Family Story in Hindi : प्यार ही तो है जो दूसरों को अपना बना लेता है. इला यह बात अच्छी तरह समझती थी लेकिन अमला को वह अपना नहीं बना पा रही थी. कैसी दीवार थी उन दोनों के बीच?
‘‘फिर पड़ोसियों के लिए तुम ने 3 प्लेट्स लगा लीं? हर त्योहार पर अपना दिल दुखी करवाने से थकतीं नहीं? अभी उतरा मुंह ले कर आओगी,’’ कहतेकहते आमिर ने किचन में काम करती अपनी पत्नी इला की लंबी, गोरी, सुराहीदार गरदन को चूम लिया. इला ने बनावटी गुस्सा दिखाया, ‘परेशान मत करो.’ फिर पता नहीं उसे क्या सूझ, आमिर की तरफ घूम गई और उस के चारों तरफ अपनी सुंदर बांहें फैला दीं, ‘‘आमिर, कितना अच्छा लगता है न, हर त्योहार कैसा सुंदर लगता है. मैं तो कहती हूं कि हर इंसान को इंटरकास्ट शादी करनी चाहिए. दोनों तरफ के त्योहार मनाने में कितना मजा आता है.’’
‘‘पर हम तो सब फैस्टिवल्स मनाते हैं, मम्मी.’’ बच्चों के आने की आहट पर इला अब तक अपना काम करने लगी थी, बोली, ‘‘हां, हर त्योहार सैलिब्रेट करना चाहिए,’’ अब आमिर के साथसाथ स्वरा और हर्षिल ने भी एक कोने में रखी थाली से पिन्नी उठा कर खानी शुरू कर दी थी. स्वरा की नजर 3 प्लेट्स पर पड़ी, ‘‘उन आंटी को भी दोगी जो हर बार आप के साथ इतना मिसबिहेव करती हैं.’’
‘‘हां, अच्छा तो नहीं लगता पर फ्लोर के 2 फ्लैट्स में त्योहार पर कुछ दूं और एक को न दूं तो मुझे अच्छा नहीं लगता.’’ हर्षिल ने कहा, ‘‘पर वह आंटी हमें बिलकुल अच्छी नहीं लगतीं, मम्मी. मत दो उन्हें कुछ.’’
आमिर ने कहा, ‘‘पिन्नी अच्छी बनी हैं, इला. उसे मत दो. क्यों ऐसे घर में दे कर आती हो जहां मुझे पूरा यकीन है कि यह सब डस्टबिन में जाता होगा. इस से अच्छा तो किसी गरीब को दे देना. वाचमैन को दे दो, हाउसकीपिंग वालों को दे दो, धोबी को दे दो. इस घर में क्यों देती हो?’’
इला ने शांत भाव से कहा, ‘‘रिलैक्स. तुम लोग ठीक कह रहे हो. मुझे उस घर में बारबार इंसल्ट करवाने के बाद कुछ भी नहीं देना चाहिए. चलो, अगली बार से उसे कुछ नहीं दूंगी. सचमुच, हर बार मन दुखता है.’’
सब ने एकएक पिन्नी और उठाई. इला ने तीनों पेपर प्लेट्स के ऊपर एकएक टिश्यूपेपर रख दिया, कहा, ‘‘तुम लोग खाओ, मैं सब को दे कर आती हूं.’’
मलाड की कामधेनु सोसाइटी की इस बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर 4 फ्लैट हैं. एक में इला, उस के सामने वाले फ्लैट में एक साउथ इंडियन फैमिली रहती है जिस में
2 बुजुर्ग श्रीनिवासन अंकल और ज्योति आंटी ही हैं, तीसरे साइड वाले फ्लैट में एक महाराष्ट्रियन कुलकर्णी फैमिली है जो एक जौइंट फैमिली है और चौथे फ्लैट में अमला अपने पति विजय और एक 7 साल के बच्चे के साथ रहती है. फ्लोर पर 2 लिफ्ट्स हैं. हमेशा की तरह सब से पहले इला ने ज्योति आंटी, फिर कुलकर्णी फैमिली को ‘हैप्पी लोहड़ी’ कहते हुए प्लेट्स दीं.’’
फिर दिल पर पत्थर रख कर एक ठंडी सांस ले कर इला ने अमला के फ्लैट की घंटी बजाई. दरवाजा खुला, अमला की कर्कश आवाज आई, ‘‘क्या है?’’
