Social Story in Hindi : मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरा दोस्त सुखी है या मैं क्योंकि जीवन के सब सुख पा लिए थे दोस्त ने लेकिन उन सुखों को भोग न पाने का उस का दुख कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था.
इन दिनों हैदराबाद में हूं. बेटेबहू विदेश गए हैं. हम पतिपत्नी उन के घर की चौकीदारी करने आए हैं.
यहां मेरा बचपन का एक दोस्त भी रहता है, जिगरी दोस्त कहें तो भारी नहीं होगा. वह एक मटन शौप का मालिक है. रोज बड़ी तादाद में बकरे हलाल करता है. यही उस का धंधा है. सुना है, उस ने काफी पैसे भी बना लिए हैं.
वह आज मुझे लेने आने वाला है. घर में बीवीबच्चों से मिलवाना और अपना कारोबार दिखाना चाहता है. जिस के पास मिलवाने व दिखाने के लिए कुछ होता है वही किसी को इस के लिए बुलाता है. मैं इंतजार में था कि वह खुद आएगा लेकिन वह नहीं आया. हां, सही समय पर उस ने एक शानदार कार से 2 सूटबूटधारी कारिंदों को मुझे लाने के लिए भेज दिया.
अद्भुत कार थी वह. करोड़ों की तो होगी ही. अब कारें लाखों में मिलती कहां हैं. जो मिलती भी हैं, उन्हें ‘कैटल कार’ कहते हैं. मैं शिष्ट हूं, इसलिए हिंदी में इन के लिए ‘पशु कार’ जैसे शब्द प्रयुक्त नहीं कर रहा हूं. करोड़ों की वह कार कैसी थी, यह बताने के लिए सोचने बैठा तो एहसास यह हुआ कि शब्दों और भाषा के मामले में मुझ से बड़ा कंगाल पूरे ब्रह्मांड में कोई दूसरा नहीं.
बहरहाल, मुझे ले कर कार मित्र के आवास की ओर चली. सोचता था कि उस की दुकान और घर एक में ही मिले होंगे. उन के आगे कटेछिले बकरे लटके होंगे. नालियों में खून बहता होगा. चारों ओर सड़े मांस की दुर्गंध फैली होगी. ऐसी वीभत्स जगह की कल्पना लिए मैं उस के घर पहुंचा.
मेरे साथ आए कारिंदे ने उतर कर बड़ी सी बाउंड्री वाल पर लगी दरवाजे की घंटी बजाई. मैं कार से उतरने लगा तो उस ने मुझे रोक दिया, ‘बैठिए, अभी मंजिल दूर है.’ मेरा तजरबा यह था कि घंटी घर के दरवाजे पर ही तो लगती है. दरवाजे पर नहीं तो दस कदम जितनी चौड़ी बाउंड्री पर लगे गेट पर. इस से ज्यादा दूरी पर घंटी लगेगी भी तो कैसे?
मैं इसी सोच में उतर रहा था कि तभी बाउड्री वाल पर लगा बड़ा सा दरवाजा सरका और कार चल पड़ी. फिर कई दरवाजे और बैरियर आए. करीब चार किलोमीटर के सफर के बाद एक विधानसभानुमा प्रासाद के पोर्च पर कार रुक गई. बाहर खड़े कई अफसरनुमा चपरासियों में से एक ने कार का दरवाजा खोला और मुझे फर्शी सलाम किया. मैं सहम गया था और वह बंदा आज के दिन को कोस रहा था कि, जब उसे ‘‘एक आभाविहीन इंसान का स्वागत करना पड़ा था. यही तो कहलाती है, निकृष्ट चाकरी?’’
अब मैं उस के ड्राइंगरूम में था. ऐसा लगा मानो महानगर के फर्नीचरों के किसी शोरूम में आ गया हूं. तैरती हुई छोटीबड़ी मछलियों का दीवारनुमा एक्वेरिएम देख कर मैं स्तब्ध था लेकिन तब भी मैं कुछकुछ सोच भी रहा था कि मुझे किस सोफे पर बिठाया जाएगा लेकिन मुझे उस ड्राइंगरूम में बैठाया नहीं गया. मुझे ड्राइंगरूमनुमा एक लिफ्ट में ले जाया गया.
