UGC New Rules 2026 :

क्यों पढ़ें? – यूजीसी की गाइड लाइन्स ने जो हंगामा मचाया था वह सुप्रीम कोर्ट के स्टे से भले ही ठंडा पड़ा हो लेकिन इस बहाने समाज का कडवा सच तो एक बार फिर उजागर हुआ कि हम जातिवाद के घोड़े पर सवार होकर विश्वगुरु बनने का दिवास्वप्न देखने की मूर्खता कर रहे हैं और इसी के तहत चाहते हैं कि दलित पिछड़े और आदिवासी अपनी बदहाली को पूर्वजन्म के कर्मों का फल और भाग्य मानते उसे बर्दाश्त करते रहें.

शिक्षा में उत्पीड़न तो द्वापर युग से ही शुरू हो गया था जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा ही गुरुदाक्षिणा में ले लिया था. इस का और कोई दूसरा प्रमाण इसलिए नहीं मिलता कि शूद्रों को पढ़ने की इजाजत ही नहीं थी. गुरुकुलों में ऊंची जाति वाले ही पढ़तेपढ़ाते थे. आजादी के बाद हालात थोड़े बदले तो सवर्णों को दिक्कत होने लगी जो यूजीसी की नई गाइडलाइन आने के बाद फिर दिखी थी.

यह सब अचानक नहीं हुआ है बल्कि पिछले 10-12 साल से जो तरहतरह की प्रताड़नाएं खासतौर से तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षित कोटे के छात्रों के प्रति बढ़ रहीं थी उन्हें रोकने की एक और कोशिश थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया है. यह वही सुप्रीम कोर्ट और वही जस्टिस साहबान हैं जिन की टिप्पणियां जिन्हें कटाक्ष कहना बेहतर होगा, बारबार यूजीसी को कटघरे में खड़ा कर रहीं थीं.

यह सिलसिला जिस पर 13 जनवरी 2026 के बाद बवंडर मचा की शुरुआत दरअसल में 20 सितंबर 2019 से हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तडवी की मांओं द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किए थे. याचिका में शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया गया था.

इन दोनों ने मांग की थी कि अन्य संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने मजबूत और कारगर मैकेनिज्म बनाया जाए. इसी याचिका की एक और अहम सुनवाई 3 जनवरी 2025 को हुई थी. इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव का डेटा मांगा था.

अपनी याचिका में इन दोनों ने यह मांग भी की थी कि कोर्ट यूजीसी को इस बाबत हिदायत दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 की गाइडलाइन को सख्ती से लागू किया जाए इस पर बेंच ने यूजीसी को यह हिदायत भी दी थी कि वह इक्वल अपार्चयुनिटी सेल यानी समान अवसर प्रकोष्ठों की स्थापना के संबंध में विश्वविद्यालयों से आंकड़ें इकट्ठा कर पेश करें और 2012 के नियमों के तहत प्राप्त शिकायतों की कुल संख्या के साथसाथ की गई कार्रवाई भी की रिपोर्ट भी पेश करें.

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यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ युवाओं का विरोध-प्रदर्शन.

इस के बाद कोर्ट ने 28 फरवरी 2025 को एक अहम टिप्पणी यह की थी कि यूजीसी के पास दोषियों को सजा देने के अधिक अधिकार देने चाहिए. रोहित और पायल की मां को आश्वस्त करते कोर्ट ने कहा था कि हम इस मुद्दे से निबटने के लिए एक मजबूत तंत्र बनाएंगे और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएंगे. इस दिन इन दोनों की अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट को बताया था कि आप के आदेश के बाद भी विश्वविद्यालयों और कालेजों ने अपने परिसरों में होने वाली आत्महत्याओं को डेटा अभी तक पेश नहीं किया है.

16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को हिदायत दी थी कि वह जाति आधारित उत्पीड़न रैगिंग यौन शोषण और लिंग, विकलांगता या दूसरी पहचानों पर आधारित भेदभाव को रोकने के लिए अपने मसौदे नियमों को अंतिम रूप देते वक्त रोहित वेमुला की मां राधा वेमुला और पायल तडवी की मां अबेदा सलीम तडवी द्वारा 2019 में दायर अपनी रिट में पेश सुझावों को शामिल करें.

