Satirical Story in Hindi : गाय के नाम पर लिया पैसा पंडित के लिए धर्मसंकट बन गया था. गांव भर में उन के नाम की पगड़ी उछाली जा रही थी. समझ नहीं पा रहे थे कि अपनी हो रही थूथू से वे कैसे बचें?
डिताइन चिल्लाचिल्ला कर परेशान, ‘‘अरे, पूजापाठ ही करते रहोगे कि गाय को भी ढूंढ़ने जाओगे. रात से वह गाय गायब है और अब सूरज चढ़ आया है.’’
‘‘चुप भी रहो, पंडिताइन. हम वे लोग हैं जो पूजापाठ के चक्कर में पानीपत का तीसरा युद्ध हार गए थे लेकिन बिना नहाएधोए, बिना पूजापाठ किए युद्ध के मैदान में न उतरे थे. तुम्हें एक गाय की पड़ी है, पूजापाठ के लिए हम ने देश को संकट में डाल दिया था. यकीन न हो तो इतिहास की किताब उठा कर देख लो.’’
‘‘हायहाय, पंडितजी कैसी बात करते हो? मेरी भोली गाय की तुलना वह भी भयंकर युद्ध से. गाय की तुलना करनी थी तो किसी भोलीभाली स्त्री से करते, किसी शर्मीले भले आदमी से करते. मारी नहीं जाती तुम से एक मक्खी और बात करते हो युद्ध की.’’
पंडित जानते थे कि पंडिताइन ने यदि एक बार बोलना शुरू कर दिया तो हरिकथा की तरह बोलती चली जाएगी, रुकने का नाम ही नहीं लेगी.
इसलिए पंडित अपना पूजापाठ समाप्त कर के गाय की तलाश में निकल पड़े. चलतेचलते वे सोचने लगे कि काश, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार होती और वे रामपुर के आजम खां की तरह मंत्री होते तो पूरे पुलिस अमले को गाय ढूंढ़ने में लगा देते. जब मंत्री की भैंस ढूंढ़ने में पुलिस का अमला लग सकता है तो गाय ढूंढ़ने में क्यों नहीं? गाय तो भैंस के मुकाबले कितनी पवित्र और पूजनीय है लेकिन न उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है और न वे आजम खां की तरह मंत्री. उन का समय इतना बुलंद कहां?
गाय ढूंढ़तेढूंढ़ते पंडित गांव से बाहर आए तो पता चला रात में कसाइयों ने खुले मैदान में एक गाय काट डाली है जिस के कुछ अवशेष अभी भी इधरउधर पड़े हैं. पंडित शंकाग्रस्त हो कर उस मैदान की ओर झटपट दौड़े. उन की शंका सही निकली. रात में काटी गई गाय उन की ही थी. अब पंडितजी क्या करें?
पंडित किसी चुनाव हारे हुए प्रत्याशी की तरह चुपचाप चारपाई पर आ कर बैठ गए.
उन्हें चुनाव में हारे, लुटेपिटे प्रत्याशी की तरह मुंह लटकाए देख पंडिताइन के मुंह से तोप के गोले की तरह प्रश्न निकला, ‘‘क्या हुआ, नहीं मिली गाय?’’
यह सुन कर पंडित घबरा गए. वे क्या जवाब दें? पहले तो सोचा पंडिताइन को खुदबखुद पता चलने दो लेकिन पंडिताइन बिना जाने चुप न रहने वाली थी. पंडित ने सच उगल दिया. इधर पंडित ने सच उगला उधर पंडिताइन ने हायतोबा मचानी शुरू कर दी.
अड़ोसीपड़ोसी इकट्ठे हुए तो उन्होंने पंडित से थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा लेकिन पंडित इस पर गूंगी औरत की तरह चुप. जब गांव वालों ने उन पर रिपोर्ट दर्ज कराने का दबाव डाला तो पंडित ने बड़ी मासूमियत से कहा, ‘‘भाइयो, जिन कसाइयों ने गाय को मारा है उन के और मेरे खेत अगलबगल ही हैं. जब वे गाय को काट सकते हैं तो मुझेभी.’’
यह कहतेकहते पंडित का गला भर्रा गया. वे आगे न बोल सके लेकिन गांव वालों ने उन की कायरता के आगे झकने से मना कर दिया. गाय का कटना गांव में बहुत बड़ा अपशकुन था और गांव वाले गौहत्या पर आसानी से चुप बैठने वाले न थे. गांव वालों ने पंचायत बुला ली. दोनों पक्ष हाजिर हो गए.
पंचायत में तय हुआ कि गौहत्या करने वाले कसाई गाय का तीनगुना जुर्माना दें वरना मामले को थाने ले जाया जाएगा. कसाई थाने में मारपिटाई और कोर्टकचहरी के मामले को अच्छे से समझते थे, इसलिए वे तीनगुना जुर्माना भरने के लिए तैयार हो गए.
