Family Story in Hindi : विनायक से शादी कर के तृप्ति को अपनेआप पर गुमान हो रहा था लेकिन वह समझ नहीं पाई कि पीतल पर चढ़ा सोने का पानी ज्यादा चमकता है. विनायक का असली रूप तो कुछ और ही था.

तृप्ति चंडीगढ़ में किराए के मकान की बालकनी में खड़ी अपलक दृष्टि से सामने का दृश्य निहार रही थी. बालकनी के ठीक सामने एक झील दिखाई देती थी. झील के किनारे खड़े ताड़ के वृक्ष उस के सौंदर्य में चारचांद लगा रहे थे. झील के किनारे पक्षियों का आनाजाना लगा रहता था.

क्रौंच पक्षी का जोड़ा बड़े प्यार से इधरउधर विहार कर रहा था कि तभी एक चील आसमान से उड़ती हुई आई और एक क्रौंच पक्षी को अपनी चोंच में दबा कर उड़ गई. दूसरा पक्षी जोरजोर से शोर मचाने लगा. वह सिर पटकपटक कर झील के किनारे बेचैनी से इधरउधर घूमने लगा.

उस का रुदन तृप्ति को बेचैन कर रहा था. इतने शांत, सरस और सुंदर वातावरण में उस के अश्रुकोष से 2 गरमगरम मोती लुढ़क कर गालों पर आ गए. तभी उस की 7 वर्षीया बेटी ईषा ने उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘मम्मी, आप क्यों रो रही हो?’’

‘‘बस, वैसे ही, बेटा’’ संक्षिप्त सा उत्तर दे कर तृप्ति ने उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. रुलाई थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी. ‘‘मम्मी, आप अब बहुत रोने लगी हो और जब हम रोते हैं तो कहती हो अच्छे बच्चे रोते नहीं. गंदे बच्चे रोते हैं.’’

छोटी सी बच्ची के पास तृप्ति को चुप कराने के लिए शब्द नहीं थे. वह अभी इतनी छोटी थी कि तृप्ति उसे अपनी बात भी नहीं समझी सकती थी लेकिन उस के मन में न रुकने वाला तूफान उठ खड़ा हुआ था. उस चील में उसे राफिला खान नजर आ रही थी जो उस के जीवन में चील की भांति आई और उस से उस के पति को छीन कर ले गई. वह उस के जीवन में सुनामी की भांति आई और हंसतेखेलते परिवार को रौंद कर चली गई.

तृप्ति कमरे में आ कर बच्ची को आलिंगनबद्ध कर बिस्तर पर लुढ़क गई. इतने में उस का बेटा आरव भी पास आ कर लेट गया. मां की थपकी से दोनों बच्चे सो गए लेकिन तृप्ति की आंखों से नींद गायब थी. नींद की जगह अविरल आंसुओं ने ले ली. अनचाहे विचारों ने उस के मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया. उस का दम घुट रहा था.

उस के विवाह को 12 वर्ष बीत गए लेकिन शांति उसे 12 घंटे भी न मिली. विवाह के थोड़े दिनों बाद ही पति का व्यवहार उस के दिमाग पर क्षयरोग की भांति उस के शरीर को खा रहा था. सभी उस से कमजोरी का कारण पूछते. उदासी उस के चेहरे पर चिपक गई थी. मुसकराहट स्पष्ट आवरण सी दिखती.

अति संस्कारी परिवार की यह बिटिया इस समाज की स्वच्छंदता से संघर्ष कर रही थी और आखिर में हार गई लड़तेलड़ते. कहते हैं लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

मेरठ के मध्यम परिवार की यह लड़की 12 साल पहले एक उच्चमध्य परिवार में बहू बन कर आई थी. अपने समय पर गर्व और अपने पति की अदाओं पर मुग्ध थी. थोड़ी सी आत्ममुग्धा भी थी क्योंकि पति ने बताया था, ‘30-35 लड़कियों को देखने के बाद तुम्हारा चुनाव किया है. इतने आकर्षक चेहरे में कि मुंह से न ही नहीं निकला. मेरे मन ने तुम्हारे जैसे चेहरे की ही कल्पना की थी.’

