Social Story in Hindi : अमीरों के प्रति अनुमति की कोई अच्छी धारणा नहीं थी. रमित के पिता रघुबीर से मिल कर उसे लगा वह अमीरों के बारे में सही सोचती थी लेकिन कभीकभी जो दिखता है वह हकीकत नहीं होती.
रमित ने साइकिल की गति को नियंत्रित करने का प्रयत्न किया लेकिन ढलान की वजह से गति धीमी न हो पाई. अचानक ही सामने से गलत दिशा में आती स्कूटी भी शायद उसे नहीं देख पाई और अगले ही पल दोनों जमीन पर धराशायी पड़े थे. आसपास की दुकानों से लोग आए और दोनों को उठने में और संयत होने में मदद की.
‘‘देख कर नहीं चला सकते, साइकिल पर कंट्रोल तक नहीं है, ध्यान कहीं और ही रहता है. शुक्र है कि मैं स्कूटी पर थी, अगर मैं ट्रक चला रही होती तो?’’ स्कूटी चालक लड़की ने ऊंची आवाज में डांटते हुए कहा.
‘‘लेकिन मैंडम, गलत साइड से तो आप आ रही थीं, मैं तो अपनी दिशा में हूं.’’
‘‘ठीक है, ठीक है, मैं स्कूल के लिए लेट हो रही थी, बच्चे इंतजार कर रहे होते हैं,’’ लड़की ने झेंप मिटाते हुए कहा और फिर सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी तो कमीज भी फट गई है, साइकिल का भी नुकसान हुआ है.’’
‘‘हां जी, कोई बात नहीं, मैं दूसरी ले लूंगा.’’
‘‘कहां से ले लोगे, बड़ी मुश्किल से गुजरबसर होती होगी, छोटीमोटी तनख्वाह में. मैं अकसर देखती हूं यहां से साइकिलों में गुजरते लोगों को, कोई ड्राइवर है तो कोई ओवरसियर तो कोई बाबू, बेचारों के चेहरे पूरी कहानी बयां कर देते हैं.’’
‘‘हां जी,’’ रमित अचकचा कर बोला.
‘‘यहां गली में एक मास्टरजी हैं, कपड़ा भी रखते हैं, नाप दे दो तो दोतीन दिनों में कमीज सिल कर दे देंगे.’’
‘‘कमीज सिलते भी हैं, मैं ने तो हमेशा…’’ रमित ने कुछ कहना चाहा
‘‘पुरानी उतरन ही पहनी है, है न.’’
‘‘हां जी, हां जी,’’ रमित थूक निगलते हुए बोला, ‘‘लेकिन पैसे?’’
‘‘मैं दूंगी और साथ में चाय भी पिलाऊंगी इंसानियत के नाते, ओबेराय होटल में.’’
‘‘यह ठीक रहेगा, ओबेराय की चाय का अलग ही अंदाज है.’’
‘‘ओ मिस्टर, क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘रमित, रमित नाम है मेरा.’’
‘‘अनुमति, मुझे अनुमति कहते हैं. है न कुछ अजीब सा नाम, तुम तो मुझे देखते ही ओबेराय के सपने देखने लग गए. यही तो कमी है लोअरमिडिल क्लास के लोगों में, छलांगें मारने लगते हैं. मैं ओबेराय के बाहर जो रेहड़ी है उस की बात कर रही हूं, रेहड़ी सम ते हो, गए हो वहां कभी?’’
‘‘हां जी, हां जी, रेहड़ी समझता हूं. कई बार गया हूं, बल्कि जाता ही रहता हूं और रोज ही जाता हूं.’’
अनुमति गली में दाएंबाएं होते चली जा रही थी और रमित उस के पीछेपीछे यंत्रवत ढंग से चल रहा था. एक मोड़ पर आ कर एक छोटी सी दुकान पर उस ने दम भरा और वहां मास्टरजी के दिखाए कपड़ों में से एक चुना और रमित के लिए कमीज सिलने का और्डर दे दिया.
‘‘मास्टरजी, कब मिल जाएगी कमीज?’’ अनुमति ने पूछा.
‘‘दोतीन दिन का समय दो, बेटी.’’
‘‘ठीक है,’’ अनुमति ने जवाब दिया और फिर रमित की ओर देख कर धीरे से फुसफुसाई, ‘‘तुम्हारे पास दूसरी कमीज है न?’’
‘‘हांहां, एक शर्ट और है मेरे पास. मैं घर जा कर चेंज कर लूंगा.’’
‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी साइकिल ठीक करवा के मास्टरजी के पास छोड़ दूंगी. जब हम 2 दिन बाद मिलेंगे तो तुम ले लेना.’’
