Parental Care :

क्यों पढ़ें – क्या कानून पेरैंट्स की बुढ़ापे में सेवा को विशेष अधिकार मानता है और क्या सेवा करने वाली संतान को वसीयत न होने पर कुछ ज्यादा मिलता है, यह जानिए इस लेख से. कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं, पढ़ें.

करोगे सेवा तो मिलेगी मेवा यह कहावत कहने सुनने में ही अच्छी लगती है नहीं तो मांबाप की सेवा करने वाले उन की मौत के बाद हाथ मलते ही नजर आते हैं. सेवा है तो उस का मूल्य भी होना चाहिए कोरे आशीर्वाद, नैतिकता प्रशंसा और पुण्य से सेवा करने वाली संतान के नुकसान की भरपाई नहीं होती.

हर समाज में मांबाप की सेवा को पुण्य का काम बताया गया है जबकि है यह जन्म देने वालों और परवरिश करने वालों के प्रति कृतज्ञता प्रगट करना. बुढ़ापे में जब मांबाप अशक्त हो जाएं तो संतान उन का सहारा बन कर उन की सेवा करते उन्हें आरामदायक जिंदगी दें. ऐसा होता भी है कि अधिकतर संताने तनमनधन से पेरैंट्स की सेवा शुमार और देखभाल करती हैं, लेकिन इस के अपवाद भी कम नहीं.

कई संतानें बेहद क्रूर होती हैं उन्हें बूढ़े मांबाप बोझ लगने लगते हैं तो वे मांबाप को या तो घर से ही निकाल देती हैं या फिर घर के किसी कोने में पटक कर उन के साथ जानवरों सरीखा व्यवहार करने लगती हैं. लेकिन इन से बहुत ज्यादा संख्या उन संतानों की है जो लोकलाज और रिश्तेदारी सहित समाज के डर और दबाब में मांबाप की सेवा कुढ़कुढ़ कर करते हैं. 20 फीसदी संताने ही होंगी जो मांबाप की सेवा को अपना कर्तव्य समझ उन की सेवा निस्वार्थ भाव से करती होंगी.

चिंता की बात अब सामाजिक डर या लिहाज और दबाव का कम होते जाना भी है. तेजी से खुलते वृद्धाश्रम तो इस की गवाही देते ही हैं लेकिन समस्या किस हद तक और कैसे बढ़ रही है इस का खुलासा तेलंगाना सरकार का हालिया एक फैसला भी करता है. जिस में कहा गया है कि जो संताने मांबाप की देखभाल नहीं करती हैं उन की सैलरी का 10 फीसदी हिस्सा काट कर पेरैंट्स के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. जाहिर है यह फैसला तेलंगाना सरकार के कर्मचारियों पर ही लागू होगा. बाकियों को इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

इस फैसले से एक और अहम बात यह भी उजागर होती है कि मांबाप की सेवा में पैसा एक बड़ा फैक्टर होता है. जिस का असर अलगअलग तरीके से पड़ता दिखाई देता है. मसकन जिन मांबाप के पास खासी जायदाद और दौलत होती है उन की संतानें लालच के चलते सेवा में कोताही नहीं बरतती क्योंकि इस के लिए उन्हें अपनी जेब से पैसा नहीं खर्च करना पड़ता. दूसरे यह लालच भी काम करता है कि बस कुछ दिनों की ही तो बात है इन के बाद तो सारी जमीनजायदाद सोना और नगदी अपनी हो ही जानी है. इसलिए सेवा घाटे का नहीं बल्कि मुनाफे का सौदा है.

किस के लिए है घाटे का सौदा ?