यह बात सही भी लगी क्योंकि जब विनायक अपनी मां, बड़ी मौसी, मौसा के साथ उसे देखने आया तो एक बार में ही हां कर दी. फिर लोकल मौसा, मौसी, उन की युवा लड़कियों को बुलाया, सलाह ली और अति शीघ्रता से बाजार से मिठाई का डब्बा मंगवा कर 2100 रुपए से टीका कर दिया. सास ने अपने हाथों के कंगन उतार कर तृप्ति के हाथों में पहना दिए. तृप्ति के मातापिता ने भी रिश्ता पक्का होने पर मोहर लगा दी.

शुरू में दिन बड़े आराम से बीत रहे थे लेकिन कभीकभी रिश्तेदारों की खुसुरफुसुर उस का विश्वास भंग कर देती थी. उन की बातों का रुख अलग होता लेकिन आशय कुछ और. नानी ने एक बार कहा, सामने वाली लड़की सीमा विनायक के चारों तरफ मंडराती थी पर विनायक ने ही नहीं कर दी. हम ने तो कम्मो को कहा भी था कि करोड़पति घर की लड़की है.

वैश्य लड़की ब्राह्मण घर में बहू बन कर आ जाएगी तो समस्या क्या है. आजकल तो जातपांत को भी कोई नहीं पूछता. वैसे भी, बनिए ब्राह्मण के रहनसहन में, खानपान में कोई खास फर्क नहीं होता. तभी दूसरी मौसी ने ताना मारा, ‘अरे, वह मुल्ली कितनी सुंदर थी, कमलेश दीदी तो उस से भी शादी करने को तैयार थीं पर विनायक मना कर दिया.’

पता नहीं वे सब ऐसा कह कर उस के चरित्र का बखान कर रही थीं या तृप्ति के सौंदर्य का क्योंकि सास की साथ वाली अध्यापिकाएं भी कह कर गई थीं, ‘बहू तो तुम छांट कर लाई हो, दीदी. बहू के एकएक नाकनक्श प्रकृति ने अपने हाथों से तराशे हैं. ब्यूटी कौंटैस्ट में भाग लेती तो मिस यूनिवर्स चुनी जाती. नाक भी सुतवां, आंखें तो मानो नशे से भरे दो प्याले हों.’ तभी सास हंस कर बोली, ‘आज तो मुझे बहू की नजर उतारनी पड़ेगी.’

शुरू में तो सब ठीक रहा. मानो जन्नत की सैर के दिन थे. रिश्तेदारों के घर आनाजाना, होटल में खानापीना. पूरे परिवार की लिविंगस्टाइल देख कर तृप्ति अपने पर गर्व महसूस करती थी. अपने परिवार को हेय दृष्टि से देखने लगी. उसे क्या पता था पौलिश किया पीतल सोने से अधिक चमक मारता है. इतनी चमक कि आंखें चुंधिया जाती हैं. अब धीरेधीरे उस की आंखों के सामने से धुंध हटने लगी.

मां का अपने बेटे पर कोई नियंत्रण नहीं था. बाप की अकाल मृत्यु के कारण दोनों बेटे बेलगाम घोड़े थे. मां सिंगल पेरैंटस होने के कारण कमाने में लगी रही. सहारनपुर से आई दिल्ली जैसे शहर की आधुनिकता ने उस की आंखों पर परदा डाल दिया. दोनों बेटों की गर्लफ्रैंड्स घर आतीजाती थीं. कुछ का व्यवहार तो बड़ा संदेहास्पद था लेकिन अति आधुनिकता की पट्टी बंधी होने के कारण मां को कुछ दिखाई न देता था.