2 घंटे में कसाइयों ने पंचों को गवाह बना कर डेढ़ लाख रुपए पंडित के हाथों में थमा दिए. पंडित उस समय तो इस फैसले से खुश हो गए लेकिन बाद में उन्हें लगा कि गांव वाले उन के बारे में तरहतरह की बातें बना रहे हैं.
अगले दिन पंडित ने रात के अंधेरे में एक चौपाल पर बैठे कुछ लोगों की बातों को कान लगा कर सुना.
‘‘ससुर, बड़ा पंडत बना फिरता है. पंडत नहीं चांडाल है. गाय पर ही पैसा खा गया,’’ गांव का शौकीन जाट कह रहा था.
‘‘चौधरी, सही कह रहे हो. औरों को तो बड़ा सनातन का ज्ञान पेलता है. खुद गौमाता पर पैसा खा गया. न जाने कैसा पंडत है?’’ थप्पन दलित ने कहा.
‘‘हांहां, हमें तो बताता है कि गाय में करोड़ों देवताओं का वास होता है. गाय पूजनीय होती है. जब पैसा जेब में आ गया तो धर्मकर्म सब ताक पर उठा कर रख दिया,’’ सोमू धोबी ने व्यंग्यबाण छोड़ा.
‘‘भैया, कुछ भी कहो, हम पूजापाठी तो ज्यादा नहीं लेकिन गाय पर पैसा न खाते. इतना धर्मकर्म तो बचा ही है. कानून के अनुसार थाने जाते और ससुर इन कसाइयों को हथकड़ी जरूर पहनवा देते. पैसा रखा हमारी जूती पर, पहले सम्मान है. हमारी पगड़ी है,’’ शौकीन ने मूछों पर ताव देते हुए कहा.
पंडित ये बातें सुन कर सकपका गए. उन को लगा उन से भारी भूल हो गई. उन्हें कसाइयों से पैसा नहीं पकड़ना चाहिए था. उन की तो गांव में बड़ी थूथू हो रही है. अब वे क्या करें?
पंडित उलटे पांव वापस लौटे. सारी बात उन्होंने पंडिताइन से बताई. पंडिताइन और भी ज्यादा धर्मभीरु थी. उस ने कहा, ‘‘मुझेतो लगता है जी, गांव वालों की बात बिलकुल सही है. हमें गाय पर पैसे नहीं पकड़ने चाहिए थे. यह तो अधर्म हो गया, पाप हो गया.’’
पंडित और पंडिताइन को पाप का पैसा घर में रखने पर रातभर नींद नहीं आई. वह पैसा उन के लिए जी का जंजाल बन गया. अंत में उन्होंने और बड़े पंडित से सलाह की. बड़े पंडित ने कहा, ‘‘इस पाप के पैसे से छुटकारा पाने का एक सुंदर उपाय है.’’
‘‘वह क्या?’’
‘‘इस पैसे को किसी गौशाला में दान कर आओ. इस से यह पैसा गौसेवा में लग जाएगा और तुम्हारा पुण्य हो जाएगा.’’
‘‘हां, यह ठीक रहेगा.’’
पंडित और पंडिताइन को लगा कि अब उन्हें पाप के पैसे से मुक्ति मिल जाएगी.
पंडित गांव के 2-3 लोगों को गवाह बना कर अपने साथ गौशाला ले गए और गौशाला के प्रबंधक गोपाल को डेढ़ लाख रुपए भेंट कर दिए. गोपाल इस से बहुत खुश हुआ. वह पंडित की दानशीलता के गुणगान करने लगा. पंडित चौड़ी मुसकान लिए वापस आए. आज पंडितजी और पंडिताइन चैन की नींद सोए.
लेकिन 2 दिनों बाद ही गोपाल पंडित के दरवाजे पर खड़ा चिल्ला रहा था, ‘‘अरे, आप कैसे कलियुगी पंडित हो? गाय पर पैसा खाते हो. खुद तो पापी हो ही, हमें भी पाप का भागी बना रहे हो. ये रखो अपने पाप के पैसे. हमें और हमारी गायों को नहीं चाहिए ऐसी पाप की दौलत और आज के बाद हमारी गौशाला की तरफ फटकना भी मत, कलियुगी पंडित.’’
ऐसी खरीखोटी सुना कर गोपाल वहां से चला गया. न जाने पंडित के किस दुश्मन ने जा कर गोपाल से सच उगल दिया था.