इन दोनों द्वारा पेश प्रमुख सुझावों में एक सुझाव यह भी शामिल था कि यदि जाति समुदाय प्रवेश परीक्षा की रैंक या शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर छात्रावासों, कक्षाओं, प्रायोगिक बेंचों या प्रयोगशालाओं का आवंटन भेदभाव का कारण बनता है तो ऐसा नहीं किया जाए. 13 जनवरी 2026 के बाद गाइडलाइन पर जो बवाल सवर्णों ने काटा उस की अहम और इकलौती वजह यह थी कि यूजीसी की गाइडलाइन श्रेष्ठी लोगों के नहीं बल्कि दो दलित महिलाओं के सुझाव पर बनी थीं. जिन्होंने यह सुझाव भी दिया था कि गठित की जाने वाली कमेटियों में कम से कम 50 फीसदी सदस्य आरक्षित कोटे के हों और समिति का अध्यक्ष भी इन्हीं में से कोई एक हो.

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बैंच को यूजीसी ने बताया था कि 2004 से 2024 के बीच अकेले आईआईटी में 115 आत्महत्याए हुईं हैं तो सुप्रीम कोर्ट का लहजा यह कहते तल्ख हो उठा था कि ऐसे मामलों पर अदालत वक्त पर सुनवाई करेगी. लेकिन यूजीसी को 2012 के नियमों को हकीकत में बदलने के लिए एक सिस्टम खोजना या बनाना होगा. 29 जनवरी के स्थगन आदेश की टिप्पणियां देख लगता है कि सब से बड़ी अदालत ने पलटी खाने के मामले में नेताओं को भी पछाड़ दिया है.

इस के बाद 17 सितंबर 2025 को बहुत सख्त लहजे में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को यह भी निर्देश दिया था कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए तैयार किए जा रहे नए नियमों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए`प्रभावी सुरक्षा उपायों` पर विचार करें.

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यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सड़कों पर उतरे दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा वाले संगठन.

लागू किये तो मचा बवंडर

जब यूजीसी ने`प्रभावी सुरक्षा उपाय` गाइडलाइंस की शक्ल में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के प्रचार के विनिमय 2026 के मसौदे में 13 जनवरी 2026 को जारी कर दिए तो न जाने क्यों विनीत जिंदल, मृत्युंजय त्रिवेदी और राहुल देव सरीखे सवर्णों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्य बागची की बेंच ने उन्हें नकारते हुए 29 जनवरी के स्टे आर्डर में कहा –

– जाति आधारित भेदभाव क्या होता है इस संबंध में यूजीसी के 2026 के नियमों को स्थगित रखा जाएगा. 2012 के नियम लागू रहेंगे. ये प्रावधान प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इन का दुरूपयोग किया जा सकता है.

– यदि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया तो इस से खतरनाक प्रभाव पड़ेगा और समाज विभाजित हो जाएगा.

– जातिविहीन समाज की स्थापना के संदर्भ में हम ने जो कुछ भी हासिल किया है क्या अब हम पीछे जा रहे हैं.

-भारत को उस स्थिति में नहीं जाना चाहिए जहां अमेरिका की तरह अश्वेत और श्वेत बच्चों के लिए अलग स्कूल हुआ करते थे. भगवान के लिए.. आज हमारे समाज में अंतरजातीय शादियां हो रही हैं हम खुद हौस्टल में रहे हैं जहां सब साथ रहते थे. आधुनिक संस्थानों में विभाजन की कोई जगह नहीं होना चाहिए.

– दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर से आने वाले छात्रों की संस्कृति का उपहास उड़ाना सब से खतरनाक है जो लोग दूसरों की संस्कृति से परिचित नहीं हैं वे अकसर इसे निशाना बनाते हैं.

2012 और 2026 के नियमों में बड़ा फर्क मचे बवंडर में साफसाफ नजर नहीं आया लेकिन कुछ तो था जो इतना धुंआ उठा. इसे समझने बस एक ही नियम समझ लेना काफी है जिस से समझ यह भी आएगा कि भाषा तो दरअसल में तब अस्पष्ट थी 2026 में तो सब कुछ स्पष्ट भाषा में लिखा गया था –

– शिक्षण संस्थानों में समानता प्रकोष्ठ बनाए जाएं जिन का काम शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब कास्ट के छात्रों की शिकायत सुन कर कार्रवाई करते उन्हें हल करना होगा.

