Religious Hypocrisy : ‘‘दुनिया के कानून का डर इंसान के अंदर की हैवानियत खत्म नहीं कर सकता, यह धर्म से ही मुमकिन है.’’ धर्मवादियों की यह बात बहुत ही दिलचस्प है लेकिन क्या यह तर्क सही है? इस के लिए धर्म के पाप और पुण्य की व्याख्या को समझना होगा. यह भी देखना होगा कि धर्म के बताए अच्छे और बुरे कर्म कौनकौन से हैं जिन पर इनाम या सजा मिलेगी.
धर्मों की नैतिकता के माने क्या हैं? सभी धर्मों में अच्छे कर्मों की फिलौसफी अलगअलग है. नमाज पढ़ना इसलाम के अनुसार अच्छा कर्म है, इस में दूसरों के लिए क्या नैतिकता है? इसलाम के अनुसार सब से उत्कृष्ट कर्म है ईमान लाना यानी इसलाम के 5 अरकानों पर विश्वास करना तब ही आप अल्लाह के रिवार्ड के हकदार होंगे वरना नहीं.
अब जो भी आदमी इसलाम की इस फिलौसफी को नहीं मानता वह अल्लाह के रिवार्ड का हकदार नहीं है. इस का अर्थ यह है कि वह गुनाहगार है और ऐसे किसी भी आदमी, जो इसलाम पर यकीन नहीं रखता, के लिए जन्नत हराम है और जिस आदमी पर जन्नत हराम है, मतलब वह दोजख में ही जाएगा.
इसलाम के अनुसार आप कितना ही अच्छा काम करें अगर आप मुसलमान नहीं हैं तो सब व्यर्थ है. आप को अल्लाह का रिवार्ड चाहिए तो मुसलमान होना पड़ेगा. अब बताइए कि इसलाम की फिलौसफी में नैतिकता या मानवता वाली कौन सी बात है? यह सिर्फ धार्मिक दुकानदारी का मामला है. कबाड़ी की दुकान में भी कुछ चीजें काम की मिल जाती हैं. नैतिकता की कुछ चीजें दिखा कर धर्म अपने भक्तों को बरगलाता है कि इस दुकान का ही माल बढि़या है.
ईसाइयत के अनुसार, जीसस ईश्वर के पुत्र हैं. यदि आप इस बात पर यकीन रखते हैं तभी आप यहोवा के रिवार्ड की उम्मीद कर सकते हैं वरना आप गुनाहगार हैं और आप का पकौड़ा बनाने के लिए जहन्नुम में तेल से खौलती कढ़ाही तैयार है. जीसस यहोवा के पुत्र हैं. वे सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन फिर से जीवित हो उठे थे.
आखिरी दिन सभी इंसानों का हिसाब होगा. जो भी व्यक्ति ईसाइयत के इन ढकोसलों पर ईमान नहीं रखता वह पापी है. चाहे वह दुनिया में कितना भी अच्छा काम कर ले कोई फायदा नहीं वह तो तला ही जाएगा. जहन्नुम की आग से बचना हो तो चर्च को पैसे दें और स्वर्ग (यदि कहीं है तो) में सीट बुक करें.
हिंदू धर्म वर्णव्यवस्था पर आधारित है. इस में 4 वर्ण हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. चारों वर्णों के कर्म अलगअलग हैं. गीता के अनुसार, आप को इस जन्म के अच्छे कर्मों का फल अगले जन्म में मिलता है. ब्राह्मण के लिए उस का कर्म है ज्ञान देना और दक्षिणा प्राप्त करना. क्षत्रिय के लिए उस का धर्म है ब्राह्मण के बनाए नियमों का पालन करना और दान देना. वैश्य का कर्तव्य है व्यापार व खेतीबाड़ी करना और शूद्र का धर्म है ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना.
तुलसीदास कहते हैं, ‘पूजहिं विप्र सकल गुण हीना, शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा.’ बताइए गीता की इस फिलौसफी में नैतिकता क्या है? एक वर्ग को दान मिलता रहे. एक वर्ग दूसरों से लूट कर दान देता रहे और बाकी के निचले वर्ग अपने से ऊपर वालों की सेवाएं करते रहें, इस में क्या महानता है?