सारा कुछ मुझे भयाक्रांत कर रहा था. मैं स्तब्ध था. लिफ्ट चली या नहीं, मुझे समझ नहीं आया पर मेरे होश तभी होश में आए जब लिफ्ट के बाहर खड़े मेरे मित्र ने मुझे अपने गले लगा लिया. वह कृष्ण से भी बड़ा लग रहा था और मैं सुदामा से कहीं ज्यादा ही. उस ने मेरी अंतर्मन से अगवानी की. पत्नी, बच्चे सब मेरे लिए पलकें बिछा रहे थे. उन की आंखें बता रही थीं कि मेरे आने से उन्हें बहुत बड़ी खुशी मिली है.
वह अपने बच्चों को बता रहा था, ‘‘हम पहली कक्षा से साथ पढ़ने वाले साथी हैं. इस के पिताजी सरकारी नौकर थे. तब मुझ अनाथ के पास खाने के लिए कुछ न था. यह रोज अपना टिफिन मुझे खिला देता था. कभीकभी यह अपने घर से पैसे चुरा कर लाता था तो हम 5 पैसे वाली बर्फ की लालपीली आइसक्रीम खाते थे. सब गुजर गया.’’
अतीत की मुश्किलें भी सुनहरी होती हैं. उन्हें याद कर मित्र दुखी हो गया.
बात पलटते हुए मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हारी मटन शौप कहां है?’’
‘‘अरे मटन शौप गुजरे जमाने में थी मेरे दोस्त, आज मेरे औटोमैटिक स्लाटर हाउस हैं. मैं मटन एक्सपोर्ट करता हूं. मेरे स्लाटर हाउस सारे मुल्क और एब्रौड में हैं. अब तो पता ही नहीं कि कहांकहां क्याक्या है, देख भी नहीं सकता. सब मैनेजरों के भरोसे है, वे चाहें तो मारें, चाहें तो तारें. बच्चे बड़े हो जाएं तो कुछ राहत मिले.’’
‘‘सलीमा देखिहौज या थिएटर आय’ अपना घर दिखलाते हुए वह अपनी बोली बोल रहा था. मैं उस के घर में बने थिएटर को देख रहा था. मैं ने कहा, ‘‘करीब 25 सालों से मैं ने कोई फिल्म नहीं देखी है.’’
‘‘हमरौ यहै हाल है. अब न इच्छै रही और न टाइमौ रहा. लड़का बच्चन के यहै हौल है.’’ अब वह पत्नी और बच्चों को किस्से सुना रहा था, ‘‘क्या था कि पैसा कम होने की वजह से हम दोनों एक ही टिकट में सिनेमा देख लेते थे. अब पूछोगे कि एक टिकट में 2 लोग सिनेमा कैसे देखते थे? तो बात यह थी कि इंटरवल तक हम में से कोई एक सिनेमा देखता था और इंटरवल के बाद का सिनेमा उसी टिकट से दूसरा बंदा देख लेता था. अंत में दोनों एकदूसरे को अपने देखे हुए हिस्से की कहानी सुना देते थे.’’
‘नहाबौज’ 7वीं मंजिल पर बने विशाल स्विमिंग पूल दिखलाते हुए कहा.
मैं ने कहा, ‘मैं दिन में बड़ी मुश्किल से एक बार नहाता हूं.’
‘‘हमरौ येहि हाल है. आज तक इह स्विमिंग पूल मा नहीं उतरेन’’ वह बोला.
फिर उस ने मुझे अपना जिम दिखाया. ऐसा लगा, किसी इंटरनैशनल स्पोर्ट्स कौम्प्लैक्स में आ गया हूं. मैं ने कहा, ‘‘इस जिम की वजह से तुम तंदुरुस्त रहते हो?’’
‘‘नहीं, मैं तो यहां आ ही नहीं पाता. जो कुछ शरीर चल रहा है वह पार्क में सुबह टहलने से चल रहा है,’’ मित्र बोला.
यकीनन, मेरे लिए उस का वैभव अचरजकारी था, जबकि, यह उस के नामालूम कितने वैभवों का बहुत छोटा सा हिस्सा था.
अब वह मुझे ले कर खाने की टेबल पर था. नामालूम कितनी तरह के व्यंजन परोसे गए थे. मैं उन में से रोटी और भिंडी की सब्जी को ही पहचान पाया था. मैं ने वही लिया. मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम क्या खाओगे?’’
