Female Leadership : पुरूषवादी समाज में महिलाओं की योग्यता और क्षमता को कमतर कर के आंका जाता है. राजनीतिक परिवार हो या साधारण घरपरिवार जब भी महिलाओं को अवसर मिलता है वह अपनी काबिलियत को साबित करती हैं.

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महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का विमान दुर्घटना में निधन हो गया था (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी प्रमुख और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद उन की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की नई डिप्टी सीएम बन गई हैं. सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम के पद पर काबिज होने वाली पहली महिला हैं. अजित पवार का 28 जनवरी को विमान हादसे में निधन हो गया था. उन के निधन के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री का पद खाली हो गया था. महाराष्ट्र में शरद पवार की ताकत बढ़ती उस के पहले ही सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम उस रास्ते को बंद करने का काम किया गया. भाजपा नहीं चाहती थी कि पवार परिवार में आपसी एकजुटता हो जिस का नुकसान महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा को उठाना पड़े.

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महाराष्ट्र की नई डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार और भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

सुनेत्रा पवार धाराशिव जिले की रहने वाली हैं. वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं. पद्मसिंह पाटिल और शरद पवार की दोस्ती की वजह से 1980 में सुनेत्रा और अजित पवार का विवाह हुआ. शादी के बाद सुनेत्रा बारामती आ गईं. उस समय अजित पवार दूध का कारोबार करते थे. सुनेत्रा ने अजित पवार के दूध के कारोबार में मदद की. इस के बाद अजित पवार ने अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. 1993 में जब शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तब अजित पवार और सुनेत्रा पवार मुख्यमंत्री आवास यानी वर्षा बंगले में उन के साथ रहने लगे. वहीं सुनेत्रा ने कंप्यूटर चलाना सीखा था.

सुनेत्रा पवार के सामाजिक कार्य की शुरुआत काटेवाड़ी से हुई. यहां उन्होंने स्वच्छता अभियान चलाया था. उस समय काटेवाड़ी में 80 प्रतिशत लोगों के पास शौचालय तक नहीं थे. निर्मलग्राम और फिर ग्राम स्वच्छता अभियान के माध्यम से सुनेत्रा पवार ने लोगों को जागरूक किया. यहां आए बदलाव के बाद सुनेत्रा पवार ने राज्य के 86 गांवों में निर्मलग्राम अभियान का नेतृत्व किया. बारामती में महिलाओं को रोजगार देने के लिए एक टैक्सटाइल पार्क भी शुरू किया. जिस में लगभग 15 हजार महिलाएं काम करती हैं. सुनेत्रा पवार साल 2006 से ही इस टैक्सटाइल पार्क की अध्यक्ष हैं.

इस के साथ ही सुनेत्रा पवार विद्या प्रतिष्ठान नाम के एक शैक्षणिक संस्थान की ट्रस्टी भी हैं. जहां हजारों छात्रछात्राएं पढ़ रहे हैं. सुनेत्रा पवार ने एनवायरनमैंटल फोरम औफ इंडिया नामक एक संगठन की स्थापना की. यह जल संरक्षण और वृक्षारोपण पर काम करती हैं. उन का संगठन पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने का काम भी करता है. अजित पवार नियमित रूप से बारामती आते थे. वहीं सुनेत्रा पवार मुख्य रूप से क्षेत्र में जनसंपर्क का काम संभालती हैं. इसी वजह से बारामती क्षेत्र में उन्हें ‘भाभी’ कहा जाता है. 2024 में सुनेत्रा पवार ने अपनी ननद सुप्रिया सुले के खिलाफ बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और बाद में वह राज्यसभा सांसद बनीं.

मौका मिलने पर हर दौर में आगे रही है महिलाएं :

सुनेत्रा पवार के लिए राजनीति नई नहीं है. अब महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम बन कर वह नई मिसाल बन सकती है. पहला रिकार्ड उन के नाम इस बात का बन चुका है कि वह महाराष्ट्र की पहली महिला सीएम है. देश और विदेश में ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं है जिन्होंने मौका मिलने पर खुद को पुरूषों से बेहतर साबित किया है. सदियों पहले के भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं. इन में से एक नाम क्लियोपेट्रा का भी है जो प्राचीन मिस्र की अंतिम और सब से प्रसिद्ध रानी थीं. क्लियोपेट्रा टालेमिक वंश से थीं. उन्होंने मिस्र के इतिहास और रोमन राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था. क्लियोपेट्रा मैसेडोनियाई वंश की थीं.