‘‘हैप्पी लोहड़ी, ये आप के लिए. मैं ने पिन्नी बनाई हैं.’’
अमला ने प्लेट झटके से ली और दरवाजा झट से इला के मुंह पर बंद कर दिया. इस में कुछ भी नया नहीं था. 3 साल से यही हो रहा था. अमला 3 साल पहले ही इस फ्लैट में आई थी. इला मन ही मन उदास सी हुई, चुपचाप अपने फ्लैट में चली गई. आमिर और बच्चों ने उसे ध्यान से देखा, समझ गए, वही हुआ है जो हमेशा होता रहा है.
इला अपने परिवार में खूब खुश थी. विजातीय आमिर से प्रेमविवाह किया था, हाउसवाइफ थी. इला की सहेली विनी की शादी में दोनों मिले थे. थोड़ी मस्ती, शरारत के मूड में दोनों की अच्छी बौंडिंग हो गई थी. फिर चल निकला था एक सिलसिला मुहब्बत का, लंबीलंबी बेचैन रातों का, एकदूसरे की कौल्स के इंतजार में कटते दिनरात का.
दोनों के घरवाले नहीं माने थे. सो, आमिर ने मुंबई ट्रांसफर लिया और दोनों के दोस्तों के साथ इला मुंबई चली आई थी. ऐसी स्थिति में दोस्तों का जो साथ जरूरी है, वही आमिर और इला का सहारा बना था. दोस्त दोनों की शादी करवा कर वापस लखनऊ चले गए थे और ये दोनों अपने प्यार के संसार में रमते चले गए थे. समय के साथ दोनों के परिवार वालों के तेवर कुछ नरम तो हुए पर दीवार बनी रही.
इला और आमिर ने धर्म की हर दीवार को अपनी लाइफ से निकाल फेंका था. यही शिक्षा बच्चों को भी दी थी. सब हर त्योहार सैलिब्रेट करते. आमिर दीवाली पर घर सजा देता. इला लोहड़ी पर पकवान बनाती. क्रिसमस पर वह केक बेक करती. ईद पर दावत होती. दोस्त आते. सब ठीक था पर जब से अमला आई थी, इला का मन त्योहार पर जरूर दुखता. इला की आदत थी कि वह त्योहारों पर जब भी कुछ बनाती, फ्लोर पर रहने वालों से जरूर शेयर करती. वह हंसमुख, मिलनसार स्वभाव की थी. उसे लोग पसंद करते.
आमिर भी ऐसा ही था. बिल्डिंग में किसी को भी कोई परेशानी होती, वह हाजिर रहता. सब के काम आता. आज लोहड़ी से पहले भी जब इला अमला को ईद पर ड्राईफ्रूट्स से सजी सुंदर सी प्लेट में सेंवईं देने गई थी. उस ने ऐसे ही बहुत ही रुखाई से प्लेट ली थी जिसे बाद में अपनी मेड से भिजवा दिया था. आमिर और इला सब समझ ही रहे थे कि मुसलिम पति और हिंदू पत्नी का यह जोड़ा अमला को नागवार गुजरता है. कई बार ऐसा होता कि कभी आतेजाते अमला और इला मिलते, अमला एक झटके से तुरंत इला की तरफ पीठ कर लेती. कभी उस की तरफ देखती भी नहीं. उस के चेहरे से ही समझ आ जाता कि अमला को यह परिवार बिलकुल पसंद नहीं है. कई बार अमला का बेटा अर्णव इला को देख कर मुसकराता, अमला तुरंत उसे अपनी ओर खींच लेती.
आज भी यही हुआ था. इला को हमेशा इस बात पर दुख होता कि कुछ लोग अपने इर्दगिर्द अपने धर्म की दीवार के अंदर ही रह जाते हैं, वे देखते ही नहीं कि धर्म की दीवार के उस पार दुनिया कितनी सुंदर हो सकती है. कई बार ऐसा हुआ था कि अमला और इला एकसाथ लिफ्ट की तरफ बढ़े पर फिर अमला का तना चेहरा देख कर इला सीढि़यों की तरफ बढ़ गई थी. नीचे से ढोल का शोर सुना तो इला खिड़की की तरफ भागी. उसे यह देख कर बहुत मजा आया कि आमिर और बच्चे सब के साथ मिल कर डांस कर रहे थे. तीनों रंगबिरंगे हो चुके थे. आमिर ने उसे फिर देखा, हंस दिया, इशारा किया, ‘बस, खाना खा कर आ रहे हैं.’ थोड़ी देर में हर्षिल आया, ‘‘मम्मी, पापा ने आप के लिए खाना भेजा है. ये सारे डब्बे जल्दी से खाली कर के दे दो. कैटरर के हैं.’’
