Equality in Marriage :

क्यों पढ़ें ? – पति को परमेश्वर मानने की धारणा तेजी से बदल रही है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि अब अधिकतर पत्नियां भी कमाऊ हो चली हैं बल्कि इसलिए भी कि कपल्स अब खुल कर जीना चाहते हैं और इस के लिए परंपराएं तोड़ भी रहे हैं हर किसी को इस बदलाव का स्वागत करना चाहिए बजाय उस में रोड़ा बनने के जो वैवाहिक जीवन का लुत्फ छीनता है. प्रस्तुत लेख में सभी पात्र व उन से की गई चर्चा वास्तविक हैं. प्रकाशन नीतियों के तहत नाम व स्थान बदल दिए गए हैं.

पतिपत्नी के रिश्ते को ले कर अकसर बहस होती रहती है कि यह कैसा होना चाहिए नए दौर के कपल्स खासतौर से पत्नियों की नजर से देखें तो यह कम से कम भक्त और भगवान सरीखा तो बिलकुल नहीं होना चाहिए यह सैनिकों जैसा हो सकता है जिस में जिंदगी की जंग में दोनों को कंधे से कंधा मिला कर हालातों का सामना करें लेकिन यह लोकतांत्रिक हो तो बात सोने पे सुहागा वाली हो जाती है.

अभिलाष से शादी तय होने के पहले ही मैं ने मम्मीपापा को बतला दिया था कि मैं उस के पैर नहीं पडूंगी…

क्यों,

उन के इस सवाल के जवाब में मैं ने भी सवाल ही दागा था कि आप ही बताइए क्यों पडूं क्या सिर्फ इसलिए कि ऐसा सदियों से चला आ रहा रिवाज है और इसीलिए मुझे इसे मानना चाहिए. इस पर उन्हें कोई सटीक या ठोस जवाब नहीं सूझा. लेकिन जाने क्यों दोनों तनिक गंभीर से हो गए थे.

निकिता आगे बताती है, आज हमारी शादी को 4 साल पूरे होने जा रहे हैं इस दौरान कभी कोई खास झंझलाहट हम दोनों के बीच नहीं हुई. हम दोनों ही एक दूसरे का सम्मान करते हैं, प्यार करते हैं, मिलजुल कर घरगृहस्थी के फैसले लेते हैं, वीकैंड पर मुंबई से बाहर घूमनेफिरने बाहर जाते हैं मौजमस्ती करते हैं.

थोड़ा रुक कर वह कहती है, एक पत्नी होने के नाते मैं ने कभी नहीं सोचा कि मैं किसी भी मामले में अभिलाष से उन्नीस हूं. अच्छा तो यह भी है कि उस ने भी कभी किसी बात के लिए मुझे फोर्स नहीं किया और न ही वह अहम दिखाया जो बतौर संस्कार मर्दों को बचपन से ही मिल जाता है कि तुम पति हो इसलिए इसी नाते पत्नी से बेहतर हो वगैरहवगैरह. आप चाहें तो इस बारे में अभिलाष से भी चर्चा कर सकते हैं.

निकिता की बात पर उसी की मौजूदगी में जब अभिलाष से उस की प्रतिक्रिया जानना चाही तो वह बोला, ईमानदारी से बताऊं तो शादी के पहले मुझे उम्मीद थी कि आम और परंपरागत पत्नियों की तरह निकिता मेरे पैर छुएगी. क्योंकि मैं ने देखा था कि मम्मी हर कभी खासतौर से तीजत्योहारों पर पापा के पैर छूती थीं. तब मुझे लगता था कि मम्मी पापा से कमतर हैं या फिर यह जरूरी होता होगा. जबकि वे भी पापा की तरह नौकरी ही करती थीं और उन की सैलरी पापा की सैलरी के लगभग बराबर ही थी.

थोड़ा रुक कर और हंस कर वह आगे बोला, निकिता से मुझे इस पर या किसी भी बात पर कोई शिकायतशिकवा नहीं और उस से पैर पड़वाकर मैं कहां का नारायण हो जाऊंगा रहूंगा तो नर ही.

बात अकेले निकिता और अभिलाष की नहीं बल्कि एक पूरी जनरेशन की है और बात अकेले पति के पैर छूने के बेहूदे रिवाज की नहीं बल्कि उस समानता की भी है जिस के तहत नई जनरेशन के कपल्स मानते हैं कि पतिपत्नी में छोटाबड़ा कोई नहीं होता. और न ही पति होने का मतलब परमेश्वर और पत्नी होने का मतलब दासी होना होता है.

पितृसत्तात्क प्रवृति

पतिपत्नी दोनों की सहमति, समझ और आपसी प्यार व सम्मान ही इस रिश्ते को आगे बढ़ाते हैं. अब वह दौर गया जब पत्नी बेवजह ही पति से दबी रहती थी और उस की ज्यादतियां बर्दाश्त करती रहती थी. हलांकि पति के पैर पड़ने वाली पत्नियां एकदम विलुप्त नहीं हो गई हैं लेकिन वे बराबरी की बात को इस या ऐसी दूसरी मान्यताओं और परंपराओं से जोड़ कर नहीं देखतीं उन की नजर में यह एक स्वैच्छिक बात है जिस से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन पत्नी अगर पति के सामने झुकी रहे तो ज्यादा सुरक्षित रहती है.

