रूस में रविवार को हुए संसदीय चुनाव में व्लादिमीर पुतिन की पार्टी ने स्टेट ड्यूमा की, जो कि रूसी संसद का निचला सदन है, तीन-चौथाई सीटें जीत लीं और शेष सीटों पर भी उनके प्रति वफादार पार्टियों के उम्मीदवार ही विजयी हुए. यह नतीजा इस सबके बावजूद आया है कि रूस आर्थिक मंदी का शिकार है, उसके खिलाफ पश्चिमी मुल्कों ने आर्थिक प्रतिबंध लगा रखा है और देश के भीतर कुछ इलाकों में नागरिक आजादी के सरकारी दमन के खिलाफ बवाल जारी है. आखिर यह क्या है?

सोवियत संघ के विघटन के 25 वर्षों के बाद ऐसा लगता है कि रूस एक चक्र पूरा करके छद्म-संसद के दौर में फिर लौट आया है, जिसका एकमात्र काम वर्चस्ववादी शासक को वैधता प्रदान करना है. सोवियत संघ के विघटन के बाद के संविधान ने सांसदों की बजाय राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल को पहले ही काफी सारे अधिकार सौंप दिए थे, बस ड्यूमा एक मंच था, जहां विपक्ष क्रेमलिन से सवाल कर सकता था और उसकी नीतियों की आलोचना कर सकता था. मगर अब यह मंच भी गया.

यह सही है कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के तौर पर 17 साल के कार्यकाल के बाद पुतिन को करीब 80 फीसदी रूसियों की हिमायत हासिल है. यह चौंकाने वाली बात है. इसके मूल में उनका वह प्रजानायकीय दावा है कि वह रूस को अमेरिका के बराबर खड़ा करके रहेंगे. पुतिन रूस की तमाम मुसीबतों के लिए अमेरिका को दोषी ठहराते रहे हैं और यह भी कहते हैं कि वह रूस को उसका गौरव दोबारा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि पुतिन के राजनीतिक विरोधियों को बड़े सुनियोजित तरीके से जेलों में बंद किया गया, देश से बाहर निकाला गया, उन्हें प्रताड़ित किया गया और कई बार तो उनकी हत्या भी हुई.

पुतिन छह साल के एक और राष्ट्रपति काल के लिए आजाद हैं. उनका मौजूदा कार्यकाल अगले साल तक है. तब तक सत्ता पर उनका शिकंजा और कस चुका होगा. रूस के तमाम संसदीय चुनाव वास्तव में यही दिखाते हैं कि जिन रूसियों ने सच्चे लोकतंत्र के लिए कभी कोशिश की थी, वे या तो कुचल दिए गए या फिर हाशिये पर डाल दिए गए.

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