Iranian Women Protest : ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.
ईरान की सड़कों पर प्रदर्शनकारी औरतों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तसवीरों में आग लगा कर उस से अपने होंठों में दबी सिगरेटें सुलगाईं और धार्मिक तानाशाही के खिलाफ अपने विरोध की वे तसवीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कीं. यह धर्म के खिलाफ औरत का एक तीव्र प्रतीकात्मक विरोध है. खामेनेई की तसवीर ईरान की धार्मिकराजनीतिक सत्ता का प्रतीक है. उसे जलाना और उसी से सिगरेट सुलगाना यह जताता है कि डर टूट चुका है और सर्वोच्च सत्ता को चुनौती दी जा रही है. खामेनेई सिर्फ राजनीतिक नहीं, धार्मिक सत्ता के भी प्रतीक हैं. उन की तसवीर जलाना यह भी बताता है कि प्रदर्शनकारी धर्म के नाम पर थोपे गए नियमों को स्वीकार नहीं करना चाहते, खासतौर पर युवा वर्ग और औरतें. यह कृत्य अशिष्टता नहीं, बल्कि गहरे असंतोष और साहसिक प्रतिरोध का संकेत है- एक ऐसा संदेश कि महिलाएं अब अपनी आवाज दबने नहीं देंगी, चाहे जोखिम कितना भी बड़ा क्यों न हो. खामेनेई ईरान में सिर्फ सत्ता के शिखर पर बैठे नेता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रतीक हैं जहां धर्म और राजनीति व राजसत्ता एकदूसरे में घुल कर व्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करते हैं.

यह कृत्य इसलिए भी असाधारण है क्योंकि ईरान जैसे देश में, जहां धार्मिक सत्ता से असहमति को ईशनिंदा और राष्ट्रद्रोह के समान देखा जाता है, सार्वजनिक रूप से इस तरह का प्रतिरोध जीवन को दांव पर लगाने जैसा है. सिगरेट सुलगाने की यह क्रिया यह संदेश देती है कि अब पवित्रता और भय का आवरण टूट चुका है. महिलाएं साफ कह रही हैं कि धर्म के नाम पर उन के पहनावे, उन की आवाज और उन के जीवन पर नियंत्रण स्वीकार्य नहीं है. यह अशिष्टता नहीं, बल्कि साहस का वह रूप है जो तब जन्म लेता है जब दमन असहनीय हो जाता है.
हाल के वर्षों में भारत में भी समान प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है. मोदी सरकार धर्म को लगातार राजनीति के केंद्र में ला कर उसे राष्ट्रीय पहचान से जोड़ रही है. धार्मिक प्रतीकों, जुलूसों, नारों और कर्मकांडों को इतना उभारा जा रहा है कि शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत प्रश्न हाशिए पर जा बैठे हैं. उन की तरफ सरकार की नजर ही नहीं है. सरकार के खिलाफ असहमति की आवाजों को ‘धर्म विरोधी’, ‘राष्ट्र विरोधी’ या ‘संस्कृति के खिलाफ’ बता कर दबाने की कोशिशें साफ दिखाई देने लगी हैं. यही वह मोड़ है जहां समाज को तय करना होता है कि धर्म व्यक्तिगत आस्था रहेगा या सत्ता का हथियार बनेगा.
ईरान की महिलाओं का साहस यह बताता है कि जब सत्ता डर के सहारे चलती है, तो एक दिन डर टूटता जरूर है. जरूरी है कि धर्म को सवालों से बचाने की ढाल न बनने दिया जाए. शिक्षा, रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दों पर खुली बहस हो और युवा वर्ग को कर्मकांडों में उलझा कर नहीं, बल्कि सोचनेसमझने की आजादी दे कर सशक्त किया जाए. जब सवाल पूछना बंद हो जाता है तब प्रतीकात्मक आग लगने में देर नहीं लगती और इतिहास गवाह है कि ऐसी आग सिर्फ तसवीरों तक सीमित नहीं रहती फिर बात चाहे ईरान की हो, अफगानिस्तान की, भारत की या अमेरिका की हो.