अब पति परमेश्वर नहीं रहा

सवाल बड़ा दिलचस्प और मौजू निकिता जैसी युवा पत्नियों के लिहाज से है कि क्या अब पति परमेश्वर है यह कांसेप्ट खत्म हो गया है अगर हां तो क्यों और इस से फर्क क्या पड़ता है.

पति के परमेश्वर न रह जाने की दास्तां महज तीन शब्दों से लिखाई है शिक्षा, जागरूकता और आत्मविश्वास जो पत्नी को पति की बराबरी से खड़ा करते हैं और इस से इस नाजुक और रोमांटिक रिश्ते में कोई कमजोरी नहीं आती है उलटे यह और मजबूत होता है. इसे पुणे की एक कंपनी में जौब कर रहे नेहा और सारांश ( आग्रह पर बदले हुए नाम व स्थान ) से समझें तो दौर हर लिहाज से बराबरी का है.

इन दोनों की पहली मुलाकात जबलपुर से पुणे जाते वक्त ट्रेन में हुई थी. दोनों को आईटी सेक्टर में काम करते पांच साल हो चुके थे और दोनों अच्छे लाइफ पार्टनर की तलाश में थे.

14 घंटे की उस जर्नी में ही हमें समझ आ गया था कि हम एकदूसरे के लिए फिट हैं, खासतौर से वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर. बस फिर क्या था हर वीकैंड पर हम मिलने लगे और साल भर में ही घर वालों को अपने फैसले से अवगत करा दिया. पेरैंट्स तो तैयार ही बैठे थे, नेहा बताती है कि वे सारांश के मम्मीपापा से मिले और चट मंगनी पट ब्याह हो गया. सारांश का जैन समुदाय और मेरा कायस्थ परिवार से होना तनिक भी आड़े नहीं आया.

मुझे नेहा के वे तेवर पसंद आए थे जिस के तहत लड़कियां लड़कों से कमतर नहीं, उन्हें अपने आप को साबित करने का मौका ही अब मिलना शुरू हुआ है. पुरुष ने हमेशा से ही उसे दबा कर रखा है, सारांश ने बताया, मैं हालांकि कोई फैमिनिस्ट नहीं हूं लेकिन अपने ही परिवार में मैं ने देखा था कि महिलाओं का अस्तित्व और पहचान दोनों ही बहुत सिमटे हुए हैं. उन की सहमति या असहमति के कोई माने नहीं होते. मैं एक अमीर व्यापारी परिवार से हूं जहां व्यापार तो व्यापार घर में कौन सी सब्जी बनेगी यह फैसले भी मर्द लेते हैं. महिलाओं के पास जो चीजें इफरात से है वे हैं गहने और साड़ियां जिन के भार से वे जिंदगी भर दबी रहती हैं.

जब मैं इंजीनियरिंग कालेज पहुंचा तो मेरे सोचने का तरीका काफी कुछ बदला जिस में नावेल्स और मैगजींस का बड़ा हाथ रहा. प्रेमचंद जी की कहानियों और उपन्यासों ने मुझ पर गहरा असर डाला लेकिन मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है ने मेरे सोचने का तरीका ही बदल दिया. इस कहानी की नायिका अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान से समझौता करने के बजाय रिश्ता तोड़ लेना ज्यादा बेहतर समझती है.

सारांश मुद्दे की बात पर आते कहता है, मुमकिन है कि घर में भी मैं ने ऐसा ही कुछ देखा हो लेकिन इस का एकदम उल्टा, जहां महिला समझौता कर लेने मजबूर रहती है उस का स्वाभिमान कोई माने नहीं रखता. नेहा की बातों से मुझे लगा कि यह उसी ख्याल की है जो मुझे मेरे परिवार को साथ ले कर तो चलेगी. लेकिन यही सच है की नायिका की तरह मर्दों की हुकुमत के सामने झुकेगी नहीं. वह कहानी सालों पुरानी है लेकिन आज भी प्रासंगिक है.

इन दोनों कपल्स की बातें जाहिर करती हैं कि अब पति परमेश्वर नहीं रहा क्योंकि पत्नियां आर्थिक रूप से उस पर निर्भर नहीं रहीं और उन की पहली कोशिश रिश्ता निभाने की ही होती है, पर एक सीमा तक इस के बाद वे भी बजाय घुटन में रहने के तलाक ले कर सुकून की जिंदगी जीना पसंद करती हैं.

पत्नियां कब लेती हैं तलाक का निर्णय ?

