Editorial : धर्म में सब से बड़ी चीज दान है. यह न समझें कि दानदक्षिणा पर हिंदू पंडेपुजारियों का एकाधिकार है. अमीर लोगों का चर्च भी ईसा मसीह और स्वर्ग में बैठे ईश्वर के नाम पर पैसा मांगता रहता है, एक ईमेल लीडिंग द वे चर्च, साउथ वेल्स, आस्ट्रेलिया के डा. माइकल यूसुफ से प्राप्त हुआ.

सब से पहले उन्होंने पढ़ने वाले के मर्म को छुआ. फिर पूछा, क्या आप को लगता है कि आप को कोई अपना नजदीकी मातापिता, बेटाबेटी, भाईबहन, पत्नी जिसे आप बहुत प्यार करते हैं आप को इग्नोर कर रहा है. अब हर घर में हरेक को लगता है कि कोई न कोई आप के प्यार को समझ नहीं रहा. ईमेल इस सर्वव्यापी तथ्य को भुनाते हुए लिखता है कि चिंता न करें, ऊपर आकाश में बैठा एक ऐसा पिता है जो आप को कभी अस्वीकार या इग्नोर नहीं करेगा.

डा. माइकल यूसुफ़ ने यह खोज कैसे की, यह ईमेल का उद्देश्य नहीं है वरना तो उन से पूछा जा सकता था कि जब वह सर्वशक्तिमान पिता कभी अपनी संतानों को इग्नोर नहीं करता तो वह किसी के मांबाप, भाईबहन, बेटे, पतिपत्नी द्वारा उस के सगे को इग्नोर कैसे करने दे सकता है. आमतौर पर इस का उत्तर धर्म के प्रचारक यह कह कर देते हैं कि ईश्वर सब की परीक्षा लेता है. वह जानना चाहता है कि आप ईश्वर में कितनी अगाध श्रद्धा रखते हैं. कितना विश्वास है आप का उस में. अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसी ने हर पतिपत्नी, मांबाप, बेटाबेटी, भाईबहन को खुद डिजाइन कर के बनाया है तो समस्या पैदा ही क्यों हुई, उस ने परीक्षा लेने की सोची ही क्यों? जब वह भक्त के साथ हाथ पकड़ कर हर समय खड़ा रहता है तो भक्त के नजदीकियों का भी तो हाथ और मस्तिष्क उस ने हमेशा पकड़ रखा है. बाकी भी तो उसी के भक्त है, ईमेल पढ़ने वाले भक्त की तरह के.

असली बात यह है कि ईमेल पैसा जमा करने के लिए भेजा गया है. उस में यह कहा गया है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, हरेक का हाथ पकड़े ईश्वर का संदेश हरेक को पकड़ाना है, उस के लिए कंप्यूटर खरीदने हैं, स्टाफ रखना है, ईश्वर का संदेश उन को देना जिन का हाथ ईश्वर ने खुद पकड़ रखा है. विरोधाभासी बातें कहते हुए धर्मप्रचारकों को कतई भी हिचक नहीं होती क्योंकि उन से कोई सवाल पूछता ही नहीं. अगर कोई पूछ लेता है तो उसे या तो धर्मभ्रष्ट कह कर भगा दिया जाता है या फिर मार डाला जाता है. यह लीडिंग द वे भी 30 डौलर, 60 डौलर, 150 डौलर, 300 डौलर हर माह देने की अपील करता है.

यही नहीं, उस के द्वारा यह आश्वासन भी दिया जाता है कि आप जितना दोगे उस को ईश्वर दोगुना समझेगा क्योंकि यह लीडिंग द वे ऊपरवाले सर्वशक्तिमान (जिस के लाखों चर्च दुनियाभर में हैं) का विशेषप्रिय चर्च है. वाह, क्या मार्केटिंग है.

ईमेल पढ़ने वालों से यह भी कहा जा रहा है कि दान देने के पुनीत कार्य में हाथ बंटाने और सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान जीसस के पिता ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिए अपने सगेसंबंधियों को ईमेल फौरवर्ड करो और सब से सारी संपत्ति के मालिक ईश्वर को और पैसे दिलवाओ.

धर्म का धंधा तरहतरह के रूप लेता है. कोई भी धर्म बिना दान के जिंदा नहीं रह सकता. यही ऐसा धंधा है जिस में बिक्री के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है पर सामान की डिलीवरी बाद में, मरने के बाद दी जाती है. कुछ में स्वर्गनर्क मिलता है तो कुछ में अच्छे कुल में पुनर्जन्म. यह सब दान पर निर्भर करता है. आप को कोई मिला है धार्मिक एजेंट जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से पैसे नहीं लेता. कुछ तो ऐसा वातावरण बना लेते हैं कि लोग लाइनों में लग कर पैसा देते हैं, जैसे एप्पल 17 के समय लोगों ने लाइनें लगाई थीं. तब, मोबाइल तो मिला था. यहां तो मरने के बाद कुछ मिलने का सिर्फ आश्वासन मिलता है. Editorial

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