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प्राचीन मिस्र की अंतिम और सब से प्रसिद्ध रानी क्लियोपेट्रा का स्टैचू (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

51 ईसा पूर्व में पह रानी बनीं थी. क्लियोपेट्रा के पिता की मृत्यु के बाद सत्ता उस के भाई टालेमी को सौंपी गई, लेकिन उस समय महिलाओं को पुरुष सह शासक के बिना शासन करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए सब से आसान उपाय यही लगा कि क्लियो अपने छोटे भाई से शादी कर ले और साथ मिल कर मिस्र पर शासन करे. वैसे तो यह अजीब बात थी. क्लियोपेट्रा ने यही किया. जब टालेमी 13 वर्ष के हुए तो उन्होंने अपनी बहन/पत्नी के बिना शासन करने का मन बना लिया. उन्होंने क्लियोपेट्रा के विरुद्ध षड्यंत्र रचा, जिस के कारण क्लियोपेट्रा सीरिया भाग गईं, वहां उन्होंने शत्रु खड़ा कर दिया और जल्द ही मिस्र गृहयुद्ध में डूब गया.

रोम में भी गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था, क्योंकि जूलियस सीजर अपने प्रतिद्वंद्वी पोम्पी से लड़ रहे थे. सीजर को हराने में असमर्थ पोम्पी मदद के लिए मिस्र भाग गए. लेकिन टालेमी ने सीजर को प्रभावित करने के लिए उन्हें तुरंत मरवा दिया. इस से सीजर क्रोधित हो गए और स्वयं मिस्र के लिए रवाना हो गए. सीजर ने टालेमी और क्लियोपेट्रा से जानकारी मांगी. उन दोनों को अपने सामने पेश होने का आदेश दिया. क्लियोपेट्रा विवादों के चलते अपने भाई के महल में नहीं आ सकती थीं.

क्लियोपेट्रा चुपके से एक रजाई में लिपट कर महल में दाखिल हुईं और सीजर से अकेले में मिलीं. जूलियस क्लियोपेट्रा की समझदारी से प्रभावित हुए. जल्द ही दोनों एक हो गए. क्लियोपेट्रा ने मिस्र की स्वतंत्रता और शक्ति बनाए रखने के लिए रोम के शक्तिशाली नेताओं, विशेषकर जूलियस सीजर और मार्क एंटनी के साथ रणनीतिक संबंध बनाए. जिस से रोमन राजनीति में उन का प्रभाव बढ़ा. कुछ सालों के बाद रोमन सेनाओं द्वारा पराजित होने के बाद मार्क एंटनी के साथ क्लियोपेट्रा ने आत्महत्या कर ली. जिस के बाद मिस्र रोमन शासन के अधीन आ गया. क्लियोपेट्रा का नाम उस की खूबसूरती, समझदारी और साहस के लिए आज भी याद किया जाता है.

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भारत की पहली मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

भारत में पहली मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान को भी जब मौका मिला तो उन्होंने खुद को साबित किया. वह दिल्ली सल्तनत के शासक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश की बेटी थी. उन का जन्म 1206 में हुआ था. उस समय चंगेज खां की सेनाएं मध्य एशिया को तबाह कर रही थीं. इल्तुतमिश को न्यायप्रिय शासक माना जाता है. इल्तुतमिश जब बूढ़े हुए तो उन्होंने अपनी बेटी रजिया को उत्तराधिकारी चुना. उन्होंने कहा कि उन के बेटे शासन के योग्य नहीं हैं, लेकिन रजिया प्रशासन में सक्षम है. रजिया ने कई मौकों पर प्रशासनिक कामों को संभाल कर अपनी क्षमता साबित की थी.

इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद दरबारियों ने उन की इच्छा के विरुद्ध उस के सौतेले भाई रुक्नुद्दीन फिरोज को सुल्तान बना दिया. फिरोज ने शासन की अनदेखी की और अय्याशी में डूब गया. उस के कुप्रशासन से परेशान जनता और गवर्नरों ने विद्रोह कर दिया. जब फिरोज दिल्ली से बाहर गए तो रजिया ने जनता का समर्थन हासिल किया. फिरोज की सत्ता पलट दी. रजिया ने खिड़की से दुपट्टा लहराते हुए कहा कि मैं महामहिम की बेटी हूं. मुझे ही उन का वारिस चुना गया था. कुछ समय के लिए ताज मुझे दीजिए, अगर मैं असफल रहूं तो गद्दी किसी और को दे देना.

इस तरह 30 साल की उम्र में नवंबर 1236 में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठीं और भारत की पहली महिला शासक बनीं. रजिया ने पर्दा प्रथा तोड़ कर खुले दरबार में शासन किया. उन्होंने महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को स्थापित किया. हालांकि उन का शासन दरबारी षड्यंत्रों और पुरुष प्रधान समाज से जूझता रहा, फिर भी रजिया सुल्तान आज भी साहस और दृढ़ता की मिसाल मानी जाती हैं. हर दौर में महिलाओं को जब अवसर मिले उन्होंने खुद को साबित किया. आज भी पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं की जंग जारी है.

