ययनों से पता चला है कि ये फैटी लिवर और असामान्य लिवर एंजाइम के जोखिम को कम करता है.
पत्तेदार सब्जियों का भरपूर सेवन करें, क्योंकि इन में नाइट्रेट और पौलीफेनौल्स की मौजूदगी होती है जो फैटी लिवर को कंट्रोल करने में मददगार होते हैं. आधी प्लेट फाइबर वाले फल, सब्जियां और साबुत अनाज रखें. खाने में दाल, चना, सोयाबीन और मटर जैसी फलियां शामिल करें. ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछली ट्राइग्लिसराइड्स को कम करती है.
क्या न खाएं
खाने में अतिरिक्त चीनी न डालें, कुकीज, बिस्कुट, कैंडी, सोडा, स्पोर्ट्स ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, मिठाई और चौकलेट जैसी चीजों से दूर रहें. तला हुआ और प्रोसैस्ड फूड न खाएं. मछली और लीन मीट को डीपफ्राई करने के बजाय उबालें. प्रोसैस्ड मीट से बचें. फ्राइड चिकन, डोनट्स, चिप्स, बर्गर वगैरह से परहेज करें. प्रोसैस्ड खाद्य पदार्थों में अकसर फ्रक्टोज या हाई फ्रक्टोज कौर्न सिरप जैसी चीजें होती हैं जो फैटी लिवर को बढ़ाती हैं.
अतिरिक्त नमक न लें. यानी, आप ऐसे पैकेज्ड फूड से दूर रहें जिस में ज्यादा नमक होता है. सोडियम का सेवन प्रतिदिन 2,300 मिलीग्राम पर सीमित रखें.
व्हाइट ब्रेड, पिसा हुआ चावल या पास्ता न खाएं. ये शुगर के स्तर को बढ़ा सकते हैं. साबुत अनाज इस प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं क्योंकि इन में फाइबर की मात्रा अधिक होती है.
बहुत ज्यादा खाना न खाएं. ज्यादा खाने से आप के शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी जमा हो सकती है जो आसानी से फैट के रूप में जमा हो जाती है और फैटी लिवर रोग का जोखिम बढ़ जाता है.
सामाजिक चेतावनी भी है फैटी लिवर
फैटी लिवर केवल एक मैडिकल समस्या नहीं, यह एक सामाजिक चेतावनी है. यह बताता है कि हम ने सुविधा को स्वास्थ्य पर, और स्वाद को संतुलन पर भारी पड़ने दिया है. फैटी लिवर का सब से बड़ा खतरा यही है कि यह दिखता नहीं, लेकिन धीरेधीरे अंदर से खोखला कर देता है. समय रहते इसे गंभीरता से लिया जाए, तो यह पूरी तरह पलटने योग्य है. Fatty Liver Disease