‘‘तो क्या हम 2 दिन बाद फिर से मिल रहे हैं?’’ रमित ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘लगता है साइकिल टूटने का और शर्ट फटने का गहरा सदमा लगा है. भूल गए कि मास्टरजी के पास आ कर शर्ट का ट्रायल देना है.’’
‘‘हांहां. मैं तो वाकई भूल गया था.’’
‘‘तुम्हें कहां छोड़ना है, बता दो, मैं स्कूटी से छोड़ दूंगी.’’
‘‘रघुराज इंडस्ट्रीज के गेट पर छोड़ दो, बड़ा एहसान होगा. वहां से दूसरी साइकिल ले कर घर चला जाऊंगा.’’
‘‘अनुमति एहसान न करती है, न करवाती है. अलबत्ता, इंसानियत जरूर निभाती है. वैसे, अच्छी जगह नौकरी कर रहे हो, सुना है इस कंपनी के देशविदेश में कई कारखाने हैं, करोड़ों की कमाई है.’’
‘‘कमाई है तो मालिक की है, मेरी थोड़े ही है,’’ रमित ने मन मसोसते हुए कहा.
‘‘यह बात तो तुम ने बिलकुल ठीक कही. लगता है तुम्हारीमेरी अच्छी निभेगी. ये मालिक लोग तो स्वार्थी और लालची किस्म के होते हैं. इन के सीने में दिल नहीं, पत्थर होता है. इन से तो जितनी दूरी रखी जाए, बेहतर है. हमें तो अपना काम मन लगा कर करते रहना है, बस. फल की चिंता नहीं करनी. मैं ने ठीक कहा न?’’
‘‘हां बिलकुल, बिलकुल ठीक कहा तुम ने. हमें तो बस मन लगाना है.’’
2 दिन रमित के लिए बड़ी मुश्किल से गुजरे. हर पल अनुमति का चेहरा आंखों के सामने घूमता और उस की बातें कानों में गूंजतीं. एकएक पल बरसों के समान हो गया था. उस रोज दोपहर को ही माल रोड के उस नुक्कड़ पर पहुंच कर वह शाम का और अनुमति का इंतजार कर रहा था.
शाम होतेहोते उस की बेचैनी बढ़ कर चरम तक पहुंच गई थी. आखिरकार जब सामने से अनुमति आती नजर आई तो उस की सांस में सांस आई. अनुमति ने आते ही उसे ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा. ‘‘वाह, क्या टीशर्ट पहनी है, लगता ही नहीं कि तुम साइकिल पर आनेजाने वाले एक मामूली मुलाजिम हो.’’
‘‘परसों जब मालिक ने फटी शर्ट देखी तो मुझे अपनी पुरानी टीशर्ट दे दी.’’ रमित ने रोंआसे स्वर में कहा.
‘‘तुम झठ बोल रहे हो, कोई मालिक इतना दयावान नहीं हो सकता. जरूर तुम ने ही मांगा होगा. खैर, छोड़ो मुझे इस से क्या. तुम जानो तुम्हारा मालिक जाने. चलो मास्टरजी के पास चलते हैं.’’
मास्टरजी मानो उन का इंतजार ही कर रहे थे. अनुमति को शर्ट पकड़ाते हुए बोले, ‘‘लो बेटी, देख लो, कुछ कमी हो तो बता दो.’’
अनुमति ने कमीज रमित को देते हुए कहा, ‘‘पहन कर देख लो, बाद में मत कहना कि ठीक नहीं सिली.’’
‘‘हांहां, हां ठीक है,’’ रमित शब्द चबाते हुए बोला, ‘‘ट्रायल रूम कहां है?’’
प्रत्युत्तर में अनुमति ने घूर कर देखा तो रमित सकपका गया, ‘‘मेरा खयाल है ठीक ही होगी, आप पैक कर दीजिए.’’
‘‘कितने पैसे हुए मास्टरजी?’’ अनुमति ने पूछा.
मास्टरजी ने हिसाब लगाया, कपड़ा सिलाई और तुम्हारी साइकिल की मरम्मत करवाई, कुल मिला कर 600 रुपए होते हैं.’’
‘‘मास्टरजी कुछ गुंजाइश है?’’ अनुमति धीरे से बुदबुदाई.
‘‘साढ़े पांच सौ रुपए दे देना, बेटा. इस से कम नहीं हो पाएगा.’’
अनुमति ने पर्स खोल कर 200 रुपए निकाले और कहा, ‘‘मास्टरजी, पहली तारीख को बाकी के पैसे दे दूंगी.’’
‘‘आप कहें तो थोड़े पैसे मैं दे दूं,’’ रमित ने झिझकते हुए कहा, ‘‘उधार समझ कर रख लीजिए.’’