इस भाषा में बड़ी खामी यह थी कि इस में कोई बाध्यता नहीं थी. मसलन यह कि यदि शिक्षण संस्थान समानता प्रकोष्ठ न बनाएं तो यूजीसी उन का क्या बिगाड़ लेगा. दूसरे इस में कार्रवाई की कोई समय सीमा नहीं थी. अलावा इस के यह भी साफ नहीं था कि कितने और किस तरह के अधिकारी शिकायतों की सुनवाई और जांच करेंगे. 14 साल हुआ यह कि एक ही अधिकारी जिसे भेदभाव विरोधी अधिकारी कहा गया शिकायतें सुन और निबटा रहा था. निबटाने का यह मतलब नहीं कि वह कोई सख्त सजा दे रहा था बल्कि संबंधित संस्था प्रमुख से कार्रवाई की सिफारिश कर रहा था.

यानी ये नियम बेहद औपचारिक और टरकाऊ थे. हालांकि इन में भी यह स्पष्ट नहीं था कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की परिभाषा क्या होगी. इस में ओबीसी तबके का जिक्र भी नहीं था जिसे अब पीड़ित वर्ग में शामिल कर लिया गया था.

जब बदलाव हुए तो…

यूजीसी ने ये तमाम खामियां दूर करते एक अधिकारी की जगह पूरी कमेटी बनाने का फरमान सुना डाला जिस के 10 सदस्यों में महिला और विकलांग सहित आरक्षित तीनो वर्गों के प्रतिनिधि का होना अनिवार्य था. यानि 5 से ले कर 7 तक सामान्य जाति के हो सकते थे. एक नया प्रावधान यह जोड़ा गया जो फसाद की बड़ी वजह बना था कि अब पीड़ित वर्गों में ओबीसी के छात्रों को भी शामिल कर लिया गया था.

समय सीमा की खामी दूर करने नई गाइडलाइन में निर्देश दिया कि समितियों को 24 घंटे चलने वाली इक्विटी हेल्पलाइन संचालित करना होगी. 24 घंटे के अंदर बैठक करनी होगी और 15 दिन में अपनी रिपोर्ट पेश करना होगी. अगर ऐसा नहीं होता है तो यूजीसी को यह अधिकार होगा कि वह संबंधित संस्थान की मान्यता रद्द कर दे, उस की ग्रांट रोक दे और डिग्री देने का हक भी छीन ले.

बाकी सब जस का तस था लेकिन इस बदलाव के माने कुछ इस तरह निकाल कर रोए गाए मानों सवर्ण या अनारक्षित छात्रों को देश निकाला दे दिया गया हो. हवा यह उड़ाई गई कि समितियों में केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के अधिकारी ही रहेंगे जबकि ऐसा नहीं था. कहा यह गया था कि संस्थान प्रमुख समिति का अध्यक्ष होगा. यानी उस के आरक्षित अनारक्षित होने से कोई फर्क नहीं पड़ना था.

नोटिफिकेशन में इतना भर कहा गया था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधत्व सुनिशिचित हो. जिस का मतलब होनहार सवर्णों ने यह प्रचारित किया कि इस में तो सवर्णों के प्रतिनिधि न होना सुनिश्चित किया जा रहा है. यानी अब कैटेगिरी` वाले जैसा चाहे हमें नचाएंगे. इस बाबत बेहद काल्पनिक और खतरनाक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए गए थे जिन से गलतफहमी फैली.

अब अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी तब तक 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे लेकिन यह जानना और समझना भी जरूरी और अहम है कि आखिर यह सब करने और होने की नौबत आई ही क्यों?

वजह बने रोहित और पायल

यह सुनवाई जैसा कि ऊपर बताया गया है, एक तरह से श्रृंखलाबद्ध थी. जो रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तडवी की मां अबेदा सलेम तडवी की तरफ से साल 2019 में दायर की गई जनहित याचिका के संबंध में हो रही थी. गौरतलब है कि इन दोनों ने ही जातिगत प्रताड़ना से तंग आ कर आत्महत्या की थी. जिस की वजह शैक्षणिक संस्थानों में पसरा जातिगत भेदभाव था जिसे ये होनहार दलित युवा तय है गैरत के चलते बर्दाश्त नहीं कर पाए थे.

पीएचडी कर रहे रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के होस्टल के अपने कमरे में आत्महत्या की थी. तब इस पर खूब बवंडर मचा था और देश भर में तगड़ा विरोध हुआ था क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे और आंबेडकर स्टूडैंट्स एसोशिएशन नाम के संगठन के सदस्य थे वह उन पांच छात्रों में शामिल थे जिन्हें होस्टल से बाहर निकाल दिया गया था. इन छात्रों पर आरोप था कि इन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र पर हमला किया था. हैदराबाद यूनिवर्सिटी ने अपनी शुरुआती जांच के बाद इन पांचों को क्लीनचिट दे दी थी लेकिन बाद में द्रोणाचार्य और एकलव्य वाला खेल खेलते फैसले को पलट दिया था जिस से दुखी, व्यथित और आहत रोहित ने गुरुदाक्षिणा में अपनी जान ही दे दी थी.