धर्म हमें कैसे नैतिक बना सकता है?
इंसानों को नैतिक बनाए रखने के लिए धर्मों का बनाया पाप और पुण्य का कौन्सैप्ट आज के वैज्ञानिक युग में अपनी प्रासंगिकता पूरी तरह खो चुका है. जो लोग रिवार्ड के लिए अच्छा काम कर सकते हैं वे लोग पैसों के लिए बुरा काम भी कर सकते हैं.

सुपारी ले कर किसी का मर्डर करने वाले भी तो यही करते हैं. लालच में किए या करवाए जाने वाले काम में कहीं कोई नैतिकता नहीं होती. अगर आप किसी डर की वजह से बुरा काम नहीं करते, इस का अर्थ है कि यदि डर न हो तो जरूर आप बुरा काम करेंगे. इस में भी नैतिकता वाली कोई बात नहीं है. इस फिलौसफी के आधार पर तो आप पूरी तरह भ्रष्ट साबित होते हैं. यदि आप का व्यक्तित्व रिवार्ड या सजा के हिसाब से तय होता है तो इस का अर्थ यह है कि आप का अपना कोई कैरेक्टर है ही नहीं.
धर्मों की नैतिकता असल में मुल्ला, मौलवियों, पादरियों और पुरोहितों के स्वार्थों पर आधारित है. इस में इंसानियत वाली कोई बात नहीं. दानदक्षिणा के नाम पर मंदिरों की दानपेटियों को भरने में कौन सी नैतिकता है? चंदे और जकात के पैसों से मजारों, मसजिदों या मदरसों को आलीशान बनाने से मानवता का क्या कल्याण होता है?
धर्मों की नैतिकता पूरी तरह पुरोहितों की धार्मिक व्यावसायिकता से जुड़ा हुआ मामला होता है. इस से आम जनता का नहीं बल्कि धर्म के ठेकेदारों का हित पूरा होता है, इसलिए हर धर्म अपनी तथाकथित नैतिकता का ढिंढोरा पीटता है.
असल में नैतिकता या मानवता का संबंध धर्म से है ही नहीं. धर्म किसी को नैतिक बनाने की गारंटी कभी दे ही नहीं सकता बल्कि धर्म केवल भक्त ही पैदा कर सकता है और भक्त के लिए अच्छा कर्म उस के धर्म की परिधि तक ही सिमटा होता है. ऐसे व्यक्ति से मानवता या नैतिकता की उम्मीद करना भी व्यर्थ है. ऐसा आदमी अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरे की जान लेने से पीछे नहीं हटेगा क्योंकि मजहब की हिफाजत उस के लिए अच्छा कर्म है. नैतिकता या मानवता का कौन्सैप्ट तो सार्वभौमिक होता है और इस के लिए किसी भी धर्म की जरूरत नहीं होती है.
किसी भूखे को खाना खिला देना मानवता है. किसी को संकट से बचा लेना मानवता है और यह मानवीय गुण इस बात पर निर्भर है कि आप कितने संवेदनशील हैं. आप की संवेदनाएं ही आप को प्रेम, भाईचारा, सहयोग और ईमानदारी के लिए प्रेरित करती हैं और आप की इन संवेदनाओं का आप के धर्म से दूरदूर तक कोई संबंध ही नहीं है. ये मानवीय गुण हैं जो सभी में होते हैं.

धर्म है तो अनैतिकता क्यों?
एक बेटे ने अपनी मां को ही हवस का शिकार बना लिया. मां चीखती रही और बेटा उस की अस्मत को नोंचता रहा. 4 सितंबर, 2024 को पंजाब केसरी में छपी इस खबर के मुताबिक राजस्थान के बूंदी जिले में एक व्यक्ति को अपनी मां से दुष्कर्म करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. पुलिस के अनुसार, यह घटना उस समय हुई जब 28 वर्षीय आरोपी अपनी 52 वर्षीया मां के साथ गांव में अपने घर लौट रहा था. इस घटना में आरोपी को अगले जन्म में सूअर बनने का डर क्यों नहीं रोक पाया?