इला को आमिर पर बहुत प्यार आया, बोली, ‘‘अब तुम लोग भी जल्दी आ जाओ.’’ लोहड़ी अच्छे से बीत गई. सब का दिन बहुत अच्छा बीता था.
कुछ दिन और बीते. जीवन सामान्य गति से चलता रहा. एक दिन आमिर औफिस में था, बच्चे स्कूल गए हुए थे. इला ने सोचा, पार्लर हो आती हूं. उस ने जैसे ही लिफ्ट में पैर रखा, अचानक अमला भी लिफ्ट में घुसी. उस ने ध्यान ही नहीं दिया था कि इला भी लिफ्ट में है. जब देखा तो उस की तरफ पीठ कर ली. यह लिफ्ट अभी 12 दिनों पहले ही नई बनी थी. दूसरी लिफ्ट में काम चल रहा था. 10वीं फ्लोर से जैसे ही लिफ्ट 8वीं फ्लोर के थोड़ा ऊपर और 9वीं फ्लोर के थोड़ा नीचे पहुंची, अचानक रुक गई.
बाहर वाले को समझ आ सकता था कि लिफ्ट अटक गई है. अमला बेचैन हो गई. इला से बात करनी नहीं थी, इधरउधर देखती रही, फिर इला की तरफ पलटी. एक वाइट टौप, रंगबिरंगी सी स्कर्ट, गले में स्टाइलिश सा स्कार्फ डाले इला को आज पहली बार अमला ने ध्यान से देखा था. इला चुपचाप ऊपरनीचे देखती रही. उस ने इमरजैंसी बटन दबाया. कोई नहीं आया तो वह इंतजार करने लगी. अमला जोरजोर से वाचमैनवाचमैन चिल्लाने लगी. इला समझ गई कि वह घबरा रही है. इला ने कहा, ‘‘अमला, दसबीस मिनट लगेंगे, कोई आ जाएगा. वौचमैन तक आवाज नहीं जाएगी. घबराओ मत.’’
पर अमला को जैसे पैनिक अटैक आ रहा था. वह चीखने लगी तो इला ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उसे तसल्ली दी, ‘‘रिलैक्स. ऐसा हो जाता है. नई लिफ्ट है, ठीक हो जाएगी. इधर से कोई निकलेगा तो देख लेगा.’’
अमला अचानक चुप हुई. इला को देखने लगी, कैसी शांत सी खड़ी है यह. जरा भी नहीं घबरा रही है. मेरे कंधे पर हाथ रखा.
अमला को रोना आ गया, ‘‘मुझे सफोकेशन हो रहा है. मेरा दम घुट रहा है.’’ इला ने उसे गले लगा लिया, मुसकराई, ‘‘कुछ नहीं हो रहा है. देखो, चैनल से बाहर की हवा आ रही है, लिफ्ट पूरी तरह से बंद थोड़े है.’’ इला के स्नेहभरे स्पर्श से अमला को कुछ राहत मिली. प्रेमपूर्ण स्पर्श में बड़े से बड़े दुख को कम करने की ताकत होती है.
‘‘अपने हसबैंड को फोन करती हूं.’’
‘‘वे औफिस में होंगे. जब तक वे आएंगे, हम लिफ्ट से बाहर निकल चुके होंगे.’’
आजकल लिफ्ट में काम चल रहा था. यह नई लिफ्ट थी, दूसरी लिफ्ट चल रही थी पर उस में भी काम चल रहा था. इतने में कोई सीढ़ी से उतरा. 10वीं फ्लोर के संजय गुप्ता थे. इन दोनों को लिफ्ट में फंसे देख कर हैरान, परेशान से बोले, ‘‘मैं वाचमैन को भेजता हूं. आप दोनों बिलकुल परेशान मत हो. फोन चल रहा है?’’