26 वर्षीय स्मार्ट डाक्टर पायल तडवी टोपीवाला नेशनल मेडिकल कालेज मुंबई की छात्रा थी जो बीवाईएल नायर चैरिटिबल अस्पताल में गायनिक विषय की रेजीडैंट डाक्टर थी. पायल मूलतय मुस्लिम तडवी भील समुदाय से थी जिस ने सांगली जिले के मिराज मेडिकल काल्र्ज से डिग्री ली थी और फिर आगे पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई थी. पायल ने 22 मई 2019 को होस्टल के अपने कमरे में आत्महत्या कर ली थी.

पायल ने आत्महत्या करने के पहले अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि अनुसूचित समुदाय से ताल्लुक रखने के चलते सीनियर डाक्टर्स द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था. इन आरोपियों के नाम हैं हेमा आहूजा, अंकिता खंडेलवाल और भक्ति मेहरे. होस्टल में रहने वाली एक आदिवासी डाक्टर लड़की किस कदर मानसिक परेशानियों से गुजर रही थी इस का अंदाजा लगाना जरूरी है कि आप खुद को उस की जगह रख कर देखें. इस के बाद भी उस मानसिकसामाजिक तनाव का दसवा हिस्सा भी महसूस नहीं कर पाएंगे.

पायल ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या की गई थी यह तय कर पाना भी उस की मानसिक पीड़ा समझ पाने सरीखा मुश्किल है क्योंकि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ था कि उस के गले पर चोट के निशान थे. दूसरे उस का सुसाइड नोट मोबाइल फोन से स्क्रीनशौट या फोटो के रूप में बरामद हुआ था जिस के चलते यह शक गहराया था कि आरोपियों को उस की आत्महत्या की जानकारी थी और उन्होंने ही हस्तलिखित सुसाइड नोट उड़ा दिया गया होगा लेकिन यह अंदाजा उन्हें नहीं था कि पायल उन की इस तरह की चालाकियों से भी वाकिफ थी इसलिए उस ने अपने लिखे का फोटो खींच लिया था लिहाजा सनद रही और वक्त पर काम भी आई अभी इस मुकदमे में कार्रवाई चल रही है.

दलित आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के पास तो जातिगत अपमान और प्रताड़ना से बचने सहूलियत भरा रास्ता यह रहता है कि वे उस जगह से भाग जाएं. फिर चाहे वह होस्टल हो लाइब्रेरी हो, कैंपस हो या फिर कैंपस के आसपास का कोई अड्डा हो जहां छात्र इकट्ठा होते हैं.

लेकिन पायल जैसी लड़कियों के पास तो यह मौका भी नहीं रहता जो अकेली घुटती रहती हैं और भाग नहीं सकतीं. अपने सुसाइड नोट में पायल ने तीनों आरोपियों के नाम सहित उन के द्वारा दिए जाने वाले जातिगत तानों का भी जिक्र किया है. ऐसे में यूजीसी की नई गाइडलाइन बेहद कारगर साबित होतीं जिन की धमक से ही सामान्य वर्ग के छात्रों के होश यह सोचते फाख्ता हो गए थे कि अब कोई कमैंट्स भी कसा तो लेने के देने पड़ जाएंगे. लिहाजा छोटी जाति वालों को तंग करने की आदत उन्हें छोड़नी ही पड़ेगी.

स्टे पर जश्न

स्टे और्डर आते ही इस वर्ग के छात्र सड़कों पर जुलूस की शक्ल में अबीरगुलाल उड़ाते दिखे थे मानो सीमा पर जा कर दुश्मन के सैनिकों को खदेड़ आए हों. देश में जातिवाद का जहर कितना और किस कदर पसरा है और यह जहर घोलने वाले दरअसल में हैं कौन लोग. इस का एहसास उस वक्त भी हुआ था जब अयोध्या में साधुसंत भी स्टे और्डर के बाद कथित रूप से ही सही जश्न मनाते दिखाई दिए थे.