17 मई, 2025 को द न्यूज पोस्ट में प्रकाशित खबर के अनुसार, एक पिता ने दोस्त के साथ मिल कर नाबालिग बेटी का दुष्कर्म किया. रांची की इस खबर में एक बाप अपनी नाबालिग बेटी के साथ गलत काम करता है और अपने दोस्तों को भी अपनी बेटी शेयर करता है. इन दोनों घटनाओं में अपराधियों को उन का धर्म या ईश्वरीय सजा का डर क्यों नहीं रोक पाया?
इंसानियत के लिए किसी धर्म की जरूरत नहीं
इंसान के अंदर छिपी नैतिकता या इंसानियत को बाहर निकलने के लिए किसी भी रिवार्ड की जरूरत नहीं है और खुदा का खौफ या दोजख का डर इंसान के अंदर छिपी हैवानियत को कभी खत्म भी नहीं कर सकता.
इंसान आज भी धर्म के नाम पर कत्लेआम कर रहा है. हैवान बना हुआ है. इस खूबसूरत दुनिया को धर्म और धर्म पर आधारित पाखंडवादी व्यवस्था ने ही बरबाद किया हुआ है. आतंकवाद, बम धमाके और मौबलिंचिंग की घटनाएं वही लोग अंजाम देते हैं जिन की संवेदनाओं को धर्म ने मार दिया है. ये सब अमानवीय घटनाएं धार्मिक इंसान ही करता है. ऐसे तमाम आतंकवादी और जातिवादी लोग नास्तिक नहीं होते.
धर्मों के बनाए सभी नियमों को उन धर्मों के ही 99 प्रतिशत लोग फौलो नहीं करते और तब इतना बुरा हाल है. धर्मों के बताए या बनाए अच्छे व बुरे कर्मों के कौन्सैप्ट पर यदि 10 प्रतिशत लोग भी चलने लग गए तो समझिए पूरी दुनिया को नरक बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म के प्रति किए गए अत्याचारों से इतिहास के पन्ने रंगे हुए हैं. इन अच्छे कर्मों के दौरान जो लोग मारे गए उन्हें इस का रिवार्ड मिला कि नहीं, यह आज तक कोई बताने नहीं आया. दूसरे धर्मों के प्रति नफरत की बात छोडि़ए, एक ही धर्म के लोगों ने अपने ही मजहबी भाइयों के प्रति हैवानियत की हदें पार की हैं. इजराइल और गाजा में धर्म के नाम पर हजारों मारे गए हैं. जिन्होंने मारा क्या वे नैतिकता के पुतले हैं क्योंकि उन्होंने अपने धर्म की रक्षा की?

पिछले 1,400 वर्षों में शिया और सुन्नियों ने एकदूसरे को काटा और आज भी दोनों एकदूसरे को खुदा के पास भेजने पर उतावले हैं. क्या यही है उन के अच्छे कर्मों की व्याख्या? ईरान, इजराइल, रूस, यूक्रेन धर्म को मानने वाले देश हैं पर इन में आज नैतिकता कहीं भी दिख नहीं रही.
संत रविदास, ज्योतिबा फुले, राहुल सांस्कृत्यान, राधामोहन गोकुलजी, मुंशी प्रेमचंद, सुरेंद्र कुमार शर्मा, संतराम बीए, ललई सिंह, रामस्वरूप वर्मा, महाराज सिंह भारती और रामास्वामी पेरियार जैसे सैकड़ों महापुरुषों ने हिंदू धर्म के तथाकथित अच्छे कर्मों की बहुत ही तार्किक व्याख्या की है. इस धर्म के बारे में डा. अंबेडकर ने लिखा कि ‘यह धर्म नहीं है बल्कि गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.’
परमेश्वर की दया का राग आलापने वाले ईसाइयों ने अपने ही लोगों के प्रति दया और करुणा को ताक पर रख दिया था. 1853 में बैतलहम के चर्च की पवित्र चाबी को हासिल करने की खातिर ईसाइयों के तीनों संप्रदाय आपस में लड़ मरे. ढाई साल तक चले इस खूनी जंग में तकरीबन 10 लाख ईसाइयों को ईसाइयों ने ही मौत के घाट उतार डाला. ईसाइयत के लिए जो लोग मरे उन्हें कौन सा रिवार्ड मिला या जिन्होंने कत्ल किया उन्हें कौन सी सजा मिली?
नैतिकता कहां से आती है?