पंडित की जान फिर से आफत में आ गई. अब तो वे उस पैसे को छूने से भी डरते थे. दानदक्षिणा में चाहे कितना पैसा भी मिल जाए, वह सब मंजूर था, लेकिन यह पैसा, न बाबा न. पंडित को यह पैसा कतई मंजूर न था. अब पंडित उस पैसे का क्या करें? पाप का पैसा फिर से घर में आ गया. जब तक उस पैसे से मुक्ति नहीं, पाप से मुक्ति नहीं.
पंडित की समस्या को जान कर शौकीन जाट उन के पास पहुंचा और उन के पैंताने बैठ कर बोला, ‘‘पंडितजी, देखो, मैं तो पूजापाठ और पापपुण्य में ज्यादा विश्वास करता नहीं. इसलिए ऐसी बातों से मुझेपाप भी नहीं लगता. भूतप्रेत उस से चिपटते हैं जो भूतप्रेत में विश्वास करता है.’’
पंडित ने एक बार शौकीन की तरफ अजीब सी नजरों से देखा, फिर पूछा, ‘‘शौकीन, अपने मन की बात कह. क्या कहना चाहता है?’’
‘‘पंडितजी, मैं यों कहूं, आप चाहो तो उस पाप के पैसे से मुक्ति पा सको और वह मुक्ति आप को मैं दिला सकूं.’’
पंडित गंभीर हो कर बोले, ‘‘वह कैसे, शौकीन? पापों से मुक्ति दिलाने का ठेका तो हमारा है. जाट कब से यह काम करने लगे?’’
‘‘पंडितजी, आप तो जानते ही हो. हम जाट घीदूध के कितने शौकीन होते हैं. आप वह पाप के डेढ़ लाख रुपए मुझेदे दो. आप की कसम 2 बढि़या नस्ल की गाय ले आऊंगा. आप का पैसा सच्चे मायनों में गौसेवा में लग जाएगा. आप के यहां भी कुछ दूधघी पहुंचा दिया करूंगा.’’
‘‘न भाई न, मुझेपाप का भागी नहीं बनना.’’
‘‘ठीक है, पंडितजी. सारे पाप का भागी मैं ही बन जाऊंगा.’’
पंडित सोचने लगे, यह शौकीन जाट बचपन से ही मूर्ख है. लोग पाप से मुक्ति चाहते हैं और यह अपनी मरजी से पाप का भागी बन रहा है. फिर बाद में कोई बात न हो, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘देख शौकीन, बाद में कुछ हो जाए तो मुझेकुछ मत कहना. तुम यह पाप का पैसा ले जाओगे तो पाप के पूरे के पूरे भागी तुम ही बनोगे.’’
‘‘पंडितजी, आप इस की चिंता रंच मात्र भी मत करो. मैं आप को किसी बात का दोष न दूंगा.’’
पंडितजी पापरूपी डेढ़ लाख रुपए से पिंड छुड़ाते हुए बोले, ‘‘ले शौकीन, इस पाप के पैसे को तू ही रख और चाहे जो कर. मेरे लिए तो यह पाप का पैसा था, अब तू इसे भोग.’’
‘‘हां पंडितजी, इस की चिंता आप मत करो. पाप को मैं देख लूंगा. आने दो जरा उसे. तेल पिलाया हुआ मोटा लट्ठ उसी के लिए रखा हुआ है. अगर वह धोखे से भी मेरे घर की ओर आ गया तो उस की खैर नहीं.’’
शौकीन जाट उन पैसों से बढि़या नस्ल की 2 दुधारू गायें ले आया. उन के 2 सुंदर सलोने बछड़े भी थे. जब शौकीन अपने घेर (गौशाला) में गाय दुहता और दूध की बाल्टी भरता तो पंडितजी अपनी छत से उसे टुकुरटुकुर देखते और सोचते कि इसे न जाने कब पाप लगेगा.
शौकीन उन को देख कर मुसकरा कर कहता, ‘‘आ जाओ, पंडितजी. दूध, छाछ कुछ तो पी लो. दूध न पिओ तो भगोना भर कर खीर ही भिजवा दूं.’’
लेकिन पंडित उसे हाथ के इशारे से मना कर देते. उन्होंने बहुत दिन इंतजार किया कि जाट के घर पाप आएगा लेकिन उन्होंने देखा कि जाट के परिवार के लोग तो उस पाप के पैसे से खरीद कर लाई गई गायों के दूध को पीपी कर दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होते जा रहे हैं.
पंडित को भी धीरेधीरे यह यकीन होने लगा कि जाट के तेल पिलाए मोटे लट्ठ को देख कर शायद पाप उधर आने से डर रहा है.
हां, सोयू और थप्पन जरूर आएदिन शौकीन के घर से छाछ, मट्ठा ले जाते देखे जा सकते थे. पंडित को यह बात आज तक समझ में नहीं आई थी. Satirical Story in Hindi