एक संत सीताराम दास के मुताबिक जिस तरह सड़कों पर यूजीसी की नई गाइडलाइंस का विरोध हो रहा था उसे देखते सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय और स्वागत योग्य है अब यह कौन सी तपस्या और भक्ति है यह तो इन का भगवान कहीं हो तो वही जाने क्योंकि कोई सीताराम या राधाकृष्ण उस वक्त मुंह नहीं खोलता जब कहीं कोई रोहित या पायल तंग आ कर आत्महत्या कर रहे होते हैं.

जाति है फसाद की जड़

रोहित और पायल की मांओं की याचिका में यह मांग भी की गई थी कि इस भेदभाव को खत्म करने के लिए एक मजबूत मैकेनिज्म बनाया जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर चुका था.

राधिका वेमुला और अबेदा सलेम तडवी की तरफ से नामी वकील इंदिरा जयसिंह ने पैरवी की थी जो 29 जनवरी की कार्रवाई में भी शामिल थीं. इस दिन भी उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया था कि कोर्ट में 2019 से एक याचिका लंबित है जिस में 2012 के नियमों को चुनौती दी गई है उन की जगह ही 2026 के नियम लाए गए हैं. मैं ने ऐसे उदाहरण दिए हैं जहां छात्रों को अलगअलग होस्टल्स में रखा गया, इसे पहले से लंबित याचिका से अलग कर के नहीं देखा जा सकता. यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस दिन उन की एक न सुनी जबकि जनवरी 2025 की सुनवाई में उन की हर दलील और बात से इत्तफाक रखा गया था.

इस सुनवाई के बाद उन की जूनियर दिशा वाडेकर ने मीडिया को बताया था कि अदालत के आदेश में हमारे सभी सुझाव दर्ज किए हैं और यूजीसी को निर्देश दिया है कि वह हमारे सुझावों को शामिल करते हुए इक्विटी इन हायर एजुकेशन रैगुलेशंस 2025 को 8 सप्ताह के भीतर अधिसूचित करे. यह और बात है कि इस में एक साल लग गया लेकिन जब यूजीसी की गाइडलाइन आई तो सवर्ण समुदाय में कुछ इस तरह हाहाकार मच गया मानों 13 जनवरी की गाइडलाइन ने ब्राह्मण से शास्त्र, क्षत्रियों से शस्त्र, वैश्यों से बहीखाते और कायस्थों के हाथ से कलम छीन ली हो.

अब भले ही ये प्रतीक चिन्ह इन जातियों की पूरी पहचान न रह गए हों लेकिन इन के सरनेम ही इन के रुतबे सहित मानसिकता बता देते हैं. शर्मा, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी से सिंह और राजपूत से होते जैन, श्रीवास्तव, माथुर, सक्सेना, अग्रवाल, गुप्ता और बंसल जैसे सरनेम अपने आप में अपर कास्ट यानी मुख्यधारा के होने के न केवल सर्टिफिकेट बल्कि अगुवा होने के लाइसैंस भी होते हैं.

उलट इस के यादव, कुशवाह, अहिरवार, वाल्मीकि, निषाद, जाटव और विश्वकर्मा जैसे सरनेम हीनता और पिछड़ेपन का एहसास कराते हैं. जातिवादी मानसिकता की जड़ धर्म, वर्ण व्यवस्था और पौराणिक साहित्य से जन्में यही सरनेम हैं जो तख्ती की तरह हर गले में लटके हुए हैं. इन से ही तय किया जाता है कि किस सरनेम वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाना है.

जाति की पहचान कठिन हो

ये सरनेम अहम इसलिए भी है कि अब आप किसी को उस के कपड़ों, पहनावे और डीलडौल से नहीं पहचान सकते कि सामने पड़ गया आदमी किस जाति का है या किस जाति का हो सकता है. आजकल सभी साफसुथरे कपड़ें पहने हुए हैं, जूते और टाई सभी इस्तेमाल कर रहे हैं सभी के शरीर से परफ्यूम और टेलकम पाउडर की खुशबू उड़ रही है और तो और हावभाव और बौडी लैंग्वेज भी बदल गई है. दलित अब हरिया, बुद्धा, घसीटा या रामसेवक नहीं रह गया है जिस के रूखे बाल, सूखे होंठ, घुटनों तक बंधी मैलीफटी धोती पांव नंगे या फिर प्लास्टिक के चप्पलजूते से लिपटे अब नहीं रहे.