‘‘नहीं, तुम रखो. अभी पहली तारीख में 15 दिन बचे हैं, तुम्हारा गुजारा मुश्किल हो जाएगा. मास्टरजी के बच्चों को मैं ट्यूशन पढ़ाती हूं, हमारा लेनादेना चलता रहता है. बस, थोड़े ही दिनों की बात है, मैं ने सिविल सर्विसेज की एंट्री परीक्षा उतीर्ण कर ली है. बस, अब मेंस का इंतजार है,’’ अनुमति ने गर्व से कहना जारी रखा, ‘‘वैसे, हम खुद्दार जरूर हैं लेकिन उतने गरीब भी नहीं हैं. जानते हो, मैं कहां रहती हूं?’’
‘‘मैं कैसे जानूंगा, तुम ने बताया कहां?’’
‘‘तुम ने आतेजाते कभी दूर से अपने मालिक सेठ रघुबीर की कोठी देखी है?’’
‘‘हां, वहां तो मैं जाता ही रहता हूं.’’
अनुमति ने खीझ कर देखा तो रमित बोल पड़ा, ‘‘मेरा मतलब है मेरे मालिक अकसर जब मुझ पर गुस्सा करते हैं या उन्हें डांटना होता है तो दफ्तर के बजाय अपने बैडरूम में बुला कर लंबाचौड़ा लैक्चर देते हैं.’’
‘‘अच्छा, बड़े सनकी से लगते हैं तुम्हारे रघुबीरजी. खैर, उन के घर के पीछे वाले मोड़ पर आखिरी मकान हमारा है. तुम्हें कहां पता होगा कि आजकल जमीन की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं, हमारा घर भी करीब 2 का हो गया है.’’
‘‘2 लाख का,’’ रमित ने विस्मित हो कर पूछा.
‘‘यही तो सोच है तुम जैसे लोगों की. लाख से आगे ही नहीं बढ़ते. हमारा मकान 2 लाख का नहीं मिस्टर, 2 करोड़ का हो गया है, पूरे 2 करोड़ का. कई लोग आए खरीदने के लिए मगर हम ने कह दिया कि हमारे आधे से ज्यादा घर में किराएदार हैं. अपने फायदे के लिए हम उन से घर खाली नहीं करवा सकते. उन्हें बेघर नहीं कर सकते.’’
‘‘बहुत ही नेक सोच है आप की और आप के परिवार की.’’
‘‘यही तो फर्क है दिलवालों में और धनवानों में, पापा की पैंशन आती है, मामूली किराया मिलता है मगर हमें संतुष्टि है. अगर यही मकान सेठ रघुराज के पास होता तो किराएदारों को मिनटों में भगा देता और वहां एक शानदार होटल बना देता,’’ अनुमति ने स्कूटी स्टार्ट करते हुए कहा.
‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो. ऐसे ही होते हैं ये रईस लोग,’’ रमित ने हां में हां मिलाई तो अनुमति को स्वयं पर बड़े गर्व की अनुभूति हुई.
रमित ने अनुमति को फोन लगाया तो उस ने फौरन उठा लिया, ‘‘मुझे मालूम था कि तुम फोन करोगे, जरूर शर्ट में कुछ कमी रही होगी. घर में मां ने फटकार लगाई होगी.’’
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं. मां को तो शर्ट बहुत पसंद आई. दरअसल, मेरे एक दोस्त का जानकार ओबेराय होटल में काम करता है, उस ने मेरे लिए वहां चाय का जुगाड़ लगाया है. हम चाहें तो एकसाथ चाय पी सकते हैं.’’
‘‘जानते हो पूरे 500 रुपए की है चाय वहां पर.’’
‘‘कहा न हमें पैसे नहीं देने, मेरे दोस्त के दोस्त ने सारा इंतजाम किया है. इसी बहाने मैं भी होटल अंदर से देख लूंगा अगर तुम हां कह दो तो.’’ अनुमति ने कुछ सोचा और कहा, ‘‘कब जाना है?’’
‘‘आज ही,’’ रमित मानो इस के लिए तैयार ही था.
‘‘ठीक है, अपनी नई शर्ट पहन कर आना, थोड़ा स्मार्ट लगोगे.’’
नियत समय पर दोनों होटल ओबेराय के रैस्टोरैंट में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे. अनुमति होटल के चारों ओर निहार रही थी. ‘‘तुम तो ऐसे सहज बैठे हो मानो रोज ही आते हो. देखो, कितना सुंदर कालीन है.’’ प्रत्युत्तर में रमित की दबे सुर में आवाज निकली, ‘‘मारे गए.’’
‘‘क्या हुआ, क्या तुम्हारे दोस्त का दोस्त नहीं दिख रहा?’’
‘‘नहीं, वह बात नहीं. मेरे पीछे वाली मेज पर जो शख्स अभीअभी आ कर बैठा है वह मेरा बाप है.’’
‘‘तुम्हारे पिता?’’ अनुमति ने विस्मित हो कर पूछा.