सामने रहने वाली लड़की सीमा शादीशुदा और एक 2 वर्षीय बच्चे की मां थी. उस लड़की का ससुराल और तृप्ति का मायका एक ही शहर में था. इस का लाभ विनायक ने भरपूर उठाया. शायद, उसे पसंद करने का एक कारण सीमामोह भी हो. वह हर सप्ताह की छुट्टी में सीमा से मिलने की योजना बना लेता और तृप्ति से बड़े प्यार से कहता, ‘चलो, तुम्हें तुम्हारे मायके घुमा  लाऊं.’ यह सुन कर तृप्ति का मन मयूर नृत्य करने लगता क्योंकि शादीशुदा लड़की के लिए मायके का आकर्षण और भी अधिक बढ़ जाता है.

इधर, वह पहले से ही सीमा से मिलने की योजना किसी होटल में कमरा औनलाइन ही बुक करा कर बना लेता. यह सिलसिला 3 सालों तक चलता रहा. वह तो एक दिन सामने रहने वाली लड़की का भाई दनदनाता हुआ आया. विनायक की कनपटी पर पिस्तौल तान दी और साफ शब्दों में धमकी दी कि मेरी शादीशुदा बहन की जिंदगी से निकल जा, वरना कनपटी उड़ा दूंगा.

पहली बार सास को भीगी बिल्ली बनी देख रही थी क्योंकि पानी वहीं समाता है जहां झील होती है. आज शेरनी की भांति दहाड़ने वाली सास की जबान पर ताला लगा था.

तृप्ति चुपचाप दृश्य निहारने के अलावा क्या कर सकती थी. सुबूत के तौर पर उस ने मैसेज दिखा दिए. वैसे भी, ये सब मैसेज सीमा के पति ने पकड़े थे और अपने साले से शिकायत की थी तथा तलाक की धमकी दी थी. सास की बोलती बंद और तृप्ति के तोते उड़ गए. इतनी अश्लील बातें तो पति व पत्नी के बीच भी नहीं होतीं. वास्तव में यह कहावत गलत है कि प्रेम अंधा होता है. सच तो यह है कि प्रेम तो बहुत पवित्र होता है, वासना अंधी होती है. लोग भ्रमवश प्रेम और वासना में अंतर नहीं कर पाते.

मन ने तो चेतावनी दे दी कि ऐसे व्यक्ति के साथ रहना गलत है जो कामांध है. चरित्रहीन व्यक्ति की कथनीकरनी एक नहीं होती. झीठ उस का सब से बेहतरीन हथियार होता है. ऐसे व्यक्ति उस भ्रमर के समान हैं जो फूल का रस पी कर उड़ जाते हैं. उन्हें दूसरों की भावनाओं से लेनादेना नहीं.

परिवारजनों ने भी तृप्ति को विनायक से अलग होने का सुझीव दिया लेकिन तृप्ति उस के साथ सावित्री बन कर खड़ी हो गई. उस ने मन में प्रतिज्ञा की कि वह अपने पति को कुमार्ग से हटा कर सुमार्ग पर ले आएगी तभी तो धर्मपत्नी के गौरव को प्राप्त कर सकेगी.

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पत्नी पति के कुमार्गी हो जाने पर उसे सुमार्ग पर ले आती है, इसीलिए पत्नी को धर्मपत्नी कहते हैं क्योंकि स्त्री में दया, ममता और चरित्र बल पुरुष की अपेक्षा अधिक होता है.

तनमन से समर्पित तृप्ति सोच नहीं सकती थी कि विनायक 2 बच्चों का बाप हो कर भी चरित्रहीनता की सारी सीमाएं पार कर सकता है. घर में आनेजाने वाली राफिला खान का आनाजाना बहुत बढ़ गया. तीजत्योहार हो, जन्मदिन हो, भजनकीर्तन या माता की चौकी हो, वह घर में आ कर बैठ जाती और फिर जाने का नाम ही न लेती. या कोई भी अवसर.