एक दौर था जब नाम के अलावा सरनेम से जाति पहचान ली जाती थी. अगर कोई राम ‘दास’ है तो वह दलित ही होता था. उलट इस के राम`सिंह` ठाकुर और राम`कुमार` वैश्य होता था. आजादी के बाद दलितों ने भी रामकुमार लिखना शुरू कर दिया तो पहचान कठिन होने लगी लेकिन अपनी भगवान टाइप की पहचान बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने रामचंद्र लिखना आज तक नहीं छोड़ा. दलितों ने अपने नाम के आगे कुमार, लाल और प्रसाद लिखना शुरू कर खुद को दासत्व से निकालने की कोशिश शुरू की तो यह उन का स्वाभिमान और गुलामी सूचक और हीनता भरे उपनामों से उबरने का सामाजिक तरीका ही था.

लेकिन इस से भी ज्यादा अहम बात दलितों के बंधे हाथों का खुल जाना रही उन के चेहरे से दयनीयता गायब हो गई है एवज में ठसक आई हो या न आई हो लेकिन हीनता भरा ही सही आत्मविश्वास जरूर आ गया है. किसी रसूखदार के घर के सामने से गुजरते पांव में अगर जूतेचप्पल हों तो उन्हें सर पर रख कर गुजरने का दौर भी विदा हो गया है. फिर स्तन टैक्स मटकी गले में लटका कर और पीछे झाड़ू बांध कर चलना तो कड़वे अतीत की बातें हैं.

यानी प्रताड़ना के लिए सहारा सरनेम का लिया जाता है. जब यह बात दलित युवाओं को समझ आई तो उन्होंने अपने मूल सरनेम बदल कर नाम के आगे कुमार लगाना शुरू कर दिया 70-80 के दशक में यह टोटका खूब चला था.  लेकिन धीरेधीरे गायब भी हो गया क्योंकि इस देश में आप एक दफा आंख का काजल छिपा सकते हैं लेकिन जाति नहीं छिपा सकते.

हालिया मचे बवंडर से परे यूजीसी को इस पर विचार करना चाहिए कि 2012 के बाद 2026 की भी गाइडलाइन जिन्हें हालफिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पोस्टपोन कर दिया है से कुछ खास हासिल नहीं होने वाला. इसलिए क्यों न कालेजों में दाखिला लेने वाले सभी छात्रों के सरनेम ही गायब कर दिए जाएं या उन्हें एक सा नहीं तो 3-4 तरह के सरनेम लौटरी सिस्टम से दे दिए जाएं मसलन कुमार, नाथ, प्रसाद, लाल और चंद्र. इस से होगा यह कि किस से कैसे पेश आना है की मानसिकता खत्म होने लगेगी और जातिवादी लोग हतोत्साहित भी होंगे.

ध्वस्त हुआ हिंदू राष्ट्र का ख्वाब

यूजीसी की नई गाइडलाइन से भी जातिवादी ही हतोत्साहित होते दिखे लेकिन बेहद बौखला कर हुए क्योंकि उन से कोटे के छात्रों को बेइज्ज्त करने का मौका छीन लिया गया था. कैसे छीन लिया गया था इस के पहले यह समझना जरूरी है कि इस बाबत वे नरेंद्र मोदी और भाजपा को क्यों कोसते नजर आए.

यूजीसी की गाइडलाइन जारी होते ही एक ही झटके में सवर्णों के देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के सपने ध्वस्त हो गए थे. जिस के माने उन के लिए यह भर होते हैं कि अब फिर सवर्णों का और उस में भी खासतौर से ब्राह्मणों का राज होगा. कहां तो मुट्ठी भर सवर्ण यह आस लगाए बैठे कि मोदी सरकार आज नहीं तो कल जातिगत आरक्षण बंद करेगी और एट्रोसिटी एक्ट भी खत्म कर देगी. लेकिन हुआ उल्टा तो सवर्ण एकदम से तिलमिला उठे और मोदी के नाम पर भाजपा को वोट देने पर खीझते भी नजर आए.

इस की दूसरी वजह यह भी थी कि एससी, एसटी और ओबीसी तबका सोशल मीडिया पर जम कर सवर्णों की सामूहिक खिल्ली उड़ा रहा था. खुद सवर्ण भी मान रहे थे कि मोदी के कट्टरवादी और मंदिर वादी तेवर देख कर ही उन्होंने भाजपा सरकार चुनी थी. नरेंद्र मोदी का इतना मजाक शायद ही पहले कभी उड़ा होगा. उन्हें उन की जाति से संबोधित करते हुए ‘तेली’ इस तंज के साथ कहा गया कि इस जाति के आदमी का चेहरा सुबहसुबह देखने से दिन बिगड़ जाता है.