घाटे का सौदा इन संतानों के लिए है जो अपना सुख, कैरियर, ग्रहस्थी और तरक्की के मौकों को दांव पर लगा कर मांबाप की सेवा करती हैं. बूढ़े मांबाप की सेवा और देखभाल कोई आसान काम नहीं है इस में बहुत कुछ खोना पड़ता है लेकिन अगर बहुत कुछ खोने के बाद पता चले कि मिला कुछ नहीं तो कोफ्त होना स्वभाविक बात है. यह कोफ्त उस वक्त कलह में तबदील हो जाती है जब सेवा करने वाली संतान को अपने ठगे जाने का अहसास होता है. यह अहसास कितना तकलीफदेह होता है इसे कुछ उदाहरणों से समझें तो महसूस होता है कि वाकई यह ज्यादती है सेवा करने वाले को अतिरिक्त कुछ मिलना चाहिए था. क्योंकि उस ने त्याग की मिसाल कायम की थी.

विदिशा के 55 वर्षीय एक सभ्य सभ्रांत अधेड़ जगदीश अग्रवाल ( बदला हुआ नाम ) की मानें तो वह दो भाई और एक बहन हैं. भाईसाहब 18 की उम्र में ही इंदौर इंजीनियरिंग कालेज पढ़ने चले गए थे और डिग्री मिलने के तुरंत बाद ही उन्हें सैंट्रल गवर्नमैंट की नौकरी भी मिल गई तो वे मथुरा चले गए. उन की शादी बड़े धूमधाम से हुई. शादी के बाद वे होलीदीवाली विदिशा आते रहे जो धीरेधीरे कम होता गया. क्योंकि भाभी भी सैंट्रल गवर्नमैंट की एम्प्लाई थी और शादी के तीन साल बाद उन्हें पहला बच्चा भी हो गया था फिर तीन साल बाद एक बेटी भी हुई तो आना जाना खत्म सा हो गया.

वक्त यूं ही गुजरता गया, हमें उन की मजबूरी समझ आती थी इसलिए विदिशा आने कभी अनावश्यक दबाव किसी ने नहीं बनाया. नौकरी लगने के बाद दो साल वे घर पांच हजार रुपए महीने के भेजते थे जो शादी के बाद बंद हो गए थे. क्योंकि उन की जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं इसलिए खुद बाबू जी ने उन्हें इस बाबत मना कर दिया था. इस बीच मेरी और छोटी बहन की भी शादी हो गई. बहन की शादी में उन्होंने 50 हजार रुपए बाबू जी के हाथ पर रखे थे और मेरी शादी में 25 हजार खर्च किए थे.

यहां तक और इस के बाद तक भी जायदाद को ले कर कोई खटपट नहीं हुई थी. बाबू जी गल्ले के मझौले व्यापारी थे और अपनी जिंदगी में ठीकठाक कमाई उन्होंने कर ली थी. उन की अच्छी बात यह थी कि वे जमीनें खरीदते रहते थे. शहर के बाहर 3 प्लौट भी उन्होंने खरीदे थे जिन की कीमत बढ़ती ही रही थी. इस तरह उन की मौत के वक्त तक हमारे पास कोई 2 करोड़ की जमीनें और एक पुश्तेनी मकान था. बीकौम करने के बाद मैं उन के कारोबार में हाथ बंटाने लगा था.

एक बार बाबू जी जो बाथरूम में गिरे तो स्थाई रूप से बिस्तर से लग गए. क्योंकि उन की कूल्हे की हड्डी टूट गई थी. मेरे सर तिहरा भार आ पड़ा था बाबू जी की देखभाल और इलाज के अलावा व्यापार का भी और घर का भी. बच्चे स्कूल जाने लगे थे अब तक पढ़ाई बहुत महंगी भी हो गई थी. बाबू जी की बीमारी और अशक्तता में भाई साहब दो बार ही देखने आए एक बार तब जब उन का औपरेशन हुआ था और दूसरे तब जब उन्हें हार्टअटैक आया था. दोनों बार उन्होंने फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी न ही यह पूछा कि इलाज में खर्च कितना हो गया. लेकिन दोनों ही बार वे मेरी पीठ थपथपा कर गए कि तुम्हारी किस्मत और कर्म अच्छे हैं जो तुम्हें मांबाप की सेवा करने का मौका मिल रहा है. मैं तो सरकारी नौकरी में फंस गया. बच्चे भी नौकरों के सहारे पल रहे हैं. तब मेरा भावुक हो जाना स्वभाविक बात थी और मैं यह सोच कर खुद को तसल्ली दे लिया करता था कि उन के हिस्से की सेवा और काम भी मैं कर रहा हूं. इस में हर्ज क्या है आखिर उन की मजबूरी है.