इस लिवइन रिलेशनशिप की परंपरा ने विवाह की पवित्रता को नष्ट कर दिया है. कानून ने इस संबंध से उत्पन्न हुए बच्चों को समान अधिकार दे कर स्त्रीपुरुष को अनैतिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर दिया है.

लिवइन रिलेशनशिप कानून ने भी भारतीय परंपरागत सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अब कानून की तलवार सिर से हट गई. विवाह सात जन्मों का बंधन नहीं, पवित्र बंधन नहीं बल्कि ऐयाश लोगों के लिए सुगम साधन बन गया और नैतिक लोग उन के कर्मों का दंश झेल रहे थे जबकि विधर्मी लाभ उठा रहे थे.

वह बच्चों के जन्म पर भी आई थी. बच्चों के पिता विनायक के बारे में भलीभांति जानते हुए भी राफिला ने चील की भांति विनायक को दबोच लिया. उसे पता है कि संपत्ति में उस का हिस्सा हो या न, बच्चे का तो होगा.

आज की महिला व पुरुष को विवाहित स्त्री व पुरुष ही पसंद आते हैं. पहले विवाह की पवित्रता का सम्मान करते हुए प्रेमीप्रेमिका खुद रास्ते से हट जाते थे. अपने प्रेम को युगल दंपती के जीवन से दफन कर देते थे ताकि उन की गृहस्थी बरबाद न हो या उन की बदनामी न हो. अब तो दांपत्य जीवन बरबाद करने का, विवाहित महिला या पुरुष को प्राप्त करने का जनून है लोगों में.

दोनों की गतिविधियों से केवल तृप्ति परेशान रहती थी. रिटायर्ड सास अब जिंदगी को एंजौय करना चाहती थी. कर्तव्यबोध का दूरदूर भी नामोनिशान न था. व्हाट्सऐप पर देरदेर तक बातें करना, फेसबुक देखना, रील्स देखना उन का शौक बन गया. वैसे भी, मोबाइल ने व्यक्ति को जितना दिया है उस से अधिक छीन लिया है. जितना लोगों को पास कर दिया है उतना ही सामने बैठे हुए लोगों को दूर कर दिया है. बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा, सभी के मनोरंजन की सामग्री मोबाइल में है. यह जितना ज्ञान परोस रहा है उतनी अश्लीलता भी.

मोबाइल जब हाथ में हो तो सामने बैठा व्यक्ति भी नजर के सामने से गायब. तृप्ति की सास भी मोबाइल ऐडिक्ट. छोटे शहर से आई कम्मो को आधुनिकता की चकाचौंध में अब दोनों बेटों के दोष दिखाई नहीं देते थे. लड़का विवाहित हो या अविवाहित; गर्लफ्रैंड रखना शौक. उन के बीच में सीमाओं का बंधन नहीं. अति आधुनिकता प्रदर्शन की होड़ में सब कृत्य स्वीकार.

छोटे बेटे ने एक बंगाली लड़की से प्रेमविवाह किया. शादी के तीनचार साल से पहले ही दोनों साथसाथ घूमतेफिरते थे. लड़की का घर में भी आनाजाना था. इतने प्रेमपाश में बंधा हुआ था पर शादी के 2 वर्ष बीत जाने पर एक बच्चे का पिता होने पर भी कौल सैंटर में अपनी बौस से दिल लगा बैठा.

मां ने पीरफकीर, मुल्लामौलवी, पंडितज्योतिषाचार्य की ड्योढी पर खूब नाक रगड़ी लेकिन कुछ नहीं हुआ. पत्नी ने गुस्से में तोड़फोड़ कर, गाड़ी ठोंक कर, हारपिक पी कर, वाशबेसिन तोड़ कर अपना गुस्सा, अपना अवसाद निकाला. आपसी समझीते से तलाक होने के बाद भी फिर दोनों का वैवाहिक जीवन प्रारंभ हो गया. अब अजीब हो गई थीं समाज की कहानियां. लिवइन रिलेशनशिप ने प्रेम के नाम से अब वासना को खुल कर तांडव करने का अवसर दे दिया था.