‘‘नहीं,’’ इला ने जवाब दिया. संजय के जाते ही थोड़ी देर बाद सीढि़यां चढ़ते हुए भागता हुआ सा वाचमैन सुधीर आया. वाचमैन सब को पहचानते ही हैं. वह बोला, ‘‘संजय सर ने बताया तो लिफ्ट वाले को फोन कर के पूछा था, उन्होंने बताया है कि उन्हें आने में टाइम लगेगा, डेढ़दो घंटे में वे लोग आ कर ठीक कर पाएंगे. मैडम, चैनल से कोई पानी की छोटी बोतल देने की कोशिश करूं?’’
‘‘नहीं, सुधीर. मेरे बैग में पानी है,’’ कह कर इला ने अमला से पूछा, ‘‘तुम्हें चाहिए, तो बता दो.’’
डेढ़दो घंटा सुन कर अमला सुधीर पर गुस्सा होने लगी, ‘‘लिफ्ट वाले को बोलो, अभी आए. फौरन. उस का दिमाग खराब हो गया है कि यह सुन कर भी कि कोई लिफ्ट में फंसा है, 2 घंटे बता रहा है.’’
‘‘मैडम, वह अंधेरी में है. उस ने कहा, वह निकल रहा है, जल्दी ही आ जाएगा. आप को पानी दूं?’’
‘‘दफा हो जाओ,’’ अमला चिल्लाई.
सुधीर डांट खा कर नीचे चला गया. अब आतेजाते लोग थोड़ी देर रुकते, परेशानी समझते पर कोई कुछ कर नहीं सकता था. अमला ने चिढ़ते हुए बोला, ‘‘अच्छा है, मेरा बेटा स्कूल में है. उस के आने तक तो निकल ही जाएंगे.’’
‘‘हां.’’
अमला बेचैन सी लिफ्ट के बाहर देखती, गुस्से में कुछ बड़बड़ाती. इला ने अमला को कनखियों से देखा, उस से कम ही उम्र की थी अमला. इस टाइम कुरते और जीन्स में थी, बाल यों ही लपेट रखे थे. देखने में सुंदर थी. उस से बात करने की गरज से यों ही पूछ लिया, ‘‘तुम कहां जा रही थीं?’’
‘‘टेलर के पास. यही टाइम मिलता है जब अर्णव स्कूल में होता है. ऐसे ही काम निबटाती हूं. तुम कहां जा रही थीं?’’
‘‘पार्लर. मैं भी बच्चों के स्कूल के टाइम के हिसाब से ही अपना रूटीन रखती हूं. मैं क्या, सारी मांएं यही करती हैं,’’ इला मुसकराई.
अमला ने सोचा, यह कितनी शांत रहती है. जब से हम लिफ्ट में फंसे हैं, यह आराम से सब हैंडल कर रही है. उस ने पूछ लिया, ‘‘तुम्हें लिफ्ट में फंसने से दिक्कत नहीं हो रही है, कोई परेशानी नहीं हो रही है? आराम से शांत खड़ी हो?’’
इला बड़ा प्यारा मुसकराई, अमला को वह पहली बार अच्छी लगी.
इला ने दोस्ताना लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारी बात का जवाब बाद में जरूर दूंगी. पहले तुम बताओ कि तुम मुझ से इतना चिढ़ती क्यों हो?’’
अमला के चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव आए, क्या कहती. उस की ऐसी सोच क्यों है, कैसे बताए. इला ने उसे कुछ दुविधा में देखा, तो कहा, ‘‘चलो, कुछ न कहना चाहो तो छोड़ो, कोई बात नहीं.’’
अमला चुप रही, फिर कहा, ‘‘थोड़ी देर नीचे ही बैठ जाएं? खड़ेखड़े पैर दुखने लगेंगे.’’
‘‘रुको, कोई आता है तो उस से बिछाने के लिए कुछ मांग लेंगे.’’
अमला और इला बीचबीच में अपना नैटवर्क भी चैक कर रही थीं. अमला अचानक बोली, ‘‘मेरा नैटवर्क आया.’’
‘‘जल्दी से किसी पड़ोसी से कुछ बिछाने के लिए मांग लो.’’
अमला ने चौथी फ्लोर पर रहने वाली एक फ्रैंड शैली को फोन कर के सब बात जल्दी से बता दी. वह फौरन भागी आई, कहा, ‘‘ओह, यह तो बड़ी परेशानी में फंस गईं तुम दोनों. यह लो एक चादर,’’ कहती हुई लिफ्ट के बीच की डिजाइन से चादर दे दी. फिर पूछा, ‘‘कुछ बिस्कुट दूं?’’