जहां तक बात उच्च शिक्षण संस्थानों की है तो तेजी से वहां का माहौल बदला है. उन में रिजर्व कोटे के छात्रों की संख्या दशक दर दशक और साल दर साल बढ़ी है इस बात को विभिन्न एजेंसियों के आंकड़ें बयां भी करते हैं.

इंडियन इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमैंट उदयपुर की टीम के एक हालिया सर्वे की मानें तो उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों की संयुक्त हिस्सेदारी साल 2022 – 23 में क्रमश 38, 16 और 6.8 फीसदी यानी कुल 60.8 फीसदी हो गई है जो कि 2011 – 12 में 43.1 फीसदी थी. अकेले 2023 में इन वर्गों के छात्रों के नामांकनों की संख्या सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या के मुकाबले 95 लाख ज्यादा थी.

इसी दौरान सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 57 फीसदी से घट कर 2023 में 39 फीसदी पर सिमट गई. इस में ईडब्ल्यूएस कोटा यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सामान्य छात्र भी शामिल हैं. इस स्टडी के तहत 4 करोड़ 38 लाख छात्र और देश भर के 60380 शिक्षण संस्थान शामिल थे.

80 – 90 के दशक में उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गों के छात्रों की संख्या 15 – 20 फीसदी ही होती थी लेकिन अब इस वर्ग में जागरूकता बढ़ी है. युवा डिग्री ले कर सरकारी या गैरसरकारी नौकरियों में पहले के मुकाबले ज्यादा जा रहे हैं जिस से उन का जीवन स्तर सुधर रहा है. इन के बापदादों ने हाड़तोड़ मेहनत कर देश की तरक्की में अपना योगदान दिया था अब इन के युवा पढ़लिख कर योगदान दे रहे हैं. यानी पीढ़ियों से ये वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.

लेकिन आर्थिक स्तर सुधरने का यह मतलब कतई नहीं है कि इन की सामाजिक हैसियत भी बढ़ रही है, मैनिट भोपाल के दलित तबके के एक सीनियर प्रोफेसर की माने तो सभी की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी है बल्कि बमुश्किल 2 फीसदी की ही बेहतर हुई है. लेकिन इस के बाद भी वे अब पहले से ज्यादा भेदभाव और प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं क्योंकि उन के पास पैसा जो आ रहा है. इस पैसे पर कल तक सवर्ण अपना हक समझते थे.

यूजीसी की गाइडलाइन के मद्देनजर सवर्ण छात्रों की यह कुंठा और भड़ास विरोध की शक्ल में सामने आए थे क्योंकि घोषित और उजागर तौर पर वे नतीजों में भी पिछड़ रहे हैं जिस की अहम वजह दरअसल में कोटे वालों का बहुसंख्यक होना है. अब दौर उन का है तो विरोध और भड़ास के मुद्दे तो ढूंढे ही जाएंगे. जैसे समाज में मुट्ठी भर सवर्ण दलित, पिछड़ों आदिवासियों को धकियाते लतियाते रहते हैं वही उच्च शिक्षण संस्थानों में भी होता है तो इस में हैरत की बात क्या.

यूजीसी के ही आंकड़ों के मुताबिक उस के अधीन शिक्षण संस्थानों में 2019 – 2020 में आरक्षित छात्रों की प्रताड़ना के 173 मामले दर्ज किए गए थे जो 2023 – 24 में बढ़ कर 378 हो गए थे. इन पांच सालों में कुल 1052 शिकायतें दर्ज की गई थीं. इस आंकड़े में जाहिर है ओबीसी के छात्रों की शिकायतों की संख्या नहीं है क्योंकि उन्हें शिकायत दर्ज कराने का अधिकार ही नहीं था. होस्टल्स में आरक्षित वर्ग के छात्र अगर जातिगत घुटन महसूस करते हैं तो सुकून से पढ़ने के लिए वे शहर में किराए के कमरे या मकान ढूंढने लगते हैं जो छोटी जाति का होने के चलते उन्हें नहीं मिलता. नतीजतन उन्हें दलित बस्तियों में रहना पड़ता है जहां का माहौल पढ़ाई के लिहाज से अनुकूल नहीं होता. इस के बाद भी ये युवा डिग्री ले कर सरकारी या प्राइवेट नौकरी से लग जाते हैं तो भी सवर्णों की भौंहें चढ़ जाती हैं कि अरे ये तो कोटे वाला है सरकारी दामाद है वगैरहवगैरह. यानी जातिगत प्रताड़ना शास्वत है जो श्मसान घाट तक पीछा नहीं छोड़ती.