एक दिन विनायक ने भी खुल कर घोषणा कर दी कि उस ने जौब छोड़ कर राफिला के साथ वैन में नौनवेज का बिजनैस आरंभ कर दिया है लेकिन कुछ दिनों बाद वैन खटारा बन कर खड़ी थी. अब दोनों ने मिल कर नौनवेज का रैस्टोरैंट खोल लिया. रैस्टोरैंट क्या, दोनों का साथसाथ रहने का बहाना था. वैसे तो नौनवेज का बिजनैस होने के कारण घर वाले नाराज थे लेकिन व्यापार उन्नत हो रहा है, सोच कर खुश थे क्योंकि अकसर रात के कभी 12 बजे, कभी 2 बजे मोबाइल पर संदेश आ जाता था कि ग्राहक अधिक हैं, मैं घर नहीं आ सकूंगा.

जुड़वां बच्चों को अकेली तृप्ति संभालती, अकसर रात आंखों में ही कट जाती. कोई बच्चा पलंग से गिर जाता. दोनों एकसाथ रोते तो चुप कराना मुश्किल. अकसर एक रोता तो दूसरा सोता हुआ भी जाग कर रोने लगता. एक बच्चे की टौयलेट साफ करती, दूसरा चिल्लाए जाता. न सास का सहारा, न पति का साथ और तब तृप्ति के मुंह से निकल जाता कि सोने को भी नहीं मिलता. वास्तव में वह सुहागन हो कर विधवा का जीवन जी रही थी. अमीर घर की चारदीवारी में बंदिनी का सा जीवन लेकिन उसे विश्वास था कि एक दिन उस का पति लौट आएगा.

एक वर्ष बाद पता चला कि रैस्टोरैंट में लाखों रुपए बरबाद हो गए.

वास्तव में वह रैस्टोरैंट नहीं, साथ रहने का सार्थक बहाना था. बिजनैस के ठप होने पर सास ने खरीखोटी सुनाई. 16 लाख रुपए मां के बिजनैस में स्वाह कर दिए थे, 3 लाख रुपए तृप्ति के क्योंकि एक वर्ष तृप्ति ने केंद्रीय विद्यालय में अस्थायी अध्यापिका के रूप में कार्य किया था. गर्भवती होने के कारण एटीएम कार्ड भी पति के हाथ में.

हार कर विनायक ने फिर किसी एमएनसी कंपनी में नौकरी कर ली. बेंगलुरु में पोस्टिंग हो गई. अभी बेंगलुरु गए हुए तृप्ति को 2 ही माह ही बीते थे कि विनायक पुणे का बहाना कर अपने छोटे बच्चों की जिम्मेदारी पत्नी पर छोड़ कर प्रथम लौकडाउन से पहले दिन दिल्ली उसी राफिला खान के पास आ गया. मत पूछो केवल कल्पना करो कि एक अनजान शहर में 2 माह पूर्व आई 2 छोटे जुड़वां बच्चों की मां ने उन दिनों को कैसे बिताया होगा. बारबार फोन करने पर, बच्चों की तबीयत खराब बताने पर उस ने औनलाइन सामान भिजवाने की व्यवस्था कर दी लेकिन तृप्ति की तबीयत बिगड़ने पर उस की कोई सुध न ली.

सामान भिजवाने के बाद तो उस ने फोन उठाना ही बंद कर दिया. तृप्ति की छोटी बहन ने नोएडा में रहते हुए औनलाइन दवा की व्यवस्था की. मांबाप की, भाईबहनों की जान अटकी पड़ी थी. जब प्रत्येक व्यक्ति अपने परिजनों के बारे में चिंतित था, अपनों की सलामती के लिए प्रार्थना कर रहा था, विनायक अपनी प्रेमिका के साथ रंगरेलियां मनाने में व्यस्त था. बीच में सरकार ने इमरजैंसी फ्लाइट की भी व्यवस्था की लेकिन वह नहीं पहुंचा.