‘‘नहीं, अभी नाश्ता किया ही था, कुछ नहीं चाहिए.’’
‘‘अच्छा, कुछ भी चाहिए तो मुझे फोन करते रहना. मैं सेक्रेटरी और चेयरमैन से बात करती हूं. ऐसा नहीं होना चाहिए था. कोई बुजुर्ग होता तो? यह गलत है.’’
अमला को फिर लिफ्ट वाले पर गुस्सा आ गया, इला चुप रही. शैली चली गई. अमला ने चादर बिछाई, कहा, ‘‘बैठ जाओ. मुझे तो थकान होने लगी थी. मेरा तो वैसे ही बीपी हाई रहता है.’’
इला उस के साथ बैठ गई. दोनों लिफ्ट में बैठी थीं. आनेजाने वाला कोई रुक जाता, लिफ्ट वाले को कोसता, कोई फ्रैंड हंसने लगती, कोई हमदर्दी दिखाता. अमला ने फिर खुद ही बात शुरू की, ‘‘मुझे पता है कि तुम ने मुझे कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है पर मुझे बचपन से अपने यहां आने वाले धर्मगुरुओं से यही शिक्षा मिली है कि दूसरे धर्म के लोगों से दूर रहना है. वे हमारे बराबर नहीं हैं. आमिर मुझे हमेशा एक समझदार, मिलनसार इंसान लगा है पर मैं तुम लोगों से दूर रहती हूं. मैं पढ़ीलिखी हूं, धर्मगुरुओं को बहुत झेल भी चुकी हूं, अपने दर्द किसी से कभी बांट नहीं पाई. धर्मगुरुओं के चक्कर में मैं ने अपनी मानसिक शांति खोई है.’’
उस की उदास, थकी सी आवाज सुन कर इला चौंकी, ‘‘क्या हुआ? तुम मुझ से अपने दुख बता सकती हो, अगर चाहो तो.’’
अमला ने बहुत ध्यान से इला को देखा. अब इला का स्नेहिल, गंभीर चेहरा देख उसे लगा जैसे इला उस की कोई सहेली है. अमला पता नहीं अंदर से कितना भरी हुई थी, कहने लगी, ‘‘तुम लोगों से मैं बहुत नफरत करती रही. मुझे तुम लोग बिलकुल पसंद नहीं थे पर साथ ही साथ वह धर्मगुरु, वह पाखंडी भी मुझे आज तक नहीं भूला जिस ने मेरे साथ अकेले में खूब छेड़छाड़ की, मेरे वीडियो भी बना लिए, मुझे ब्लैकमेल भी किया. आज तक भी मैं उस से डरती हूं. शादी के बाद भी डरी सी रहती हूं. उस पाखंडी ने मेरी पूरी पर्सनैलिटी बदल दी.’’ यह कहतेकहते अमला का स्वर भर्रा गया.
इला को उस पर बहुत तरस आया. उस ने अमला के हाथ पर हाथ रख दिया. थोड़ी देर सोचती रही, फिर कहा, ‘‘अमला, मैं सब समझ गई. तुम हम लोगों से नफरत करती हो, इस के पीछे क्या कारण हैं. यह समझना मुश्किल है भी नहीं. हमारे समाज में हर धर्म ने अपनीअपनी दीवार खड़ी कर रखी है. हम अपनी चारदीवारों में अपनी सीमित सोच के साथ जिए जा रहे हैं. दीवार के उस पार के लोगों को अपने से कमतर समझते हैं. ये दीवारें जब तक नहीं ढहेंगी, अमला का परिवार यों ही इला के परिवार से नफरत करता रहेगा.
‘‘तुम पूछ रही थी न कि मैं लिफ्ट में फंसने पर शांत कैसे खड़ी हूं, वह इसलिए कि यह परेशानी तो कोई परेशानी ही नहीं है. अभी लिफ्ट वाला आएगा, हम बाहर निकल जाएंगे. मैं ने तो इस से कई ज्यादा परेशानियां झेली हैं. एक ब्राह्मण परिवार की बेटी हो कर एक विधर्मी से प्रेम विवाह किया है. अंदाजा लगा सकती हो कि क्याक्या झेला होगा और तुम जैसे पड़ोसी मिल जाएं तो एक मैंटल टौर्चर हर त्योहार पर मिलता है. तुम्हें अंदाजा है कि जबजब तुम ने मेरे मुंह पर अपना दरवाजा बंद किया है, मुझे कैसा लगा होगा? सोच सकती हो वह अपमान, हर बार हर त्योहार पर.