‘‘मेरा मतलब है, मेरी कंपनी का मालिक, पिता समान हुआ न.’’
‘‘वे तो इधर ही आ रहे हैं,’’ अनुमति ने हौले से कहा.
रमित ने चेहरा हाथों से छिपाने का यत्न किया लेकिन तब तक एक रोबदार आवाज उस के कानों में पड़ गई थी, ‘‘तुम यहां क्या कर रहे हो, साथ में कौन है?’’
रमित को खामोश देख कर अनुमति ने मोरचा संभाला, ‘‘सर, इसे माफ कर दीजिए, औफिस के समय में इस गुस्ताखी के लिए और प्लीज, नौकरी से मत निकालिएगा. यह लगभग अनाथ है, इस के पिता नहीं हैं. बस, एक बूढ़ी मां है. बेचारा कहां जाएगा. मैं ने ही जिद की थी कि इस बड़े होटल में चाय पीना है वरना हम तो रेहड़ी पर चाय पीते हैं.’’
‘‘रेहड़ी? यह कौन सा होटल है और जनाब, आप के पिता कब सिधारे, मुझे तो पता ही नहीं चला.’’
‘‘सर, अब आप इतने बड़े आदमी, यह बेचारा छोटा सा कर्मचारी. नौकरी की वजह से अपने पिता की अंत्येष्टि में भी नहीं गया. सारा काम मैं ने ही संभाला.’’
‘‘तुम ने संभाला, क्या तुम इस की पत्नी हो?’’ फिर से वही रोबदार आवाज.
‘‘नहीं सर, मैं इस की होने वाली पत्नी हूं. हम जल्द ही शादी करने वाले हैं.’’ फिर कुहनी मार कर रमित से गुस्से से बोली, ‘‘कब से मैं ही बोले जा रही हूं, कम से कम हां तो बोलो.’’
‘‘हां जी,’’ रमित ने थूक निगलते हुए कहा.
‘‘अच्छा तो क्या तुम्हारे घरवालों को इस लड़की के बारे में पता है?’’
‘‘हां जी, हां जी. बिलकुल पता है.’’ इस के पहले कि रमित कुछ बोल पाता अनुमति ने फौरन जवाब दिया, ‘‘हमारी तो शादी की तारीख भी तय हो गई है, आगामी 2 अक्तूबर को हमारी शादी है.’’
‘‘वैरी गुड, हमें बुलाओगे अपनी शादी में?’’ सेठ रघुबीर ने रमित की आंखों में झंक कर पूछा.
‘‘जी, जी,’’ रमित की आवाज हलक में अटक गई थी.
‘‘वैसे, शिमला में दूसरी ऐसी नहीं मिलेगी. मेरा मतलब है ऐसी शर्ट, कितने स्मार्ट लग रहे हो मानो किसी कंपनी के मालिक हो,’’ सेठजी ने जातेजाते कहा.
रमित ने जेब से रूमाल निकाल कर माथे पर आया, पसीना पोंछा, ‘‘देखा, मैं ने कहा था न कि अच्छी शर्ट का रोब पड़ता है,’’ अनुमति ने कहा लेकिन रमित का ध्यान अपने घर की तरफ लगा हुआ था. उसे घर पर आने वाले भूचाल की चिंता सता रही थी.
अगले दिन सुबह जब अनुमति स्कूल जा रही थी तो एक बड़ी सी गाड़ी को अपनी ओर आते देख रुक गई. स्कूटी को एक तरफ स्टैंड पर लगा कर वह गाड़ी में बैठे सज्जन से कुछ पूछना चाह रही थी कि उस की जबान थम गई, ‘‘सर, आप से फिर आज मुलाकात हो रही है, कभी सोचा न था. कैसे कष्ट किया आप ने? रमित को माफ तो कर दिया न?’’ अनुमति एक सांस में बोल गई.
‘‘हां, बात ही कुछ ऐसी थी.’’
‘‘मैं जानती हूं इस ‘प्लौट’ को खरीदने के लिए बड़े से बड़े अमीर और रईस यहां तक आ चुके हैं, हमारा जवाब एक ही है.’’
‘‘मेरा बेटा तुम से शादी करना चाहता है. मैं शादी का कार्यक्रम तय करने आया हूं.’’
‘‘सर, आप होश में तो हैं? मेरी सहमति के कुछ मायने नहीं हैं क्या. और फिर, अचानक ही आप को क्या सनक सूझ? रमित ने मुझे यह तो बताया था कि आप सनकी हैं मगर इतने सनकी होंगे, इस का मुझे इल्म न था. जाइए सर, फिर आइएगा.’’
‘‘अनुमति, तुम्हारी सहमति तो कल ही मिल चुकी थी. तुम ने तो अपनी शादी की तारीख भी बता दी थी, 2 अक्तूबर.’’
