Bangladesh Crisis : भारत ने जिस पड़ोसी को कभी पाकिस्तानी टैंकों के नीचे से निकाल कर खड़ा किया, वही बंगलादेश आज नफरत की आग में झुलस रहा है और दिल्ली से ढाका तक सत्ता और सियासत मानो उस आग पर पानी नहीं, पैट्रोल डालने की होड़ में लगी हैं. शेख हसीना को पनाह, मुहम्मद यूनुस की कमजोर अंतरिम हुकूमत, जमात ए इसलामी और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तूफान के बीच फंसा बंगलादेश जब विकास से विनाश की तरफ लुढ़क रहा है तब भारत आईपीएल की नीलामी, टीवी प्रसारण और ‘देशद्रोह’ के नारों में उलझ हुआ है.

1947 में आजाद होने के बाद से ही पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से पर जबरन भाषा और तहजीब थोपना चाहता था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान की जनता अपने ऊपर थोपी जा रही इस भाषाई गुलामी के खिलाफ थी. दशकों तक संघर्ष चला. 1971 से पहले के पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की क्रूरता से लाखों लोग मारे गए और लाखों शरणार्थी भारत में आए. भारत ने न केवल इन शरणार्थियों को अपनाया बल्कि बंगलादेश की आजादी के सिपाहियों को ट्रेनिंग दी और हथियार दिए.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश के मुद्दे को उठाया और बंगलादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जो 13 दिनों में समाप्त हो गया. इस तरह बंगलादेश को पाकिस्तान से आजादी मिल गई. यही कारण है कि बंगलादेश 2024 तक भारत का सब से हिमायती मुल्क बना रहा.

1971 में बंगलादेश को आजादी दिलाने के बाद भारत ने बंगलादेश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी मदद की. भारत ने बंगलादेश को लगभग 8 अरब डौलर का कर्ज दिया. भारत की ओर से भेंट की गई यह मदद बंगलादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और ट्रेड को बढ़ाने में इस्तेमाल की गई. बंगलादेश की 15 प्रतिशत बिजली भारत से जाती है, इस से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है. भारत ने बंगलादेश में रेल, सड़क और पोर्ट के प्रोजैक्ट्स में भी मदद की जिस से बंगलादेश की इकोनौमी और मजबूत हुई. 2021 से 2023 के बीच भारत ने सालाना 200-300 करोड़ रुपए की मदद दी. हालांकि, बंगलादेश की इकोनौमी में तेजी मैन्युफैक्चरिंग की वजह से आई है लेकिन भारत ने बड़े भाई की तरह हर मुश्किल वक्त में बंगलादेश की मदद की है पर बीते 2 वर्षों में हालात बिलकुल बदल चुके हैं.

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