‘‘यह समाज हमेशा धर्म की दीवार खड़ी करता रहा है. इन दीवारों के सहारे ही टिका है हर धर्म और तुम जैसी महिलाएं अपना नुकसान करवाने के बाद भी इसी के फेर में पड़ी हैं और हम जैसों से नफरत किए जा रही हैं. होना क्या चाहिए, पता है, निडर हो कर अपने पाखंडी गुरु को ऐसी डांट लगाओ कि वह तुम से डरता घूमे. यह क्या बात हुई कि तुम्हारे साथ नाइंसाफी हुई और तुम ही घुटघुट कर जी रही हो, दोस्त.
‘‘यह समाज, यह धर्म का चक्कर डरे हुए को और डराता है. मैं अपने प्रेम विवाह के बाद इस समाज के ताने झेलझेल व सब से निबट कर और मजबूत होती गई हूं और मुझे अपने और अपने परिवार पर गर्व होता है कि हमारी सोच को किसी धर्म की कोई दीवार बांध कर नहीं रख सकी.’’
अमला सांस रोके हुए इला को बोलते सुनती रही. इतने में कई लोगों के आने की आहटें आईं. दोनों खड़ी हो गईं. लिफ्ट का काम करने वाले 3 लोग थे, ‘‘सौरी मैडम, सौरी मैडम’’ कहते हुए उन्होंने 10 मिनट में दरवाजा खोल दिया. फिर एक स्टूल इला को पकड़ाया. उस पर पैर रख कर दोनों एकएक कर के बाहर आईं. लिफ्ट वालों ने बहुत माफी मांगी और अमला व इला अपनेअपने फ्लैट की तरफ बढ़ गईं.
इला ने अपना फ्लैट खोलते हुए कहा, ‘‘आज तो हम ने बहुत बातें कर लीं. अच्छा हुआ, लिफ्ट खराब हो गई.’’ अमला कुछ बोली नहीं, बस, मुसकरा कर अपने फ्लैट में चली गई.
शाम को आमिर और बच्चों ने पूरी बात सुनी. आमिर ने उसे गले लगा लिया, ‘‘आज तो बहुत थक गई होगी? और उस पर अमला का साथ, उफ, मेरी प्यारी पत्नी दोदो टौर्चर झेल कर आई है.’’
शाम 7 बजे इला के फ्लैट की घंटी बजी. आमिर ने दरवाजा खोला. विजय, अमला और अर्णव को देख आमिर को कुछ समझ नहीं आया. अमला के हाथ में मिठाई के डब्बे थे. इतने में इला भी अंदर से निकल आई थी. वह भी सब को देख कर चौंकी, ‘‘तुम लोग!’’
‘‘हां, भाई, हम लोग. ये तुम सब के लिए मिठाई.’’
‘‘पर किसलिए?’’
‘‘ओहो, बैठने तो दो,’’ करीने से सजे लिविंगरूम में आती हुई अमला सुंदर, स्टाइलिश सोफे पर बैठती हुई बोली. विजय और अर्णव भी हंसते हुए उस के पास बैठ गए. विजय हंसा, ‘‘आमिर, अमला को आज लिफ्ट में शायद बहुत मजा आया है. जैसे ही मैं औफिस से आया, सबकुछ बता कर बोली, ‘आज इला के घर
जाना है.’’
सब हंसने लगे, थोड़ी देर के बाद इला ने पूछा, ‘‘आप लोग कुछ लेंगे?’’
जवाब अमला ने दिया, ‘‘हां, पहले चाय, फिर आज खाना भी खा कर जाएंगे. तुम भी थकी होगी, ज्यादा कुछ नहीं, कुछ शौर्टकट में बना लेना, पुलाव भी चलेगा.’’
इला, आमिर, स्वरा और हर्षिल हैरानी से नए मेहमानों का मुंह देख रहे थे. बस, इला जानती थी कि यह हृदय परिवर्तन कैसे हुआ. जब आपस में बैठ कर मन की बात की जाएगी तभी तो बात बनेगी न. वह खुश थी कि आज उस ने एक और इंसान को अपने धर्म की दीवार के उस पार भी देखने के लिए तैयार कर लिया है. Family Story in Hindi