लेकिन अब तलाक के बाद के जोखिम कम ही पत्नियां देखती हैं, जबलपुर हाईकोर्ट के युवा लेकिन अनुभवी अधिवक्ता सौरभ भूषण बताते हैं, मेरा अनुभव रहा है कि तलाक के अधिकतर मामलों में पति अहंकारी ठसियल और पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला था. जिस की जिंदगी और घर दोनों में पत्नी की भूमिका प्रजा जैसी थी और खुद की उस राजा जैसी जिस का हुकुम ही कानून होता है. मैं यह नहीं कहता की सभी पत्नियां दूध की धुली होती हैं लेकिन तलाक का फैसला वे तभी लेती हैं जब रिश्ता उन के लिए एक ऐसा बोझ बन जाता है जिसे ढोना उन के बस की बात नहीं रह जाती.

बकौल सौरभ पतिपत्नी के रिश्ते को बजाय धर्म, संस्कृति और परंपराओं के ढांचे के संविधान के नजरिए से देखा समझा और जिया जाना चाहिए नहीं तो उस के टूटने और दरकने की आशंका और खतरे तो बने रहेंगे. पतियों को अहम और भ्रम दोनों छोड़ना पड़ेंगे क्योंकि समाज अभी दे न दे लेकिन कानून पतिपत्नी दोनों को बराबरी का दर्जा देता है.

समाज में भी तलाकशुदा पुरुषों की पूछ या डिमांड पहले सरीखी नहीं रह गई है कि शादी करने वालियों की लाइन लग जाती हो अब तलाक की त्रासदी पुरुषों को भी बराबरी से भुगतना पड़ती है. इस मामले में मैं सरिता मैगजीन की तारीफ करना जरूरी समझता हूं जिस की रचनाएं बेहद संतुलित ढंग से समाज और परिवार का सच पेश करते सही और सटीक रास्ता भी दिखाती हैं.

महिलाओं पर बनीं हिंदी फिल्में

पतिपत्नी के बदलते रिश्ते को हिंदी फिल्मों से भी समझा जा सकता है. 70 और एक हद तक 80 के दशक की कुछ फिल्मों में पत्नी को पति के पैर छूने के अलावा हर तरह की ज्यादती सहन करने वाली दिखाया गया है. बाद की फिल्मों में यह रिश्ता वास्तविक जिंदगी की तरह दोस्ताना होता गया 2017 में प्रदर्शित विद्या बालन और मानव कौल अभिनीत फिल्म तुम्हारी सुलू और 2020 में प्रदर्शित तापसी पन्नू और पवेल गुलाटी अभिनीत फिल्म थप्पड़ इस के बेहतर उदाहरण हैं.

थप्पड़ का मैसेज साफ था कि आज की पत्नी भरी पार्टी में पति का थप्पड़ बर्दाश्त नहीं कर सकती यह अपमान, हिंसा और क्रूरता तीनों हैं. लेकिन सच यह कि पति का पितृसत्तात्क प्रवृति का होने उस का कम पढ़ालिखा और गंवार होना जरूरी नहीं. वह पति एक शिक्षित सभ्य समाज का शहरी भी हो सकता है जो पौराणिक मानसिकता के चलते यह भूल जाता है कि गैरतमंद पत्नी थप्पड़ के साथ रहने और जीने तैयार नहीं.
उदाहरण फिल्मों का ही लें तो नायिका स्वामी और नाथ जैसे तो दूर एजी और सुनते हो जैसे परंपरागत संबोधनों से समाज में भी बाहर आ गई है. इस पर एक दिलचस्प किस्सा सुनाते भोपाल की सुरभि बताती है जब भी मैं अपनी पति आदित्य को नाम ले कर बुलाती हूं मम्मीपापा दोनों टोकते हैं कि पति का नाम मत लिया करो और उन से सम्मान से पेश आया करो ये क्या है कि आदित्य आएगा, आदित्य जाएगा, आदित्य खाएगा, आदित्य सोएगा.

न जाने ये लोग किस जमाने में जी रहे हैं वह खीझ कर बताती है जबकि आदित्य को इस से कोई शिकायत या परेशानी नहीं. हम लोग पतिपत्नी होने के साथसाथ अच्छे दोस्त भी हैं लेकिन जाने क्यों घरो में पति को हौवा बना कर रखा जाता है उसे तो कोई नहीं कहता कि सुरभि सोएंगी, सुरभि आएंगी, जाएंगी और सुरभि खाएंगी बोला करो. सम्मान का उपदेश सिर्फ पत्नियों को ही क्यों उन से ही यह अपेक्षा क्यों पतियों से क्यों नहीं.

बात सही है कि पुरानी पीढ़ी अपने दायरे में जी रही है जबकि नए दौर के कपल्स उन्मुक्त और दोस्ताना अंदाज में जीना पसंद कर रहे हैं. उन की नजर में जिम्मेदारियां शेयर की जाना रिश्ते को बेहतर बनाता है, प्यार के अनौपचारिक सम्मान को भी यह जनरेशन जरूरी समझती है.
आजादी के माने इन के लिए बेलगाम हो जाना नहीं है बल्कि पुराने को तोड़ कर नए रिवाज कायम करना है जिस में हुक्म की जगह डायलाग हों, एकदूसरे के लिए बराबरी का स्पेस हो, जरूरत के मुताबिक प्राइवेसी भी हो, असहमति को जिद न समझा और माना जाता हो और अहम बात संवेधानिक बराबरी जिंदगी में भी हो. Equality in Marriage

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