3 माह बाद जब वापस पहुंचा तो तृप्ति ने पलकपांवड़े बिछा दिए पति के स्वागत में. यूट्यूब पर रैसिपी पढ़ कर नईनई डिशें बना डालीं. उसे उस का विश्वास यही यकीन दिलाता रहा कि मेरा पति लौकडाऊन में फंस गया है. उस के क्वारंटाइन की भी अलग कमरे में व्यवस्था की ताकि छोटे बच्चे प्रभावित न हों लेकिन आने के समय भी शक उत्पन्न हुआ क्योंकि पुणे से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों को 7 दिनों के क्वारंटाइन की व्यवस्था थी और दिल्ली से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों के लिए 3 दिन की.

तृप्ति के पूछने पर उस ने कहा कि वह दिल्ली से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों की लाइन में खड़ा हो गया था. एनआरआई भाई ने तृप्ति को समझीया कि अलगअलग फ्लाइट से आने वालों के गेट भी अलगअलग होते हैं और सारा डाटा कंप्यूटर में फीड होता है. और कोरोनाकाल में तो विशेष सावधानी बरती जा रही थी, फिर यह कैसे हो सकता है कि वह अपने को दिल्ली से आने वाला बता दे.

भ्रम टूट गया, सत्य उजागर हो गया जब 3 दिन बाद राफिला का फोन आया. वह विनायक से लड़ रही थी. न जाने क्या सोच कर विनायक ने फोन तृप्ति के हाथों में दे दिया और राफिला ने सारा राज उस के कानों में उड़ेल दिया. सब सुन तृप्ति के होश उड़ गए. वह घायल शेरनी की भांति पति पर टूट पड़ी लेकिन हृष्टपुष्ट विनायक ने प्रहार पर प्रहार कर उसे अधमरा कर दिया. थप्पड़, घूंसे और लात तृप्ति पर बरसा दिए. फोन पर सूचना देने पर मातापिता ने 112 पर फोन करने को कहा लेकिन तृप्ति के कोमल हृदय में अब भी पति के लिए सौफ्टकौर्नर सुरक्षित था.

चतुरचालाक सास ने आननफानन अपने छोटे बेटे से तत्काल एयर टिकट करा तृप्ति को दिल्ली बुला लिया. एयरपोर्ट से जा कर मांबाप उसे घर ले आए. दोनों मासूम बच्चे तिनके की भांति कांप रहे थे लेकिन नाटकखोर पति ने अपनी चालाकी के मोहरे फेंक कर तृप्ति का दिल पिघला दिया. माफी, रोनाधोना, आत्महत्या की धमकी से प्रभावित हो तृप्ति ने मातापिता को पुलिस में शिकायत और कानूनी कार्रवाई करने से रोक दिया.

सास, देवर और देवरानी मनाने आईं और रेगिस्तान की शुष्क धरती में मीठा झीरना खोजने की तृष्णा में तृप्ति फिर छली गई. शातिर विनायक के पास अब धोखा देने का अच्छा बहाना था. आईटी क्षेत्र में कार्यरत सभी वर्क फ्रौम होम कर रहे थे लेकिन उस ने ऐलान कर दिया कि उस की नाइट ड्यूटी है. उस ने तृप्ति पर भी सर्विस करने का दबाव यह कह कर बनाया कि कम्फर्ट जोन से बाहर निकलो. बेचारी गृहस्थी बचाने के लालच में इस शर्त को भी मान गई.