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भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

इंदिरा गांधी से ले कर सुनेत्रा पवार तक :

आजाद भारत में इंदिरा गांधी से ले कर सुनेत्रा पवार तक पुरूषवादी वर्चस्व को तोड़ते हुए महिलाओं ने राजनीति में अपनी जगह बनाई. इंदिरा गांधी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी थी. लेकिन उन को प्रधानमंत्री परिवारवाद के चलते नहीं बनाया गया था. इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर तब मिला जब देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का असमय निधन हो गया. उस समय कांग्रेस के एक गुट ने इंदिरा गांधी का विरोध किया. दूसरा गुट इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया मानता था. उसे लगता था कि इंदिरा गांधी फेल हो जाएगी.

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने खुद को साबित किया. उन की गिनती देश के सफल प्रधानमंत्रियों में की जाती है. बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की पत्नी ने कभी राजनीति नहीं की थी न ही उन का यह शौक था. लालू प्रसाद यादव को जब चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी. राबड़ी देवी ने सफलता पूर्वक काम को संभाला था. पहले राबड़ी देवी को अपना नाम भी लिखना नहीं आता था.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जब जेल जाना पड़ा तो उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी भले ही चंपई सोरेन को दी पर पार्टी की कमान अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को सौंप दी थी. कल्पना राजनीति मे सक्रिय हुई. 2024 में गिरिडीह के गंडे विधानसभा का उपचुनाव जीता. 2024 के लोकसभा चुनाव में कल्पना सोरेन ने इंडिया गठबंधन के लिए प्रचार किया. जिस के प्रभाव से भाजपा को बहुमत के आंकड़ें से पीछे रोका जा सका.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजी रामचन्द्रन की उत्तराधिकारी के रूप में जयललिता ही मशहूर रही है. सही बात यह है कि एमजी रामचन्द्रन के निधन के बाद 7 जनवरी 1988 को उन की पत्नी जानकी रामचन्द्रन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. वह तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी. लेकिन इस के बाद एमजी रामचन्द्रन की पार्टी एआईएडीएमके दो गुटो में बंट गई. जिस के चलते जानकी रामचन्द्रन अपनी बहुमत साबित नहीं कर पाई. 23 दिन के बाद 30 जनवरी 1988 को उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद छोड़ना पडा था.

1989 में चुनावी हार के बाद जानकी रामचन्द्रन ने राजनीति छोड़ दी. उस के बाद जयललिता ने पार्टी को एकजुट किया. 1991 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बनी. इस वजह से जयललिता को एमजी रामचन्द्रन का असली उत्तराधिकारी माना जाता है. ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं है जहां जिस को जैसे अवसर मिला उसने अपनी प्रतिभा दिखाई. उत्तर प्रदेश में अपना दल इस का एक और उदाहरण है. इस के संस्थापक डाक्टर सोनेलाल पटेल कभी न सांसद बन सके न विधायक लेकिन उन के निधन के बाद बेटी अनुप्रिया पटेल ने 2012 में विधानसभा और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता. केंद्र सरकार में मंत्री बनी. दूसरी बेटी पल्लवी पटेल 2022 में विधायक चुनी गई.

बिजनेस को संभालती महिलाएं :

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मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के मातापिता कोकिलाबेन और धीरूभाई अंबानी (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

घरों में काम करने वाली महिलाओं के सामने जब बिजनेस संभालने का अवसर आया तो उन्होंने इसे चुनौती की तरह से लिया और बिजनेस को सही दिशा दी. रिलायंस ग्रुप का नाम 1990 के दशक में बड़ी तेजी से आगे बढ़ा था. इस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी का जुलाई 2002 में निधन हो गया. इस के बाद मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का पद संभाला और उन के भाई अनिल अंबानी ने उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का पद संभाला. दो साल के बाद ही नवंबर 2004 मुकेश और अनिल के बीच झगड़ा सामने आ गया. मुकेश और अनिल की मां कोकिलाबेन की समझदारी के चलते ही रिलायंस ग्रुप का बंटवारा सही तरह से निपट सका.