‘‘वह तो सर आप के एक मुलाजिम रमित को बचाने के लिए कुछ सूझ नहीं तो…’’
‘‘रमित मेरा बेटा है, मेरी सारी कंपनियों का मैंनिजिंग डायरैक्टर, मेरा वारिस,’’ अनुमति की बात बीच में ही रह गई थी.
‘‘क्या?’’ अनुमति को काटो तो खून नहीं, ‘‘लेकिन सर, वह तो…’’
‘‘स्मार्ट तो बहुत हो अनुमति तुम, मगर सोच सीमित है. जो सामने दिखता है उस को फौरन सच मान कर तुरंत निष्कर्ष पर पहुंच जाती हो. रमित सुबहसुबह साइक्लिंग करता है और तुम उसे एक मजदूर समझ बैठी.’’
अनुमति निशब्द हो गई, उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दे. हौले से बोली, ‘‘तो उस ने मेरे साथ छल किया? मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया?’’
‘‘नहीं अनुमति,’’ रघुबीर दो कदम चल पड़े तो अनुमति भी उन के साथ चल पड़ी, ‘‘रमित एक सीधासादा इंसान है. उसे वही लोग पसंद आते हैं जिन के कदम धरती पर हों और मन निश्च्छल हो. तुम्हारी सादगी, गरीबों के प्रति प्रेम और साफगोई उस के मन को भा गई.’’
अनुमति अविश्वास से देखे जा रही थी, कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रही. अमीरों की चालबाजी का भी खयाल आया. ‘‘मुझे वक्त चाहिए, सर. इतना बड़ा फैसला मैं ऐसे राह पर नहीं ले सकती. मुझे आगे जिंदगी में बहुतकुछ करना है, सिविल सर्विसेज का मेंस सामने है.’’
‘‘पहली बात कि हम तुम्हारी पढ़ाई में आगे नहीं आएंगे बल्कि अपना सहयोग और आशीर्वाद भी देंगे. दूसरी बात यह कि आज शाम को तुम सब हमारे घर चाय पर आ रहे हो.’’
‘‘लेकिन सर, मैं ईमानदारी से कह रही हूं कि मेरे मन में रमित के लिए ऐसी कोई भावना नहीं है, मुझे उस से प्रेम नहीं है,’’ अनुमति ने थोड़ा झिझकते हुए कहा.
‘‘आज शाम को तुम हमारे घर आओगे तो रमित को दूसरी नजर से देखना. प्रेम नजरों का खेल भी होता है. यही नजर जिस के जरिए तुम मुझे पिता जैसा सम्मान दे रही हो या मैं तुम में अपनी बेटी देख रहा हूं वरना हम बिलकुल अनजाने हैं. जब मांबाप शादी तय करते हैं तो 2 अपरिचित इंसान अचानक ही एकदूसरे के प्रति समर्पित हो जाते हैं, जीवनभर के लिए एकदूसरे के पूरक हो जाते हैं. यह सब नजरों का खेल है कि आप एकदूसरे को कैसे देखते हो. आज शाम को आओ तो रमित को किसी और नजर से देखने की कोशिश कर के स्वयं से प्रश्न करना तो तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब मिल जाएगा.’’
रघुबीर ने गाड़ी में बैठते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे पिता से कल रात ही बात कर चुका हूं. उन्हें इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं है बल्कि वे तो बहुत खुश हैं लेकिन मैं फिर भी तुम से एक वादा करता हूं कि अगर तुम्हें आज की हमारी भेंट के बाद भी अगर मेरे बारे में, मेरे परिवार या रमित के बारे में कोई भी प्रश्न या संदेह हो तो बिना हिचकिचाहट के कह देना, बात वहीं खत्म हो जाएगी.’’
आलीशान घर में पहुंचते ही अनुमति की आंखें चकाचौंध रह गईं. रघुराजजी की पत्नी और बहन बड़ी ही आत्मीयता से मिलीं, रईसों वाला कोई आडंबर, अहंकार या अभिमान नहीं नजर आया लेकिन फिर भी अनुमति अमीरों के बारे में अपना दृष्टिकोण बदलने को मानो तैयार न थी. उसे इन की सहजता और सरलता पर भी शायद भ्रम हो रहा था.
सामने एक सोफे पर रमित बैठा हुआ था. घर के सभी सदस्य एकएक कर के उन्हें अकेला छोड़ कर चले गए. एक ऐसा मौका दिया गया जिस में वे एकदूसरे के बारे में प्रश्न कर सकें. रमित ने वही शर्ट पहनी हुई थी. अनुमति की मानो हंसी छूट रही थी. उस ने एक नजर रमित पर फिर से डाली जो बुत बना बैठा था. रमित के चेहरे से, उस की आंखों से प्रेम की ऐसी किरणें आती हुई प्रतीत हुईं जिस से उस की आंखें मानो चुंधिया कर रह गईं, जिस ने पलभर में ही उस का नजरिया बदल कर रख दिया.