विनायक को मौका मिल गया. अब बच्चे स्कूल जाने लगे. बच्चे दिन में अपने पिता के पास रहते और रात को तृप्ति के पास क्योंकि वह दिन में वर्क फ्रौम होम करता और रात को नाइट ड्यूटी के नाम पर राफिला के पास चला जाता. विनायक और तृप्ति केवल नाम के लिए साथ रहते थे. मिलते कभी न थे.

ऐसा नहीं कि तृप्ति बेवकूफ थी या उस के मातापिता अनजान थे कि वे विनायक के बारे में न जानते हों लेकिन उस के अटूट, असीम प्रेम व दृढ़ विश्वास ने उन के पैरों में बेडि़यां डाल दीं. सब को पता था कि वह नाइट ड्यूटी के नाम से कहां जाता है, कहां रहता है.

जब सबकुछ ही खुद करना है तो यहां क्यों रहना. यह सोच कर तृप्ति मेरठ आ गई. मां ने महिला थाने में शिकायत कराई. एसओ ने फौरन ऐक्शन लिया और विनायक को थाने में बुला लिया. ससुराल में फोन करने पर देवर ने फोन उठाया और सत्य का साथ दिया. बाहर निकल कर पति ने फिर माफी मांगने का ढोंग किया.

राफिला को केवल मित्र बताया और विश्वास दिलाया कि 17-18 साल पहले से हमारी दोस्ती है. तुम पत्नी हो, वह तुम्हारी जगह कभी ले सकती है क्या? इन दोनों बच्चों का जीवन क्यों बरबाद करती हो? हमारी लड़ाई में इन बच्चों का भविष्य स्वाहा हो जाएगा.

औरत की यही त्रासदी है, कभी मांबाप के नाम पर, कभी भाई के नाम पर, कभी पति के नाम पर और कभी औलाद के भविष्य के नाम पर बलि चढ़ती आई है. तृप्ति ने भी सोच लिया कि मैं इन बच्चों का भविष्य इतना उज्ज्वल नहीं बना पाऊंगी जितना हम बना पाएंगे. एक हाथ और दो हाथों की शक्ति में जमीनआसमान का अंतर होता है. महिला थाने के अधिकारियों ने भी तृप्ति को समझी दिया क्योंकि सरकार का भी मानना है कि घर तोड़ने का नहीं, जोड़ने का ही प्रयास करना चाहिए.

अब बेटी तृप्ति ने मांबाप पर महिला थाने का सहारा लेने को रायता फैलाने का काम बता दिया. इसलिए मातापिता सबकुछ जानते हुए अंधे, गूंगे और बहरे बने हुए थे लेकिन सती सावित्री का विश्वास जब धराशायी हो गया जब एक शाम जल्दी में वह अपना जी मेल लौगआउट करना भूल गया और तृप्ति को रात में  लैपटौप पर कुछ काम करना पड़ा लेकिन एक मेल पढ़ते ही उस की हालत खराब हो गई, वह अपना काम करना भूल गई.

वह जैसेजैसे मेल पढ़ती गई, सुबूत मिलते गए. वह सुबूतों के अभाव में विश्वास नहीं करना चाहती थी. आज सुबूत भी उस के सामने थे. विनायक और राफिला का एक बेटा था. जिस अस्पताल में बच्चा पैदा हुआ, जहां उस का इलाज चला सब सुबूत.

अब तो तृप्ति का विश्वास चकनाचूर हो गया. उस की प्रतीक्षा समाप्त हो गई. उस का विश्वास टूट गया था. उस ने बच्चों को साथ लिया और अपनी कंपनी से कहसुन कर ट्रांसफर ले कर चंडीगढ़ आ गई. उस ने शहर से दूर कंपनी के पास मकान किराए पर लिया. अब उसे किसी की प्रतीक्षा नहीं थी. राफिला नामक चील उस के विनायक नामक क्रोंच को हमेशा के लिए ले कर उड़ गई थी और इन परिस्थितियों से समझीता करना अब आत्मसम्मान को बिलकुल स्वीकार नहीं था. Family Story in Hindi

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