‘‘दलिया और लौकी की उबली हुई सब्जी. इस के अलावा कुछ खाऊंगा तो मर जाऊंगा. वैसे, तुम्हारे घर में भाभीजी के हाथ की बनी हुई गुझिया का स्वाद मेरे मुंह में आज भी बसा हुआ है,’’ मित्र ने कहा.
‘‘गुझिया खाना है?’’ मैं ने सुदामा स्टाइल में पोटली छिपातेदिखाते हुए कहा.
‘‘बहुतै गधे हो यार, भाभी ने गुझिए भेजे और तुम मुझे दे नहीं रहे हो,’’ यह कहते हुए उस ने पोटली छीन ली और फिर मित्र का सारा परिवार टेबल पर सजे छप्पन व्यंजनों को छोड़ सुदामा की गुझिया पर टूट पड़ा.
‘‘मैं तो सोचता था कि तुम्हारे डाइनिंग टेबल पर लजीज मांसाहार सजे होंगे पर यहां मटनमुरगा तो दूर, अंडा तक नहीं दिख रहा?’’ मैं ने कहा.
‘‘हम शुद्ध शाकाहारी हैं. अंडा, मटन, मुरगा क्या, हमारी रसोई में लहसुनप्याज तक इस्तेमाल नहीं होता,’ मित्र ने कहा.
‘‘मांस के इतने बड़े बिजनैसमैन हो और मांस नहीं खाते?’’ मैं अचरज में था.
मित्र बोला, ‘‘वैसे तो मेरे कुछ कारखाने शराब के भी हैं पर मैं शराब छूता भी नहीं. हिक्क आती है.’’
अब वह उठ खड़ा हुआ. उस के पास मेरे लिए बस इतना ही वक्त था. वह बोला, ‘‘बंधु, मुझे एयरपोर्ट निकलना है, आधे घंटे में मेरी फ्लाइट है.’’
‘‘आधे घंटे में तुम हवाईअड्डा कैसे पहुंचोगे, ट्रैफिक बहुत होता है. फिर घंटेभर पहले तो चैकइन करना पड़ता है,’’ मैं ने चिंता जताई.
‘‘जहां से तुम कार पर सवार होगे, उसी के बगल में मेरा हैलिकौप्टर चालू हालत में खड़ा होगा. मैं 10वें मिनट में एयरपोर्ट पहुंच जाऊंगा. अपने जहाज में बैठने के लिए काहे का चैकइन?’’ मेरे स्तब्ध होने की घड़ी एक बार फिर से आ खड़ी हुई थी.
‘‘इतना सब सारा जुटाने के बाद तुम दुनिया के सब से सुखी बंदे बन गए होगे?’’ चलतेचलाते मैं ने पूछा.
‘‘नहीं दोस्त, मैं बहुत दुखी हूं. बहुत ही दुखी. परेशान. हलकान. ये जो सारा कुछ तुम देख रहे हो, यह बहुत दर्द देता है.’’
‘‘फिर तुम ने इन्हें जुटाया क्यों?’’
‘‘हर चीज जो मेरे पास नहीं होती, वह मुझ से कहती है, अगर मैं तेरे पास होती तो तू सुखी हो जाता. तेरे मन में शांति आ जाती. बस, मैं उस चीज को पाने के लिए पूरी ताकत से जुट पड़ता हूं लेकिन वह चीज मिलते ही मेरा दुख और बढ़ जाता है.’’ मित्र ने भरेमन से मुझे कार का दरवाजा खुद खोल कर बिठाया और हैलिकौप्टर की ओर भारी कदमों से बढ़ गया.
कल वह मेरे घर आने वाला है. सोचता हूं, किसी मौल में जा कर कुछ अच्छे किस्म के कपप्लेट ले आऊं. सड़क के ठेले से खरीदे बरतनों में वह नाश्ता करेगा भी कि नहीं, मुझे संदेह है. दरअसल, मेरा सब से शानदार घर उस के घटिया से भी घटिया होगा, यह मेरा यकीन है.
बहरहाल, पत्नी गुझिया बना रही है और आज मैं खुद घर में झड़ूपोंछा कर रहा हूं. कोई कमी न रह जाए? Social Story in Hindi