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ओम प्रकाश जिंदल की पत्नी सावित्री जिंदल (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

सावित्री जिंदल ने पति ओम प्रकाश जिंदल की हेलिकाप्टर हादसे में मृत्यु के बाद जब कारोबार संभाला तो वह 55 साल की थी. सावित्री जिंदल 2021 में 18 अरब डालर की नेटवर्थ के साथ फोब्र्स की शीर्ष 10 लिस्ट में भारत की अकेली अमीर महिला बनी थी. बिजनेस संभालने से पहले सावित्री जिंदल घरेलू महिला थी. 20 मार्च, 1950 को असम के तिनसुकिया कस्बे में जन्मी सावित्री की 1970 के दशक में ओपी जिंदल के साथ शादी हुई थी. वह सफल बिजनेसमैन के अलावा, हरियाणा सरकार में मंत्री और हिसार क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा के सदस्य थे.

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कैफे कौफी डे (सीसीडी) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की पत्नी मालविका हेगड़े (तस्वीर सौजन्य : इंटरनेट मीडिया)

इस तरह के क्रम में एक नाम मालविका हेगड़े का भी है. मालविका हेगड़े कैफे कौफी डे (सीसीडी) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की पत्नी है. 2019 में सिद्धार्थ ने खुदकुशी कर ली थी. कंपनी तब 7000 करोड़ रुपए के कर्ज में थी. 2020 में मालविका ने कैफे कौफी डे की कमान संभाली. वह कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा की बेटी हैं. सिद्धार्थ से शादी के बाद उन्होंने काफी इंडस्ट्री में प्रवेश किया. सीसीडी की स्थापना 1996 में हुई थी. कंपनी ने भारत में खूब नाम बटोरा.

खराब समय आया तो सिद्धार्थ ने खुदकुशी कर ली. तब लगा कि यह कंपनी का अंत हो गया है. इस के बाद मालविका ने कंपनी के सीईओ का पदभार संभाला. सीईओ बनने के बाद मालविका ने सब से पहले कर्ज खत्म करने को ही अपना लक्ष्य बनाया. उन्होंने कौफी के रेट नहीं बढ़ाए लेकिन कई घाटे वाले बिजनेस बंद कर दिए. एक समय पर दिवालिया होन की कगार पर पहुंच चुकी कंपनी मुनाफे में पहुंच गई है.

पत्नियों को समझना चाहिए कारोबार :

ऐसे उदाहरण केवल बड़े बिजनेस घरानों के ही नहीं है. सामान्य परिवारों में भी महिलाएं अपना कारोबार संभाल लेती हैं. डाक्टर अर्चना गुप्ता की पुरानी घड़ियों की दुकान भूतनाथ मार्केट में थी. कोविड में उन के पति का निधन हो गया. 5-6 माह उन की दुकान बंद रही. दुकान किराए की थी. उस का किराया भी बकाया हो गया था. घर में अर्चना की सास और बेटी ही थी. बेटी कालेज में पढ़ रही थी. सास बूढ़ी थी. ऐसे में अर्चना ने दुकान संभाली. उन के अपने घर पर जगह थी तो किराए की दुकान छोड़ कर घर पर ही दुकान शुरू कर दी. अपनी मेहनत से पूरा बिजनेस संभाल लिया.

कुछ इसी तरह से चिकन के कपड़ों का काम करने वाली ममता अग्रवाल ने भी अपने पति के निधन के बाद चिकन कपड़ों के शोरूम को संभाल लिया. पति के समय में उन के पास दो दुकानें थी. ममता अग्रवाल ने आर्थिक संकट से उबरने के लिए अपनी एक दुकान बेच दी. उस से जो पैसे मिले उसे बिजनेस में लगाया. वह कहती हैं ‘बिजनेस में एक महिला के लिए काम करना सरल नहीं होता है. खासकर बकाया पैसे वसूल करना मुश्किल काम होता है. मेरे पति का बहुत सारा लेनदेन आपस में मौखिक रूप से था. वह पैसा डूब गया. इस के बाद भी 2 साल में हम ने अपनी शौप को मजबूत कर लिया है.’

पति की अचानक मौत होने के बाद महिलाओं के लिए बिजनेस संभलाना सरल नहीं होता है. ऐसे में उन को पति के साथ कारोबार में दखल देना चाहिए. जिस से जरूरत पड़ने पर वह कारोबार को संभाल सके. कई बार इस तरह के मौके आने पर महिलाएं बिजनेस से अधिक धर्मकर्म पर भरोसा करने लगती है. कई महिलाएं टूट जाती हैं.

हमारे समाज में आज भी विधवा महिलाओं को ले कर दोहरा नजरिया रखा जाता है. उन को अपशगुनी माना जाता है. उन के चरित्र को ले कर भी सवाल उठाए जाते हैं. महिलाओं को इस तरह के दकियानूसी विचारों की परवाह न करते हुए आगे बढ़ना चाहिए. जिन महिलाओं ने दकियानूसी और रूढ़िवादी विचारों को त्याग कर आगे कदम बढ़ाए हैं वह सफल हुई हैं. Female Leadership

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