रमित में सहसा उसे अपने जीवन का उद्देश्य, अपनी मंजिल का
अवलोकन हुआ. क्या नजर इस तरह भावनाओं को इस सीमा तक बदल सकती है? कल तक रमित की तरफ उस की नजरें एक राहगीर की तरह पड़ती थीं, आज अचानक ही वही नजरें हमसफर की तरह हो गईं. शायद रघुबीरजी ने कल ठीक ही कहा था, ‘‘आप जिस नजर से इंसान को देखो आप के मन की भावनाएं आप की नजरों का पीछा कर ही लेती हैं.’’
‘‘मास्टरजी को कहना, शर्ट थोड़ी ढीली है, इसे टाइट कर दें,’’ रमित ने बात शुरू करते हुए कहा.
‘‘कह दूंगी और यह भी कह दूंगी कि एक ट्रायलरूम बना लो क्योंकि अब रघुबीर ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग डायरैक्टर अकसर अपने कपड़े सिलवाने आते रहेंगे, अपनी अनुमति के साथ.’’
दोनों ने एकदूसरे की आंखों में झंका. मुसकराए, फिर खुल कर हंस पड़े.
थोड़ी देर में अनुमति और रमित उस कमरे में गए जहां सब बैठे थे. रघुबीरजी ने देखा, दोनों ने एकदूजे का हाथ थामा हुआ था. रघुबीरजी के होंठों पर मुसकान और मन में प्रसन्नता के भाव थे.
दोनों परिवार वालों ने एकदूसरे का मुंह मीठा करवाया और गले मिल कर बधाई दी. जातेजाते रघुबीरजी ने अनुमति के पिता से हौले से कहा, ‘‘हमें आप की बेटी चाहिए, न कोई दहेज, न कपड़ेलत्ते और न गहने या साजसामान. शादी के लिए यह हमारी पहली शर्त है.’’
अनुमति के पिता श्रवणजी की आंखें नम हो गईं. उन्हें नियति के इस फैसले पर अविश्वास के साथसाथ गर्व भी महसूस हो रहा था.
दूसरे दिन रघुबीरजी ने श्रवणजी को रीगल क्लब में बुलाया. ‘‘श्रवणजी, हमें दहेज में कपड़ालत्ता, गहना, नेग कुछ नहीं चाहिए. हम आप को बता चुके हैं. हां, यह दूसरी शर्त तो नहीं अलबत्ता विनती जरूर है, आप इजाजत दें तो…’’
‘‘कहिए रघुबीरजी, निसंकोच हो कर कहिए. आप का कहा मेरे लिए आदेश होगा.’’
‘‘श्रवणजी, हमारे इकलौते बेटे की शादी में देशविदेश से मेहमान आएंगे. हमारी इच्छा है कि शादी शानोशौकत से हो, बराती अच्छी जगह रुकें और उन का मानसम्मान ऐसा हो कि सभी याद रखें.’’
‘‘आप बेफिक्र रहें, रघुबीरजी. शादी बड़ी धूमधाम से होगी.’’
‘‘शिमला में दोचार ही पांचसितारा होटल हैं. सब में मेरी अच्छी जानपहचान है. आप कहें तो मैं बात कर सकता हूं.’’
‘‘धन्यवादजी, आप को जरूर कष्ट दूंगा. फिलहाल, मैं इजाजत चाहूंगा, आप शादी का दिन तय कर के मुझे इत्तेला कर दीजिएगा,’’ श्रवणजी ने जातेजाते कहा. ‘‘मैं रात को आप से फोन पर बात करूंगा ताकि आगे का कार्यक्रम तय कर पाएं.’’
‘‘तो क्या आप अपना यह घर बेच देंगे? मेरी शादी के फेरे की अग्नि में आप अपने जीवनभर की इकलौती पूंजी को स्वाहा कर देंगे? मुझे यह कतई मंजूर नहीं है, पिताजी.’’
‘‘मैं यह फैसला कर चुका हूं, कल रात मेरी रघुबीरजी से बात हो चुकी है. घर उन के जरिए ही बिक रहा है और उस के एवज में वे मुझे 2 करोड़ रुपए वे पहले ही दिलवा देंगे जिस से मैं तुम्हारी शादी बड़ी ही धूमधाम से करूंगा.’’
‘‘और फिर आप लोग किसी छोटे से झंपड़े में अपनी पैंशन से गुजरबसर करेंगे. मैं वहां महलों में राज करूंगी और आप… और फिर इन किराएदारों का क्या होगा, कहां जाएंगे ये. भूल गए आप ने खुद से क्या वादा किया था.’’