ऐसे में यूजीसी की नई गाइडलाइन अपनी जगह ठीक थीं जिस से आरक्षित वर्ग के छात्र सम्मान और स्वभिमान से पढ़ सकें किसी को रोहित वेमुला, पायल तडवी और आईआईटी मुंबई के दलित छात्र दर्शन सोलंकी की तरह खुदकुशी करने मजबूर न होना पड़े.

यह सब नई बातें नहीं हैं. देश यह मानसिकता सदियों से देख और भुगत रहा है. उस की पहचान टैक्नोलौजी न हो कर यही जातिवाद है जिस से बाहर आने की कोई भी कोशिश उसे नागवार गुजरती है. सवर्णों का उबाल शबाब पर आने को ही था कि 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन गाइडलाइंस पर स्टे और्डर दे दिया. लेकिन यह ट्रीटमैंट नहीं है बल्कि अनेस्थिया है. लगता ऐसा है कि सुप्रीम कोर्ट भी सवर्णों के हल्ले से दबाव में आ गया था. ठीक वैसे ही जैसे अयोध्या के विवादित ढांचे को राममंदिर करार देते आस्था के नाम पर आया था.

अब क्या होगा?

स्टे के बाद सामान्य छात्र जश्न मना रहे हैं तो उन सहित सभी को यह समझ आ रहा है कि अब होना जाना कुछ नहीं है. क्योंकि वाकई में कुछ होने का वक्त और मौका दोनों स्टे की बलि चढ़ गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी और सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. 19 मार्च को याचिकाकर्ताओं की सुनवाई भी होगी जाहिर है और तारीखें भी लगेंगी. तबतक 2012 के नियमों के तहत कार्रवाई होगी जिन की भाषा अस्पष्ट नहीं थी.

इस का राजनीति पर कोई खास असर पड़ेगा ऐसा भी नहीं लग रहा क्योंकि सवर्ण कितना ही भाजपा और नरेंद्र मोदी को कोस लें उन के सिवा कोई विकल्प उन के पास है नहीं. यह जरूर है कि मोदी की साख पर बट्टा लगा है और सवर्ण भी उन्हें अब शक की निगाह से देखने लगा है दलित आदिवासी और पिछड़े तो लोकसभा चुनाव में बता चुके हैं कि उन्हें इन दोनों पर ही भरोसा नहीं. लेकिन उन के पास दर्जनों क्षेत्रीय और एक राष्ट्रीय विकल्प हैं.

इन कयासों के भी कोई खास माने नहीं कि कमेटी में अब कौन और कैसे लोग रहेंगे और क्या वे सामान्य वर्ग के छात्रों को उस खतरे से सुरक्षा दिला पाएंगे जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं वास्तविक खतरा तो एकलव्य से ले कर रोहित, पायल और दर्शन जैसे छात्रों को रहता है जो जाति के साथसाथ पैसे से भी गरीब होते हैं.

उन की आंखों में कारें और भव्य फ्लैट्स खरीदने के नहीं बल्कि पेरैंट्स के दुःखदर्द दूर कर देने के सपने रहते हैं. वे किसी 5 स्टार होटल में हजारों का डिनर करने की नहीं सोचते बल्कि परिवार सहित 150 रुपए की मारवाड़ी थाली खाने की सोचते हैं और इस के लिए भी सवर्णों वाले सस्ते होटल में भी जाने से डरते हैं कि कहीं कोई टोक न दे या जाति न पूछ ले. इस के बाद भी कहा यह जाता है कि अब कहां जातपात और छुआछूत है, अब कहां भेदभाव और प्रताड़नाएं हैं. अब तो सब बराबर हैं और सब हिंदू हैं.

बात सही भी है कि अब तो सब हिंदू हैं क्योंकि जातपात की विदाई आरएसएस और भाजपा कह देने मात्र से हो गई है. इन के कह देने भर से सवर्ण दलित उसी तरह भाईभाई हो गए हैं जैसे कभी हिंदू और मुसलमान भाईभाई हुआ करते थे.  सब खुश हैं. हिरण और शेर एक घाट पर पानी पी रहे हैं. यानी देश हिंदू राष्ट्र बन चुका है अब बस विश्वगुरु के खिताब के ऐलान का इंतजार किया जा रहा है.

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