ईरान में हालिया जनाक्रोश किसी एक घटना की उपज नहीं है. 1979 की इसलामी क्रांति के बाद से धार्मिकराजनीतिक सत्ता ने आम जनता के निजी जीवन में गहरी दखलअंदाजी की. लोगों, खासकर औरतों, का पहनावा, आवाजाही, अभिव्यक्ति जैसी हर चीज पर धार्मिक सत्ता का नियंत्रण बढ़ता चला गया. समय के साथ यह नियंत्रण सामाजिक अनुशासन से आगे बढ़ कर दमन में बदल गया. आर्थिक प्रतिबंधों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने आम ईरानी नागरिक की मुश्किलें बढ़ाईं. पर महिलाओं के लिए तो यह दोहरा बोझ साबित हुआ. आर्थिक संकट के साथसाथ उस के शरीर और पहचान पर भी राज्य का नियंत्रण हावी हो गया. बीते 3 दशकों के दौरान हुए आंदोलनों में ईरानी महिलाएं इसलिए आगे दिखीं क्योंकि सरकारी नीतियों का सब से कठोर असर सीधे उन्हीं के जीवन पर पड़ा.
मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के राजनीतिक मानचित्र पर ईरान और अफगानिस्तान दो ऐसे देश हैं, जहां सत्ता और धर्म का गठजोड़ महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का प्रमुख औजार रहा है. हाल के वर्षों में ईरान की सड़कों पर औरतों का उग्र प्रतिरोध और अफगानिस्तान में उन की जबरन खामोशी दोनों मिल कर यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या दमन हर जगह एकजैसा काम करता है?

1979 की इसलामी क्रांति के बाद ईरान में ‘इसलामी नैतिकता’ के नाम पर महिलाओं पर सख्त नियम थोपे गए. इसलामी क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया गया. इसे लागू करने के लिए ‘मोरल पुलिस’ बनाई गई, जो सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की निगरानी करती है. बुर्के के बाहर बाल दिखने, कपड़े ‘अनुचित’ होने या मेकअप तक पर गिरफ्तारी और हिंसा की खबरें आना ईरान में आम बात हो गई.

2022 में 23 वर्षीया स्टूडैंट महसा अमीनी ने इस दबाव को चुनौती दी. उस ने बाल कटवाए और अपने कटे बालों को खुली हवा में लहराते हुए सड़कों पर चक्कर लगाए. ईरान की मोरल पुलिस ने महसा को गिरफ्तार कर लिया और उसे इतना प्रताड़ित किया गया कि कस्टडी में उस की मौत हो गई. महसा की मौत के बाद भड़का आंदोलन केवल हिजाबविरोध नहीं था, बल्कि यह सत्ता के उस धार्मिकराजनीतिक गठजोड़ को चुनौती थी जिस की वैधता डर पर टिकी है. महसा अमीनी की हिरासत में हुई मौत ने पूरे ईरान को झकझोर दिया. यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं थी, यह उस सिस्टम का प्रतीक थी जो महिलाओं को नियंत्रित करता है.
नारा उभरा: “औरत, जिंदगी, आजादी”- और आंदोलन देशव्यापी बन गया. इतिहास गवाह है कि जब सत्ता महिलाओं के सिर पर धर्म और नैतिकता का बोझ रख कर उन्हें नियंत्रित करना चाहती है, तो वही नैतिकता आखिरकार प्रतिरोध का हथियार बन जाती है. यही ईरान में हुआ और हो रहा है.
धर्म की सत्ता सब से पहले औरतों पर नकेल कसती है. उन के जरिए पूरे परिवार और फिर पूरे समाज को धर्म के चक्रव्यूह में फंसाती है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि कोई भी शासन डर पैदा कर के ज्यादा दिन नहीं टिक सकता है. आज ईरान की सड़कों पर और अफगानिस्तान की खामोश गलियों में जो संघर्ष चल रहा है, वह सिर्फ महिलाओं का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह देश के भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई है.