अब से कोई 5-6 साल पहले बाबू जी की हालत लगातार गिरने लगी थी और अम्मा को भी तरहतरह की बीमारियों ने घेर लिया था. अब दोनों को ही हर कभी डाक्टर और अस्पताल की जरूरत पड़ने लगी थी जिस के चलते दुकान हर कभी बंद करना पड़ती थी या फिर मुनीम और नौकरों के भरोसे छोड़ना पड़ती थी जिस से घाटा होने लगा था. एक वक्त तो ऐसा भी आया था जब दुकान कहने को ही रह गई थी.

इन परेशानी के दिनों में पत्नी और मैं शिफ्टों में अम्मा बाबू जी की सेवा शुमार करते थे. बाबू जी के साथ तो रातरात भर जागना पड़ता था कि कब उन्हें किस चीज की जरूरत पड़ जाए और उन का डायपर ज्यादा गीला होने पर समय पर बदला जाए. तब दिलोदिमाग पर मांबाप की सेवा का ऐसा जूनून था कि समाज के लोग और रिश्तेदार मुझे कलयुग का श्रवण कुमार कहने लगे थे मैं भी अपनी तारीफ सुन कर चने के झाड़ पर चढ़ जाया करता था. लेकिन जमा पैसा खत्म हो रहा था और नया पैसा आना कम हो चला था. कई बार तो ब्याज पर पैसा उठाना पड़ा.

इस दौरान भाई साहब ने कभी मदद नहीं की यह और बात है कि लिहाज और गैरत के अलावा यहां है तो की सोच के चलते मैं ने भी नहीं मांगी जो कि मेरी गलती साबित हुई. मैं अब तक यह मानने लगा था कि यहां का जो कुछ भी है वह मेरे लिए है क्योंकि भाई साहब ने दिल्ली में बड़ा सा बंगला खरीद लिया था और इधरउधर भी वे इन्वैस्ट करते रहते थे अगर यह सोचना मेरा लालच था तो मैं उस लालच पर भी पछताता रहता हूं.

मैं ने तो मान लिया था लेकिन उन्होंने नहीं माना था इसलिए बाबू जी के सिधारते ही उन की जायदाद का हिसाब मांगने लगे और तेरहवी के दूसरे दिन ही बराबर बंटवारे की बात चार रिश्तेदारों के सामने कर दी. सभी ने उन का समर्थन भी किया. बहन ने कुछ भी लेने से मना कर दिया था.

मैं उन के बदले तेवर देख सकते में था और अकेले में बहुत रोया. कुछ दिन में ही घर जमीनों के दो हिस्से हो गए और अपना हिस्सा बेचने वे एक ब्रोकर को भी अपाइंट कर गए. ये मेरे लिए दूसरा झटका था बेचने का जिम्मा वे मुझे भी दे सकते थे इस से शहर और समाज में मेरी बात बनी रहती पर उन्होंने मुझ पर भरोसा नहीं किया.

