Ikkis Movie Review : आजकल रूस-यूक्रेन युद्ध जोरों पर है. रोजाना हजारों सैनिक मारे जा रहे हैं. पाकिस्तान की फौज बलूच फौजों से डर कर पीछे हट रही है और हथियार छोड़ कर भाग रही है. इसी तरह अन्य कई देशों में लड़ाइयां छिड़ी हुई हैं. जिन में फौजी जूझ रहे हैं, गोलियों को झेल कर मर रहे हैं. जिस की गति वही जाने, बड़े फौजी अकसर तो सिर्फ हुक्म देना जानते हैं, बेचारे फौजियों पर क्या गुजरती है, यह तो वही जानते हैं. अपने देश के खातिर भूखेप्यासे रह कर भी वे फ्रंट पर बहादुरी से लड़ते हैं और कुछ तो शहीद तलक हो जाते हैं.
ऐसे ही एक युद्ध की कहानी पर श्रीराम राघवन ने फिल्म ‘इक्कीस’ बनाई है. फिल्म में युद्ध के कई सीन ऐसे हैं जो झकझोरते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर युद्ध होते क्यों हैं ?
फिल्म 1971 के भारतपाक युद्ध के नायक बहुत कम उम्र में शहीद हुए सैकंड लैफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बायोपिक है, जिस में उन के शौर्य को दर्शाया गया है. उस वक्त वो महज 21 वर्ष के थे. वैसे फिल्म में देशभक्ति व इमोशनल ड्रायर भी भरपूर है. इस फिल्म में दिवंगत धर्मेंद्र ने भी अभिनय किया है. यह उन की आखिरी फिल्म है. उन के संवाद भावुक बन पड़े हैं. यह सिर्फ एक बायोपिक नहीं बल्कि साहस, बलिदान और रिश्तों की भी बात करती है.
कहानी की शुरुआत अरुण के 21 वें जन्मदिन से होती है. सैन्य अधिकारियों को उन की रेजिमैंट में लौटने का आदेश मिलता है. अरुण (अगस्त्य नंदा) सोचने लगता है कि क्या लड़ाई होने वाली है. कहानी 30 साल आगे बढ़ती है.
वर्ष 2002 में 80 वर्षीय ब्रिगेडियर मदन लाल (धर्मेंद्र) 3 दिन की पाकिस्तान यात्रा पर आते हैं. वह अपने पैतृक गांव गरगोधा में अपना घर देखने की ख्वाहिश रखते हैं. उन की मेजबानी पाकिस्तानी ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार (जयदीप अहलावत) करता है. ब्रिगेडियर मदनलाल को अपने पुराने दोस्तों से मिलता है, साथ ही वह उस मिट्टी को भी छूना चाहता है जहां भारतीय सेना के सैकंड लैफ्टिलैंट यानी उस का 21 साल का बेटा खेत्रपाल शहीद हुआ था. अरुण खेत्रपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र पाने का गौरव हासिल हुआ. मदन पाकिस्तान में निसार के घर में ठहरता है और अपने बेटे की वीरगाथा उसे सुनाता है. वही निसार जंग में अरुण के आमनेसामने था.
वर्तमान से अतीत में आतीजाती कहानी अरुण के जीवन की कई परतें खोलती है अरुण की मां (सुहासिनी मुते) उसे लड़ने की सीख दे कर विदा करती है. मोर्चे पर कमांडर हनूत सिंह (राहुल देव) उसे युद्ध में शामिल करने के लिए मना रहे होते हैं. वरिष्ठ सूबेदार सगत सिंह (1 सिकंदर खेर अरुण) को टैंट और युद्ध की रणनीति का प्रशिक्षण देते हैं. अरुण की योग्यतानुसार अरुण की रिजर्व के तौर पर युद्ध में शामिल कर लिया जाता है.
यहां पूरी कहानी मदन के नजरिए से चलती है. वह बताता है कि अरुण ने हाल ही में अपना 21वां जन्मदिन मनाया था. उसे किरण (सिमर भाटिया) से प्यार हो गया था. तभी 1971 के कारगिल युद्ध का ऐलान हो गया था. उसे फ्रंट पर भेजा गया था.
इस कहानी को कुछ इस तरह डेवलप किया गया है कि आप पहले अरुण को जानते हैं और फिर युद्ध की स्थिति को समझ पाते हैं. फिल्म को सिर्फ कार सीन अहलावत ने पूरी फिल्म में आप को इमोशनल बनाए रखा है. दोनों के कई सीन ऐसे हैं जो आप की आंखों में आंसू ला देंगे.
फिल्म की यह कहानी दिल छू लेने वाली है. फिल्म में मुख्य भूमिका अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने निभाई है. उस ने भरपूर मेहनत की है. अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया ने डेब्यू किया है. एक छोटे से सीन में आने वाले दीपक जेबरियाल और असरानी भी प्रभावित करते है. नसीरुद्दीन शाह के बेटे विवान शाह का काम भी अच्छा है.
फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. निर्देशक ने कार सीखैए और इमोशंस दोनों को बराबर जगह दी है. फिल्म की कहानी खास है. यह सिर्फ अरुण खेत्रपाल की कहानी नहीं है बल्कि इसे में भारतपाक के विभाजन का दुख भी दिखाया गया है. युद्ध के दृश्य कमजोर हैं, संपादन में भी गड़बड़ियां हैं. बैकग्राउंड संगीत अच्छा है ‘बन के, देखा इक्कीस’ गाना जोश भरता है.
फिल्म के अंत में दिखाया गया डिस्क्लेमर जरूर देखें. यदि आप इमोशनल और शांत स्वभाव वाली फिल्म नहीं देख पाते तो यह आप के लिए नहीं है. हां, सच्चे फौजी के शौर्य और बलिदान को याद करने के लिए इसे देखा जा सकता है, खास कर धर्मेंद्र के लिए सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Ikkis Movie Review :