सवाल यह नहीं कि ये आंदोलन जीतेंगे या नहीं, सवाल यह है कि दुनिया कब यह मानेगी कि औरतों की आजादी किसी समाज के पतन का नहीं, बल्कि उस के परिपक्व होने का संकेत होती है. ईरानी महिलाओं का संघर्ष सिर्फ हिजाब के खिलाफ नहीं, बल्कि गरिमा, बराबरी और अपने जीवन पर अधिकार की लड़ाई है. धार्मिक सत्ता द्वारा बारबार आंदोलनों का दमन करने के बावजूद उठ खड़े होने वाले आंदोलन दिखाते हैं कि समाज में बदलाव की आकांक्षा को दबाया नहीं जा सकता है.
ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सत्ता की सख्ती और समाज की बेचैनी आमनेसामने दिखाई दे रही है. हालिया महीनों में महिलाओं के नेतृत्व में उभरे विरोधप्रदर्शन, युवाओं की मुखरता और आर्थिक दबावों ने इसलामी गणराज्य की शासनव्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. यह केवल सड़कों पर उतर आए ग़ुस्से की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध की टूटन का संकेत है जिस पर दशकों से सत्ता टिकी रही.
खामेनेई सरकार की कुनीतियां न सिर्फ औरत की हस्ती, आजादी और गरिमा के खिलाफ हैं, बल्कि धर्म और सत्ता को बचाने में लगी यह सरकार आम जनता, खासकर युवाओं, की जिंदगी सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है. एक तरफ जहां अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने देश में महंगाई और बेरोजगारी को चरम बिंदु पर पंहुचा दिया है, वहीं पढ़ेलिखे ईरानी युवाओं को अपना भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नजर आ रहा है.
ईरान इस वक्त क्रांति की आग में जल रहा है जहां लोग इसलामी गणराज्य के खामेनेई शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर हैं. खामेनेई 1989 से अब तक 37 साल से सत्ता में हैं. इस पूरे काल में ईरान आर्थिक संकट, भारी महंगाई, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों, बेरोजगारी, मुद्रा गिरावट और लगातार जनआंदोलनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझता रहा. मौजूदा आर्थिक बदहाली और सख्त धार्मिक शासन से नाराज लोग अब बदलाव चाहते हैं.
खामेनेई सरकार अपने खिलाफ हो रहे उग्र प्रदर्शनों से घबराई हुई है और आंदोलन को कुचलने के लिए पूरा जोर लगा रही है. बीते एक हफ्ते में ईरान में 600 से ज्यादा लोगों की जान पुलिस की गोलियों से जा चुकी है और हजारों की संख्या में लोग घायल हुए हैं. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी खामेनेई को लगातार धमका रहे हैं कि यदि प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई तो वे ईरान पर हमला करेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान सरकार प्रदर्शनों को रोकने के लिए रेड लाइन पार कर रही है. अमेरिका ‘कड़े विकल्पों’ पर विचार कर रहा है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘ईरान आजादी की ओर देख रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ. हम ईरान के लोगों की मदद के लिए तैयार है.’
पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान में प्रदर्शनकारियों के साथ जो हो रहा है, उस पर अमेरिका की नजर है. उधर ईरान ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह अमेरिकी सैनिकों और इजराइल को निशाना बनाएगा.