कुछ दिन बाद जब मैं संभला तो मैं ने रिश्तेदारी और समाज में अपना रोना रोया कि मैं तो बाबूजी की सेवा में लुट गया. दिन देखा न रात देखी, सर्दीगर्मी, बरसात की परवाह किए बगैर हम पतिपत्नी सेवा में लगे रहे. कमाई और मुनाफे के कई मौके छोड़े और अम्माबाबूजी दोनों की सारी रिश्तेदारी निभाई उस में भी पैसा खर्च हुआ. जरूरत पड़ी तो पैसा ब्याज पर उठा लिया लेकिन जमीन नहीं बिकने दी. बिस्तर से लगे बाबूजी सब देखसमझ रहे थे लेकिन उन्होंने कोई वसीयत न जाने क्यों नहीं की. अब अम्मा भी कुछ नहीं बोलती सिवाय इस के कि मुझ बुढ़िया को बीच में न डालो तुम दोनों भाई जैसा ठीक समझो करो मैं अगर भार लगने लगी होऊं तो किसी रिश्तेदार के यहां पटक दो या वृद्धाश्रम भेज दो…

अब मेरी हालत का आप क्या कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि मुझ पर क्या गुजर रही है. पैसों की कमी के चलते बच्चों को सस्ते स्कूल में पढ़ाया जबकि भाईसाहब के बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़े. वे महल से मकान में रहते हैं कार के नीचे कभी उन्होंने पांव नहीं रखा और मेरे बच्चों ने सिर्फ खटारा होती मेरी बाइक की ही सवारी की है.

मेरी पत्नी के पास वही गहने हैं जो उसे मायके से मिले थे जबकि भाभी हर साल दीवाली पर पांच तौला सोना खरीदती थीं. मेरी पढ़ाई पर मामूली खर्च हुआ लेकिन भाईसाहब की पढ़ाई पर उस से दस गुना ज्यादा खर्च हुआ था.

क्याक्या गिनाऊं, जगदीश कहते हैं मैं तो मांबाप की सेवा कर पछता रहा हूं. मुझे पुण्य नहीं पैसा चाहिए. इस सेवा और श्रवणकुमारियत ने मेरा हक मुझ से छीन लिया. मुझे बड़ा पैसा वाला नहीं बनने दिया और यह मेरी कमजोरी या निकम्मापन कतई नहीं है.

कई बार तो जी में आता है कि बाबू जी की बीमारी और कमजोरी के दिनों में ही सारी जायदाद अपने नाम लिखवा लेता तब भाईसाहब को पता चलता जिन्हें बिना एक रात जागे, बिना बाबू जी के पैर दबाए, टट्टी भरी धोती धोए बगैर और सब से बड़ी बात बिना कोई तनाव या चिंता पाले मेरे बराबर जमीन जायदाद मिली. अब तो उन से बात करने भी मन नहीं होता इतना बैगैरत और खुदगर्ज इंसान मैं ने दुनिया में नहीं देखा.

सगा बड़ा भाई है कभी बहुत प्यार करता है मुझे इसलिए मुंह से बददुआ भी नहीं निकलती. ऐसी और कई मिलीजुली बातें करते जगदीश खुद को रोने से रोक नहीं पाते.

न कहने की कोई वजह नहीं कि जगदीश के साथ ज्यादती तो हुई है मुमकिन है कुछ झूठ वे बोल रहे हों और अपनी कुछ कमजोरियां ढकने अपने किए को बढ़ाचढ़ा कर बता रहे हों लेकिन मांबाप की सेवा में उन्होंने कोई कोताही नहीं बरती और काफी कुछ उन्हें छोड़ना भी पड़ा है जिस की वाजिब कीमत नहीं मिली तो नमक पड़े केंचुए की तरह वे बिलबिला रहे हैं.

एक छोटे से शहर के मध्यमवर्गीय वैश्य परिवार के इस वास्तविक किस्से का एक पेंच यह है कि जमीनजायदाद का बंटवारा पिता के रहते वक्त पर हो जाता तो यह पहाड़ नहीं टूटता जो दो भाइयों के बीच खाई खोद गया. अगर बंटवारे की बात पिता की जिंदगी में होती तो शायद जगदीश को अपनी सेवाओं का पुरस्कार या मूल्य कुछ भी कह लें मिलता. क्योंकि बिस्तर से लगे अपाहिज पिता को बड़े बेटे के मुकाबले उन की जरूरत ज्यादा थी.