‘‘ऐसी बात नहीं है, अनुमति. ये सब जमीनजायदाद इंसान इसीलिए तो बनाता है कि जरूरत पर काम आ जाएं.’’
‘‘मैं जानती थी कि सारे अमीर एकजैसे ही होते हैं?’ उन्होंने दहेज नहीं लिया मगर दहेज के एवज में…’’
‘‘नहीं बेटी, ऐसा नहीं है. रघुबीरजी ने बताया है कि अनुबंध के मुताबिक हम और हमारे किराएदार अगले 3 वर्षों तक यहां रह सकते हैं, फिर उस के बाद…’’
‘‘कोई एहसान नहीं कर रहे हैं वे हम पर. मैं इस शादी के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं हूं. आप मेरा संदेश भिजवा दीजिए वरना मैं खुद उन्हें फोन कर के कह दूंगी.’’
अनुमति ने रमित को फोन कर के सारी बात बता दी. यह सुन कर रमित भी हैरान हो गया. उसे अपने पिता से ऐसी उम्मीद न थी, ‘‘मैं ऐसी शानोशौकत और दिखावे में यकीन नहीं रखता. हमारी शादी होगी तो वैसी ही होगी जैसी तुम्हारे घर वाले बिना मकान का सौदा किए करेंगे- सादगी और सरलता से जिस में आडंबर का कोई स्थान नहीं होगा. मैं नहीं जानता था कि मेरे पिता के मन में इतना कपट है. हम उन के खिलाफ जा कर भी शादी कर सकते हैं.’’
‘‘नहीं, ऐसा सोचना भी मत, सपने में भी नहीं.’’
‘‘जान सकता हूं आप ने ऐसा क्यों किया? मेरी शादी में चकाचौंध और धूमधाम का दिखावा करने के लिए आप किसी का आशियाना उजाड़ सकते हैं. मुझे आप से ऐसी उम्मीद न थी, पिताजी.’’
‘‘क्या बुरा किया मैं ने, रमित. उन के घर की अच्छी कीमत दे रहा हूं. उन्हें रहने का अधिकार दे रहा हूं और क्या चाहिए. उन का बुढ़ापा आराम से कटेगा.’’
‘‘उन की इज्जत, आत्मसम्मान गिरवी रख कर?’’
‘‘जो भी मैं कर रहा हूं उन की इज्जत, आत्मसम्मान और खुद्दारी के लिए ही कर रहा हूं.’’
‘‘नहीं, आप के अंदर का रईस इस मौके को हाथ से गंवाना नहीं चाहता. आप एक तीर से दो शिकार कर रहे हैं.’’
‘‘शिकार के लिए तो सारा जंगल मेरे सामने है. अपने बेटे की खुशी का शिकार कोई पिता नहीं करता.’’
‘‘अनुमति ने शादी से इनकार कर दिया है, पिताजी. अब आप का जो दिल चाहे, आप करने के लिए स्वतंत्र हैं. चाहे तो मेरी शादी अपनी हैसियत वाले किसी उद्योगपति की बेटी से तय कर सकते हैं जिस की लालसा आप के अंतर्मन में अवश्य होगी.’’
रमित के जाने के बाद रघुबीरजी थोड़े विचलित से हो गए. उन्होंने अपनी पत्नी से विमर्श किया. ‘‘बात बहुत बढ़ गई है, लगता है अनुमति से बात करनी पड़ेगी. उसे समझने का एक प्रयत्न करना पड़ेगा. सच्चाई की कुछ परतें खोलनी पड़ेंगी.’’
‘‘ठीक कह रहे हैं आप. हमारी शराफत हमारे ही खिलाफ जा रही है. अनुमति को पास बिठा कर खुलेदिल से बात को समझने का आग्रह करते हैं. मैं कल ही अनुमति को बुलावा भेजती हूं.’’
अनुमति बेमन से मात्र औपचारिकता पूरी करने के लिए रमित के घर पहुंची. रघुबीरजी और उन की पत्नी ने बड़ी ही आत्मीयता से उस का स्वागत किया. बड़े से ड्राइंगरूम के एक कोने में रमित भी बैठा मानो उस का इंतजार कर रहा था.
‘‘तुम हमारे बेटे की पसंद हो, इसलिए हम ने कभी भी किसी भी दृष्टि से भेदभाव नहीं रखा. बस, इतनी सी आरजू थी कि शादी थोड़ी धूमधाम से हो.’’
‘‘और उस के लिए आप ने मेरे पिता से सौदा किया, ईंटगारे के भवन के बदले शादी.’’
‘‘यह तुम्हारा इल्जाम है, बेटी. इस में कोई सच्चाई नहीं है. हम तो चाहते थे कि श्रवणजी पर कम से कम बोझ पड़े, इसलिए एक डील की.’’