ईरान में खामेनेई सरकार के खिलाफ विरोधप्रदर्शन के बीच कई शहरों में राजशाही के लिए नारे और ‘पहलवी वापस आएं’ जैसे स्लोगन भी सुने जा रहे हैं. रजा पहलवी, जिन्हें क्राउन प्रिंस भी कहा जाता है, ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे हैं और लगभग 50 वर्षों से अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. उन्होंने लंबे समय से ईरान में धार्मिक शासन यानी इसलामिक रिपब्लिक के खिलाफ आवाज उठाई है और लोकतांत्रिक बदलाव की वकालत की है. हालांकि ईरान की जनता देश में एक बार फिर राजशाही बहाल करने के समर्थन में नहीं है लेकिन वह एक अच्छे लोकतंत्र का सपना जरूर देख रही है. ‘शाह वापस आए’ या ‘पहलवी’ जैसे नारे फिलहाल इसलामी गणतंत्र के प्रति गहरे आक्रोश की अभिव्यक्ति है. ये नारे बता रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था से लोग कितने निराश हैं.
ईरान का असली संघर्ष धार्मिक तानाशाही बनाम नागरिक स्वतंत्रता ही है. ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.
ईरान की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा, शिक्षित और वैश्विक दुनिया से जुड़ा है. इंटरनैट, विज्ञान, कला और तकनीक के युग में वे ऐसे राज्य की चाह रखते हैं जो ज्ञान, नवाचार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दे, न कि आम आदमी की जीवनशैली पर नियंत्रण करे. महिलाएं इस परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में हैं. हिजाब, पहनावे और निजी जीवन पर नियंत्रण के खिलाफ उन का संघर्ष असल में नागरिक गरिमा और बराबरी की मांग है, जो किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद है.
ईरान में जारी आंदोलन भारत के लिए केवल एक विदेशी घटना नहीं है, बल्कि एक गहरी चेतावनी और सीख है. यह आंदोलन बताता है कि जब राज्य, धर्म और सत्ता मिल कर नागरिकों- खासतौर पर महिलाओं, की आज़ादी को कुचलते हैं तो समाज के भीतर असंतोष लंबे समय तक दबा नहीं रह सकता है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता खतरनाक साबित हो सकता है. ईरान में हिजाब जैसे निजी मामलों को राज्य द्वारा नियंत्रित किया गया. भारत में भी यदि पहनावे, खानपान, प्रेम, विवाह या विचार पर नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो लोकतंत्र खोखला होगा.
धर्म और सत्ता का घालमेल लोकतंत्र को नष्ट करता है. ईरान में धार्मिक सत्ता ने संविधान, कानून और जीवनशैली पर कब्जा कर लिया. भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, यह उस की सब से बड़ी ताकत है. इस से किसी भी तरह का समझौता भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है. महिला परिवार की धुरी है, इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि महिलाओं की आजादी ही लोकतंत्र की असली कसौटी है. ईरान के आंदोलन की अगुआई महिलाओं ने की. यह दिखाता है कि जब महिलाओं के अधिकार छीने जाते हैं तो समाज का संतुलन टूटता है. भारत में महिलाओं की शिक्षा, काम, आवाज और सुरक्षा पर किसी भी तरह का अंकुश लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है.
कोई भी शासक लंबे समय तक तभी टिकता है जब वह डर से नहीं बल्कि सहमति से अपना शासन चलाता है. ईरान की सत्ता दमन, गिरफ्तारी और हिंसा के बल पर टिकी है. भारत को याद रखना होगा कि लोकतंत्र बहुमत से नहीं, अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है और असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती. ईरान में युवा पीढ़ी आधुनिक, वैश्विक और सवाल करने वाली है. भारत की भी विशाल युवा आबादी है. यदि उन की आकांक्षाओं, रोजगार और स्वतंत्र सोच को दबाया गया, तो असंतोष ही बढ़ेगा, रामराज्य स्थापित नहीं होगा. ईरान का आंदोलन बताता है कि आजादी छीनी जा सकती है, पर इच्छा नहीं. भारत के लिए यह समय आत्ममंथन का है, ताकि वह धार्मिक कठोरता, सांस्कृतिक नैतिकता के नाम पर दमन और असहमति के दमन की राह पर न जाए. लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, नागरिक स्वतंत्रता से जीवित रहता है. Iranian Women Protest