क्या कहता है कानून ?

ऐसे कितने जगदीश देश भर में कहांकहां नहीं तिलमिला रहे होंगे इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हर दूसरे हिंदू परिवार में ऐसा होना मुमकिन है कि जो पेरैंट्स की सेवा करता है उसे तारीफ और वाहवाही तो बहुत मिलती हैं लेकिन पिता की जायदाद में से हिस्सा उतना ही मिलता है जितना कि घर से दूर रह रही उन संतानों को मिलता है. जिन्हें प्रभु तुल्य अपने मांबाप की सेवा इलाज और देखभाल का मौका ही नहीं मिला और न ही उन्होंने ऐसा मौका अपनी तरफ से पैदा करने की कोशिश की. वे तो बस अपना कमाते खाते रहे जिंदगी एन्जौय करते रहे अपनी जायदाद भी अलग बनाते रहे लेकिन पुश्तैनी जायदाद में बराबरी से लिया.

इस से खार खाई कई संतानों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया लेकिन अदालत ने कहा कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं जो सेवा करने वाली संतान को ज्यादा हिस्सा देने की बात करता हो. ऐसे मुकदमों में से सब से चर्चित है एस आर श्रीनिवास व अन्य बनाम पद्मवाथाम्मा व अन्य 2010 जो निचली अदालत से शुरू हो कर सुप्रीम कोर्ट तक गया था. इस में वादी के तर्क वही थे जो जगदीश के थे. अदालत के सामने सीधा सा सवाल यह था कि क्या मातापिता की सेवा करने वाली संतान संपत्ति में ज्यादा हिस्से की हकदार है.

कई भावनात्मक तर्कों के साथ वादी एस आर श्रीनिवास ने अदालत से यह सवाल भी किया था कि अगर कानून सेवा और त्याग को नहीं देखेगा तो भविष्य में कोई सेवा क्यों करेगा. इस पर अदालत का कहना था कि सेवा तारीफ के काबिल है लेकिन उत्तराधिकार कानून से चलता है. यदि मातापिता चाहते तो सेवा करने वाली संतान को ज्यादा हिस्सा दे सकते थे लेकिन मौत के बाद अदालत सिर्फ कानून को देखेगी.

बकौल सुप्रीम कोर्ट, सेवा कितनी भी सराहनीय क्यों न हो वह उत्तराधिकार में विशेष अधिकार नहीं बनाती. इस बिना पर एसआर श्रीनिवास का मुकदमा खारिज हो गया और सभी संतानों को बराबर हिस्सा पुश्तैनी जायदाद में से मिला. दरअसल में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में ऐसी कोई धारा या नियम ही नहीं है जो जगदीश और श्रीनिवास जैसों की सेवा और जज्बे को सलाम न करे लेकिन उसे सेवा का मूल्य दिलाने पहल करती हो.

खामी कैसे दूर हो ?

बिलाशक यह कानूनी खामी है जिस पर चर्चा और बहस होना जरूरी है जिस से मांबाप की सेवा को प्रोत्साहन मिले और इतना मिले कि भाईभाई और बहनें भी आपस में पेरैंट्स की सेवा और देखभाल को ले कर लड़ें कि नहीं मैं करूंगा.. मैं करूंगा .. मैं करूंगी. एक दूसरा रास्ता वसीयत की अनिवार्यता का है कि जिस के पास भी कम ज्यादा जितनी भी संपत्ति हो वह अपने जीतेजी उस की वसीयत जरूर करे. नहीं तो संपत्ति राज्य यानी सरकार की हो जाएगी. हालांकि ऐसा कानून हो पाना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन भी नहीं है. Parental Care

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...