‘‘सर, एकदो दिन के दिखावे का अगर आप को इतना शौक था तो आप अपनी हैसियत वाले के पास जाते जिन्हें पैसा लुटाने में मजा आता और आप को लूटने में. एक इंसान की जिंदगीभर की कमाई को पल में उड़ाने में उस पर क्या गुजरेगी, आप ने सोचा कभी?’’
‘‘श्रवणजी पर कोई दबाव नहीं था, बेटी. वे मना कर सकते थे. हम कोई और रास्ता निकालते.’’
‘‘अपनी बेटी के इतने बड़े घर में शादी की खुशी और रिश्ता कहीं हाथ से फिसल न जाए, उस का भय एक पिता पर कितना दबाव डालता है, इस का एहसास आप को नहीं होगा क्योंकि आप अमीर हैं और आप की अपनी कोई बेटी नहीं है.’’
‘‘अब मैं क्या कर सकता हूं, अनुमति. आप के पिता श्रवण कुमारजी ने यह डील साइन की है. अब अगर उन्होंने इसे बिना पढ़े इस पर हस्ताक्षर किए हैं तो इस में हमारा कोई कुसूर नहीं.’’
‘‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. अमीरों का कोई कुसूर नहीं होता. मुझे इजाजत दीजिए,’’ अनुमति ने जाते हुए कहा.
रघुबीरजी ने कागजों का एक पुलिंदा और फाइल अनुमति के हाथ में रख दी. ‘‘जाने से पहले इस पर नजर डाल लो और फिर किसी नतीजे पर पहुंच कर अपने जीवन का फैसला कर लेना. तुम्हारा निर्णय ही अंतिम होगा.’’
अनुमति ने अनमने ढंग से कागजों पर नजर डाली. अपने पिता के हस्ताक्षर को पहचानने में उसे समय नहीं लगा. पढ़तेपढ़ते अविश्वास से उस ने रघुबीरजी को देखा, फिर एक नजर कागजों पर डाली और स्फुटित स्वर से पूछा, ‘‘ये क्या?’’
‘‘ये तुम्हारे घर के कागजात हैं.’’
‘‘हां, मगर इस में तो लिखा है…’’
‘‘इस में लिखा है कि आत्मसम्मान और खुद्दारी पर हर इंसान का हक है चाहे अमीर हो या गरीब. और लिखा है कि इंसान अमीर बनता है अपने संस्कारों से, अपने व्यवहार से न कि बैंक बैलेंस, शेयर्स या प्रौपर्टी से.’’
‘‘अनुमति ने अश्रुपूरित आंखों से भरे गले से कहा कि सभी अमीर बुरे नहीं होते. अच्छेबुरे इंसान हर वर्ग में पाए जाते हैं. इस का अमीरी और गरीबी से कोई लेना नहीं.’’
रमित ने कागज अनुमति के हाथ से लिए और एक सांस में ही पढ़ लिए.
अनुबंध के मुताबिक श्रवणजी ने कागजात रघुबीरजी के पास सुरक्षित रखे थे क्योंकि अनुमति की शादी की वजह से घर में उथलपुथल होनी थी और उन के पास कोई बैंकलौकर नहीं था जहां वे ऐसे महत्त्वपूर्ण कागजात रख सकें. जो 2 करोड़ रुपए की राशि रघुबीरजी ने दी थी उस का इन कागजात से कोई वास्ता न था. और, यह राशि एक तरह की भेंट थी जिसे कभी भी वापस नहीं करना था.’’
‘‘मैं यह बात तुम दोनों से शादी के बाद किसी सही मौके पर करने वाला था.
मेरा मकसद था कि श्रवणजी अपने आत्मसम्मान से कोई समझता न करें और उन्हें लगे कि यह शादी उन्होंने अपनी बचत से, अपनी संपत्ति से और अपने स्रोतों से की है. हां, एक बेईमानी मैं ने अवश्य की है कि श्रवण कुमारजी के भरोसे का फायदा उठा कर कागजों पर उन के हस्ताक्षर ले लिए, बिना सच बताए.’’
‘‘नेक नीयत से किए किसी भी काम में बेईमानी नहीं होती है, पिताजी. हमें माफ कर दीजिए,’’ रमित और अनुमति दोनों ही लगभग एकसाथ बोल पड़े, ‘‘हम ने आप को कितना गलत समझ था.’’
‘‘तो अब अगर गलतफहमी के बादल छंट गए तो एक चाय पार्टी तो बनती है,’’ रघुबीरजी की पत्नी बोलीं, ‘‘मैं होटल में टेबल बुक करवाऊं?’’
‘‘हम होटल तक चलेंगे जरूर मगर चाय होटल के बाहर रेहड़ी में पिएंगे,’’ रघुबीरजी ने कहा तो सभी हंस पड़े. Social Story in Hindi