मानवता, करुणा, न्याय, प्रेम, सहयोग और नैतिकता आदि सब हमारी अपनी समझ, परवरिश और कुछ हद तक हमारे जीन्स पर आधारित होता है. साथ ही क्रूरता, बेईमानी और आपराधिक मनोवृत्ति भी हमारी परवरिश, समझ और हमारे जीन्स पर ही आधारित हैं.
इंसान के अंदर अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के जीन्स मौजूद होते हैं और पारिवारिक परिवेश, देश, काल और परिस्थिति ये सभी कारक मिल कर एक इंसान के वजूद को तैयार करते हैं.
इस का अर्थ यह नहीं कि हमारे पिता एक अच्छे इंसान हों तो हम भी अच्छे ही होंगे या वे बुरे हों तो हम भी बुरे ही होंगे. एक डाकू का बच्चा एक अच्छा प्रोफैसर साबित हो सकता है और एक प्रोफैसर का लड़का चोर हो सकता है. यह भी जरूरी नहीं कि जो चोर है उस के अंदर नैतिकता, मानवता नहीं होगी और यह भी जरूरी नहीं कि जो प्रोफैसर या डाक्टर है वह भ्रष्ट नहीं होगा. एक चोर भी संवेदनशील हो सकता है और एक डाक्टर भी क्रूर हो सकता है.
आज की दुनिया को धर्म और उस की फिलौसफी की कोई जरूरत नहीं है. आज शिक्षा, जागरूकता, ज्ञान, मनोविज्ञान, न्याय व्यवस्था और वैज्ञानिकता से इंसान के अंदर की नैतिकता को निखारा जा सकता है और उस के अंदर की हैवानियत को नियंत्रित किया जा सकता है.
क्या बच्चों और जानवरों में संवेदनाएं होती हैं?
यूट्यूब पर एक वीडियो है जिस में एक बच्चे की छोटी सी साइकिल से एक मुरगी का बच्चा घायल हो गया. वह छोटा बच्चा मुरगी के बच्चे को ले कर सीधे हौस्पिटल पहुंचा और डाक्टर से उसे ठीक करने के लिए निवेदन करने लगा. एक छोटा सा बच्चा किस रिवार्ड को पाने के लिए लालायित था या कौन से धर्मग्रंथ को पढ़ कर उस ने ऐसा किया?
इस मासूम बच्चे ने तो धर्म की किसी किताब को नहीं पढ़ा. इसे जन्नत और दोजख का भी इल्म नहीं. फिर इस ने ऐसा क्यों किया? वह बच्चा चाहता तो उस चूजे को वहीं छोड़ कर भाग सकता था. बच्चा था, उसे कौन टोकता और इंसानों की इस भीड़ में न जाने कितने इंसान रोज कुचले जाते हैं. एक मामूली सा चूजा कुचला भी जाता तो इस से किसी को क्या फर्क पड़ता?
उस बच्चे ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उस में संवेदनाएं थीं और संवेदनाएं मानव के लाखों वर्षों के सामाजिक विकास में इवौल्व हुई हैं. इन मानवीय संवेदनाओं के लिए किसी भी धर्म की जरूरत नहीं पड़ती और न ही इस के लिए किसी रिवार्ड की जरूरत होती है. इसी तरह जो लोग गलत काम करते हैं उन्हें किसी ईश्वर, खुदा या भगवान का डर कभी नहीं रोक सकता.
यूट्यूब पर एक और वीडियो में एक कुत्ता नजर आता है जो पानी में डूबते हुए खरगोश की जान बचा लेता है. यह कुत्ता कौन से धर्म को मानता है? इस कुत्ते को कौन सी जन्नत चाहिए? अगर वह उस डूबते हुए खरगोश को नहीं बचाता तो उसे कोई टोकता भी नहीं क्योंकि वह तो कुत्ता है न? फिर उस ने ऐसा क्यों किया?
यूट्यूब के एक और वीडियो में दिखता है कि किनारे पर रेत में फंसे एक कछुए के बच्चे को एक कौआ अपनी चोंच में उठा कर समुद्र में डाल देता है जिस से कछुए के बच्चे की जान बच जाती है. कौन से रिवार्ड को पाने के लिए इन जानवरों ने ऐसा किया? इन के पास कौन सी आसमानी किताब थी? क्या इन्होंने जन्नत के लालच में ऐसा किया?
मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना
दुनिया का सब से बड़ा झठ यह नहीं है कि ‘ईश्वर है’ बल्कि एक और झठ है जो इस झठ से भी ज्यादा प्रचलित है और वह है ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ यह इतना बड़ा झठ है जिस के टक्कर का दूसरा कोई झठ नहीं और आश्चर्य की बात है कि इस झठ पर लगभग सभी धर्मों की एकता है. इन धर्मों के बीच चाहे जितना भी सिरफुटौवल हो लेकिन अपने झठ को बचाने की खातिर सब एक हो जाते हैं.
इंसानियत, नैतिकता, करुणा, प्रेम और सहयोग की भावना हर इंसान में छिपी होती है. जरूरत है उस मानवीय गुण को बाहर निकालने की. तभी हम मनुष्य कहलाने के हकदार साबित हो सकते हैं. इस के लिए हमें किसी रिवार्ड की जरूरत नहीं है. एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में आप का योगदान ही तय करेगा कि आप कितने नैतिक हैं. आज के बदलते दौर में नैतिकता और मानवता की सर्वोच्च पहचान यही हो सकती है कि आप में कितनी संवेदनाएं मौजूद हैं.
आज हमें वर्षों पुरानी उन सभी घेराबंदियों को तोड़ देना चाहिए जो हमें इंसान बनने से रोकती हैं, जो दूसरे के दर्द को समझने में रुकावटें पैदा करती हैं. आज हमें उन सभी दीवारों को उखाड़ फेंकना चाहिए जो हमें हैवान बनाती हैं. आज इंसान बनने के लिए उन सभी रेखाओं का मिट जाना जरूरी है जो हमें हिंसक भेड़ों की भीड़ बनाती हैं. जिस दिन ये बंदिशें खत्म होंगी उसी दिन यह संपूर्ण धरती हमारी मां होगी, देश हमारा घर होगा, मानवता हमारा धर्म बन जाएगा और तब, दुनिया में केवल दो ही जातियां होंगी- सिर्फ मर्द और औरत.
करुणा, प्रेम, समर्पण, सहयोग और मानवता पर आधारित उस नई सामाजिक व्यवस्था में किसी को नैतिक होने के लिए या अच्छा कर्म करने के लिए किसी खुदा के रिवार्ड की जरूरत नहीं होगी.
धर्म का अर्थ अगर आप किसी तत्त्व के गुण या स्वभाव से करते हैं तब तो यह बिलकुल प्राकृतिक चीज है जिसे छोड़ना या अपनाना दोनों ही बातें बेकार हैं. जल का गुण है कि वह गीला ही करेगा. अग्नि का गुण है कि वह जलाएगी. कुत्ते का गुण है कि वह मांस खाएगा. मदिरा का गुण है कि वह बहका देगा. उल्लू और चमगादड़ का गुण है कि वह निशाचर प्राणी है. इंसान का गुण है कि वह एक सामाजिक प्राणी है.
अगर मनुष्य के धर्म का तात्पर्य उस के इस नैचुरल गुण से है तब इस को छोड़ने या अपनाने की बात ही गलत है. लेकिन ईश्वर पर आधारित धर्म को अपनाने से कोई बेहतर इंसान नहीं बनता और ऐसे धर्म को छोड़ने से मनुष्य पशुतुल्य नहीं होता बल्कि यह तो मानसिक विकारों की वह स्थिति है जो हमें विरासत में मिलती है जिसे हम धर्म समझ कर गधे की तरह ढोते चले जाते हैं. इस हिसाब से इसे लादे रहने वाला पशुतुल्य हुआ न?
इन मानसिक विकारों के बोझ को उतार फेंकने वाला ही मनुष्य कहलाने का हक रखता है न कि इसे अंधभक्तों की तरह ढोने वाला. ज्यादातर धार्मिक देशों में इंसान जानवरों से भी बदतर स्थिति में हैं. इस के उलट, जिन देशों में धार्मिकता की मानसिक बीमारी जितनी कम है वहां के लोग उतने ही ज्यादा खुशहाल हैं. Religious Hypocrisy





